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कब और क्यों- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘When And Why’ का भावानुवाद-

 

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

कब और क्यों

 

जब मैं लाता हूँ तुम्हारे लिए रंगीन खिलौने, मेरे बच्चे, तब मैं समझता हूँ कि क्यों
रंगों का ऐसा उत्सव -बादलों में, जल स्रोतों के ऊपर छाता है, और क्यों पुष्प
रंगीन आभा से युक्त होते हैं, जब मैं तुम्हे रंगीन खिलौने देता हूँ, मेरे बच्चे।
जब मैं गीत गाता हूँ, तुम्हे नचाने के लिए, मैं जानता हूँ कि क्यों वास्तव में संगीत है-
पत्तियों में, और क्यों लहरें, अपनी ध्वनियों के समवेत स्वर भेजती हैं, सुन रही पृथ्वी के
हृदय तक –जब मैं तुम्हे नचाने के लिए गीत गाता हूँ।
जब मैं तुम्हारे ललचाते हाथों के लिए, मिष्ठान्न लाता हूँ, मैं जानता हूँ
कि पुष्प के गर्भ में शहद क्यों मौज़ूद है, और क्यों फलों में गुप्त रूप से
मधुर रस भर जाता है-जब मैं तुम्हारे ललचाते हाथों के लिए
मिष्ठान्न लाता हूँ।.
जब मैं तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए, तुम्हारा मुख चूमता हूँ, मेरे प्रिय, मैं
खूब समझता हूँ, कैसा आनंद, आकाश से सुबह के प्रकाश में प्रवाहित होता है और
कैसा उल्लास, ग्रीष्म की हवा मेरे शरीर में लाती है, जब मैं तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए,                                             तुम्हारा मुख चूमता हूँ।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

When And Why

 

When I bring you coloured toys, my child, I understand why there
is such a play of colours on clouds, on water, and why flowers are
painted in tints-when I give coloured toys to you, my child.
When I sing to make you dance, I truly know why there is music
in leaves, and why waves send their chorus of voices to the heart
of the listening earth-when I sing to make you dance.
When I bring sweet things to your greedy hands, I know why
there is honey in the cup of the flower, and why fruits are
secretly filled with sweet juice-when I bring sweet things to your
greedy hands.
When I kiss your face to make you smile, my darling, I surely
understand what pleasure streams from the sky in morning light, and
what delight the summer breeze brings to my body-when I kiss you
to make you smile.

 

Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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केवल तुम – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Only Thee’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 

केवल तुम

 

यह कि मैं केवल तुम्हे चाहता हूँ- मेरे हृदय को निरंतर यह दोहराने दो।
ऐसी सभी इच्छाएं, जो दिन-रात मेरा ध्यान भटकाती हैं,
मिथ्या और सिरे से शून्य हैं।

 

जब रात अपने विषाद के घेरे में घिरी रहती है, प्रकाश के लिए याचना,
मेरी बेसुधी की गहराई में भी यह आर्त्त पुकार गूंजती है
—`मैं तुमको चाहता हूँ, केवल तुम्हे’।

 

और जब तूफान अभी भी शांत परिवेश में अपने अंत की प्रतीक्षा कर रहा है
जब वह अपनी पूरी शक्ति के साथ शांति पर चोट करता है,
ऐसे में भी मेरा विद्रोह, आपके प्रेम पर चोट करता है
और तब भी यह पुकार गूंजती है
—`मैं तुम्हे चाहता हूँ, सिर्फ तुमको’।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Only Thee

 

That I want thee, only thee—let my heart repeat without end.
All desires that distract me, day and night,
are false and empty to the core.
As the night keeps hidden in its gloom the petition for light,
even thus in the depth of my unconsciousness rings the cry
—`I want thee, only thee’.
As the storm still seeks its end in peace
when it strikes against peace with all its might,
even thus my rebellion strikes against thy love
and still its cry is
—`I want thee, only thee’.

Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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आखिरी सौदा- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Last Bargain’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आखिरी सौदा

 

 

 

“आओ मुझे काम पर रख लो,” मैं चिल्लाया, जब सुबह मैं पथरीले मार्ग पर चल रहा था।
हाथों में तलवार लिए, राजा वहाँ आया अपने रथ पर सवार।
उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “मैं अपनी शक्ति के आधार पर तुम्हें काम पर रखूंगा।”
लेकिन उसकी शक्ति शून्य मात्र निकली, और वह अपने रथ में वापस चला गया।

 

दोपहर की गर्मी भरी धूप में, सभी घरों के दरवाजे बंद थे।
मैं घुमावदार गलियों में घूमता रहा।
एक बूढ़ा आदमी अपने सोने से भरी थैली के साथ आया।
उसने विचार करके कहा, “मैं अपने धन से तुम्हे काम पर रखूंगा।”
उसने एक-एक करके अपने सिक्कों को गिना, लेकिन फिर वापस घूम गया।

 

शाम का समय था। बगीचे की बाड़ फूलों से लदी थी।
एक सुंदर लड़की बाहर आई और बोली, “मैं तुम्हे एक मुस्कान के बल पर सेवक बना लूंगी।”
उसकी मुस्कान फीकी पड़ी और आंसुओं में बह गई, फिर वह अंधेरे में वापस लौट गई।

 

सूर्य की किरणें कुछ देर तक रेत पर चमकीं, और समुद्र की लहरें सीमा पार कर रास्ते की तरफ बढ़ गईं।
एक बच्चा बैठा शंख-सीपियों से खेल रहा था।
उसने सिर उठाया, लगा कि वह मुझे जानता है, वह बोला, “मैं बिना कुछ दिए, तुम्हे सेवक बनाता हूँ।“
उस समय  से ही, बच्चे के खेल में हुआ सौदा लागू हो गया  और मैं एक मुक्त मनुष्य बन गया।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

 

The Last Bargain

 

“Come and hire me,” I cried, while in the morning I was walking on the stone-paved road.
Sword in hand, the King came in his chariot.
He held my hand and said, “I will hire you with my power.”
But his power counted for nought, and he went away in his chariot.

 

In the heat of the midday the houses stood with shut doors.
I wandered along the crooked lane.
An old man came out with his bag of gold.
He pondered and said, “I will hire you with my money.”
He weighed his coins one by one, but I turned away.

 

It was evening. The garden hedge was all aflower.
The fair maid came out and said, “I will hire you with a smile.”
Her smile paled and melted into tears, and she went back alone into the dark.

 

The sun glistened on the sand, and the sea waves broke waywardly.
A child sat playing with shells.
He raised his head and seemed to know me, and said, “I hire you with nothing.”
From thenceforward that bargain struck in child’s play made me a free man.

 

Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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ऐसा है स्वभाव प्रेम का- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘On The Nature Of Love’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 

ऐसा है स्वभाव प्रेम का!   

 

अंधियारी रात है और जंगल का कोई अंत नहीं है;
लाखों लोग यहाँ विचरते हैं, लाखों तरीकों से,
हमको इस अंधकार में अपनी निर्धारित गुप्त मुलाक़ात करनी हैं, परंतु कहाँ
और किसके साथ- इसकी हमको जानकारी नहीं है।
परंतु यह आस्था है हमारी – कि हमारे जीवन काल का यह परमानंद
किसी भी क्षण, अपने होठों पर मुस्कान लिए, अवतरित हो सकता है।
अनेक गंध, स्पर्श, ध्वनियां, गीतों की कड़ियां,  
हमको सहलाते हुए निकट से गुजरती हैं, हमें सुखद झटके देती हैं।
तभी अकस्मात बिजली सी कौंधती है:
उस क्षण मैं जिसको भी देखता हूँ, उससे मुझे प्रेम हो जाता है।
मैं उस व्यक्ति को पुकारता हूँ और चिल्लाता हूँ: जीवन सौभाग्यपूर्ण है!
तुम्हारे लिए ही मैं मीलों चलकर आया हूँ!
अन्य सभी, जो पास आए और फिर दूर चले गए,   
अंधकार में- मुझे नहीं मालूम कि वे अस्तित्व में हैं भी या नहीं।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

On The Nature Of Love

 

The night is black and the forest has no end;
a million people thread it in a million ways.
We have trysts to keep in the darkness, but where
or with whom – of that we are unaware.
But we have this faith – that a lifetime’s bliss
will appear any minute, with a smile upon its lips.
Scents, touches, sounds, snatches of songs
brush us, pass us, give us delightful shocks.
Then peradventure there’s a flash of lightning:
whomever I see that instant I fall in love with.
I call that person and cry: `This life is blest!
for your sake such miles have I traversed!’
All those others who came close and moved off
in the darkness – I don’t know if they exist or not.

 

Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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मुस्कुराते बैठे रहते हो- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Sit Smiling’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

मुस्कुराते बैठे रहते हो!

 

मैंने लोगों के बीच शेखी बघारी कि अब मैं तुम्हे जानता हूँ।
वे मेरी सभी कृतियों में तुम्हारे चित्र देखते हैं।
वे आकर पूछते हैं, ”कौन है वह?”
 मैं नहीं जानता कि उनको कैसे उत्तर दूं, लेकिन मैं कहता हूँ,                                                                                                                          ‘बेशक, मैं नहीं बता सकता।“
वे मुझ पर दोष लगाते हैं और घृणापूर्वक चले जाते हैं।
और तुम वहाँ बैठे मुस्कुराते रहते हो।

 

मैं तुमसे संबंधित अपने किस्सों को अमर गीतों में पिरोता हूँ।
रहस्य, मेरे हृदय से अचानक बाहर निकल आता है।
वे आते हैं और मुझसे पूछते हैं, `अपने सभी आशय हमें बताओ।‘
मैं नहीं जानता कि उनको इसका उत्तर कैसे दूं।
मैं कहता हूँ, `अरे, कौन कह सकता है कि उनका अर्थ क्या है!”
वे मुस्कुराते हैं और घोर तिरस्कार के साथ दूर चले जाते हैं।
और तुम वहाँ बैठे मुस्कुराते रहते हो।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Sit Smiling

 

I boasted among men that I had known you.
They see your pictures in all works of mine.
They come and ask me, `Who is he?’
I know not how to answer them. I say, `Indeed, I cannot tell.’
They blame me and they go away in scorn.
And you sit there smiling.
I put my tales of you into lasting songs.
The secret gushes out from my heart.
They come and ask me, `Tell me all your meanings.’
I know not how to answer them.
I say, `Ah, who knows what they mean!’
They smile and go away in utter scorn.
And you sit there smiling.

 

Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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अंत- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The End’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

   

अंत

 

ये मेरे जाने का समय है मां; मैं जा रहा हूँ।
अकेलेपन से भरी भोर में, जब तुम अपनी बाहें फैलाओगी
बिस्तर में लेटे शिशु को छूने के लिए, तब मैं कहूंगा, “शिशु यहाँ
नहीं है मां!”- मैं जा रहा हूँ।
मैं हवा का एक नाज़ुक झौंका बनकर तुमको सहलाऊंगा, और
जब तुम स्नान करोगी तब मैं पानी की लहरें बन जाऊंगा, और तुमको
बार-बार चूमूंगा।
तेज हवाओं वाली रात में, वर्षा की बूंदें पत्तियों पर पटपटाएंगी, तुम
सुनोगी मुझे फुसफुसाते हुए अपने बिस्तर में, और मेरी हंसी खुली खिड़की से,
आकाशीय बिजली के साथ पूरे कमरे में कौंध जाएगी।
अगर तुम जागती लेटी रहोगी, देर रात तक, अपने शिशु के बारे में सोचते हुए
तब मैं सितारों के बीच से तुम्हारे लिए गाऊंगा, “सो जाओ, मां, सो जाओ।“from the stars।
चंद्रमा की भटकती किरणों में से, एक को साथ लेकर, मैं आऊंगा तुम्हारे बिस्तर पर, और
तुम्हारी छाती पर लेटा रहूंगा, जब तुम सो रही होंगी।
मैं एक स्वप्न बन जाऊंगा, और तुम्हारी हल्की सी खुली पलक से
तुम्हारी नींद की गहराइयों में चला जाऊंगा, और जब तुम जागोगी
और अचंभित होकर चारों तरफ देखोगी, तब मैं एक चमकते जुगनू की तरह
अंधकार में उड़ जाऊंगा।
और जब पूजा के पावन पर्व में, पड़ौस के बच्चे आएंगे
और घर में खेलेंगे, तब मैं घुलकर बांसुरी की
धुन में मिल जाऊंगा, और पूरा दिन तुम्हारे दिल की धड़कन बना रहूंगा।
जब प्रिय चाचियां पूजा के उपहार लेकर आएंगी, और पूछेंगी, “कहां
है तुम्हारा शिशु, दीदी?” मां, तब तुम मृदुल स्वर में कहना, “वह
मेरी आंखों की पुतलियों में, मेरे शरीर और मेरी आत्मा में है।”

 

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

The End

It is time for me to go, mother; I am going.
When in the paling darkness of the lonely dawn you stretch out
your arms for your baby in the bed, I shall say, “Baby is not
here!”-mother, I am going.
I shall become a delicate draught of air and caress you and
I shall be ripples in the water when you bathe, and kiss you and
kiss you again.
In the gusty night when the rain patters on the leaves you
will hear my whisper in your bed, and my laughter will flash with
the lightning through the open window into your room.
If you lie awake, thinking of your baby till late into the
night, I shall sing to you from the stars, “Sleep, mother, sleep.”
One the straying moonbeams I shall steal over your bed, and
lie upon your bosom while you sleep.
I shall become a dream, and through the little opening of your
eyelids I shall slip into the depths of your sleep; and when you
wake up and look round startled, like a twinkling firefly I shall
flit out into the darkness.
When, on the great festival of puja, the neighbours’ children
come and play about the house, I shall melt into the music of the
flute and throb in your heart all day.
Dear auntie will come with puja-presents and will ask,”Where
is our baby, sister?” Mother, you will tell her softly, “He is in
the pupils of my eyes, he is in my body and in my soul.”

.
Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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कठोर दयालुता- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Strong Mercy’ का भावानुवाद-

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

कठोर दयालुता

 

मेरी इच्छाएं बहुत हैं और मेरी पुकार अति कातर है,
परंतु हमेशा तुमने मेरी रक्षा की है अपने कठोर इंकार से;
और यह कठोर उदारता मेरे जीवन में गहरे, बहुत गहरे पैठ गई है।

 

दिन प्रतिदिन तुम मुझे अपने दिए हुए उन सामान्य परंतु महान उपहारों के योग्य बनाते जाते हो,
जो तुमने मुझे बिना मांगे ही प्रदान किए हैं- यह आकाश और प्रकाश, यह शरीर और
यह मस्तिष्क—और इस प्रकार तुमने मुझे अत्यधिक इच्छाओं के खतरों से बचा लिया है।

 

ऐसे भी अवसर आए हैं जब मैं सुस्ती से पड़ा रहा हूँ,
और ऐसे भी जब मैं अचानक जागा हूँ और अपने लक्ष्य को खोज में तेजी से दौड़ा हूँ;
परंतु तुमने निर्दयतापूर्वक स्वयं को मुझसे छिपा लिया है।

 

दिन प्रतिदिन तुम मुझे इस योग्य बना रहे हो कि तुम मुझे पूरी तरह स्वीकार कर सको,
इसके लिए तुम हमेशा बार-बार, इंकार कर देते हो, जिससे मैं अनिश्चित इच्छाओं के कारण होने वाले संकट से बचा रहूं।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Strong Mercy

 

My desires are many and my cry is pitiful,
but ever didst thou save me by hard refusals;
and this strong mercy has been wrought into my life through and through.

 

Day by day thou art making me worthy of the simple,
great gifts that thou gavest to me unasked—this sky and the light, this body and the
life and the mind—saving me from perils of overmuch desire.

 

There are times when I languidly linger
and times when I awaken and hurry in search of my goal;
but cruelly thou hidest thyself from before me.

 

Day by day thou art making me worthy of thy full acceptance by
refusing me ever and anon, saving me from perils of weak, uncertain desire.

.
-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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बहती हवा – रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Passing Breeze’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

बहती हवा

 

 

हाँ, मुझे मालूम है, यह और कुछ नहीं तुम्हारा प्रेम ही है,
ओ मेरे हृदय के प्रियतम —यह सुनहरी रोशनी, जो पत्तियों पर नृत्य करती है,
वे आलसी बादल, जो आकाश के आर-पार तैरते हैं,
यह बहती हवा जो मेरे मस्तक पर अपनी शीतलता छोड़ जाती है।

 

सुबह की रोशनी ने मेरी आंखों को चकाचौंध कर दिया है—                                                                                                                                यह तुम्हारा संदेश है,  मेरे हृदय के लिए।
तुम्हारा चेहरा आकाश में दिख रहा है, तुम्हारी आंखें, मेरी आंखों मे झांकती हैं,
और मेरा हृदय ने तुम्हारे चरणों को छू लिया है।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Passing Breeze

 

Yes, I know, this is nothing but thy love,
O beloved of my heart—this golden light that dances upon the leaves,
these idle clouds sailing across the sky,
this passing breeze leaving its coolness upon my forehead.
The morning light has flooded my eyes—this is thy message to my heart.
Thy face is bent from above, thy eyes look down on my eyes,
and my heart has touched thy feet.

.
-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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घर तक की यात्रा – रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Journey Home’ का भावानुवाद-

 

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

घर तक की यात्रा

 

मेरी यात्रा में बहुत समय लगता है और रास्ता भी बहुत लंबा है।

 

मैं प्रकाश की प्रथम किरण के रथ पर बाहर आया, और मैंने निहारा-
अनेक दुनियाओं से होकर गुजरे अपने सफर को, जिसने अनेक तारों और उपग्रहों पर अपनी यात्रा के निशान छोड़े।

 

यह सबसे लंबा रास्ता  है, जिससे होकर आप स्वयं के सबसे निकट पहुंचते हैं,
और यह प्रशिक्षण भी बहुत जटिल है, जिसके माध्यम से हम धुन की .जटिल, सरलता तक पहुंचते हैं।

 

इस राह के यात्री को, अपने दरवाजे तक पहुंचने से पहले, हर पराये दरवाजे को खटखटाना पड़ता है,
और व्यक्ति को, अंततः अंतरतम में स्थापित मूर्ति तक पहुंचने से पहले, अन्य सभी बाहरी दुनियाओं की यात्रा करनी होती है।

 

मेरी आंखें अचंभित रह गईं, और इसके बाद ही मेरे मुंह से निकला ‘अरे तुम तो यहाँ पहुंच गए!’

 

और फिर यह प्रश्न और पुकार ‘अरे कहाँ’, आंसुओं की हजारों धाराओं के रूप में पिघल गए,
और उन्होंने दुनिया को ‘मैं हूँ’ की हुंकार भरी  बाढ़ से आश्वस्त कर दिया।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Journey Home

 

The time that my journey takes is long and the way of it long.
I came out on the chariot of the first gleam of light, and pursued my
voyage through the wildernesses of worlds leaving my track on many a star and planet.
It is the most distant course that comes nearest to thyself,
and that training is the most intricate which leads to the utter simplicity of a tune.
The traveler has to knock at every alien door to come to his own,
and one has to wander through all the outer worlds to reach the innermost shrine at the end.
My eyes strayed far and wide before I shut them and said `Here art thou!’
The question and the cry `Oh, where?’ melt into tears of a thousand
streams and deluge the world with the flood of the assurance `I am!’

.
-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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पुरातन और नूतन – गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Old And New’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 

 पुरातन और नूतन

 

तुमने मुझे परिचित कराया उन मित्रों से, जिनको मैं जानता नहीं था।
तुमने मुझे ऐसे घरों जा बिठाया, जो मेरे नहीं थे।
तुम दूर के लोगों को पास ले आए और अजनबी को बंधु बना दिया।

 

मेरे दिल में बहुत बेचैनी होती है, जब मुझे अपने बसेरे से दूर जाना होता है,                                                                                                      जिसकी मुझे आदत है;
मैं भूल जाता हूँ कि नये में भी पुराना वास करता है,
और वहाँ तुम भी रहते हो!

 

जन्म और मृत्यु के फेरे में, इस दुनिया में या किसी और में,
तुम मुझे जहाँ भी ले जाते हो, वहाँ तुम वही एक होते हो,
एकमात्र साथी मेरी अनंत जीवन-यात्रा के,
जो हमेशा मेरे हृदय को जोड़ते हो,                                                                                                                                                              अपरिचितों के साथ आनंद के बंधनों में,

 

जब कोई तुमको जान जाता है, तब कोई पराया नहीं रहता, कोई दरवाजा बंद नहीं रहता,
आह, मेरी प्रार्थना स्वीकार करो कि मैं,                                                                                                                                                              अनेकों के साथ क्रीड़ा में रत रहते हुए, कभी भी उस एक के स्पर्श मात्र से
मिलने वाले परमानंद को न भूल जाऊं।

 

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Old And New

Thou hast made me known to friends whom I knew not.
Thou hast given me seats in homes not my own.
Thou hast brought the distant near and made a brother of the stranger.

 

I am uneasy at heart when I have to leave my accustomed shelter;
I forget that there abides the old in the new,
and that there also thou abidest.

 

Through birth and death, in this world or in others,
wherever thou leadest me it is thou, the same,
the one companion of my endless life
who ever linkest my heart with bonds of joy to the unfamiliar.

 

When one knows thee, then alien there is none, then no door is shut.
Oh, grant me my prayer that I may never lose
the bliss of the touch of the one
in the play of many.

 

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-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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