ऐसे तुझे कौन गुज़रने देगा!

सब से जीती भी रहे सब की चहेती भी रहे,
ज़िन्दगी ऐसे तुझे कौन गुज़रने देगा|

वसीम बरेलवी

ज़िन्दगी आग भी है पानी भी!

दिल को शोलों से करती है सेराब,
ज़िन्दगी आग भी है पानी भी।

फ़िराक़ गोरखपुरी

उस हाल में जीना लाज़िम है!

वह मर्द नहीं जो डर जाए, माहौल के ख़ूनी मंज़र से,
उस हाल में जीना लाज़िम है, जिस हाल में जीना मुश्किल है|

अर्श मलसियानी

ईश्वर!

आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| जैसे ईश्वर हर जगह पहुँचने के लिए स्वतंत्र होते हैं उसी प्रकार कवि की स्वतंत्रता भी अनंत है| अब इस कविता में ही देखी सर्वेश्वर जी ने ईश्वर को कौन सी ड्रेस पहना दी और उससे क्या काम करवा लिया| एक अलग अंदाज़ में सर्वेश्वर जी ने इस कविता में अपनी बात काही है
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता –


बहुत बडी जेबों वाला कोट पहने
ईश्वर मेरे पास आया था,
मेरी मां, मेरे पिता,
मेरे बच्चे और मेरी पत्नी को
खिलौनों की तरह,
जेब में डालकर चला गया
और कहा गया,
बहुत बडी दुनिया है
तुम्हारे मन बहलाने के लिए।

मैंने सुना है,
उसने कहीं खोल रक्खी है
खिलौनों की दुकान,
अभागे के पास
कितनी जरा-सी पूंजी है
रोजगार चलाने के लिए।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ज़ाती मकान थोड़ी है!

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे,
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है|

राहत इन्दौरी

दृश्य घाटी में!

श्री ओम प्रभाकर जी हिन्दी के एक प्रमुख नवगीतकार हैं| उनका एक नवगीत मुझे बहुत पसंद है- ‘यात्रा के बाद भी पथ साथ रहते हैं’| आज मैं श्री ओम प्रभाकर जी का एक और सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें आज की विसंगतियों को उन्होंने एक अलग अन्दाज़ में प्रस्तुत किया है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत –

बीत गए दिन
फूल खिलने के।

होती हैं केवल वनस्पतियाँ
हरी-हरी-सी
हर गली
हर मोड़ पर बैठी
मौत अपनी बाँह फैलाकर।
बर्फ़-सा
जमता हुआ हर शख़्स
चुप्पियों में क़ैद हैं साँसें,
समय की नंगी सलीबों पर
गले में अटकी हुईं फाँसें,
लिख रहे हैं
लोग कविताएँ
नींद की ज्यों गोलियाँ खाकर।
बीत गए दिन
अब हवाओं में गन्धकेतु हिलने के
फूल खिलने के।

ढोती हैं काले पहाड़ दृष्टियाँ
सूर्य झर गए,
दृश्य घाटी में गहरे उतर गए,
बीत गए दिन
उठी बाँहों से बाँहों के मिलने के
फूल खिलने के।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सारा जग बंजारा होता!

लीजिए आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य जगत में गीतों के राजकुंवर के नाम से विख्यात स्वर्गीय गोपाल दास जी ‘नीरज’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, हिन्दी काव्य साहित्य और हिन्दी फिल्मों में भी उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से अमूल्य योगदान किया है| मैंने पहले भी नीरज जी के अनेक गीत शेयर की हैं और आशा है कि आगे भी करता रहूँगा|

लीजिए आज प्रस्तुत है नीरज जी का यह गीत-

प्यार अगर थामता न पथ में उँगली इस बीमार उमर की
हर पीड़ा वैश्या बन जाती, हर आँसू आवारा होता।


निरवंशी रहता उजियाला
गोद न भरती किसी किरन की,
और ज़िन्दगी लगती जैसे-
डोली कोई बिना दुल्हन की,
दुख से सब बस्ती कराहती, लपटों में हर फूल झुलसता
करुणा ने जाकर नफ़रत का आँगन गर न बुहारा होता।
प्यार अगर…


मन तो मौसम-सा चंचल है
सबका होकर भी न किसी का
अभी सुबह का, अभी शाम का
अभी रुदन का, अभी हँसी का
और इसी भौंरे की ग़लती क्षमा न यदि ममता कर देती
ईश्वर तक अपराधी होता पूरा खेल दुबारा होता।
प्यार अगर…


जीवन क्या है एक बात जो
इतनी सिर्फ समझ में आए-
कहे इसे वह भी पछताए
सुने इसे वह भी पछताए
मगर यही अनबूझ पहेली शिशु-सी सरल सहज बन जाती
अगर तर्क को छोड़ भावना के सँग किया गुज़ारा होता।
प्यार अगर…


मेघदूत रचती न ज़िन्दगी
वनवासिन होती हर सीता
सुन्दरता कंकड़ी आँख की
और व्यर्थ लगती सब गीता
पण्डित की आज्ञा ठुकराकर, सकल स्वर्ग पर धूल उड़ाकर
अगर आदमी ने न भोग का पूजन-पात्र जुठारा होता।
प्यार अगर…


जाने कैसा अजब शहर यह
कैसा अजब मुसाफ़िरख़ाना
भीतर से लगता पहचाना
बाहर से दिखता अनजाना
जब भी यहाँ ठहरने आता एक प्रश्न उठता है मन में
कैसा होता विश्व कहीं यदि कोई नहीं किवाड़ा होता।
प्यार अगर..
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हर घर-आँगन रंग मंच है
औ’ हर एक साँस कठपुतली
प्यार सिर्फ़ वह डोर कि जिस पर
नाचे बादल, नाचे बिजली,
तुम चाहे विश्वास न लाओ लेकिन मैं तो यही कहूँगा
प्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता।
प्यार अगर…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है!

काफी लंबे अंतराल के बाद मैं आज फिर से स्वर्गीय बलबीर सिंह जी ‘रंग’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी अपनी तरह के एक अनूठे कवि थे और अपनी कविताओं और प्रस्तुति के अंदाज़ के कारण उन्होंने काव्य मंचों पर अपनी अलग पहचान बनाई थी|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह जी ‘रंग’ का यह गीत –

चाहता हूँ मैं तुम्हारी दृष्टि का केवल इशारा,
डूबने को बहुत होता एक तिनके का सहारा,
उर-उदधि में प्यार का तूफ़ान आना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

चाहते थककर दिवाकर-चंद्र नभ का शांत कोना,
सह सकेगी अब न वृद्धा भूमि सब का भार ढोना,
जीर्ण जग फिर से नई दुनिया बसाना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

एक योगी चाहता है बाँधना गतिविधि समय की,
एक संयोगी भुलाना चाहता चिंता प्रलय की,
पर वियोगी आग, पानी में लगाना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

व्यंग्य करता है मनुजता पर मनुज का क्षुद्र-जीवन,
हँस रहा मुझ पर जवानी की उमंगों का लड़कपन,
किंतु कोई साथ मेरे मुस्कुराना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

स्वर्ग लज्जित हो रहा है नर्क की लखकर विषमता,
आज सुख भी रो रहा है देखकर दुख की विवशता,
इंद्र का आसन तभी तो डगमगाना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अहसास कहीं कुछ कम है!

ज़िंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है,
हर घड़ी होता है अहसास कहीं कुछ कम है|

शहरयार

काट लो रस्ता यही बेहतर!


आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूं| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनको साक्षात सुनने के अनेक अवसर मिले, उनसे प्रशंसा भी प्राप्त की और लंबे समय तक उनसे गीत लिखने की प्रेरणा प्राप्त होती रही|

लीजिए प्रस्तुत है श्री रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

इधर दो फूल मुँह से मुँह सटाए
बात करते हैं
यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर

हमें दिन इस तरह के
रास आए नहीं ये दीगर
तसल्ली है कहीं तो
पल रहा है प्यार धरती पर
हरे जल पर पड़े मस्तूल-साए
बात करते हैं

यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर

खुले में ये खुलापन देखकर
जो चैन पाया है
कई कुर्बानियों का रंग
रेशम में समाया है
उमर की आग का परचम उठाए
बात करते हैं

यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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