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और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

आज सोचा कि ज़िंदगी के बारे में बात करके, ज़िंदगी को उपकृत कर दें।
शुरू में डॉ. कुंवर बेचैन जी की पंक्तियां याद आ रही हैं, डॉ. बेचैन मेरे लिए गुरू तुल्य रहे हैं और उनकी गीत पंक्तियां अक्सर याद आ जाती हैं-


ज़िंदगी का अर्थ मरना हो गया है,
और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे।


जब सोचते हैं कि बहुत दिनों के लिए जीना है तो क्या किया जाए, तब यह याद आता है-


जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम,
ये रस्ता कट जाएगा मितरा, ये बादल छंट जाएगा मितरा।


लेकिन फिर कोई यह कहता मिल जाता है-


ये करें और वो करें, ऐसा करें, वैसा करें।
ज़िंदगी दो दिन की है, दो दिन में हम क्या-क्या करें।

अब वैसे तो ये कवि-शायर लोग कन्फ्यूज़ करते ही रहते हैं, पर ज़िंदगी के बारे में इन्होंने कुछ ज्यादा ही कन्फ्यूज़ किया है-


ज़िंदगी कैसी है पहेली ये हाय
कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाए।


और जब ज़िंदगी में परेशानियां ज्यादा होती हैं, तब फैज़ अहमद फैज़ कहते हैं-


ज़िंदगी क्या किसी मुफलिस की क़बा है जिसमें,
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं।

और कहीं कोई मोहब्बत का मारा, ये कहता हुआ भी मिल जाता है-


हम तुझ से मोहब्बत करके सनम, हंसते भी रहे, रोते भी रहे,
हंस हंस के सहे उल्फत में सितम, मरते भी रहे, जीते भी रहे।


जब जीवन में कोई पवित्र उद्देश्य मिल जाता है, तब ये खयाल ही नहीं आता कि ज़िंदगी छोटी है या बड़ी, तब इंसान इस तरह की बात करता है-


हम जिएंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए,
दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए।


एक बात और, स्वामी विवेकानंद और इस तरह के कुछ महापुरुष जब कम समय में बहुत बड़ी उपलब्धियां कर लेते हैं और कम उम्र में ही उनको जीवन-त्याग करना पड़ जाता है, उनके लिए सोम ठाकुर जी ने बड़ी सुंदर पंक्तियां लिखी हैं-


कोई दीवाना जब होंठों तक अमृत घट ले आया,
काल बली बोला मैंने, तुझ से बहुतेरे देखे हैं।


और आज के लिए आखिरी बात, ये फानी बदायुनी जी का शेर-


एक मुअम्मा है, समझने का न समझाने का,
ज़िंदगी काहे को है, ख्वाब है दीवाने का।


मेरे खयाल में ज़िंदगी के नाम पर, आज के लिए इतना कंफ्यूज़न ही काफी है।
नमस्कार।


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यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –



आज गुलाम अली जी का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे आनंद बक्षी जी ने लिखा है और इसका संगीत अनु मलिक जी ने तैयार किया है।


यह गीत वैसे ही सुंदर लिखा गया है और गुलाम अली जी की गायकी ने इसको अमर बना दिया है। मूल बात जो इसमें है, वो यह कि इंसान का आचरण, उसका किरदार उसको कहीं से कहीं ले जाता है, ऊंचाइयों पर भी और बर्बादी के रास्ते पर भी! लेकिन इसमें तक़दीर का, परिस्थितियों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है।


लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए और गुलाम अली साहब की अदायगी को याद कीजिए-


चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला
बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर की गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था
मेरी तक़दीर ने मुझको, तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


आज के लिए इतना ही, नमस्कार।



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ये मुझसे तगड़े हैं- रमेश रंजक

हिन्दी के चर्चित नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ, इस गीत में रंजक जी ने कितनी खूबसूरती से यह अभिव्यक्त किया है कि दुख घर से जाने का नाम ही नहीं ले रहे हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



जिस दिन से आए
उस दिन से
घर में यहीं पड़े हैं,
दुख कितने लंगड़े हैं ?

पैसे,
ऐसे अलमारी से,
फूल चुरा ले जायें बच्चे
जैसे फुलवारी से|

दंड नहीं दे पाता
यद्यपि-
रँगे हाथ पकड़े हैं ।

नाम नहीं लेते जाने का,
घर की लिपी-पुती बैठक से
काम ले रहे तहख़ाने का,
धक्के मार निकालूँ कैसे ?

ये मुझसे तगड़े हैं ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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किसी के जाने पर!

उर्दू का एक प्रसिद्ध शेर है, किसी के जाने की ज़िद को लेकर, शायर का नाम मुझे याद नहीं आ रहा-

 

 

अभी आए, अभी बैठे, अभी दामन सँभाला है,
तुम्हारी जाऊँ, जाऊँ ने हमारा दम निकाला है|

 

एक और फिल्मी गीत की पंक्ति हैं-

चले जाना ज़रा ठहरो, किसी का दम निकलता है,
ये मंज़र देखकर जाना|

पता नहीं क्यों, मेरे मन में इस विषय पर लिखने की बात बिजली के जाने के प्रसंग से आई| आजकल बंगलौर में हूँ, जहां हमारी सोसायटी में तो दिन में 20-25 बार बिजली जाती है| इस विषय में चकाचक ‘बनारसी’ की एक हास्य गजल की पंक्तियाँ थीं-

डरती नहीं हुक्काम से बिजली चली गई
बिजली थी जब कहा था अस्सलाम वालेकुम,
वालेकुम अस्सलाम पे बिजली चली गई|

एक गीत फिल्म- कन्हैया का है, मुकेश जी की आवाज़ में, जिसमे राजकपूर एक लुढ़क रही दारू की बोतल को पुकारते हुए गाते हैं, लेकिन लोग उसे नायिका से जोड़ लेते हैं| गीत है-

रुक जा ओ जाने वाली, रुक जा
मैं तो राही तेरी मंज़िल का|
देखा भी नहीं तुझको, सूरत भी न पहचानी,
तू आ के चली छम से, ज्यों धूप के दिन पानी!

जाने के इस तरह बहुत से उदाहरण हैं, जैसे ‘शाम’ अचानक चली जाती है| मीना कुमारी जी की पंक्तियाँ हैं शायद-

ढूंढते रह जाएंगे, साहिल पे क़दमों के निशां,
रात के गहरे समंदर में उतार जाएगी शाम|

जाने के बारे में ही तो यह गीत है-

तेरा जाना, दिल के अरमानों का लुट जाना,
कोई देखे, बनके तक़दीरों का लुट जाना|

एक शेर और याद आ रहा है, वसीम बरेलवी साहब का-

वो मेरे सामने ही गया और मैं, 
रास्ते की तरह देखता रह गया|

 

वैसे जाने के बाद भी आने की उम्मीद तो लगी ही रहती है, और जाने वाले लौटकर भी कभी आते हैं| लेकिन ऐसा भी तो लगता है न –

 

तेरे जाने में, और आने में,
हमने सदियों का फासला देखा|

 

और जैसा हम जानते हैं, एक जाना तो ऐसा भी होता है, जिसके बाद वापसी नहीं होती-

 

दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ!

 

जाने है वो कौन नगरिया, आए-जाए खत न खबरिया!
आएँ जब-जब उनकी यादें, आएँ होठों पर फरियादें,
जाके फिर न आने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ!

गीत, गजल तो बहुत होंगे, किसी के जाने को लेकर और इस विषय पर कई आलेख लिखे जा सकते हैं, परंतु अंत में स्वर्गीय किशन सरोज जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं, जो लाजवाब हैं-

तुम गए क्या, जग हुआ अंधा कुआं,
रेल छूटी, रह गया केवल धुआँ,
गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात,
हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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पंछी पिंजरा तोड़ के आजा, देश पराया छोड़ के आजा!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

 

 

आज एक खबर कहीं पढ़ी कि उत्तराखंड के किसी गांव में केवल बूढ़े लोग रह गए हैं, विशेष रूप से महिलाएं, जवान लोग रोज़गार के लिए शहरों को पलायन कर गए हैं।

वैसे यह खबर नहीं, प्रक्रिया है, जो न जाने कब से चल रही है, गांव से शहरों की ओर तथा नगरों, महानगरों से विदेशों की तरफ! जहाँ गांव में बूढ़े लोग हैं, लेकिन जैसा भी हो, उनका समाज है वहाँ पर, शहरों में बहुत से बूढ़े लोग फ्लैट्स में अकेले पड़े हैं, जिनका कोई सामाजिक ताना-बाना भी नहीं है, ऐसे में कृत्रिम ताना-बाना भी बनाया जाता है, जैसे ‘ओल्ड एज होम’, लॉफिंग क्लब आदि, ये जहाँ काम दें, अच्छा ही है। वरना बहुत सी बार कोई मर जाता है, तब पता चलता कि वह अकेला रह रहा था।

मेरे एक वरिष्ठ मित्र थे- श्री रमेश शर्मा जी, जिन्होंने ग्रामीण परिवेश पर कुछ बहुत सुंदर गीत लिखे हैं। उनकी दो पंक्तियां याद आ रही हैं-

 

ना वे रथवान रहे, ना वे बूढ़े प्रहरी,
कहती टूटी दीवट, सुन री उखड़ी देहरी।

 

मैंने भी बहुत पहले, निर्जन होते जा रहे गांवों को लेकर एक कविता लिखी थी-

गांव के घर से

बेखौफ चले आइए
यहाँ अभी भी कुछ लोग हैं।
घर की दीवारों पर जो स्वास्तिक चिह्न बने हैं,
इन्हीं पर कई बार टूटी हैं चूड़ियां,
टकराए हैं माथे।

 

कभी यह एक जीवंत गांव था,
लेकिन आज, हर जीवित गंध- एक स्मारक है,
जमीन का हर टुकड़ा, लोगों की गर्दन पर गंडासा है।

 

धुएं का आकाश रचती चिमनियां, और यंत्र संगीत,
न जाने कहाँ उड़ा ले गया- उन गंध पूरित लोगों को।
एक, शहर में- सही गलत का वकील है,
पड़ौस को उससे बड़ी उम्मीदें हैं।

 

(श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’)

 

वीरान होते गांवों को लेकर अपनी यह पुरानी कविता मुझे याद आई, कहीं लिखकर नहीं रखी है और यहाँ प्रस्तुत करते समय, कहीं-कहीं से रिपेयर करनी पड़ी।

आखिर में आनंद बक्शी जी का लिखजा और  पंकज उदास का गाया एक गीत याद आ रहा है, कमाई के लिए घर से दूर, विदेशों में अकेले रहने वालों को लेकर यह बहुत सुंदर गीत है, इसकी कुछ पंक्तियां ही यहाँ शेयर करूंगा-

चिट्ठी आई है, आई है चिट्ठी आई है।
बहुत दिनों के बाद, हम बे-वतनों को याद,
वतन की मिट्टी आई है।

 

वैसे तो इस गीत का हर शब्द मार्मिक है, मैं केवल अंतिम छंद यहाँ दे रहा हूँ-

 

पहले जब तू ख़त लिखता था, कागज़ में चेहरा दिखता था,
बंद हुआ ये मेल भी अब तो, खत्म हुआ ये खेल भी अब तो,
डोली में जब बैठी बहना, रस्ता देख रहे थे नैना,
मैं तो बाप हूँ मेरा क्या है, तेरी मां का हाल बुरा है,
तेरी बीवी करती है सेवा, सूरत से लगती है बेवा,
तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया,
पंछी पिंजरा तोड़ के आजा, देश पराया छोड़ के आजा,
आजा उमर बहुत है छोटी, अपने घर में भी है रोटी।
चिट्ठी आई है, आई है चिट्ठी आई है।

 

ये गीत उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो जैसे-तैसे काम-धंधे के लिए चले तो जाते हैं, लेकिन जब चाहें तब घर मिलने के लिए नहीं आ सकते।

अब इसके बाद क्या कहूं!
नमस्कार।

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मैं क्या जिया ?

आज डॉ धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भारती जी ने कविता, कहानी, उपन्यास आदि सभी विधाओं में अपना बहुमूल्य योगदान किया था| उनकी कुछ रचनाएँ- सूरज का सातवाँ घोडा, अंधा युग, ठंडा लोहा, ठेले पर हिमालय, सात गीत वर्ष आदि काफी प्रसिद्ध रहीं| वे साप्ताहिक पत्रिका- धर्मयुग के यशस्वी संपादक भी रहे|

 

लीजिए प्रस्तुत है भारती जी की यह रचना-

 

 

 

मैं क्या जिया ?
मुझको जीवन ने जिया –
बूँद-बूँद कर पिया, मुझको
पीकर पथ पर ख़ाली प्याले-सा छोड़ दिया|

 

मैं क्या जला?
मुझको अग्नि ने छला –
मैं कब पूरा गला, मुझको
थोड़ी-सी आँच दिखा दुर्बल मोमबत्ती-सा मोड़ दिया|

 

देखो मुझे
हाय मैं हूँ वह सूर्य
जिसे भरी दोपहर में
अँधियारे ने तोड़ दिया !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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आत्म-मुग्ध, आत्म-लिप्त, आत्म-विरत!

मुझे ‘गर्म हवा’ फिल्म का प्रसंग याद आ रहा है| विभाजन के समय के वातावरण पर बनी थी वह फिल्म, जिसमें स्वर्गीय बलराज साहनी जी ने आगरा के एक मुस्लिम जूता व्यापारी की भूमिका बड़ी खूबसूरती से निभाई थी|

 

 

उस फिल्म में एक मुस्लिम नेता का चरित्र दिखाया गया है, जिसे तालियाँ बजवाने का शौक है, जैसा कि नेताओं को होता ही है| वह अपने भाषणों में कहता है कि वह भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने वाला आखिरी व्यक्ति होगा| इस प्रकार की बात अक्सर नेता लोग तालियाँ पिटवाने के लिए करते हैं| लेकिन बाद में इन नेताजी को लगता है कि बदलते माहौल में यहाँ उनकी नेतागिरी नहीं चलने वाली| ऐसे में वे अचानक अपनी बेगम को बताते हैं कि हम पाकिस्तान जाएंगे, उनका सामान तांगे में लदता है, और अचानक उनकी तसवीर उल्टी हो जाती है और पृष्ठभूमि में तालियों की आवाज आती है| बड़े प्रतीकात्मक तरीके से यहाँ उनके पलटी मारने, कथनी और करनी के अंतर को दर्शाया गया है|

अचानक यह प्रसंग याद आ गया, और एक बात और कि जब वे जा रहे होते हैं, तब उनका जवान बेटा देखता है कि युवक लोग जूलूस निकाल रहे हैं और रोजगार आदि संबंधी अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं| बेटा तांगे से उतर जाता है और बोलता है कि उसकी जगह तो यही है, वह यहाँ रहकर ही अपने युवा साथियों के साथ संघर्ष करेगा|

मैं बात करना चाह रहा था ऐसे लोगों की जो जीवन में आत्म मुग्ध रहते हैं, नेतागण अधिकतर इसी श्रेणी में आते हैं| उनको दूसरों के दोष दिखाई देते हैं और वास्तव में दूसरों के दोष निकालना ही उनका मुख्य काम होता है| वे यह तो सोच ही नहीं पाते कि उनमें भी कोई दोष हो सकता है| यह वास्तव में बहुत खराब स्थिति होती है जब व्यक्ति न केवल अपनी कमियों पर ध्यान देना बंद कर देता है अपितु इस संबंध में सुनना भी नहीं चाहता, तब उसके सुधार की गुंजाइश नहीं बचती और वह क्रमशः लोगों के बीच अपना सम्मान खोता जाता है|

हम जो कुछ एक अधिकारी/कर्मचारी होने के नाते, सिस्टम का एक पार्ट होने के नाते करते हैं, वह हमारी एक भूमिका होती है और उस भूमिका का निर्वाह होने से हमें तसल्ली भी होती है| लेकिन एक यात्रा इसके साथ-साथ चलती है या शायद चलनी चाहिए!

एक प्रसंग याद आ रहा है सेवाकाल का| हमारे एक महाप्रबंधक थे, मिस्टर दुआ, जब मैं एक विद्युत परियोजना में काम करता था| वे अपने पद की भूमिका तो ठीक से निभाते ही थे, लेकिन एक क्रिएटिव व्यक्ति होने के नाते वे संस्कृतिक गतिविधियों में भी रुचि लेते थे और भाग लेते थे| उन्होंने इस दृष्टि से वहाँ लॉयंस क्लब की गतिविधि प्रारंभ कीं| अब वे इसमें रुचि लेते थे तो अधिकारीगण भी सदस्य बनते गए| इस प्रकार एक विशाल नेटवर्क वहाँ तैयार हो गया| आसपास के सोशली एक्टिव लोग भी इसमें जुड़ते गए|

अब कुछ उपयोगी काम तो होते ही होंगे इसके अलावा बहुत से लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने और तालियाँ पिटवाने का भी अवसर मिला| लेकिन मिस्टर दुआ को हमेशा तो वहाँ नहीं रहना था| उनका ट्रांसफर हुआ और एक मिस्टर सिंह उनके स्थान पर आए| महाप्रबंधक से निचले स्टार के लॉयंस क्लब में सक्रिय अधिकारियों ने लॉयन्स क्लब का एक प्रोग्राम रखा और मिस्टर सिंह के पास उसके लिए आमंत्रित करने गए| इस पर मिस्टर सिंह बोले- ‘न मैं जाऊंगा और न तुमको जाने दूंगा| आप यहाँ बिजली पैदा करने आए हैं या ये सब करने आए हैं|’

हर व्यक्ति की इस संबंध में अपनी फिलोसफ़ी है| कुछ लोग सिर्फ सिस्टम का पुर्जा बने रहना पसंद करते हैं, कुछ इन सीमाओं का बार-बार अतिक्रमण करते हैं|

मेरे अपने सेवाकाल के दौरान मैंने ऐसे कई लोगों से प्रेरणा प्राप्त की और स्वयं भी ऐसा व्यक्ति बनने की कोशिश की, जिससे कोई भी व्यक्ति अपने मन की बात कह सकता है, आपकी कमी भी बता सकता है| जबकि एक-दो अधिकारी ऐसे भी थे, जिनके बारे में सभी जानते थे कि उनसे सहज होकर कुछ देर बात करना भी संभव नहीं है| कुछ ही देर में उनके सहज व्यवहार की सीमा समाप्त हो जाती है और किसी न किसी बहाने से ब्लास्ट पाइंट आ जाता है|

आज ऐसे ही खयाल आया कि इन आत्म मुग्ध किस्म के प्राणियों को श्रद्धांजलि दी जाए|

जबकि मैं यह आलेख समाप्त करने को था तभी यह खबर मिली कि प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और मेहनती कलाकार सुशांत सिंह राजपूत ने अपने मुंबई स्थित निवास में आत्महत्या कर ली| ये परेशानियाँ सिर्फ पैसे की कमी से ही नहीं होतीं जी! सबको संतोष प्राप्त हो यही कामना है| ऐसा प्रतिभाशाली कलाकार जिससे समाज को ऐसी अनेक प्रभावशाली भूमिकाएँ निभाए जाने की उम्मीद रहती है, उसके अचानक चले जाने और इस मामले में तो हथियार डाल देने की जानकारी मिलने पर बहुत दुख होता है|

क्यों ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति, और ऐसा सफल व्यक्ति, जीवन में अंदर ही अंदर घुटता रहता है और दुनिया को तभी मालूम होता है जब वह आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम उठा लेता है| काश ये दुनिया ज्यादा रहने लायक होती|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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Life lessons!

Life- we all live it, with many hopes, we set several targets and are always trying to achieve them. Some people call it a journey, to many destinations which we might fix for ourselves from to time, but we know that it would terminate, sometimes suddenly and sometimes we might guess in advance, when the destination called ‘death’ is arriving!

 

Anyhow in life, whatever name we may give it,  we always get chance to learn new things, sometimes by choice but mostly we learn from our mistakes and failures. Life is a very tough teacher and sometimes we have to pay very heavily if we don’t learn in time.

I have travelled the most part of this journey called life. We have different co-travelers, whom we call family members, friends, colleagues, neighbors etc. during different phases of our life, since nobody can cover this long journey of life alone.

Further humans are called ‘social animals’, we always work and interact with different people, many times we work in teams. We have shared goals as family, as members of some institution, society, country and world family as a whole.

Any journey or endeavor would have more chances of being successful and certainly you would feel more comfortable, if you have true, kind hearted and loving companions. One thing I would like to mention is that one should always be honest and choose honest and loving companions. Though it is not always possible, but wherever possible one must try to do so.

But the fact is that some people are born to live honestly and spread love, while there are some who love themselves only. They are so engrossed in their own false image, that they can’t love anybody else selflessly. In any journey or activity if you don’t have a good companion half the battle is lost or even if you achieve it, the real joy of this achievement can’t be felt. There might be fight over who contributed more.

So, what I want to emphasize is one must choose his fellow team members, companions very wisely because doing that makes half the battle won.

There could many lessons from life but this came to my mind today. This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- What you have learned from life so far? #life

Thanks for reading.

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ऐसा भी तो अंगार नहीं मिलता है – गोपाल दास ‘नीरज’

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी अपने जमाने में कवि सम्मेलनों का मुख्य आकर्षण हुआ करते थे| हिन्दी फिल्मों में भी नीरज जी ने बहुत प्यारे गीत दिए हैं|

लीजिए आज नीरज जी के इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

 

मुझको जीवन आधार नहीं मिलता,
आशाओं का संसार नहीं मिलता।

 

मधु से पीड़ित-मधुशाला से निर्वासित,
जग से, अपनों से निन्दित और उपेक्षित-
जीने के योग्य नहीं मेरा जीवन पर
मरने का भी अधिकार नहीं मिलता।
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता..

 

भव-सागर में लहरों के आलोड़न से,
मैं टकराता फ़िरता तट के कण-२ से,
पर क्षण भर भी विश्राम मुझे दे दे जो
ऐसा भी तो मँझधार नहीं मिलता है।
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है..

 

अब पीने को खारी मदिरा पीता हूँ,
अन्तर में जल-२ कर ही तो जीता हूँ,
पर मुझे जला कर राख अरे जो कर दे
ऐसा भी तो अंगार नहीं मिलता है।
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है..

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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अब दो आलम में, उजाले ही उजाले होंगे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे।

 

 

दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में-

 

हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे,
उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।
(डॉ. बालस्वरूप राही)

 

एक अच्छा शेर कहके, मुझको ये महसूस हुआ,
बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं।
(डॉ. सूर्यभानु गुप्त)

सचमुच जब कोई रचनाकार कोई अच्छी रचना लिखता है, शेर तो उसकी सबसे छोटी, लेकिन अपने आप में मुकम्मल इकाई है, तो उसके बाद यह चुनौती उसके सामने होती है कि इससे ज्यादा अच्छी रचना अपने पाठकों/श्रोताओं के सामने रखे।

बहुत अधिक कष्ट और चुनौतियां होती हैं ईमानदारी से प्रभावी अभिव्यक्ति को अंजाम देने के लिए। असल में एक अच्छा सृजनशील रचनाकार, दिल से एक अच्छा प्रेमी होता है, जो अक्सर पूरी दुनिया से प्रेम करता है।

मैं बसाना चाहता हूँ, स्वर्ग धरती पर,
आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर,
उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ।
आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ॥

वैसे किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति के प्रति अनन्य प्रेम भी अद्वितीय रचनाओं का आधार बन सकता है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम और दिव्य होते हैं, जैसे तुलसीदास और उनके ईष्ट श्रीराम, सूरदास और उनके दुलारे श्याम मनोहर।

खैर हम लौकिक सृजन के बारे में ही, हल्की-फुल्की बातें करेंगे। एक गज़ल जो गुलाम अली जी ने गाई है, लेखक हैं परवेज़ जालंधरी,बड़े सुंदर बोल हैं और बड़ी कठिन शर्तें हैं चाहत की-

जिनके होठों पे हंसी, पांव में छाले होंगे,
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे।

 

शमा ले आए हैं हम, जल्वागह-ए-जाना से
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे।

 

मय बरसती है, फज़ाओं में नशा तारीं है,
मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे।

 

हम बड़े नाज़ से आए थे तेरी महफिल में,
क्या खबर थी, लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे।

आज के लिए इतना ही काफी है, वैसे तो कहते हैं ना- हरि अनंत, हरिकथा अनंता, साहित्य के बारे में भी ये बात लागू होती है।

नमस्कार

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