मौत से यारी रखो!

एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो,
दोस्ताना ज़िंदगी से, मौत से यारी रखो|

राहत इन्दौरी

कहाँ के हैं, किधर के हम हैं!

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से,
किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं |

निदा फ़ाज़ली

वह झंकार है कविता!

नीलम सिंह जी एक सृजनशील कवियित्री हैं, उनके एक गीत की पंक्तियां मुझे अक्सर याद आती हैं-

धूप, धुआँ, पानी में,
ऋतु की मनमानी में,
सूख गए पौधे तो
मन को मत कोसना,
और काम सोचना|

आज प्रस्तुत है नीलम सिंह जी की एक और प्रभावशाली कविता, जो वास्तव में ‘कविता’ की क्षमता और प्रभाविता के बारे में ही है –

शब्दों के जोड़-तोड़ से
गणित की तरह
हल की जा रही है जो
वह कविता नहीं है|

अपनी सामर्थ्य से दूना
बोझ उठाते-उठाते
चटख गई हैं जिनकी हड्डियाँ
उन मज़दूरों के
ज़िस्म का दर्द है कविता
भूख से लड़ने के लिये
तवे पर पक रही है जो
उस रोटी की गंध है कविता|


उतार सकता है जो
ख़ुदा के चेहरे से भी नकाब
वो मज़बूत हाथ है कविता
जीती जा सकती है जिससे
बड़ी से बड़ी जंग
वह हथियार है कविता|

जिसके आँचल की छाया में
पलते हैं हमारी आँखों के
बेहिसाब सपने
उस माँ का प्यार है कविता
जिसके तुतलाते स्वर
कहना चाहते हैं बहुत कुछ
उस बच्चे की नई वर्णमाला का
अक्षर है कविता|


कविता एकलव्य का अँगूठा नहीं है
कि गुरु-दक्षिणा के बहाने
कटवा दिया जाय
वह अर्जुन का गाण्डीव है, कृष्ण का सुदर्शन चक्र ।

कविता नदी की क्षीण रेखा नहीं
समुद्र का विस्तार है
जो गुंजित कर सकती है
पूरे ब्रह्माण्ड को
वह झंकार है कविता ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आदतें डालने पर!



काफी लंबा समय हो गया ये ब्लॉग लिखते हुए| मैंने कभी यह नहीं सोचा कि विद्वान लोग ही इसको पढ़ें और अपनी सम्मति दें| जो भी मेरा पाठक है, वह मेरी दृष्टि में सबसे विद्वान है|
शुरुआत मैंने की थी अपने जीवन के प्रसंगों, प्रारंभिक जीवन जो दिल्ली-शाहदरा में रहते हुए बिताया, उसके बाद विभिन्न स्थानों पर सेवाकाल में हुए अनुभवों को दोहराते हुए, अपने कवि मित्रों का संदर्भ भी इसमें दिया और उनकी कुछ रचनाएं भी शेयर कीं | मैंने अपने नियोजकों के लिए बहुत से कवि सम्मेलन भी आयोजित किए, उनके अनुभव और इस प्रकार जिन कवियों के संपर्क में आया, उनके बारे में भी लिखा|

आज मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि प्रारंभ में जबकि मैं अपने ब्लॉग में अपने अनुभव ज्यादा शेयर करता था, वह बाद में रचनाएं अथवा फिल्मी गीत आदि शेयर करने पर आकर सिमट गया| यद्यपि ये रचनाएं और फिल्मी गीत भी मुझे अत्यंत प्रिय हैं और मेरा विश्वास है कि मेरे अधिकांश पाठक भी इनको पसंद करते हैं|

असल में हमारी सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार भी हमारी आदतें बदलती रहती हैं| आज मैं आदतों के बारे में ही बात करूंगा| मुझे याद है कि हायर सैकेंडरी के मेरे पाठ्यक्रम में अंग्रेजी की ‘प्रोज़ बुक’ थी| उसमें एक निबंध था ‘ऑन अरली राइज़िंग’ जिसमें एक उक्ति थी ‘राइज़ अरली, एंड यू आर द मास्टर ऑफ टाइम’, यह पाठ सुबह जल्दी उठने की आदत डालने के बारे में था|

एक पाठ और याद आ रहा है इसी पुस्तक से ‘ऑन मेकिंग हैबिट्स’, इस पाठ में बताया गया था कि कैसे हम लोगों की आदत होती है कि कहाँ क्या रखना है, किस जेब में कौन सा सामान रखना है| इसमें लेखक ने एक प्रसंग लिखा था कि एक बार वो पूरी रात नशे में, बदनाम लोगों के साथ जुआ खेलता रहा लेकिन उसकी जेब साफ नहीं हुई, क्योंकि उसे खुद ध्यान नहीं था कि उसकी कौन सी जेब में पैसे रखे हैं| लेखक यह बताना चाहते थे कि जब हमको यह चिंता होती है कि उधर रखे हुए मेरे पैसे सलामत रहें, तब हम अनजाने में दूसरे लोगों को इसका संकेत दे देते हैं कि पैसे किधर हैं!

आदतों के बारे में एक उदाहरण कि किस तरह लोग हमारी आदतों का फायदा उठाते हैं| बहुत पहले प्रबंधन विषय की किसी कक्षा में एक वक्ता ने यह बात बताई थी| यह शायद 15-20 साल पुरानी तो बात होगी ही, एक टुथ-पेस्ट कंपनी के प्रबंधन ने महसूस किया कि उनके टुथ-पेस्ट की बिक्री नहीं बढ़ रही है, तब उन्होंने यह निर्णय लिया कि ट्यूब के जिस गोल मुह से पेस्ट निकलता है, उसका आकार थोड़ा बढ़ा दिया जाए| लोगों को अक्सर आदत होती है कि वे ब्रश के ऊपर एक निश्चित लंबाई तक पेस्ट निकालकर उसका उपयोग करते हैं| क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि ट्यूब का मुह थोड़ा सा ही बड़ा करने से टुथ-पेस्ट की बिक्री दोगुनी हो गई|

अभी कोरोना काल है, हम मास्क पहनकर बाहर निकलने की आदत डालते हैं, कभी-कभी भूल जाते हैं| ईश्वर करे कि यह स्थिति जल्दी खत्म हो जाए और हमको इसके बिना निकलने की आदत डालनी पड़े|

आदतें तो बहुत सी हो सकती हैं, मैं उपदेशक भी नहीं बनना चाहता बस हर प्राणी से प्रेम करने की आदत डाल सकें तो अच्छा है, इसके लिए दूसरों के दोषों पर नहीं उनकी अच्छाइयों पर फोकस करना होगा|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कोई दूसरा हो जाएगा!

कितनी सच्चाई से मुझसे ज़िन्दगी ने कह दिया,
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा|

बशीर बद्र

दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा!

स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मैं उनसे कभी मिला नहीं, फ़ेसबुक पर मेरे मित्र थे, अपनी रचनाओं के बारे में सूचना देते रहते थे, जिनको पढ़कर मैं काफी प्रभावित होता था, विशेष रूप से फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ जी पर उन्होंने अत्यंत सराहनीय कार्य किया है| विभिन्न विषयों पर, अनेक रचनाकारों के संबंध में उनके अत्यंत सारगर्भित आलेख मैंने फ़ेसबुक पर ही पढे और कुछ चर्चाओं में भाग भी लिया|

फिर एक-दो बार उन्होंने लिखा कि वे अस्वस्थ हैं और फिर 21 अक्टूबर,2021 को उनके देहांत का दुःखद समाचार भी मिला| स्वर्गीय यायावर जी का स्मरण करते हुए आज उनकी यह कविता शेयर कर रहा हूँ –



एक दृश्य है जो अदृश्य हो गया है
उसका बिम्ब मन में उतर गया है
मैं चुप हूँ
चुपचाप चला जाऊँगा
कहाँ
किस ओर
किस जगह
अदृश्य !

किसी के मन में यह बात प्रकट होगी
कि एक दृश्य था
अदृश्य हो चला गया है !

अब उसके शब्द जो हवा में सनसनाते थे
किसी के साथ कुछ दूर घूम आते थे
उसके विचार कहीं मानो किसी गुफ़ा से निकलते थे
पहले गुर्राते थे
फिर गले लगाते थे
फिर कुछ चौंक – चौंक जाते थे
फिर बहुत चौंकाते थे

अब उसकी कहीँ छाया तक नहीं है
अब कोई पहचान भी नहीं है
दृश्य में अदृश्य हो जाएगा
कहीं नज़र नहीं आएगा !

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दूसरा कोई रास्ता ही नहीं!

ज़िन्दगी! मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

क्या जुर्म है पता ही नहीं!

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

हँसाते-हँसाते रूलाया गया हूँ !

स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी हिन्दी साहित्य मंच के एक अनूठे कवि थे, उनकी अभिव्यक्ति शैली अलग तरह की थी, अक्सर एक कवि के रूप में वे अपनी बात करते थे, आज भी मैं ‘आत्माभिव्यक्ति शैली में मैं लिखी गई उनकी एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की यह कविता –


न छेड़ो मुझे मैं सताया गया हूँ ।
हँसाते-हँसाते रूलाया गया हूँ ।

सताए हुए को सताना बुरा है,
तृषित की तृषा को बढ़ाना बुरा है,
विफल याचना की अकर्मण्यता पर-
अभय-दान का मुस्कुराना बुरा है ।
करूँ बात क्या दान या भीख की मैं,
संजोया नहीं हूँ, लुटाया गया हूँ ।
न छेड़ो मुझे…।

न स्वीकार मुझको नियंत्रण किसी का,
अस्वीकार कब है निमंत्रण किसी का,
मुखर प्यार के मौन वातावरण में-
अखरता अनोखा समर्पण किसी का ।
प्रकृति के पटल पर नियति तूलिका से,
अधूरा बना कर, मिटाया गया हूँ !


क्षितिज पर धरा व्योम से नित्य मिलती,
सदा चांदनी में चकोरी निकलती,
तिमिर यदि न आह्वान करता प्रभा का-
कभी रात भर दीप की लौ न जलती ।
करो व्यंग्य मत व्यर्थ मेरे मिलन पर,
मैं आया नहीं हूँ, बुलाया गया हूँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ताश के पत्तों-सी सजी है दुनिया!

मेज़ पर ताश के पत्तों-सी सजी है दुनिया,
कोई खोने के लिए है कोई पाने के लिए|

निदा फ़ाज़ली