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गति,अगति, सद्गति!

आज का समय मानव जाति के लिए बड़ा कठिन है, खास तौर पर कोरोना की यह दूसरी लहर भारतवर्ष के लिए बड़े कष्ट लेकर आई है| पहली लहर के समय हम कहते थे कि बाहर से लोगों को क्यों आने दे रहे हैं! आज दूसरे अनेक देश भारत से लोगों का वहाँ जाना प्रतिबंधित कर रहे हैं| इस महामारी का हम सबको मिलकर मुक़ाबला करना है, मैं तो कम से कम उन लोगों में से नहीं हूँ जो इस स्थिति के लिए भी किसी एक व्यक्ति को दोष देकर मुक्त हो जाएँ|

जिस गति से आज कोरोना फैल रहा है, उस पर शीघ्र नियंत्रण किया जाना आवश्यक और मुझे उम्मीद है कि एक संकल्प-बद्ध राष्ट्र के रूप में हम ऐसा करने में सफल होंगे|


असल में, मैं स्वयं को इतना कुशल नहीं मानता कि कोरोना के बारे में कोई उपयोगी सलाह दे सकूँ, वैसे हमारे यहाँ हर घर में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कोरोना को दूर भगाने के कारगर घरेलू नुस्खे बता सकते हैं, परंतु जब उनके किसी अपने को यह रोग लग जाता है, तब वे शांत हो जाते हैं|


खैर आज मैं गति को लेकर कुछ बात करना चाह रहा था| गोवा में हम जिस सोसायटी में रहते हैं, उसमें सभी 6 मंजिला इमारतें हैं, गोवा में शायद सामान्यतः इतनी मंज़िलें बनाने की अनुमति है| और हम छठी मंज़िल पर रहते हैं| अपनी लिफ्ट का इस्तेमाल करते समय अक्सर मुझे ऐसा लगता है कि अपनी यह लिफ्ट दिल्ली मैट्रो की तरह चलती है| जी हाँ, जितने समय में दिल्ली मैट्रो एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुँचती है, उतने समय में अपनी यह लिफ्ट, एक फ्लोर से दूसरे फ्लोर पर पहुँचती है| मैं यही सोचता हूँ कि अगर अपनी बिल्डिंग 20-25 या इससे अधिक फ्लोर वाली होती तो हमें दिल्ली कि एक मैट्रो लाइन- ग्रीन, ब्लू या किसी पर भी पूरी यात्रा का आनंद मिल जाता| अब थोड़ी-बहुत अतिशयोक्ति की तो आप मुझे अनुमति देंगे ही न!

आज कोरोना के इस माहौल में बंबई (मुंबई) की हालत सबसे ज्यादा खराब है, और पूरे देश से वहाँ श्रमिक अपनी ज़िंदगी बनाने के लिए जाते हैं| ऐसे में एक पुराना गाना, नए संदर्भ में याद आता है-

ऐ दिल, मुश्किल-जीना यहाँ,

जरा हटके, जरा बचके, ये है बंबई मेरी जान|


वैसे भी कोरोना ने हमारी ज़िंदगी की गति की ऐसी की तैसी कर रखी है, ऐसे ही मन हुआ कि अपनी इस लिफ्ट के बहाने किसी ओर तरफ ध्यान दिया जाए, वैसे जो चुनौती आज हम सबके सामने है, उससे तो हमको मिलकर निपटना ही है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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Faith, Belief and Motivation!

We humans are one of the millions of species that exist in the universe. We keep thinking about our life, aims and how to achieve our goals, how to succeed in life. Do we ever think whether other living beings also have some goals, dreams or aspirations in life and whether they are on the right path to achieve them!



Among the many things, items and devices man has created or invented, I think robots fit in the space, that we human beings occupy amongst the creations of God. Though I have not come across any complete Robot yet, only seen them in movies etc. In some stories we witnessed that the robot didn’t perform as per its programming. I wonder God almighty might also be thinking after seeing our performance that this person is not performing as per the original programming!


Anyway, it is a fact that we are the special creatures in the universe, God almighty loves us and created us to do some special things in the world and make our planet a better place to live, while achieving our personal goals also.


Every individual has his own individual goals and also a role in making this world worth living in some way or the other. We all work for each other in some way or the other and in this way achieve the goals set for ourselves and help the society to perform better.


In any case everybody first thinks about his or her own well being and that of the individual family. Human life is such a complicated thing that nobody else can guide us in every field. There is no set formula that everybody can follow in his or her life to achieve success.


The only thing is that we learn from the examples of other people. Like some scientist who failed 100 times, he said now I know that these 100 ways are not to be used for achieving this goal. A political leader who lost elections at every level, finally became the President of America.
So, the basic thing is that we must keep trying, keep our hopes alive, be prepared to accept challenges, study our own conditions and requirements and make own progression plan.

While doing all that we can learn from the lives of other people, not necessarily from the rich and powerful people, but also from other ordinary people, from their success and failures.


Yes, in this process, the motivational and self-help books might prove helpful to some extent, since these normally are based on real life examples and personal experiences of many people. The vital part of it, that I too believe is that faith makes the biggest contribution in our success. If we ourselves accept defeat, then nobody can make us succeed and like we have read so many times, ‘One becomes the way he or she believes’. Our belief and faith make the biggest contribution in our success. What else do we have to supplement our efforts in achieving our goals.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Is life as simple and promising as our motivational and self-help books think? #FacileOptimism


Thanks for reading.

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ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया!

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

वसीम बरेलवी साहब की एक गज़ल याद आ रही है, बस उसके शेर एक-एक करके शेयर कर लेता हूँ। बड़ी सादगी के साथ बड़ी सुंदर बातें की हैं, वसीम साहब ने इस गज़ल में। पहला शेर तो वैसा ही है, जैसा हम कहते हैं, कोई बहुत सुंदर हो तो उसको देखकर-

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया।


ये बात तो उनकी हुई, कि उन्होंने अपनी झलक से जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो, अब आपके पास क्या है मियां? आपकी बातें, आपके जज़्बात, आपका अंदाज-ए-बयां। उसके दम पर ही आपको तो अपनी छाप छोड़नी होगी न! आपने अपनी सारी प्रतिभा, सारी ईमानदारी, सब कुछ लगा दिया उसको प्रभावित करने में, लेकिन आखिर में हुआ तो बस इतना-

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया।


अब ये सब कैसे समझाया जाए कि जहाँ पर तबीयत जम जाए, ऐसा लगता है कि वो तो बस सामने ही रहे और हम उसको देखते रहें, लेकिन ऐसे में अचानक ऐसा होता है, और हम फिर से देखते ही रह जाते हैं-


वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया।


होता यह भी है आज के समय में कि जब आप अपनी खूबियों से, जो आपके अंदर हैं, उनसे लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, वहीं आज का समय ऐसा है, ऐसे लोग आज उभरकर सामने आते हैं कि उनके भीतर भले ही कुछ न हो, वे स्वयं को शाहरुख खान की तरह, मतलब कि जहाँ जैसी जरूरत है, जैसी डिमांड है, उस रूप में प्रस्तुत कर देंगे। गज़लों में अक्सर आशिक़-माशूक़ के रूप में बातें रखी जाती हैं, लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में वह कोई भी हो सकता है, आपका बॉस भी हो सकता है! जिसे आप अपनी भीतरी खूबसूरती से, अपनी प्रतिभा से, अपनी सच्चाई से प्रभावित करना चाहते हैं, और दूसरे लोग उसको अपने प्रेज़ेंटेशन से प्रभावित कर लेते हैं, और ऐसा बार-बार होता है, क्योंकि आपको तो अपनी सच्चाई पर ही भरोसा है-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया।


अब आखिर में अचानक, मुझे डॉ. धर्मवीर भारती की लिखी एक कहानी याद आ रही है- ‘गुलकी बन्नो’, वैसे मुझको इसका ताना-बाना कुछ याद नहीं है, बस इतना है कि एक कन्या, जो बहू बनकर आई थी मुहल्ले के एक गरीब परिवार में, उस पर इतनी मुसीबतें आती हैं, इतनी बार वह टूटती है, मुसीबतें झेलती है, कुछ बार बहुत दिन तक नहीं दिखती, लेखक सोचता है कि मर-खप गई है, फिर अचानक दिखाई दे जाती है, शरीर कंकाल हो चुका है, लेकिन वही मुस्कान, दांत निपोरती हुई पहले की तरह्।

सच्चे लोगों की परीक्षा ज़िंदगी कुछ ज्यादा ही लेती है, और आखिरी शेर इस गज़ल का प्रस्तुत है-

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया।


आज वसीम बरेलवी साहब की इस गज़ल के बहाने आपसे कुछ बातें हो गईं।

नमस्कार।

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सामने बैठा था मेरे, और वो मेरा न था!

आज एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसके कुछ शेर ग़ुलाम अली जी ने और जगजीत सिंह तथा चित्रा सिंह की जोड़ी ने भी गाए हैं| काफी लंबी ग़ज़ल है ये और सिर्फ एक घटना हो जाने पर ज़िंदगी कितनी बदल जाती है, ये इसमें बहुत खूबसूरती से दर्शाया गया है|


लीजिए आज प्रस्तुत है, अदीम हाशमी जी की लिखी ये खूबसूरत ग़ज़ल-

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था,
सामने बैठा था मेरे, और वो मेरा न था|

वो के ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार सू,
मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था|

रात भर पिछली ही आहट कान में आती रही,
झाँककर देखा गली में कोई भी आया न था|

अक्स तो मौजूद था पर अक्स तनहाई का था,
आईना तो था मगर उसमें तेरा चेहरा न था|

आज उसने दर्द भी अपने अलहदा कर दिए,
आज मैं रोया तो मेरे साथ वो रोया न था|

मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा,

सारी दुनिया में मगर, कोई तेरे जैसा न था|

आज मिलने की ख़ुशी में सिर्फ़ मैं जागा नहीं,
तेरी आँखों से भी लगता है कि तू सोया न था|

ये भी सब वीरानियाँ उस के जुदा होने से थीं,
आँख धुँधलाई हुई थी, शहर धुँधलाया न था|

सैंकड़ों तूफ़ान लफ़्ज़ों में दबे थे ज़ेर-ए-लब,
एक पत्थर था ख़ामोशी का, के जो हटता न था|



याद करके और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’,
भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था|

मस्लहत ने अजनबी हम को बनाया था ‘अदीम’,
वरना कब इक दूसरे को हमने पहचाना न था|


-अदीम हाशमी


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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एहसास का मारा दिल ही तो है!

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

कल एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर की थी| एक ही विषय पर लिखी ब्लॉग पोस्ट्स में से वह दूसरी थी| सोचता हूँ कि इस विषय पर साथ की अन्य पोस्ट भी शेयर कर लूँ| आज प्रस्तुत है उससे पहले लिखी गई पोस्ट|



अगर यह पूछा जाए कि रसोई में कौन सी वस्तु, कौन सा पदार्थ सबसे महत्वपूर्ण है तो पाक कला में निपुण कोई व्यक्ति, अब महिला कहने से बच रहा हूँ, क्योंकि बड़े‌-बड़े ‘शेफ’ आज की तारीख में पुरुष हैं, हाँ कोई भी ऐसा व्यक्ति बता देगा कि यह वस्तु सबसे ज्यादा उपयोग में आती है अथवा यह वस्तु सर्वाधिक गुणकारी है।

अब यही सवाल अगर कविता, शायरी, विशेष रूप से फिल्मी गीतों के बारे में पूछा जाए, तो मुझे लगता है कि जो शब्द प्रतियोगिता में सबसे आगे आएंगे, उनमें से एक प्रमुख शब्द है-‘दिल’।

मुकेश जी के एक गीत के बोल याद आ रहे हैं-

दिल से तुझको बेदिली है, मुझको है दिल का गुरूर,
तू ये माने के न माने, लोग मानेंगे ज़ुरूर
!

आगे बढ़ने से पहले, दो शेर याद आ रहे हैं जो गुलाम अली जी ने एक गज़ल के प्रारंभ में गाए हैं-

दिल की चोटों ने कभी, चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया।
इसका रोना नहीं, क्यों तुमने किया दिल बर्बाद,
इसका गम है कि बहुत देर में बर्बाद किया।


कुछ बार ऐसे लोगों की बात होती है, जो चावल के एक दाने पर काफी बड़ा आलेख, श्लोक, यहाँ तक कि पूरी गीता भी लिख देते हैं। उन चमत्कारों का तो पता नहीं, परंतु ‘दिल’, जिसको शरीर विज्ञानी, आकार-प्रकार के लिहाज़ से पता नहीं कितना छोटा या बड़ा मानते हैं, परंतु उस पर कितना कुछ अंकित हो पाता है, उसकी कोई सीमा नहीं है।

फिल्म ‘दिल ही तो है’ में मुकेश जी ने, साहिर लुधियानवी जी के लिखे दो गीत गाए हैं, जिनका मुखड़ा लगभग एक ही जैसा है, एक उल्लास से भरा है और दूसरा उदासी से, मन हो रहा है दोनों को पूरा ही शेयर करने का-

दिल जो भी कहेगा मानेंगे,
दुनिया में हमारा दिल ही तो है।

हार मानी नहीं ज़िंदगी से,
हंस के मिलते रहे हर किसी से,
क्यों न इस दिल पे क़ुर्बान जाएं,
सह लिए कितने गम किस खुशी से,
सुख में जो न खेले हम ही तो हैं,
दुख से जो न हारा दिल ही तो है।।


कोई साथी न कोई सहारा,

कोई मंज़िल न कोई किनारा,
रुक गए हम जहाँ दिल ने रोका,
चल दिए जिस तरफ दिल पुकारा।
हम प्यार के प्यासे लोगों की,
मंज़िल का इशारा दिल ही तो है॥

अपनी जिंदादिली के सहारे,
हमने दिन ज़िंदगी के गुज़ारे,
वर्ना इस बेमुरव्वत जहाँ में,
और कब्ज़े में क्या था हमारे,
हर चीज है दौलत वालों की,
मुफलिस का बेचारा दिल ही तो है॥


अब दूसरा गीत-

भूले से मुहब्बत कर बैठा,
नादां था बिचारा दिल ही तो है।
हर दिल से खता हो जाती है,
बिगड़ो न खुदारा दिल ही तो है।

इस तरह निगाहें मत फेरो,
ऐसा न हो धड़कन रुक जाए,
सीने में कोई पत्थर तो नहीं,
एहसास का मारा दिल ही तो है।

बेदादगरों की ठोकर से,
सब ख्वाब सुहाने चूर हुए,
अब दिल का सहारा गम ही तो है,
अब गम का सहारा दिल ही तो है।


जब इतना अधिक स्थान ‘दिल’ ने कविता-शायरी में घेरा है, एक ब्लॉग में तो इसका समाना मुश्किल है। ‘मेरा नाम जोकर’ में नायक इस बात पर खुश होता है कि उसके दिल में पूरी दुनिया समा जाएगी और फिर उसका दिल टूटकर बिखर जाता है।

बहुत सारी बातें याद आ रही हैं, दिल को लेकर, कुछ बातें आगे भी तो करेंगे!

नमस्कार
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कच्चे रंगों से तसवीर बना डाली!

स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी के हिन्दी कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं| वे बच्चों की पत्रिका पराग के संपादक भी रहे थे और अपने साहित्य सृजन के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए गए|

आज मैं नंदन जी की यह रचना शेयर कर रहा हूँ-


रेशमी कंगूरों पर
नर्म धूप सोयी।
मौसम ने
नस-नस में
नागफनी बोयी!
दोषों के खाते में कैसे लिख डालें
गर अंगारे
याचक बन पाँखुरियाँ माँग गए

कच्चे रंगों से
तसवीर बना डाली,
हल्की बौछार पड़ी
रंग हुए खाली।
कितनी है दूरी,
पर, जाने क्या मजबूरी
कि
टीस के सफ़र की

कई सीढ़ियाँ,
फलाँग गए।

खंड-खंड अपनापन
टुकड़ों में
जीना।

फटे हुए कुर्ते-सा
रोज़-रोज़ सीना।
संबंधों के सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह
अपना ही बौनापन
टाँग गए!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मौत मुसाफ़िरखाना है!

एक विषय दिया गया है, #IndiSpire के मंच पर, The end is often the beginning #Life वहाँ पर प्रविष्टि सामान्यतः अंग्रेजी में दी जाती है, परंतु मुझे लगा कि इस विषय पर लिखते हुए भारतीय दर्शन की जो बातें मेरे मन में आ सकती हैं, वे सभी हिन्दी में हैं और मैं हिन्दी और अंग्रेजी के बीच में फँसकर रह जाऊंगा, इसलिए मैं वहाँ प्रविष्टि न देकर, अलग से आलेख लिख रहा हूँ|


हाँ विषय कुल मिलाकर यह है कि- अंत ही सामान्यतः एक नई शुरूआत होती है, अब यह किसी अभियान अथवा व्यवसाय के किसी पक्ष, किसी पड़ाव से लेकर हमारे जीवन तक पर लागू हो सकता है|

मुझे कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं, शायद रमानाथ अवस्थी जी की पंक्तियाँ हैं ये-


मिलना तो मन का होता है,
तन तो सिर्फ बहाना है|
जीवन के बेरोक सफर में,
मौत मुसाफ़िरखाना है|


फिर नीरज जी की पंक्तियाँ याद आती हैं-

न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ,
बस इतनी सी ही तो बात है|
किसी की आँख खुल गई,
किसी को नींद आ गई
|


एक विचार और आता है, अक्सर हम देखते हैं लोग अपना पुश्तैनी व्यवसाय अपनाते जाते हैं, जो पिता करते थे, वही बेटा करता है, बड़ों के अनुभव का फायदा उठाते हुए ठीक-ठाक सा काम करते हुए वे अपना जीवन बिता देते हैं| अक्सर जब कोई ढर्रे पर चलते हुए सफल नहीं हो पाता और इसे चुनौती मानते हुए नई राह चुनता है, तब यदि वह सफल होता है, तो ऐसा भी होता है कि वह चमत्कार भी कर देता है| एक बंधी हुई लीक पर चलते हुए यह चमत्कार संभव नहीं होता|


कविता के क्षेत्र में अज्ञेय जी ने इसी को राहों का अन्वेषी होना कहा था| अक्सर एक यात्रा समाप्त करने के बाद मनुष्य नई राह, नई चुनौती चुनता है, तभी वह ऐसी उपलब्धि कर पाता है|

इस प्रकार हर समय नई चुनौतियों को स्वीकार करने की तैयारी, नई पहल करना और यदि ऐसा समय आता है तो मृत्य का भी हँसते-हँसते वरण करना और नई जीवन-यात्रा के लिए तैयार रहना भी शामिल हो सकता है|

अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि वास्तव में अधिकतर अंत ही प्रारंभ होता है, वह जीवन का कोई अभियान हो अथवा स्वयं जीवन ही हो| अतः हमेशा नई पहल के लिए तैयार रहना, नई चुनौतियों को स्वीकार करना ही वास्तव में जीवंतता का प्रमाण है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल है-


तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे
जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे।

यह गज़ल पहले भी शायद मैंने शेयर की है, आज इस गज़ल का एक शेर खास तौर पर याद आ रहा था-


बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढकर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।


ऐसे ही खयाल आया कि आखिर कैसे हो जाते हैं, या हो गए हैं हम चार किताबें पढ़ने के बाद, पढ़-लिख लेने के बाद!


इस पर धर्मवीर भारती जी के गीत की पंक्तियां याद आती हैं-


सूनी सड़कों पर ये आवारा पांव,

माथे पर टूटे नक्षत्रों की छांव,
कब तक, आखिर कब तक!
चिंतित पेशानी पर अस्त-व्यस्त बाल,
पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण भूचाल,
कब तक आखिर कब तक!


और फिर लगे हाथ भारत भूषण जी के गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं, जो शायद पहले भी शेयर की होंगी, लेकिन फिर उनको शेयर करने का मन हो रहा है-


चक्की पर गेंहू लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा,
क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई।


कंधे पर चढ़ अगली पीढ़ी, ज़िद करती है गुब्बारों की,
यत्नों से कई गुना ऊंची, डाली है लाल अनारों की,
हर भोर किरन पल भर बहला, काले कंबल में सुला गई।


लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना-पत्र लिखते बीती,
जर्जर उदासियों के कपड़े, थक गई हंसी सींती-सींती,
खंडित भी जाना पड़ा वहाँ, ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई।


गीतों की जन्म-कुंडली में, संभावित थी यह अनहोनी,
मोमिया मूर्ति को पैदल ही, मरुथल की दोपहरी ढोनी,
खंडित भी जाना पड़ा वहाँ, ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई!


बड़ा होने के बाद क्या-क्या झेलना पड़ता है इंसान को, और बच्चा कहता है मुझे तो ये चाहिए बस! और परिस्थिति जो भी हो, उसको वह वस्तु अक्सर मिल जाती है!


ये भी कहा जाता है कि जो आप पूरे मन से चाहोगे, वह आपको मिल जाएगा। उस परम पिता परमात्मा के सामने हम भी तो बच्चे ही हैं, और हाँ हमारा वह परम पिता, हमारी तरह मज़बूर भी नहीं है, अगर हमको पूरे मन से ऐसा मानना मंज़ूर हो!


खैर ज्यादा बड़ी बातें नहीं करूंगा, अंत में रमेश रंजक जी की ये पंक्तियां-


फैली है दूर तक परेशानी,
तिनके सा तिरता हूँ तो क्या है,
तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!


मैं दूंगा भाग्य की लकीरों को,
रोशनी सवेरे की,
देखूंगा कितने दिन चलती है,
दुश्मनी अंधेरे की,


मकड़ी के जाले सी पेशानी,
साथ लिए फिरता हूँ तो क्या है,
टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं!


आखिर में यही दुआ है कि उम्र बढ़ते जाने के बावज़ूद, हमारे भीतर एक बच्चे जैसी आस्था, विश्वास और थोड़ी ज़िद भी बनी रहे!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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कितने दाग लगे चादर में!

एक समय था जब दिल्ली में रहते हुए कवि सम्मेलनों, कवि गोष्ठियों आदि के माध्यम से अनेक श्रेष्ठ कवियों को सुनने का मौका मिलता है| अब वैसा माहौल नहीं रहा, एक तो ‘कोरोना’ ने भी बहुत कुछ बदल दिया है|


हाँ तो पुराने समय के काव्य-मंचों पर उभरने वाले बहुत से कवि, जिनकी कविताएं मैं शेयर करता रहा हूँ, उनमें से जो नाम मुझे आज याद आ रहा है, वे हैं स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी, लीजिए आज उनका एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ-

अगर चल सको साथ चलो तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितने चलकर आए हो तुम, कितनी मंज़िल शेष रह गई?

हम तुम एक डगर के राही
आगे-पीछे का अन्तर है,
धरती की अर्थी पर सबको
मिला कफ़न यह नीलाम्बर है ।
अगर जल सको साथ जलो तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
अभी चिताओं के मेले में कितनी हलचल शेष रह गई ?


मुझे ओस की बूंद समझकर
प्यासी किरन रोज़ आती है,
फूलों की मुस्कान चमन में
फिर भी मुझे रोज़ लाती है ।
तड़प सको तो साथ तड़प लो, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितनी धरा भिगोई तुमने कितनी मरुथल शेष रह गई ?

अवनी पर चातक प्यासे हैं
अम्बर में चपला प्यासी है,
किसकी प्यास बुझाए बादल
ये याचक हैं, वह दासी है ।
बनो तृप्ति बन सको अगर तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितनी प्यास बुझा लाए हो, कितनी असफल शेष रह गई ?


जीवन एक ग्रंथ है जिसका
सही एक अनुवाद नहीं है,
तुम्हें बताऊँ कैसे साथी
अर्थ मुझे भी याद नहीं है ?
बुझा सको तो साथ बुझाओ, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
मरघट के घट की वह ज्वाला, कितनी चंचल शेष रह गई ?

घाट-घाट पर घूम रहे हैं
भरते अपनी सभी गगरिया,
बदल-बदल कर ओढ़ रहे हैं
अपनी-अपनी सभी चदरिया ।
ओढ़ सको तो साथ ओढ़ लो, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितने दाग़ लगे चादर में, कितनी निर्मल शेष रह गई ?


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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अभागों की टोली अगर गा उठेगी!

स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के लहजे में कविता कहने के लिए प्रसिद्ध थे| उन्होंने अनेक बहुमूल्य काव्य संकलन हमें दिए हैं, जिनमें ‘बुनी हुई रस्सी’, ‘गीत फ़रोश’, ‘खुशबू के शिलालेख’, ‘त्रिकाल संध्या’ आदि शामिल हैं और उनके संकलन- ‘बुनी हुई रस्सी’ के लिए उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्रदान किया गया था|

लीजिए प्रस्तुत है भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता-

चलो गीत गाओ, चलो गीत गाओ।
कि गा – गा के दुनिया को सर पर उठाओ।

अभागों की टोली अगर गा उठेगी
तो दुनिया पे दहशत बड़ी छा उठेगी
सुरा-बेसुरा कुछ न सोचेंगे गाओ
कि जैसा भी सुर पास में है चढ़ाओ।


अगर गा न पाए तो हल्ला करेंगे
इस हल्ले में मौत आ गई तो मरेंगे
कई बार मरने से जीना बुरा है
कि गुस्से को हर बार पीना बुरा है

बुरी ज़िन्दगी को न अपनी बचाओ
कि इज़्ज़त के पैरों पे इसको चढ़ाओ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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