ढूँढ ले तू भी किसी दीवाने को!

ज़िंदगी ढूँढ ले तू भी किसी दीवाने को,
उसके गेसू तो मिरे प्यार ने सुलझाए हैं|

राही मासूम रज़ा

ये ख़्वाब न देखे हैं न दिखलाए हैं!

प्यास बुनियाद है जीने की बुझा लें कैसे,
हमने ये ख़्वाब न देखे हैं न दिखलाए हैं|

राही मासूम रज़ा

दो दिन में हम क्या क्या करें!

ये करें और वो करें ऐसा करें वैसा करें,
ज़िंदगी दो दिन की है दो दिन में हम क्या क्या करें|

नज़ीर बनारसी

निर्बीज क्यों हो चले हम!

आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम ठाकुर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत–


इस तरह निर्बीज -से
क्यों हो चले हम आज
हरियल घास पर बैठे हुए

कहाँ हैं अंकुर हमारे
तने – शाखें
ध्वंस बोलो पर सहमकर
टिकी आँखें
तृप्ति का कैसा समंदर हम तरेंगे
मरुथलों की प्यास पर बैठे हुए|

शोक मुद्राएँ
सुबह को दी किसी ने
शाम को दुर्दांत हलचल दी
गाल पर मलने चले थे
रंग -लाल गुलाल
लेकिन राख मल दी
किस लहू की कंदरा में चल पड़े
अरदास पर बैठे हुए
हरियल घास पर बैठे हुए|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम भी बहल सको तो चलो!

यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें,
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो|

निदा फ़ाज़ली

सब कुछ पुराना चल रहा है!

वही दुनिया वही साँसें वही हम,
वही सब कुछ पुराना चल रहा है|

राहत इन्दौरी

नाटक पुराना चल रहा है!

नए किरदार आते जा रहे हैं,
मगर नाटक पुराना चल रहा है|

राहत इन्दौरी

अभी हम ज़िंदगी से मिल न पाए!

अभी हम ज़िंदगी से मिल न पाए,
तआ’रुफ़ ग़ाएबाना चल रहा है|

राहत इन्दौरी

ज़िंदगानी का सामना करके!

किसने पाया सुकून दुनिया में,
ज़िंदगानी का सामना करके|

राजेश रेड्डी