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Two Yards Of Land!

This life of ours is termed as ‘Mirage’ by many learned people and Saints. We come to this world, we learn, acquire knowledge and skills as per our requirements and capacity and then we wish to get into a service or business, that we are able to get into for living a life fulfilling our dreams.

 

There are many novels and poems that highlight, how everybody has big dreams in life and there are very few who are able to reach somewhere near to their dreams. It is also true, that our dreams are limited by our living conditions. The conditions we live in often shorten our horizon, everybody can’t normally think of becoming a Mukesh Ambani or so.

It is often not easy to explain what we look for in our life. True that everybody likes to live his or her life with happiness, but what is the thing or set of things or living conditions, that give us happiness keep changing with time and our status. Our present status often determines the range of the satellite of our dreams.

Often we are not in a condition to differentiate between our needs and our aspirations or may be our greed. If our needs are met, we might feel satisfied but mostly our dreams do overpower our feeling of satisfaction also. In today’s world everybody is in a continuous race, we are running to achieve what we observe that some other people are having and we must also acquire, to be at same level, and then move further.

We listen to old stories of wishes of people getting fulfilled, some demons praying God, pleasing them and then getting a boon of becoming invincible, but that also fails in the end, since there are certain rules, which they eventually do not follow, considering themselves invincible.

There was also a story that a saint taking pity on a small mouse made him a lion, but later he tries to attack the Saint and had to again become a mouse.

There is the famous story from Ramayana, where Kaikeyi one of the three queens of King Dasharatha, gets her wish fulfilled through boons from Dasharath that her son Bharat should be made the king of Ayodhya and Rama the elder brother be sent to exile! But did she get what she wanted to achieve through fulfillment of her wishes!

Yes it is right that we follow our dreams, have wishes in life and make good efforts to achieve them, but let the wishes, our dreams not be such that we keep tracing them and finally do not get anything.

There was a story in Hindi which in English can be termed as ‘Two yards of land’. In this story a King tells a person that he can start walking in the morning and whatever area of land he covers till sunset, would be owned by him. The persons keeps extending his lust for land, keeps walking with more and more speed till evening and finally falls down and dies. Ultimately he gets the two yards of land, where he fell down.

Finally I would like to sum up with a couplet by Saint Kabir Das Ji, which says- Saain itna Dijiye, jaame kutumb samaay, main bhi bhookha na rahoon, Sadhu na bhookha jaay’ ( Oh God , give me so much, which fulfills my family needs, so that we do not remain hungry and are also in a position to feed our guest).

So definitely happiness is the ultimate goal, we must try to achieve in our life, whatever is achievable by our talent and efforts, without being over worked or being impractical. Yes in addition to this personal wish, I wish that there is peace and harmony in society and an atmosphere in which everybody can pursue his or her dreams.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- I wish. We all wish. What’s that wish? #WishMine

Thanks for reading.

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काल-बली बोला मैंने तुझसे बहुतेरे देखे हैं!

आज एक अनुभव शेयर कर रहा हूँ और उस बहाने से जो कुछ बातें मन में आईं, उनके बारे में बात करूंगा। एक बात का खयाल कई बार आता है, बहुत से ऐसे मित्र हैं जो दफ्तर में मेरे साथ थे, मुझसे उम्र में कम थे, मुझसे काफी बाद रिटायर हुए, लेकिन ऊपर जाने का टिकट उनका कट चुका है और मैं अभी तक यहीं हूँ। यह तो दुनिया की व्यवस्था है- ‘कोई पहले तो कोई बाद में जाने वाला!’ हम यह सब होता हुए देखते रहते हैं, जब नज़दीक में कुछ होता है तब ज्यादा संवेदना के साथ उसको महसूस करने की गुंजाइश रहती है।

 

 

मैं आज बात करना चाहूंगा अपने एक निकट संबंधी की मृत्यु के बारे में, मेरे इस संबंधी का अभी हाल ही में स्वर्गवास हुआ है। जिस दिन उनकी तेरहवीं हुई उसके 2 दिन बाद ही उनका जन्मदिन आया और यदि वे जीवित रहे होते तो तब वे 50 वर्ष के हुए होते। मेरे इस संबंधी के पास कोई उच्च डिग्री अथवा विशेषज्ञता नहीं थी, परंतु अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र में अच्छा नाम कमाया, उनके मित्रों की कमी नहीं थी, वे आस्तिक भी बहुत थे, नियमित रूप से पूजा-पाठ किया करते थे और अपने कार्य-क्षेत्र में हुए अनुभव के बल पर उन्होंने हाल ही में अपना व्यवसाय शुरू किया था और ईश्वर की दया से व्यवसाय बहुत सही गति से आगे बढ़ रहा था।

मेरे इस दिवंगत संबंधी का एक बेटा है, जो अभी तक ज़िंदगी के झमेलों से दूर संगीत की दुनिया में अपना भाग्य आज़माने में लगा था, कई बार मुंबई हो आया था संगीत कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए। अब इस कहानी को ज्यादा लंबा नहीं करूंगा, अचानक मेरे इस संबंधी को पेट में तकलीफ हुई, पहले भी शायद ऐसी तकलीफ पहले भी कुछ बार हुई थी, लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया था। इस बार की यह तकलीफ उनकी आखिरी रही और अचानक उनकी पत्नी और बेटा, जिसने अभी तक दुनियादारी के बारे में कुछ सोचा ही नहीं था, उन पर सारा बोझ पड़ गया, अब व्यवसाय की बारीकियां उनको समझनी होंगी और हाँ समय तो सब कुछ सिखा ही देता है।

यहाँ फिर से मैं दोहराना चाहता हूँ कि मेरे इस संबंधी ने संघर्ष करते हुए अच्छा-खासा बिज़नस प्रारंभ कर लिया था, भविष्य बहुत उज्ज्वल था, लेकिन इसी बीच यह हादसा, जीवन का अचानक अंत और ऐसे में एक कमी जिसके बारे में मेरे मन में बार-बार प्रश्न उठ रहा था, और पता करने पर यह मालूम हुआ कि मेरे इस संबंधी ने जीवन-बीमा नहीं कराया था, असमय मृत्यु की स्थिति में यह सबसे बड़ा सहारा होता है परिवार के लिए, लेकिन यहीं मेरा यह संबंधी चूक गया, बताया गया कि वह इस संबंध में बात कर रहा था, लेकिन असमय मृत्यु ने इसका अवसर ही नहीं दिया और उसकी मृत्यु के बाद परिवार के लिए जो बहुत बड़ा सहारा हो सकता था, वह उनको नहीं मिल पाया।

मैं इसलिए सभी मित्रों का ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगा कि जीवन और मौत तो इंसान के हाथ में नहीं होता लेकिन यदि इंसान अच्छी राशि का बीमा करा ले तो असमय मृत्यु की स्थिति में यह बहुत बड़ा सहारा बन सकता है।

मुझे सोम ठाकुर जी की हिंदी गज़ल का एक शेर याद आ रहा है, जो उन्होंने बड़े संदर्भ में लिखा था, लेकिन यहाँ भी तो वह लागू होता है-

कोई दीवाना जब होंठों तक अमृत घट ले आया,
काल बली बोला मैंने, तुझसे बहुतेरे देखे हैं।

आज यही याद आया और मैंने महसूस किया कि बीमा एक अच्छा निवेश तो नहीं है, लेकिन अगर अचानक मृत्यु आ जाए तो इससे अधिक सहायक कुछ नहीं है।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां!

आज शहरयार जी की एक गज़ल के बहाने आज के हालात पर चर्चा कर लेते हैं। इससे पहले दुष्यंत जी के एक शेर को एक बार फिर याद कर लेता हूँ-

 

 

 

इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां।

आज की ज़िंदगी इतनी आपाधापी से भरी हो गई है कि किसी के पास, किसी के लिए बिल्कुल टाइम नहीं है। खास तौर जीवित या जीवन से जूझ रहे व्यक्ति के लिए तो बिल्कुल नहीं है। ये बात बड़े शहरों पर तो विशेष रूप से लागू होती है।

बहुत बार देखा है कि कोई व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो गया हो और जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा हो, तब लगभग सभी लोग उसकी तरफ एक बार देखकर आगे बढ़ जाते हैं। इतना ही नहीं लोगों के सामने कोई किसी को चाकू मार दे तब भी कोई उसको बचाने के लिए आगे नहीं बढ़ता, और उसके बाद उसे चिकित्सा सुविधा दिलाने के लिए भी नहीं। ऐसे में लोगों को अपने अर्जेंट काम याद आ जाते हैं या ड्यूटी के लिए देर होने लगती है। जो लोग ऐसे में सहायता के लिए आगे बढ़ते हैं, वे वास्तव में सराहना के पात्र हैं और आज के समय में इंसानियत के जीवित होने की मिसाल हैं।

इसके विपरीत जब कोई लाश दिखाई दे जाती है, तब लोग घंटों वहाँ खड़े रहते हैं, पता करते रहते हैं, कौन था, कहाँ का था, क्या हुआ था । ऐसे में लोगों को कोई काम याद नहीं आता, कोई जल्दी नहीं होती।

खास तौर पर नेताओं को ऐसी लाशों की तलाश रहती है, जिनको झंडे की तरह इस्तेमाल किया जा सके। जिनको लेकर किसी पर इल्ज़ाम लगाए जा सकें। भुखमरी, कानून व्यवस्था की बदहाली, किसी भी मामले को जोरदार ढंग से उठाया जा सके। ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब लोगों ने किसी को आत्महत्या करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया, जिससे बाद में उस पर राजनीति की जा सके।

शायद यही कारण है कि, औद्योगिक अशांति की स्थिति में भी मैंने देखा है कि जब लोग कोई लाश बीच में रखकर आंदोलन करना चाहते हैं, तब पुलिस वालों का प्रयास यह होता है कि सबसे पहले किसी तरह समझा-बुझाकर, लाश को वहाँ से हटाया जाए वरना आंदोलन लंबा चल सकता है।

खैर इन सब बातों पर ज्यादा चर्चा किए बिना, शहरयार जी की वह गज़ल यहाँ दे रहा हूँ, जिसे हरिहरन जी ने गाया है, ‘गमन’ फिल्म के लिए। मैंने जितना कुछ ऊपर लिखा है, उससे कहीं ज्यादा बात ये गज़ल अपने आप में कह देती है-

 

अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो
मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो।

 

हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला,
हर एक ज़ख्म मेरे दिल का भर गया यारो।

 

भटक रही थी जो कश्ती वो गर्क-ए-आब हुई
चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो।

 

वो कौन था, वो कहाँ का था, क्या हुआ था उसे,
सुना है आज कोई शख्स मर गया यारो।

 

नमस्कार।

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रहम जब अपने पे आता है तो हंस लेता हूँ।

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

 

 

मुकेश जी का गाया एक प्रायवेट गाना याद आ रहा है-

मेरे महबूब, मेरे दोस्त, नहीं ये भी नहीं
मेरी बेबाक तबीयत का तकाज़ा है कुछ और।

 

हाँ मैं दीवाना हूँ चाहूँ तो मचल सकता हूँ,
खिलवत-ए-हुस्न के कानून बदल सकता हूँ,
खार तो खार हैं, अंगारों पे चल सकता हूँ,
मेरे महबूब, मेरे दोस्त, नहीं ये भी नहीं
मेरी बेबाक तबीयत का तकाज़ा है कुछ और।

 

इस गीत में आगे भी कुछ अच्छी पंक्तियां हैं, लेकिन इतना ही शेयर करूंगा क्योंकि इतना हिस्सा सभी को आसानी से समझ में आ सकता है। कुल मिलाकर हर कोई यह बताना चाहता है कि मेरी कुछ अलग फिलॉसफी है ज़िंदगी की, अलग सिद्धांत हैं और खुद्दारी है, जो मेरी पहचान है, लेकिन अपने सिद्धांतों के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ।

अपनी बात कहने के लिए, कोई माकूल माध्यम और बहाना चाहिए। राजकपूर जी को फिल्म का माध्यम अच्छा लगता था, खानदानी दखल भी था उस माध्यम में, क्योंकि पिता पृथ्वीराज कपूर प्रसिद्ध रंगकर्मी और सिने कलाकार थे, सो राजकपूर जी ने फिल्म का माध्यम अपनाया, लेकिन कही वही अपनी बात, अपनी पसंदीदा फिलॉसफी को पर्दे पर अभिव्यक्त किया, यहाँ तक कि जेबकतरे का काम कर रहे नायक से भी यही कहलवाया-

 

मैं हूँ गरीबों का शहज़ादा, जो चाहूं वो ले लूं,
शहज़ादे तलवार से खेले, मैं अश्कों से खेलूं।

 

लेकिन इससे भी पहले वो कहते हैं-

 

देखो लोगों जरा तो सोचो, बनी कहानी कैसे,
तुमने मेरी रोटी छीनी, मैंने छीने पैसे,
सीख़ा तुमसे काम, हो गया मैं बदनाम,
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबको मेरा सलाम,
छलिया मेरा नाम।

 

मेरा ब्लॉग, मेरा प्लेटफॉर्म है, मेरी फिल्म है, मेरा नाटक है। मैं अपनी बात इसी तरह कहूंगा, कभी आज की बात का ज़िक्र करके, कभी अतीत की किसी घटना, किसी धरोहर को याद करके।

 

जाते-जाते एक और गीत याद आ रहा है-

जब गम-ए-इश्क़ सताता है तो हंस लेता हूँ,
हादसा याद जब आता है तो हंस लेता हूँ।
मेरी उजड़ी हुई दुनिया में तमन्ना का चिराग
जब कोई आ के जलाता है तो हंस लेता हूँ।
कोई दावा नहीं, फरियाद नहीं, तंज़ नहीं,
रहम जब अपने पे आता है तो हंस लेता हूँ।

बी हैप्पी, जस्ट चिल!

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बीते हुए दिन!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

 

अतीत में रहना अक्सर लोगों को अच्छा लगता है, मेरी उम्र के लोगों को और भी ज्यादा। कुछ लोग तो जब मौका मिलता है अतीत में जाकर दुबक जाते हैं, या ऐसा कहते रहते हैं, हमारे समय में तो ऐसा होता है। वैसे मेरा तो यही प्रयास है कि हर समय, मेरा समय रहे, लेकिन अनुभव को मन में दोहराने के लिए कभी-कभार अतीत में डुबकी लगा लेना तो अच्छी बात है।

आज एक दृश्य याद आ रहा है, आकाशवाणी जयपुर में सेवा के समय का, वहाँ मैं 1980 से 1983 तक रहा था। मैं अपने पुराने ब्लॉग्स में उस अवधि के बारे में बता चुका हूँ। हाँ तो एक दृश्य याद आ रहा है, रिकॉर्डिंग स्टूडियो का, एक लाइन का संवाद, लेकिन उससे पहले लंबी-चौड़ी भूमिका तो बांध सकता हूँ, कैरेक्टर्स के बारे में बताने के बहाने।

हाँ तो आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था, हिंदी अनुवादक होने के नाते, रिकॉर्डिंग स्टूडियो से मेरा सीधे तौर पर कोई नाता नहीं था, लेकिन मैं अक्सर रिकॉर्डिंग स्टूडियो में रहता था कभी किसी कवि-गोष्ठी में, कभी कविता रिकॉर्ड कराने के लिए और कभी अपनी आवाज़ में कोई कहानी रिकॉर्ड कराने के लिए।

मेरी मित्रता भी प्रशासन शाखा से बाहर, प्रोग्राम विभाग के लोगों से अधिक थी, जबकि प्रशासन शाखा के बहुत से लोग प्रोग्राम विभाग के लोगों से ईर्ष्या करते थे, क्योंकि उनको पैसा और ख्याति, दोनों अधिक मिलते हैं।

हाँ तो कार्यक्रम विभाग में एक थे- श्री राजेंद्र वोहरा, कार्यक्रम निष्पादक, बहुत ही सृजनशील व्यक्ति थे, बाद में वे केंद्र निदेशक के स्तर तक पहुंचे थे। एक थे मेरे मित्र- बैजनाथ गौतम, कृषि विभाग में कार्यक्रम सहायक थे। ईसुरी के लोकगीत बड़े सुरीले अंदाज में गाते थे। और एक थे श्री एस.एस.धमौरा, वे बहुत अच्छे कलाकार थे, पगड़ी बांधकर, पूरी तरह राजस्थानी परिधान में रहते थे। इस दृश्य में ये तीन व्यक्ति ही प्रमुख रूप से थे, वैसे आकाशवाणी में अनेक कलाकार मेरे मित्र थे, जिनमें बहुत जाने-माने तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी भी शामिल थे।

हाँ तो एक लाइन के संवाद वाले इस दृश्य के बारे में बात करते हैं। मैं किसी रिकॉर्डिंग के मामले में स्टूडियो गया था और इस दृश्य में मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

दरअसल कृषकों के लिए चौपाल की रिकॉर्डिंग होनी थी, धमौरा जी ने कहा- ‘राम राम बैजनाथ भाई, क्या हाल है, आज की चौपाल में चर्चा शुरू की जाए? इस पर श्री बैजनाथ गौतम बोले- ‘हाँ धमौरा भाई मैं तो मजे में हूँ, चर्चा शुरू करते हैं, बस थोड़ा ‘वोहरा साहब’ आ जाएं।‘

इतना बोलना था, कि धमौरा जी, जो रुतबे में गौतम जी से बहुत छोटे थे, लेकिन अनुभवी कलाकार थे, उन्होंने रिकॉर्डिंग बंद करा दी और चिल्लाए- ‘ये वोहरा साहब क्या होता है? यहाँ प्रोग्राम में कोई किसी का साहब नहीं है!

बस यही अचानक याद आया, हर जगह का अलग संस्कार होता है, दफ्तर में अगर नाम के साथ साहब न लगाएं तो वह अशिष्टता है और चौपाल में अगर किसी के नाम के साथ साहब लगाएं तो वह गलत है।

आज के लिए यही एक बहाना था, अतीत में झांकने का, और उन पलों को दोहराने का, जगजीत जी की गाई गज़ल के शेर याद आ रहे हैं-

झूठ है सब तारीख हमेशा अपने को दोहराती है,
फिर से मेरा ख्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो।
शफक़, धनुख, महताब, घटाएं, तारे, नगमे, बिजली, फूल,
उस दामन में क्या-क्या कुछ है, वो दामन हाथ में आए तो।

 

नमस्कार।

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ट्वेंटी-ट्वेंटी (2020) की शुरूआत!

लो जी नया साल शुरू हो गया। ऐसे मौकों के लिए लोग अपनी पोस्ट तैयार रखते हैं, जिससे घड़ी का कांटा सही जगह पहुंचते ही तुरंत ‘चेप’ दें। लेकिन मैं थोड़ा सुस्त बंदा हूँ।

 

 

वैसे इस साल का शीर्षक भी जोरदार है ‘ट्वेंटी-ट्वेंटी’, जैसे 20-20 का क्रिकेट मैच रोमांचक और उत्साह से भरा होता है, वैसे ही यह वर्ष भी रोमांच और उत्साह से भरा रहे, और सबसे जरूरी है कि यह प्यार से भरा रहे, यह मेरी दुआ है।

इस वर्ष के साथ ही नया दशक भी शुरू हो रहा है। इसके साथ ही मुझे अपने जन्म का वर्ष भी याद आता है 1950, तब भी नया दशक प्रारंभ हुआ था। सात दशक इस धरती पर बिता दिए, बहुत ज्यादा लोगों को नहीं मिलता इतने समय इस ग्रह पर मनुष्य के रूप में जीवन जीने का अवसर!

इसके साथ ही पिछले वर्ष का एक अलग अनुभव याद आ रहा है। जी हाँ मैंने कम से कम तीन मित्रों से उनके जन्म-दिन के अवसर पर मित्रता तोड़ ली! वैसे ये अच्छी बात नहीं है ना! लेकिन ये अनुभव भी शायद इस उम्र में और आज के आधुनिक समय में ही ज्यादा होता है!

जैसा मैंने कहा मेरे मित्र और सहकर्मी, जो ‘फेसबुक’ पर भी मेरे मित्र समूह में शामिल थे, उनके जन्मदिन का नोटिफिकेशन फेसबुक पर आया, अब जबकि हम रिटायर होने के बाद काफी दूर-दूर अलग शहरों में रहते थे। मुझे यह जानकारी तो मिल चुकी थी कि मेरे वे मित्र अब परलोक सिधार चुके हैं, लेकिन फेसबुक पर उनकी प्रोफाइल अभी भी बनी हुई थी, शायद उनको पता होता कि अब जाने वाले हैं तो वे खुद ही इसे समाप्त कर देते, लेकिन ऐसा तो होता नहीं ना!

हाँ तो मेरे पास एक विकल्प तो यह था कि ऐसे अपने मित्रों को जन्म दिन की बधाई दूं, लेकिन इस बात की संभावना तो नहीं है न कि जहाँ वे अब है, वहाँ फेसबुक भी होगा! खैर मुझे बेहतर विकल्प यही लगा कि मैं उनको अपने मित्रों की सूची से हटा दूं, वरना हर वर्ष जन्मदिन की यह सूचना बिना कारण परेशान करती। यह अनुभव विशेष रूप से पिछले वर्ष ही हुआ क्योंकि मेरी उम्र के लोग ऊपर की फ्लाइट के लिए लाइन में लगे होते हैं ना!

खैर नववर्ष पर यह प्रसंग अचानक याद आ गया। हाँ तो 1950 में जन्म लेने के बाद, मै पूरे उत्साह और जीवंतता के साथ जीवन के आठवें दशक में प्रवेश कर रहा हूँ, जो बिछड़ उनको सादर नमन और नए मित्रों का हार्दिक स्वागत-

आने वाले स्वागत, जाने वाले विदा,
अगले चौराहे पर इंतजार, शुक्रिया!

 

आज के लिए इतना ही, नववर्ष 2020 के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।
ईश्वर करे कि यह वर्ष हम सभी के और समूची मानव जाति के लिए सुख-समृद्धि लाने वाला हो।

नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-2

कल से मैंने अपनी रचनाएं, जितनी उपलब्ध यहाँ शेयर करना शुरू किया है जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं केवल इतना कर रहा हूँ कि मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

एक बात और, मैं हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

 

 

लीजिए आज इस क्रम की इस दूसरी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

 

पिता के नाम

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ 

हे पिता
यदि हो कहीं, तो क्या लिखूं तुमको
बस यही, जो जिस तरह था
उस तरह ही है।

 

पत्र है अभिवादनों की शृंखला केवल
हम अभी जीवित बचे हैं, यह बताने को,
और आश्वासन इसी अनुरूप पाने को,
मैं न मानूं किंतु प्रचलन
इस तरह ही है।

 

हाल अपना क्या सुनाऊं, ठीक सा ही है,
गो कि अदना क्लर्क–
कल का महद आकांक्षी,
ओस मे सतरंगदर्शी बावला पंछी–
हो गया है, मुदित सपना, आपके मन का
जी रहा है, और जीवन
उस तरह ही है।

 

साथ हैं अब कुछ वही एहसास सपनीले-
वह फिसलने फर्श पर मेरा रपट जाना,
और चिंता से तुम्हारा आंख भर लाना,
बीच सड़कों, धुएं, ट्रैफिक के गिरा हूँ मैं
और यह ध्यानस्थ दुनिया-
उस तरह ही है।

 

और यह दूसरी कविता, बेरोजगारी के दिनों के अनुभव पर आधारित-

 

इंद्रधनुष सपनों को, पथरीले अनुभव की
ताक पर धरें,
आओ हम तुम मिलकर, रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।

 

गर्मी में सड़कों का ताप बांट लें,
सर्दी में पेड़ों के साथ कांप लें,
बूंद-बूंद रिसकर आकाश से झरें।
रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें॥

 

ढांपती दिशाओं को, हीन ग्रंथियां,
फूटतीं ऋचाओं सी मंद सिसकियां।
खुद सुलगे पिंड हम, आग से डरें।
रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

जीवन के जो अनुभव सिद्ध सिद्धांत हैं, वही अक्सर कविता अथवा शायरी में भी आते हैं, लेकिन ऐसा भी होता है कि कवि-शायर अक्सर खुश-फहमी में, बेखुदी में भी रहते हैं और शायद यही कारण है कि दिल टूटने का ज़िक्र शायरी में आता है या यह कहा जाता है-

मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए, मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो!

अब हर समय व्यावहारिक बना रहे तो कवि-शायर क्या हुआ, सामान्य जीवन में, सभी लोग वैसे भी कहीं न कहीं धोखा खाते ही हैं और कुछ लोग जो ज्यादा भरोसा करने वाले होते हैं, वो खाते ही रहते हैं।

इसीलिए शायद कविवर रवींद्र नाथ ठाकुर ने लिखा था-

जदि तोर डाक सुनि केऊ ना आशे, तबे एकला चलो रे!

इसी बात को एक हिंदी फिल्मी गीत में बड़ी खूबसूरती से दोहराया गया है-

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला
तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला।

हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का, तूने कहाँ है खेला।

 

जगजीत सिंह जी की गाई एक गज़ल है, शायर शायद बहुत मशहूर नहीं हैं- अमजद इस्लाम ‘अमजद’, इस गज़ल में कुछ बहुत अच्छे शेर हैं जिनको जगजीत जी ने बड़े खूबसूरत अंदाज़ में प्रस्तुत किया है-

चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले।

फस्ल-ए-गुल आई है फिर आज असीराने वफा
अपने ही खून के दरिया में नहाने निकले।

दिल ने इक ईंट से तामीर किया ताजमहल
तूने इक बात कही, लाख फसाने निकले।

दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिजरा में खड़ा सोचता हूँ
हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले।

आज यही भाव मन पर अचानक छा गया, बड़ा सुंदर कहा गया है इस गज़ल में, खास तौर पर आखिरी शेर में- अकेलेपन के जंगल में खड़ा हुआ मैं सोचता हूँ कि कैसे लोग थे जो मेरा साथ निभाने चले थे!

जीवन में जो बहुत से रंग-बिरंगे भावानुभव होते हैं, उनमें से यह भी एक है और यह काफी बार सामने आने वाला भाव है। और यह ऐसा भाव है जिसे मीना कुमारी जैसी महान कलाकार को भी भरपूर झेलना पड़ा है। उनके ही शब्दों मे आइए पढ़ते हैं-

चांद तन्हा है आस्मां, तन्हा
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा।

बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआं तन्हा।

ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा।

हमसफर कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे कहाँ तन्हा।

जलती-बुझती सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा।

राह देखा करेगा सदियों तक,
छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा।

तन्हाई, अकेलापन, बेरुखी- ये तो सबको झेलने पड़ते हैं, लेकिन मीना कुमारी जी जैसा कोई महान कलाकार ही यह दावा कर सकता है कि ‘छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा’ ।

नमस्कार।

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संगीत की देवी स्वर-सजनी!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

 

 

ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है,
ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है,
भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में
इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं, कुछ और भी है।

 

तुम अगर नाज़ उठाओ तो, ये हक़ है तुमको
मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।

 

आज हक़ीकत और कल्पना पर आधारित कुछ फिल्मी गीतों के बारे में बात करते हैं। ऊपर जिस गीत के बोल लिखे गए हैं, वह हक़ीकत के बोझ से दबे, ज़िम्मेदार शायर के बोल हैं, जो देखता है कि दुनिया में इतने दुख हैं, ऐसे में कैसे किसी एक के प्यार में पागल हुआ जाए।

अब कल्पना की धुर उड़ान के बारे में बात कर ली जाए, जहाँ प्रेमी अपने तसव्वुर में इतना पागल है कि सामने जो हक़ीकत है उसको स्वीकार नहीं कर पाता और देखें उसकी कल्पना की उड़ान कितनी दूर तक जाती है-

चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल, संगीत की देवी स्वर-सजनी,
सुंदरता की हर मूरत से, बढ़कर के है तू सुंदर सजनी।

 

दीवानगी का एक और आलम ये भी है-

 

ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम,
हमसे पूछे बिना दिल में आने लगे,
नीची नज़रों से बिजली गिराने लगे।

 

एक और मिसाल-

मेहताब तेरा चेहरा, एक ख्वाब में देखा था,
ऐ जान-ए-जहाँ बतला,
बतला कि तू कौन है।

 

और जवाब-

ख्वाबों में मिले अक्सर,
एक राह चले मिलकर,
फिर भी है यही बेहतर-
मत पूछ मैं कौन हूँ।

 

और इसके बाद फिर हक़ीकत की पथरीली ज़मीन पर आते हैं-

देख उनको जो यहाँ सोते हैं फुटपाथों पर,
लाश भी जिनकी कफन तक न यहाँ पाती है,
पहले उन सबके लिए, एक इमारत गढ़ लूं,
फिर तेरी मांग सितारों से भरी जाएगी।

 

आज के लिए इतना ही!
नमस्कार।

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याद के चरन पखारते न बीत जाय रात!

लंदन प्रवास इस बार का भी समाप्त होने को है, एक सप्ताहांत और बाकी है इसमें।

इस बीच आज मन हो रहा है कि सुकवि श्री सोम ठाकुर जी का एक प्यारा सा गीत शेयर कर लूं। कविता अपनी बात खुद ही कहती है, उसके बारे में मैं अलग से क्या कहूं, बस आप इस गीत का आनंद लीजिए –

 

जाओ, पर संध्या के संग लौट आना तुम,
चाँद की किरन निहारते न बीत जाय रात।

 

कैसे बतलाऊँ इस अंधियारी कुटिया में
कितना सूनापन है,
कैसे समझाऊँ, इन हल्की सी साँसों का
कितना भारी मन है,
कौन सहारा देगा दर्द -दाह में बोलो
जाओ पर आँसू के संग लौट आना तुम,
याद के चरन पखारते न बीत जाय रात।

 

हर न सकी मेरे हारे तन की तपन कभी
घन की ठंडी छाया,
काँटों के हार मुझे पहना के चली गई
मधुऋतु वाली माया,
जी न सकेगा जीवन बिंंधे-बिंंधे अंगों में,
जाओ पर पतझर के संग लौट आना तुम,
शूल की चुभन दुलारते न बीत जाय रात।

 

धूल भरे मौसम में बज न सकेगी कल तक
गीतों पर शहनाई,
दुपहरिया बीत चली, रह न सकेगी कल तक
बालों में कजराई,
देर नही करना तुम गिनी -चुनी घड़ियाँ हैं,
जाओ पर सपनों के संग लौट आना तुम,
भीगते नयन उघारते न बीत जाय रात।

 

मेरी डगमग नैया डूबते किनारों से
दुख ने ही बाँधी है,
मेरी आशावादी नगरी की सीमा पर
आज चढ़ी आँधी है,
बह न जाए जीवन का आँचल इन लहरों में,
जाओ, पर पुरवा के संग लौट आना तुम,
सेज की शिकन संवारते न बीत जाय रात।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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