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लंदन फिर से छूटा जाय!

यह आलेख भी मैंने पिछले वर्ष लंदन छोड़ने से पहले लिखा था, अब इसको थोड़ा बहुत एडिट करके फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ।
डेढ़ महीने के प्रवास के बाद कल सुबह लंदन छोड़ देंगे। कल दोपहर की फ्लाइट यहाँ से है, सो सुबह ही घर छोड़ देंगे, हाँ उस समय जब भारत में दोपहर होती है। फिर कुछ दिन बंगलौर में रुककर, अगले सप्ताह गोवा पहुंचेंगे।

 

 

बहुत लंबे समय तक यमुना मैया के पास, दिल्ली में यमुना पार- शाहदरा में रहे, एक वर्ष समुद्र के आकर्षण वाली नगरी मुंबई में रहे, अब गोवा में रहते हैं, जो समुद्र और अनेक आकर्षक ‘बीच’ होने के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन लंदन का अनुभव एकदम अलग था, जहाँ घर से थोड़ा दूर ही समुद्र जैसी लगने वाली नदी ‘थेम्स’ बहती है, पिछले वर्ष जिस मकान में थे वहाँ तो घर को छूते हुए ही बहती थी, अब नए घर के बगल से नहर बहती है, जिसके पार ‘कैनरी व्हार्फ’ के अंडरग्राउंड और ओवरग्राउंड दोनो स्टेशन हैं, एक ‘जुबिली लाइन’ का और दूसरा ‘डीएलआर’ लाइन का।

 

 

दिन भर पहले रंग-बिरंगे आकर्षक शिप और बोट घर से ही देखने को मिलते थे, जो एक अलग ही अनुभव था। इस बार हर कुछ ही सेकंड बाद ‘डीएलआर’ लाइन की ट्रेन सामने से जाती हुई दिखाई देती हैं। दुनिया के दूसरे छोर पर आकर यहाँ के स्थानों और अलग रंग, सभ्यता और संस्कृति वाले लोगों के बीच समय बिताने, एक दूसरी ही दुनिया को देखने का अवसर मिला। कुछ लोगों की रुचि स्थानों में अधिक होती है, मेरी मनुष्यों में भी समान रूप से रुचि है, हालांकि यहाँ अधिक लोगों से बातचीत का अवसर तो नहीं मिला।

 

 

शाम को जब 6 से 7 बजे तक वॉक के लिए जाता हूँ, इस बार मेरा ‘वॉक’ का ठिकाना ‘कैनरी व्हार्फ रिवर फ्रंट’ है, नदी किनारे यह आकर्षक स्थान विकसित किया गया है, जहाँ क्रूज़ आदि से लोग आते-जाते हैं और हाँ बड़ी संख्या में लोग यहाँ वॉक, साइक्लिंग और कुदरत का आनंद लेने के लिए भी आते हैं, शाम के समय यहाँ सूर्यास्त का सुंदर दृश्य देखने को मिलता है, जैसा गोवा में ‘मीरामार बीच’ पर भी मैं देखता हूँ।

 

 

एक और गतिविधि जो यहाँ बहुत सामान्य है, वह है ‘बार’ की रौनक, मैं जब ‘कैनरी व्हार्फ’ स्टेशन के सामने से होकर गुज़रता हूँ, और जब ‘रिवर फ्रंट’ पहुंचता हूँ वहाँ भी, मदिरालय में पीने वालों की इतनी भीड़ होती है, कि वे विशाल ‘बार’ के भीतर नहीं समा पाते और काफी संख्या में उनको बाहर खड़े होकर ही पीनी पड़ती है, ऐसा लगता है कि जैसे शराब मुफ्त में बंट रही हो, मदिरालय के सामने से गुज़रने में थोड़ी दिक्कत होती है, लेकिन मैंने किसी को पीकर बहकते हुए तो नहीं देखा। भारत में तो बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि पीकर बहके नहीं, तो पैसा बेकार ही खर्च किया!

 

 

इससे पहले दुबई और यूएई के प्रांतों तथा तंजानिया में घूमने का अवसर मिला था। लंदन का तो यह दूसरा ट्रिप है, पिछले वर्ष एक माह के लिए आया था, इस बार डेढ़ माह का प्रवास था। निश्चित रूप से हर अनुभव अपने आप में नया होता है।

 

 

लंबे समय तक एनटीपीसी में सेवा की लेकिन उस सेवा के दौरान कभी विदेश भ्रमण का अवसर नहीं मिला। मुझे याद है कि एक बार एक कवि आए थे, मैं वहाँ कवि सम्मेलनों का आयोजन करता था। तो वे कवि, उनको दिखता भी कम था, ‘भोंपू’ नाम था उनका, उन्होंने एकदम अपनी आंखों से सटाकर मेरा हाथ देखा था और कहा था कि मैं तो पता नहीं जिंदा रहूंगा या नहीं, लेकिन आप दुनिया के कई देश घूमोगे!

 

 

मैं सेवा से रिटायर भी हो गया फिर सोचा कि अब कहाँ विदेश जाऊंगा, लेकिन बच्चों का प्रताप है कि कई देशों में घूमना हो गया। कुछ लोगों के लिए विदेश जाना सहज ही रूटीन का हिस्सा होता है लेकिन मेरे मामले में ऐसा नहीं था।

खैर, आज ज्यादा लंबी बात नहीं करूंगा और इसके बाद अपने देश में पहुंचने के बाद ही बात होगी।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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लंदन की खुरचन!

यह आलेख भी मैंने पिछले वर्ष लंदन छोड़ने से पहले लिखा था, अब इसको थोड़ा बहुत एडिट करके फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ।

शीर्षक पढ़कर आप सोच सकते हैं कि मैं किस डिश, किस व्यंजन की बात कर रहा हूँ और क्या ऐसी कोई डिश भी लंदन की विशेषता है! दरअसल मुझे तो किसी भी डिश की जानकारी नहीं है इसलिए ऐसी बात की तो उम्मीद न कीजिए।

असल में जब किसी भी विषय में बातचीत का समापन करना हो,तो एक तरीका यह भी है कि जहाँ लगे कि यह बात बतानी रह गई है,कुछ यहाँ से,कुछ वहाँ से,वे बातें ही कर ली जाएं। जैसे कड़ाही में हलुआ आदि खत्म होने पर उसे खुरचकर निकालते हैं! इतना ज्ञान तो मुझे है खाने-पीने के पदार्थों का!

हाँ तो कुछ बातें,जो मुझे यहाँ अच्छी लगीं,उनका ज़िक्र कर लेते हैं,वैसे कमियां भी सभी जगह होती हैं,लेकिन उन पर मेरा ध्यान तो गया नहीं है,डेढ़ माह के इस संक्षिप्त प्रवास में। हाँ जो बातें मैं कहूंगा,वो जितना अनुभव मुझे यहाँ हुआ है,उसके आधार पर ही कहूंगा,हो सकता है कुछ इलाकों में स्थिति इससे अलग हो।

कुछ बातें हैं जिन पर अपने देश में तो सरकारों ने कभी ध्यान दिया नहीं है,और ऐसा करके शायद कुछ व्यवसायों को हमारे देश में बहुत बढ़ावा मिला है!

जैसे एक है पीने का शुद्ध पानी! क्या ये हमारी सरकारों,नगर निकायों आदि की ज़िम्मेदारी नहीं है कि नागरिकों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जाए! अपने संक्षिप्त प्रवास में मुझे तो यहाँ कोई पानी शुद्ध करने के लिए आरओ सिस्टम,फिल्टर आदि इस्तेमाल करते नहीं दिखा। दुकानों में भी मैंने ये सामान बिकते नहीं देखा। होटल में रुकने पर भी यह बताया गया कि आपके कमरे, बाथ रूम में जो पानी आ रहा है,उसी को आप पीने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सोचिए यदि हमारी सरकारें इस तरफ ध्यान देतीं तो नागरिकों का कितना भला होता,लेकिन तब यह फिल्टर,आरओ सिस्टम का उद्योग कैसे पनपता!

 

इसी प्रकार यहाँ मैंने किसी को जेनरेटर,इन्वर्टर आदि इस्तेमाल करते नहीं देखा। मैं गुड़गांव में 7-8 साल रहा हूँ, सोचिए वहाँ तो इन्वर्टर के बिना काम ही नहीं चलता,कितना पनपाया है इन उद्योगों को हमारी सरकारों के निकम्मेपन ने! इसके अलावा जिन हाउसिंग सोसायटियों में पॉवर बैक-अप दिया जाता है,वो कितना ज्यादा पैसा वसूलती हैं लोगों से और इसके लिए भी हमारी सरकारों का निकम्मापन ही ज़िम्मेदार हैं।

 

यहाँ लंदन की बसों में केवल ड्राइवर होता है और भुगतान बस,ट्रेन आदि सभी में कार्ड द्वारा किया जाता है। यहाँ मैंने पाया कि विकलांग व्यक्ति भी काफी संख्या में हैं। लेकिन वे गतिविधि के मामले में कहीं किसी से कम नहीं लगते। मैंने देखा कि यहाँ उनके पास सामान्य व्हील चेयर नहीं बल्कि मोटरचालित चेयर होती है। बस में जब कोई विकलांग व्यक्ति आता है तो ड्राइवर एक बटन दबाकर गेट से एक स्लोप वाला प्लेटफॉर्म निकाल देता है और वह व्यक्ति उससे बस में चढ़ जाता है। यहाँ सभी बसों में,ट्रेन में विकलांग व्यक्ति अपनी मोटरचालित कुर्सी के साथ चढ़ते हैं। (वैसे मुझे लगता है कि उनके लिए ‘दिव्यांग’ शब्द इस्तेमाल करना ही बेहतर है)।

हर जगह- बस,रेल,मार्केट में आपको दिव्यांगों की मोटरचालित कुर्सी और बच्चों की प्रैम अवश्य दिखाई देंगी। सक्रियता में यह दिव्यांग व्यक्ति कहीं किसी से कम नहीं लगते और इनके लिए सुविधाएं भी हर जगह हैं,जिससे ये किसी पर निर्भर नहीं रहते।

 

 

बच्चों के मामले में भी ये है कि यहाँ पर वे या तो प्रैम में होते हैं या अपने पैरों पर,वे गोदी में दिखाई नहीं देते,और उनकी प्रैम के लिए भी सभी स्थानों पर व्यवस्था है। आपकों बस,ट्रेन और मार्केट में कुछ मोटरचालित व्हील चेयर और कुछ प्रैम अवश्य मिल जाएंगी।

 

अंत में एक बात याद आ रही है,शायद निर्मल वर्मा जी ने लिखा था कि लंदन जाने के बाद मेरी सबसे पहली इच्छा ये थी कि जिन अंग्रेजों ने हमारे देश पर इतने लंबे समय तक राज किया है, उनमें से किसी से अपने जूतों पर पॉलिश कराऊं। तो यहाँ मैंने देखा कि यहाँ शॉपिंग मॉल आदि में पॉलिश करने के लिए एक ऊंचे प्लेटफॉर्म पर कुर्सी रखी रहती है जिस पर पॉलिश कराने वाला बैठता है,उसके सामने ही पॉलिश करने वाला,फर्श पर रखी कुर्सी पर बैठकर पॉलिश करता अथवा करती है। उसको पॉलिश करते देखकर ही आप जान पाएंगे कि वह पॉलिश करने वाला अथवा वाली है,अन्यथा नहीं। सफाई कर्मी भी एक कूड़ा उठाने के साधन से,खड़े-खड़े ही नीचे पड़ा कूड़ा उठकर अपने पास रखी थैली में बिना छुए डाल देता है। हर काम की गरिमा यहाँ पर है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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