ख़ामुशी जिनकी तर्जुमानी है!

ऐ लब-ए-नाज़ क्या हैं वो असरार,
ख़ामुशी जिनकी तर्जुमानी है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

जाम छलकता दिखाई दे!

वो लब कि जैसे साग़र-ए-सहबा दिखाई दे,
जुम्बिश जो हो तो जाम छलकता दिखाई दे|

कृष्ण बिहारी नूर

बाग़ सा महकाए हुए रहना!

छलकाए हुए चलना ख़ुशबू लब-ए-लाली की,
इक बाग़ सा साथ अपने महकाए हुए रहना|

मुनीर नियाज़ी

बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं!

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं,
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं|

अहमद फ़राज़

गालियां खा के बे मज़ा न हुआ!

कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब,
गालियां खा के बे मज़ा न हुआ|

मिर्ज़ा ग़ालिब

तुमने क्या मुझ से बेवफ़ाई की!

मेरे होंठों के फूल सूख गए,
तुमने क्या मुझ से बेवफ़ाई की|

बशीर बद्र

किरन फूल की पत्तियों में दबी!

किरन फूल की पत्तियों में दबी,
हँसी उस के होंठों पे आई हुई|

बशीर बद्र

गुंचा तेरे होठों पर खिला करता है!

जो भी गुंचा तेरे होठों पर खिला करता है,
वो मेरी तंगी-ए-दामाँ का गिला करता है|

क़तील शिफ़ाई

होठों पे खिलते गुलाब रखते हैं!

वो पास बैठें तो आती है दिलरुबा ख़ुश्बू,
वो अपने होठों पे खिलते गुलाब रखते हैं|

हसरत जयपुरी

कुछ पाना ज़रूरी है!

मेरे होंटों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो,
कि इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है|

वसीम बरेलवी