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स्कॉटलैंड यात्रा-3 !

स्कॉटलैंड यात्रा से जुड़े हुए अपने शेयर कर रहा था, जिसके बाद आज रात तक वापस लंदन लौट जाएंगे|जैसा कि मैं पहले भी बता हूँ, यह सब प्रसंग 2 साल पहले के हैं|


अब स्कॉटलैंड यात्रा में तीसरे और अंतिम दिन के बारे में बात करते हैं, जैसा कि प्रोग्राम था, उसके अनुसार नाश्ता करने के बाद होटल से चेक आउट करके निकलना था और हम लोगों ने ऐसा ही किया।


अंतिम दिन का प्रमुख आकर्षण था- एडिनबर्ग, जो कि एक ऐतिहासिक नगर होने के अलावा स्कॉटलैंड की राजधानी भी है। नगर में पहुंचने के बाद हमने रानी का महल देखा, जहाँ वे अपने एडिनबर्ग प्रवास के दौरान रहती हैं। जैसा कि होता है बहुत भव्य महल है। उसके सामने ही स्कॉटलैंड की संसद का भवन भी है।


इन दो प्रमुख भवनों के पास ही, ऊंची कार्ल्टन पहाड़ी पर विकसित की गई एक सिटी ऑब्ज़र्वेटरी है जहाँ से नगर का बहुत सुंदर दृश्य दिखाई देता है। इस पहाड़ी पर एक पुर्तगाली तोप भी है, और लोगों ने यहाँ से नगर के बहुत सुंदर चित्र लिए।


इसके बाद अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए टूर ऑपरेटर ने हम लोगों को ‘एडिनबर्ग कैसल’ के पास छोड़ दिया क्योंकि इसके पास का इलाका बहुत सुंदर और गतिविधिपूर्ण है, मानो दिल्ली का कनॉट प्लेस, हालांकि वहाँ जो दृश्य देखने को मिले वे बहुत ही भव्य थे। वहाँ पास ही में राष्ट्रीय संग्रहालय, राष्ट्रीय पुस्तकालय आदि भी हैं।


‘एडिनबर्ग कैसल’ काफी ऊंचाई पर स्थित है और बहुत भव्य है, वहाँ देखने वालों की भारी भीड़ होती है। वहाँ से नीचे उतरते हुए सेंट गाइल्स कैथेड्रल और बाजार में अनेक जीवंत आकर्षण हैं। वहाँ एक भव्य मूर्ति है, जिसके बारे में माना जाता है कि उसके पांव के पंजे पर हाथ रगड़ने से लोगों की किस्मत चमक जाती है। बाजार में लगातार आकर्षण देखने को मिलते हैं, बहुत से डॉगी चश्मा पहने बैठे दिखाई देते हैं और उनका स्वामी संगीत का साज़ बजाते हुए उन दोनो के लिए कमाई कर रहा होता है।


इसी बाज़ार के पास राष्ट्रीय संग्रहालय है, जिसमें अत्यधिक आकर्षक वस्तुओं का संग्रह है। इसके पास ही ‘बॉबी’ नाम के एक कुत्ते की मूर्ति बनी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह अपने मालिक की मृत्यु के बाद, अपनी मृत्यु तक उसकी कब्र पर ही बैठा रहता था। इस कुत्ते को देखने के लिए बहुत लोग आते थे, अब उसकी मूर्ति को देखने आते हैं।


इस प्रकार तीन दिन की इस यात्रा में अनेक दर्शनीय स्थानों और प्रकृति की अनूठी छवियों को देखने, उसे यथासंभव अपने कैमरों में कैद करने के बाद हम लोग वापसी की लगभग 9 घंटे लंबी यात्रा पर रवाना हुए और रास्ते में कुछ स्थानों पर चाय-पानी के रुकते हुए हम वापस चले, और रात को 12 बजे के बाद हम वापस लंदन पहुंचे।

एक कमी तो रह गई, पता नहीं उस समय खींची हुई तस्वीरें मेरे सिस्टम से कहाँ गायब हो गईं, और एक-दो मैंने पिछले आलेख में ही शामिल कर ली थीं| खैर अभी आलेख से ही काम चला लीजिए|


जैसे कि हर अनुभव करता है, इस यात्रा ने भी हम लोगों को भीतर से समृद्ध किया।


नमस्कार।
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स्कॉटलैंड में दूसरा दिन!

तीन दिन की स्कॉटलैंड यात्रा में दूसरे दिन के बारे में बात करने से पूर्व यह बता दूं कि यात्रा के दौरान पहली रात हमने ग्लास्गो एयरपोर्ट के पास ही ‘ट्रैवेलॉज’ समूह के होटल में बिताई, जहाँ टूर ऑपरेटर ने हमारे रुकने की व्यवस्था की थी। इस होटल में कांटिनेंटल ब्रेकफास्ट की व्यवस्था थी, जिसमें मुझ जैसे लोगों को बार-बार यह पूछना पड़ता है, ‘ये डिश वेजीटेरिअन है न जी!’


खैर नाश्ता करके हम सुबह 9 बजे भ्रमण के लिए रवाना हुए। चलिए शुरू में संक्षेप में अपने सहयात्रियों के बारे में बता दूं। टूर ऑपरेटर-कम-ड्राइवर महोदय के बारे में तो मैं बता ही चुका हूँ। बस में शुरू की दो पंक्तियों में एक गुजराती परिवार था जिसमें एक पति-पत्नी, उनकी दो बेटियां, जिनमें से एक ‘सी.ए.’ थी जैसा उन्होंने बताया और एक बेटा जो शायद बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा था। उनके बाद दो मद्रासी वृद्धाएं थीं, जो सहेलियां थीं, जिनमें से एक के संबंधी लंदन में रहते हैं। दोनो महिलाएं 70 वर्ष के आसपास उम्र की थीं, एक का बेटा अमरीका में है, जहाँ वह इसके बाद जाने वाली थीं।


वैसे सभी लोग क्योंकि लंदन से इस यात्रा पर रवाना हुए थे, तो जाहिर है कि सभी के संबंधी लंदन में रहते थे और वे वहाँ से ही रवाना हुए थे। हाँ तो बाकी लोग तो रह ही गए, एक परिवार केरल का था, जिसमें युवा माता-पिता और उनकी एक 8-10 साल की बेटी थी। उनके पीछे था कलकत्ता से आया एक परिवार, जो थोड़ा अंग्रेजी संस्कृत्ति से ज्यादा मुतमइन था। मियां-बीबी और छोटा बेटा, जो या तो कभी-कभी बंगला बोलते थे, या ज्यादातर तीनों मिलकर अंग्रेजी में कोई गेम खेलते रहते थे।


अंत में चार लोगों की एक सीट थी, जिस पर हम पति-पत्नी, और हमारे अलावा बंगलौर से आए एक और पति-पत्नी थे, शायद 50 वर्ष के आसपास उम्र के थे।

दूसरे दिन के भ्रमण के बारे में अधिक नहीं बता पाऊंगा, क्योंकि यह शुद्ध प्रकृति की गोद में यात्रा थी, लंबी-चौड़ी सुंदर फैली-पसरी झीलें, बीच-बीच में पहाड़ों घाटियों के बीच सुंदर व्यू-पाइंट, जिसकी खूबसूरती ही उसका वर्णन होती है। लेकिन दिक्कत ये है कि मुझे अभी ठीक से फोटो डालना नहीं आता!

खैर नाम के तौर पर बताऊं तो दूसरे दिन हम इन स्थानों पर गए- लोच-लोमंड जो स्कॉटलैंड की बहुत सुंदर और विशाल झील है, जिसके पास लाल हिरण काफी रहते हैं। यहाँ अत्यंत सुंदर झरना है- ‘फाल ऑफ फलोच, जिसका दृश्य देखते ही बनता है। ब्रिटेन के सबसे ऊंचे पहाडों की छाया में बसे फोर्ट विलियम नगर में गए, वहाँ हमने भोजन किया और उसके बाद आगे ऊंचे पहाडों ‘बेन नेविस’ के बीच रोपवे ट्रॉली ‘गोंडोला’ से ऊपर गए, लेकिन अचानक बरसात आ जाने के कारण हम इसका अधिक आनंद नहीं ले पाए।

लौटते समय हमने फोर्ट विलियम में ही एक दुकान से थ्री डाइमेंशन तस्वीरें लीं जो हमें देखने में बहुत अच्छी लगीं। टूर ऑपरेटर ने बताया था कि यहाँ से सस्ते गिफ्ट आइटम, इधर कहीं नहीं मिलेंगे। कुछ ऐसा ही लगा भी। लौटते समय भी सुंदर पहाड़ और झीलें लुभाते रहे, नाम में क्या रखा है लेकिन कुछ नाम थे- कैलेडोनिअन कैनाल, फोर्ट ऑगस्टस विलेज, लोच (झील) नेस मॉन्स्टर, जिसमें माना जाता है कि दैत्याकार जानवर रहते थे।

दूसरे दिन की यात्रा का विवरण इतना ही, अब कल बात करेंगे तीसरे और अंतिम दिन के बारे में।

नमस्कार।

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थेम्स नदी और लंदन !

अभी तो मैं नई-पुरानी पोस्ट की बात भी नहीं करूंगा, क्योंकि मन है कि कुछ दिन तक लंदन प्रवास की अपनी यादें ताज़ा करूं| पहले मैं शेयर कर रहा हूँ जून-जुलाई 2018 के प्रवास के कुछ अनुभव और उसके बाद अगस्त-सितंबर 2019 पर आऊँगा|


लंदन में वीक-एंड का दूसरा दिन रविवार, जब हम एक बार फिर से घूमने के लिए निकले, बस और ट्रेन से प्रारंभिक यात्रा करने के बाद हम पहुंचे ‘ग्रीनविच’ जो कि मेरिडियन लाइन पर स्थित है। मेरिडियन लाइन की रीडिंग के आधार पर ही जीएमटी (ग्रीनविच मीन टाइम) निर्धारित किया जाता है, दुनिया में हर स्थान की कोणीय स्थिति, इस स्थान से वह कितने कोण पर स्थित है, शायद ऐसे निर्धारित की जाती है। वैज्ञानिक किस्म के दिमाग वालों के लिए इसमें शायद और बहुत सी बातें जानने के लिए हों, मेरे लिए इतना ही बहुत है।


इसके पास ही क्वीन का महल और रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी भी है, जहाँ बहुत सी खगोलीय गणनाएं की जाती हैं। वैसे लंदन में क्वीन के महल बहुत से हैं यह भी पुराना है, यहाँ की प्रॉपर्टी का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी रॉयल परिवार के पास है।


इसके पास ही वह स्थान है, जहाँ से इस मौसम में, प्रत्येक रविवार की शाम को एक क्रूज़ के द्वारा थेम्स नदी की लगभग 2 घंटे की यात्रा कराई जाती है तथा इसमें दिखाया और बताया जाता है कि थेम्स नदी के किनारों पर कौन से महत्वपूर्ण स्थान हैं।

वैसे देखा जाए तो पुराने ज़माने में, सभी महत्वपूर्ण नगर प्रमुख नदियों के किनारे ही बसाए गए थे, जैसे हमारे यहाँ- गंगा, यमुना, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र आदि-आदि नदियों के किनारे पर। लंदन में तो लगता है कि थेम्स नदी नगर के बीचों-बीच होकर गुज़रती है और इसके ऊपर अनेक पुल हैं, जो नगर के दोनों तरफ के हिस्सों को जोड़ते हैं। एक पुल के सिर्फ स्तंभ खड़े हुए थे, बताया गया कि पुल गिर गया था, सो उसके स्तंभों को लगे रहने दिया गया। यह जानकर तसल्ली हुई कि लंदन में भी पुल गिर जाते हैं। बाकी पुल तो बहुत सारे हैं, जिनमें प्रसिद्ध लंदन ब्रिज भी है और भी ब्रिज अलग-अलग कारणों से प्रसिद्ध हैं।

शिप से लौटते समय अनेक इमारतें और स्ट्रक्चर, नए-पुराने दिखाए गए, इनमें ‘लंदन आई’ भी है, जो एक विशाल आकाश-झूला है, लगातार चलता रहता है लेकिन देखने में लगता है कि वह स्थिर है, उसका एक चक्कर लगभग आधे घंटे में पूरा होता है। इसके अलावा अनेक कैथेड्रल, और मूल्यवान प्रॉपर्टी दिखाई गईं।


एक बात जिसने मेरा ध्यान ज्यादा आकर्षित किया, नदी के जिस किनारे पर पुराने महल आदि अधिक थे, उस तरफ अनेक कैदखाने भी थे, जहाँ बताया गया कि कैदियों को फांसी भी दी जाती थी। नदी के दूसरे किनारे पर विलियम शेक्सपियर और चार्ल्स डिकेंस से जुड़े अनेक स्थान थे, जिनमें थिएटर और वे स्थान भी थे जिनको लेकर डिकेंस ने अपने उपन्यास आदि लिखे थे।


कुल मिलाकर जीवन नदी के दो निरंतर समानांतर चलते किनारे, जिनमें से एक पर राज-काज, सुख-सामान और अपराध और दूसरी तरफ सृजन, अभिव्यक्ति आदि। ये विभाजन मैंने ऐसे ही कर दिया, जरूरी नहीं है कि ऐसा कोई विभाजन हो, ये साथ-साथ भी चल सकते हैं।


नदी किनारे पर स्थित भवनों, स्थानों आदि के नाम लेने में तो बहुत टाइम लग जाएगा, मैंने उनको याद भी नहीं किया, वह बताने का मेरा उद्देश्य भी नहीं है, पर इनमें से कुछ हैं- टॉवर ऑफ लंदन, लंदन एक्वेरियम, हाउसेज़ ऑफ पार्लिआमेंट, बटर-सी पार्क, रॉयल बोटेनिक गार्डन्स और ब्रिज तो कम से कम 15-20 हैं।


अंत में डॉ. कुंवर बेचैन जी के एक गीत की दो पंक्तियां, ऐसे ही याद आ रही हैं-


नदी बोली समुंदर से मैं तेरे पास आई हूँ,
मुझे भी गा मेरे साजन, मैं तेरी ही रुबाई हूँ!


आज के लिए इतना ही!



नमस्कार।
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सफर पुराना, मंज़िल पुरानी!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

वैसे मुझे लगता है कि अभी कुछ दिन तक मैं बहुत से पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर करूंगा और इस बहाने लंदन की यादें ताज़ा करूंगा| हमारे फैमिली ग्रुप का नाम ही रहा है- ‘लंदन, गोवा, बंगलौर’, क्योंकि एक-एक बेटा इन तीनों जगह रहते रहे हैं| हम दो बार लंदन भी रह आए हैं, एक बार- एक माह के लिए और एक बार डेढ़ माह के लिए| लेकिन अब फैमिली ग्रुप का नाम भी बदल गया है, क्योंकि लंदन वाला बेटा अब कनाडा चला गया है| अब लंदन फिर से जाकर रहने की संभावना तो नहीं है| कोई नहीं यादों की पुरानी गठरी तो खोल ही सकते हैं|


जैसा मैंने पहले बताया था, हम एक माह के लिए लंदन आए हुए हैं, यहाँ थेम्स नदी के किनारे पर अपने बेटे-बहू के घर में रह रहे हैं, घर की एक तरफ जिधर थेम्स नदी बहती है, उधर कांच की ही दीवार, दरवाजा है, दिन भर नावें और छोटे-मोटे शिप दिखाई देते रहते हैं। नदी के दूसरे किनारे पर ओ-2 कॉन्टिनेंटल और ईवेंट प्लेस है, जो पिछ्ले ओलंपिक के समय विकसित किया गया था, कल वहाँ भी जाना हुआ।


हाँ तो वीक एंड होने के नाते, आज हम पति-पत्नी, अपने बेटे और बहू के साथ बाहर घूमने निकले। शुरुआत हुई यहाँ की लोकल बस से ट्यूब रेल स्टेशन ‘कैनेरी व्हार्फ’ और वहाँ से ट्यूब पकड़कर ग्रीन पार्क तक जाकर! वहाँ एक बर्थडे में भाग लेना था ना!


जी हाँ, ग्रीन पार्क ट्यूब स्टेशन है यहाँ लंदन में और उसके पास ही है बकिंघम पैलेस! कल क्वीन विक्टोरिया का जन्म दिन था, और हम क्योंकि कुछ देर में पहुंचे, तो हमें दूर से ही देखना पड़ा। बॉलकनी से रॉयल फैमिली के लोग, जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे, जहाँ हम थे, वहाँ से उनकी शक्लें साफ दिखाई नहीं दे रही थीं। हाँ जब हम पहुंचे तब तोपों की सलामी दी जा रही थी।


शाही परिवार रहता तो कहीं और है लेकिन ऐसे आयोजन के लिए बकिंघम पैलेस आता है। बहुत भीड़ थी, ठीक से देख भी नहीं पाए, इससे साफ तो अपना सलमान ही बॉलकनी से हाथ हिलाते हुए दिख जाता है, भले ही वो जेल से छूटकर आने पर हो। खैर फिर हमारे सामने ही रॉयल फैमिली के लोग वहाँ से वापस भी लौटकर भी चले गए और सेरेमॉनियल बैन्ड और घोड़े वगैरा भी।
महल से लौटकर फिर हमने ट्यूब पकड़ी, हाँ एक बात और, अपनी दिल्ली की मैट्रो से एक फर्क है यहाँ की ट्यूब में, प्लेटफॉर्म का किनारा पूरा कवर रहता है,और जैसे दीवार बनी हो, सिर्फ ट्यूब के डिब्बे के दरवाजे के सामने का हिस्सा खुलता है, जैसा हमने पहले दुबई में भी देखा था।


हाँ तो ट्यूब पकड़कर हम ओ-2 एरिया में गए, जो हमारे घर से ही, नदी के पार दिखता है, लेकिन ट्यूब हमें टनेल के माध्यम से, नदी के नीचे होकर वहाँ ले जाती है। ओ-2 एरिया गुड़गांव के ‘किंगडम ऑफ ड्रीम्स’ जैसा भव्य है, बस अंदर फाल्स सीलिंग को आकाश का रूप नहीं दिया है।


जिसे साधारण भाषा में रोप-वे भी कह सकते हैं, यहाँ उसका अनुभव भव्य था, पूरे लंदन का नज़ारा बहुत ऊंचाई से उसमें दिखता है, और उसको कहते हैं- एमिरेट्स एयरलाइंस। इस दिव्य यात्रा के बाद, आज के सफर को विराम दिया, घर पहुंचकर।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार।

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वापस अपने हिंदुस्तान!

डेढ़ माह के प्रवास के बाद लंदन से वापस चले और बंगलौर में आकर टपक गए। एयर इंडिया से ही हमने दोनो तरफ की यात्रा की। एक बात कहने का मन हो रहा ‘एयर इंडिया’ के बारे में, अपनी सरकारी एयरलाइन है, इसमें जो परिचारिकाएं हमारी सेवा के लिए उपस्थित होती हैं, उनकी उम्र देखते हुए कई बार खयाल आता है कि इनसे सेवा कराई जाए अथवा इनकी सेवा की जाए!

 

 

खैर रात में साढ़े तीन बजे बंगलौर पहुंचने के बाद आप्रवास अर्थात इमिग्रेशन की प्रक्रिया में सामान्य से कुछ अधिक समय लगा लेकिन फिर उसके बाद मैंने ‘कस्टम’ वालों के विशेष किले से गुज़रने की प्रक्रिया को देखा, जहाँ सभी यात्रियों के हैंड-बैगेज को ‘एक्स-रे’ किया जा रहा था, जैसा कि बोर्डिंग के समय किया जाता है और इस काम में वे अपनी अक्षमता भी भरपूर दिखा रहे थे।

 

 

इससे पहले मैं जब विदेश से वापस आया हूँ, तब या तो दिल्ली आया हूँ अथवा गोवा (मुंबई होते हुए) में इमिग्रेशन संबंधी कार्रवाई हुई है। जहाँ तक ‘कस्टम’ संबंधी कार्रवाई की बात है, उसके लिए बेल्ट से अपना सामान लेने के बाद जब यात्री बाहर की तरफ जाते हैं, मैंने देखा है कि वहाँ कस्टम वाले कुछ या सभी लोगों का सामान एक्स-रे कर लेते थे, लेकिन उसके लिए कोई लंबी लाइन लगते मैंने अब तक नहीं देखी थी।

 

 

 

हाँ तो बंगलौर पर कस्टम की परेशान करने वाली प्रक्रिया से गुजरने के बाद जब मैं बाहर आया तब दूसरी तरफ खड़े उनके एक सरगना, मेरा उसको ‘अधिकारी’ कहने का मन नहीं हो रहा, वह बोला कि आपने अपनी जेब से मोबाइल स्कैन करने के लिए नहीं निकाला। मैंने झुंझला कर कहा कुछ नहीं है भाई, सब तो निकाल दिया। इस पर वो बोला- ‘गुस्सा क्यों दिखा रहे हो, इधर खड़े हो जाओ’, तब मुझे लगा कि मैंने इस इंसान की ‘न्यूसेंस वेल्यू’ का उचित सम्मान नहीं किया। कुछ नहीं होने पर भी यह मुझे 2-4 घंटे रोककर रख सकता है, कुछ वस्तुएं भी सामान से निकालकर रख सकता है! शुक्र है ऐसा कुछ नहीं हुआ।  बाद में बेल्ट से सामान लेकर निकलने के बाद भी कस्टम का क्षेत्र था, लेकिन वहाँ किसी ने सामान स्कैन कराने के लिए नहीं कहा।

 

 

मुझे एक घटना याद आ गई, वह भी लंदन और ‘कस्टम’ से जुड़ी हुई थी। मैं ऑनलाइन अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद का काम करता हूँ, नियमित नहीं लेकिन जब मिल जाए तब, क्योंकि मैं ‘रेट’ कम रखकर यह काम नहीं करना चाहता। अनुवाद के लिए एजेंसियां, ज्यादातर विदेशी, अपनी सामग्री की सॉफ्ट-कॉपी ऑनलाइन भेज देती हैं और मैं अनुवाद करके भी ऑनलाइन वापस भेज देता हूँ।

 

 

एक बार एक ब्रिटिश एजेंसी से रेट संबंधी सहमति बनी और उन्होंने कहा कि वे कूरियर द्वारा सामग्री भेज रहे हैं, जिसका अनुवाद करना है। शायद सामग्री का वजन एक-दो किलो रहा होगा। वैसे यह पहली बार था कि कोई एजेंसी अनुवाद के लिए सामग्री की ‘हार्ड कॉपी’ भेज रही थी। उन्होंने मुझे कूरियर के संबंध में ‘ट्रैकिंग नंबर’ भेजा। बाद में पता लगा कि वह ‘कूरियर’ नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रुका हुआ था, क्योंकि किसी वीर ‘कस्टम अधिकारी’ ने उस पर, पाउंड्स में इतना कस्टम जुर्मानालगा दिया था, जितने में कोई व्यक्ति हवाई जहाज से लंदन जाकर, वह सामग्री लेते हुए वापस आ सकता है। खैर मैंने फिर उस काम की उम्मीद छोड़ दी और शायद उस एजेंसी ने भी।

 

 

बस ऐसे ही खयाल आया कि हमारे देश में कुछ ऐसी एजेंसियां हैं जिनमें जनता को परेशान करने वाले लोग हैं, भ्रष्टाचार जहाँ का शिष्टाचार है, और लोगों को परेशान करने में ही जिनको अपनी सफलता नज़र आती है। जिन गतिविधियों को रोकने के लिए ये बनी हैं, उनके सरगनाओं से अक्सर इनकी मिलीभगत  भी होती है।

खैर लंदन महानगर और वहाँ के अति सुंदर हीथ्रो एयरपोर्ट की स्मृतियों के साथ हम वापस अपने लोगों के बीच, अपने हिंदुस्तान में आ गए, कहते हैं ना ‘पुनः कॉमन इंडियन भव’।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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लंदन फिर से छूटा जाय!

यह आलेख भी मैंने पिछले वर्ष लंदन छोड़ने से पहले लिखा था, अब इसको थोड़ा बहुत एडिट करके फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ।
डेढ़ महीने के प्रवास के बाद कल सुबह लंदन छोड़ देंगे। कल दोपहर की फ्लाइट यहाँ से है, सो सुबह ही घर छोड़ देंगे, हाँ उस समय जब भारत में दोपहर होती है। फिर कुछ दिन बंगलौर में रुककर, अगले सप्ताह गोवा पहुंचेंगे।

 

 

बहुत लंबे समय तक यमुना मैया के पास, दिल्ली में यमुना पार- शाहदरा में रहे, एक वर्ष समुद्र के आकर्षण वाली नगरी मुंबई में रहे, अब गोवा में रहते हैं, जो समुद्र और अनेक आकर्षक ‘बीच’ होने के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन लंदन का अनुभव एकदम अलग था, जहाँ घर से थोड़ा दूर ही समुद्र जैसी लगने वाली नदी ‘थेम्स’ बहती है, पिछले वर्ष जिस मकान में थे वहाँ तो घर को छूते हुए ही बहती थी, अब नए घर के बगल से नहर बहती है, जिसके पार ‘कैनरी व्हार्फ’ के अंडरग्राउंड और ओवरग्राउंड दोनो स्टेशन हैं, एक ‘जुबिली लाइन’ का और दूसरा ‘डीएलआर’ लाइन का।

 

 

दिन भर पहले रंग-बिरंगे आकर्षक शिप और बोट घर से ही देखने को मिलते थे, जो एक अलग ही अनुभव था। इस बार हर कुछ ही सेकंड बाद ‘डीएलआर’ लाइन की ट्रेन सामने से जाती हुई दिखाई देती हैं। दुनिया के दूसरे छोर पर आकर यहाँ के स्थानों और अलग रंग, सभ्यता और संस्कृति वाले लोगों के बीच समय बिताने, एक दूसरी ही दुनिया को देखने का अवसर मिला। कुछ लोगों की रुचि स्थानों में अधिक होती है, मेरी मनुष्यों में भी समान रूप से रुचि है, हालांकि यहाँ अधिक लोगों से बातचीत का अवसर तो नहीं मिला।

 

 

शाम को जब 6 से 7 बजे तक वॉक के लिए जाता हूँ, इस बार मेरा ‘वॉक’ का ठिकाना ‘कैनरी व्हार्फ रिवर फ्रंट’ है, नदी किनारे यह आकर्षक स्थान विकसित किया गया है, जहाँ क्रूज़ आदि से लोग आते-जाते हैं और हाँ बड़ी संख्या में लोग यहाँ वॉक, साइक्लिंग और कुदरत का आनंद लेने के लिए भी आते हैं, शाम के समय यहाँ सूर्यास्त का सुंदर दृश्य देखने को मिलता है, जैसा गोवा में ‘मीरामार बीच’ पर भी मैं देखता हूँ।

 

 

एक और गतिविधि जो यहाँ बहुत सामान्य है, वह है ‘बार’ की रौनक, मैं जब ‘कैनरी व्हार्फ’ स्टेशन के सामने से होकर गुज़रता हूँ, और जब ‘रिवर फ्रंट’ पहुंचता हूँ वहाँ भी, मदिरालय में पीने वालों की इतनी भीड़ होती है, कि वे विशाल ‘बार’ के भीतर नहीं समा पाते और काफी संख्या में उनको बाहर खड़े होकर ही पीनी पड़ती है, ऐसा लगता है कि जैसे शराब मुफ्त में बंट रही हो, मदिरालय के सामने से गुज़रने में थोड़ी दिक्कत होती है, लेकिन मैंने किसी को पीकर बहकते हुए तो नहीं देखा। भारत में तो बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि पीकर बहके नहीं, तो पैसा बेकार ही खर्च किया!

 

 

इससे पहले दुबई और यूएई के प्रांतों तथा तंजानिया में घूमने का अवसर मिला था। लंदन का तो यह दूसरा ट्रिप है, पिछले वर्ष एक माह के लिए आया था, इस बार डेढ़ माह का प्रवास था। निश्चित रूप से हर अनुभव अपने आप में नया होता है।

 

 

लंबे समय तक एनटीपीसी में सेवा की लेकिन उस सेवा के दौरान कभी विदेश भ्रमण का अवसर नहीं मिला। मुझे याद है कि एक बार एक कवि आए थे, मैं वहाँ कवि सम्मेलनों का आयोजन करता था। तो वे कवि, उनको दिखता भी कम था, ‘भोंपू’ नाम था उनका, उन्होंने एकदम अपनी आंखों से सटाकर मेरा हाथ देखा था और कहा था कि मैं तो पता नहीं जिंदा रहूंगा या नहीं, लेकिन आप दुनिया के कई देश घूमोगे!

 

 

मैं सेवा से रिटायर भी हो गया फिर सोचा कि अब कहाँ विदेश जाऊंगा, लेकिन बच्चों का प्रताप है कि कई देशों में घूमना हो गया। कुछ लोगों के लिए विदेश जाना सहज ही रूटीन का हिस्सा होता है लेकिन मेरे मामले में ऐसा नहीं था।

खैर, आज ज्यादा लंबी बात नहीं करूंगा और इसके बाद अपने देश में पहुंचने के बाद ही बात होगी।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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लंदन की खुरचन!

यह आलेख भी मैंने पिछले वर्ष लंदन छोड़ने से पहले लिखा था, अब इसको थोड़ा बहुत एडिट करके फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ।

शीर्षक पढ़कर आप सोच सकते हैं कि मैं किस डिश, किस व्यंजन की बात कर रहा हूँ और क्या ऐसी कोई डिश भी लंदन की विशेषता है! दरअसल मुझे तो किसी भी डिश की जानकारी नहीं है इसलिए ऐसी बात की तो उम्मीद न कीजिए।

असल में जब किसी भी विषय में बातचीत का समापन करना हो,तो एक तरीका यह भी है कि जहाँ लगे कि यह बात बतानी रह गई है,कुछ यहाँ से,कुछ वहाँ से,वे बातें ही कर ली जाएं। जैसे कड़ाही में हलुआ आदि खत्म होने पर उसे खुरचकर निकालते हैं! इतना ज्ञान तो मुझे है खाने-पीने के पदार्थों का!

हाँ तो कुछ बातें,जो मुझे यहाँ अच्छी लगीं,उनका ज़िक्र कर लेते हैं,वैसे कमियां भी सभी जगह होती हैं,लेकिन उन पर मेरा ध्यान तो गया नहीं है,डेढ़ माह के इस संक्षिप्त प्रवास में। हाँ जो बातें मैं कहूंगा,वो जितना अनुभव मुझे यहाँ हुआ है,उसके आधार पर ही कहूंगा,हो सकता है कुछ इलाकों में स्थिति इससे अलग हो।

कुछ बातें हैं जिन पर अपने देश में तो सरकारों ने कभी ध्यान दिया नहीं है,और ऐसा करके शायद कुछ व्यवसायों को हमारे देश में बहुत बढ़ावा मिला है!

जैसे एक है पीने का शुद्ध पानी! क्या ये हमारी सरकारों,नगर निकायों आदि की ज़िम्मेदारी नहीं है कि नागरिकों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जाए! अपने संक्षिप्त प्रवास में मुझे तो यहाँ कोई पानी शुद्ध करने के लिए आरओ सिस्टम,फिल्टर आदि इस्तेमाल करते नहीं दिखा। दुकानों में भी मैंने ये सामान बिकते नहीं देखा। होटल में रुकने पर भी यह बताया गया कि आपके कमरे, बाथ रूम में जो पानी आ रहा है,उसी को आप पीने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सोचिए यदि हमारी सरकारें इस तरफ ध्यान देतीं तो नागरिकों का कितना भला होता,लेकिन तब यह फिल्टर,आरओ सिस्टम का उद्योग कैसे पनपता!

 

इसी प्रकार यहाँ मैंने किसी को जेनरेटर,इन्वर्टर आदि इस्तेमाल करते नहीं देखा। मैं गुड़गांव में 7-8 साल रहा हूँ, सोचिए वहाँ तो इन्वर्टर के बिना काम ही नहीं चलता,कितना पनपाया है इन उद्योगों को हमारी सरकारों के निकम्मेपन ने! इसके अलावा जिन हाउसिंग सोसायटियों में पॉवर बैक-अप दिया जाता है,वो कितना ज्यादा पैसा वसूलती हैं लोगों से और इसके लिए भी हमारी सरकारों का निकम्मापन ही ज़िम्मेदार हैं।

 

यहाँ लंदन की बसों में केवल ड्राइवर होता है और भुगतान बस,ट्रेन आदि सभी में कार्ड द्वारा किया जाता है। यहाँ मैंने पाया कि विकलांग व्यक्ति भी काफी संख्या में हैं। लेकिन वे गतिविधि के मामले में कहीं किसी से कम नहीं लगते। मैंने देखा कि यहाँ उनके पास सामान्य व्हील चेयर नहीं बल्कि मोटरचालित चेयर होती है। बस में जब कोई विकलांग व्यक्ति आता है तो ड्राइवर एक बटन दबाकर गेट से एक स्लोप वाला प्लेटफॉर्म निकाल देता है और वह व्यक्ति उससे बस में चढ़ जाता है। यहाँ सभी बसों में,ट्रेन में विकलांग व्यक्ति अपनी मोटरचालित कुर्सी के साथ चढ़ते हैं। (वैसे मुझे लगता है कि उनके लिए ‘दिव्यांग’ शब्द इस्तेमाल करना ही बेहतर है)।

हर जगह- बस,रेल,मार्केट में आपको दिव्यांगों की मोटरचालित कुर्सी और बच्चों की प्रैम अवश्य दिखाई देंगी। सक्रियता में यह दिव्यांग व्यक्ति कहीं किसी से कम नहीं लगते और इनके लिए सुविधाएं भी हर जगह हैं,जिससे ये किसी पर निर्भर नहीं रहते।

 

 

बच्चों के मामले में भी ये है कि यहाँ पर वे या तो प्रैम में होते हैं या अपने पैरों पर,वे गोदी में दिखाई नहीं देते,और उनकी प्रैम के लिए भी सभी स्थानों पर व्यवस्था है। आपकों बस,ट्रेन और मार्केट में कुछ मोटरचालित व्हील चेयर और कुछ प्रैम अवश्य मिल जाएंगी।

 

अंत में एक बात याद आ रही है,शायद निर्मल वर्मा जी ने लिखा था कि लंदन जाने के बाद मेरी सबसे पहली इच्छा ये थी कि जिन अंग्रेजों ने हमारे देश पर इतने लंबे समय तक राज किया है, उनमें से किसी से अपने जूतों पर पॉलिश कराऊं। तो यहाँ मैंने देखा कि यहाँ शॉपिंग मॉल आदि में पॉलिश करने के लिए एक ऊंचे प्लेटफॉर्म पर कुर्सी रखी रहती है जिस पर पॉलिश कराने वाला बैठता है,उसके सामने ही पॉलिश करने वाला,फर्श पर रखी कुर्सी पर बैठकर पॉलिश करता अथवा करती है। उसको पॉलिश करते देखकर ही आप जान पाएंगे कि वह पॉलिश करने वाला अथवा वाली है,अन्यथा नहीं। सफाई कर्मी भी एक कूड़ा उठाने के साधन से,खड़े-खड़े ही नीचे पड़ा कूड़ा उठकर अपने पास रखी थैली में बिना छुए डाल देता है। हर काम की गरिमा यहाँ पर है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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ये लंदन-वो दिल्ली!

यह आलेख मैंने पिछले वर्ष लंदन छोड़ने से पहले लिखा था, अब इस वर्ष फिर से वही घटना हो रही है तो थोड़ा बहुत एडिट करके फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ। पिछले वर्ष एक महीना रुका था, 6 जून से 6 जुलाई तक, इस बार प्रवास डेढ़ महीने का है, 6 अगस्त से 20 सितंबर तक, अब बस चलाचली की बेला है।

 

 

काफी दिन पहले अपने एक भारतीय अखबार में छपा एक कार्टून याद आ रहा है। उस समय लंदन को दुनिया का सबसे खूबसूरत नगर घोषित किया गया था। कार्टून में एक घर का कमरा दिखाया गया था, जिसमें एक भारतीय सरदार जी का परिवार था, सामान इधर-उधर फैला था, कमरे के आर-पार डोरी टांगकर उस पर कपड़े सूख रहे थे, और वो अपनी पत्नी से कह रहे थे- देखो जी, हम दुनिया के सबसे खूबसूरत नगर में रह रहे हैं।

 

 

 

कैसे तुलना करें। दिल्ली की बात- मतलब भारत की बात और लंदन मतलब ब्रिटेन की बात! दोनों नगर प्रतिनिधि तो हैं ही,दो देशों के,दो संस्कृतियों के।

 

 

वैसे हमें दूसरों के सामने खुद को नीचा करके दिखाने की आदत है,लेकिन मैं प्रयास करुंगा इस मामले में संतुलित रहने की।

 

 

अंग्रेजों को देखकर लंबे समय से एक छवि बनी रही है हमारे मन में- ‘टुम हिंदुस्तानी कैसे हमारे सामने खड़े होने की हिम्मत करटा है’। एक टॉम आल्टर थे, अभिनेता जो मूल रूप से अंग्रेज थे और अक्सर बुरे,अत्याचारी अंग्रेजों की भूमिका निभाते रहते थे।
आज की तारीख में दुनिया में जो महानतम लोकतंत्र हैं, उनमें शायद अमरीका, ब्रिटेन और भारत ही सबसे प्रमुख हैं। लेकिन लोकतंत्र की समान कड़ी को छोड़कर बाकी बातों में,संस्कृति में बहुत बड़ा अंतर है।

 

हिंदुस्तानी लोग पारंपरिक रूप से बहुत शांत,संतोषी और सबको प्यार करने वाले रहे हैं। मुझे इस संदर्भ में ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का नायक ‘राजू’ याद आता है। वैसे वो भी तो फिल्म में अपनी तरह का अकेला ही था। लेकिन इस संस्कृति में बहुत प्रदूषण व्याप गया है। इस माहौल को खराब करने में आज की राजनीति का भी बहुत बड़ा योगदान है।

 

 

हमारे यहाँ ऐसी पहचान बन गई है कि कुछ खास पार्टियों का सक्रिय सदस्य होने का मतलब है- गुंडा होना।

 

 

लंदन में बहुत बड़ा अंतर जो भारत के मुकाबले, यहाँ आते ही दिखाई देता है, वह है कि यहाँ सार्वजनिक स्थानों पर,एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर कहीं भी आपको प्रेमी युगल चुंबन लेते, लिपटते, प्यार करते दिख जाएंगे। भारत में तो इसे अपराध माना जाता है, हाँ यह थोड़ा-बहुत एयरपोर्ट तक पहुंच रहा है।

 

 

भारत में सरेआम लोग लड़की को छेड़ सकते हैं, लड़ाई-झगड़ा कर सकते हैं, यहाँ तक कि अपहरण और ‘रेप’ भी कर सकते हैं, लेकिन प्रेम नहीं कर सकते! उसको रोकने के लिए ‘एंटी रोमियो स्क्वैड’ और बजरंग दल के महान स्वयंसेवक अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार रहते हैं। इनको यह नहीं लगता कि लूटपाट,दंगा और बलात्कार आदि रोकने में उनकी कोई भूमिका हो सकती है!

 

 

यह बहुत बड़ी बात है कि अंग्रेज, जिनकी छवि हमारे मन में बर्बर, अत्याचारी और नफरत करने वालों की थी,वे आज प्रेम के प्रतिनिधि नजर आते हैं और मानव-मात्र से प्रेम वाली हमारी संस्कृति के प्रतिनिधि- हिंसा और नफरत में लिप्त दिखाई देते हैं।
एक बात मैं अवश्य कहना चाहूंगा कि सच्चे भारतीय आज भी सबसे प्रेम करने वाले और ईश्वर से भय खाने वाले हैं,हाँ महानगरों में कुछ लोग ऐसे सामने आ रहे हैं, और ये लोग अपनी गतिविधियों में इतने सक्रिय हैं कि इनके कारण हमारे देश का नाम खराब हो रहा है।

 

 

आज यह सुनकर बहुत खराब लगता है कि भारत विदेशी महिला सैलानियों के लिए सुरक्षित नहीं है। वास्तव में इस मामले में कानून का भय कायम किए जाने की आवश्यकता है,जिससे विदेशी सैलानी हमेशा हमारे बारे में अच्छी राय रखें, भारत भ्रमण के अच्छे अनुभव लेकर जाएं।

 

 

मैं इंग्लैंड प्रवास में यह बात कह रहा हूँ,क्योंकि मुझे लगता है कि जो लोग भारत आते हैं, वे हमारी मेज़बानी से प्रसन्न होकर जाएं।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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लंदन में इधर-उधर!

लंदन प्रवास के इस वर्ष और पिछले वर्ष के अनुभवों को मिलाकर शेयर करने के क्रम में आज मैं वह आलेख शेयर करूंगा जो मैंने पिछले वर्ष, तब लिखा था, जब मैं लौटने वाला था। इसमें कुछ बातें बदल गई हैं, जैसे मेरे बेटे का घर अब ‘कैनरी व्हार्फ’ ट्यूब रेलवे स्टेशन के बगल में है। अब यह थेम्स नदी नहीं बल्कि उससे जुड़ी एक नहर की बगल में है।

जो लोग लंदन की ज्योग्राफी समझते हों, उनके लिए बता दूं, कि मेरे बेटे का घर यहाँ पर ब्लू ब्रिज के पास, थेम्स नदी के किनारे है। यह स्थान ‘कोल्ड हार्बर’ है। जैसे यहाँ ‘व्हार्फ’ बहुत हैं, वैसे ही हार्बर भी बहुत हैं। हमको तो नदी किनारे घर होना, बहुत दिव्य लगता है, लेकिन असल में पूरा लंदन नगर ही थेम्स नदी के दोनों किनारों पर बसा है, अतः बहुत बड़ी संख्या में ऐसे मकान यहाँ हैं, जो थेम्स नदी के किनारे बने हैं। और नदी भी ऐसी जहाँ ढेर सारी छोटी-बड़ी बोट और बड़े-बड़े शिप चलते हैं।

 

यहाँ हमारे घर के पीछे ही नदी में घुमाव है और नदी के इस अर्द्ध चंद्राकार गोले में दूसरी तरफ, जहाँ एक टापू जैसा बन गया है, वहाँ नदी के बीच ओ-2 होटल और ईवेंट प्लेस है। वहाँ पर ही रोप वे पर आकर्षक ट्रॉली चलती है, जिसको एमिरेट्स एयरलाइंस द्वारा संचालित किया जाता है और उसको इस नाम से ही जाना जाता है। हाँ तो इस घुमाव वाले क्षेत्र में जब कोई बड़ा शिप आ जाता है तब दो छोटी नांवों द्वारा खींचकर उसे घुमाव वाले क्षेत्र से बाहर निकाला जाता है, वैसे भी ट्रैफिक सुरक्षा की दृष्टि से शायद यह सहायता नगर क्षेत्र में दी जाती है।

यही कारण है कि जब हमारे घर के पीछे नदी के घुमाव में कोई बड़ा जहाज आता है तो उसके बाहर निकलने तक हम उसको बहुत पास से अच्छी तरह देख पाते हैं। अभी दो दिन पहले ही एक बड़ा शिप ‘वाइकिंग’ यहाँ से वापस लौटा और उससे दो दिन पहले वह आया था। घर में बैठकर ही ढेर सारी नावों और बड़े शिप को देखना, यहाँ पर हुआ एक नया अनुभव है।

 

हाँ तो लंदन में जहाँ हम रह रहे हैं, वहाँ से मेरी पैदल यात्रा के दो छोर ‘कैनरी व्हार्फ’ ट्यूब स्टेशन और ‘आइलैंड गार्डन’ स्टेशन हैं। जी हाँ कभी मैं ‘वाक’ के लिए ‘कैनरी व्हार्फ’ ट्यूब स्टेशन की तरफ निकल जाता हूँ और कभी ‘आइलैंड गार्डन’ स्टेशन की तरफ! कैनरी व्हार्फ की तरफ जाता हूँ तो बगल में ही इतनी अंडरग्राउंड मार्केट ‘कैनाडा स्क्वेयर’ आदि-आदि हैं, ऐसे कि वहाँ कभी-कभी रास्ता भूल जाता हूँ। दूसरी तरफ ‘आइलैंड गार्डन’ की तरफ ‘वॉक’ को कुछ और लंबा करता हूँ तो अंडरग्राउंड टनेल से नदी के पार ‘ग्रीनविच’ क्षेत्र में चला जाता हूँ, जहाँ ‘कट्टी सार’ नामक शिप प्रदर्शनी के रूप में खड़ा है और उसके पास ही ‘ग्रीनविच वेधशाला’ भी है और रानी का एक महल वहाँ भी है।

ये कुछ स्थान, कुछ नाम जो यहाँ से जाने के बाद सिर्फ याद रह जाएंगे। नाम याद रह जाएं इसलिए यहाँ लिख भी दिया।

 

एक बात और शेयर करना चाहूंगा, ये तो हम जानते हैं कि आज की तारीख में, अधिकतर अखबारों की कमाई उस पैसे से नहीं होती, जो हम अखबार खरीदने के लिए देते हैं। असल में अखबार के लिए अगर हम 1 रुपया देते हैं तो उस पर खर्च 10 रुपए आता है। भारत में हम एक ‘टोकन’ राशि अखबार के लिए देते हैं। कमाई तो अखबार की विज्ञापनों से होती है। यहाँ ब्रिटेन और शायद पश्चिम के और देशों में भी, प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर अखबार रखे रहते हैं और आप वहाँ से अखबार उठाकर ले जा सकते हैं। यहाँ उसके लिए कोई दाम नहीं देना होता।

यहाँ पर ग्रोसरी स्टोर में भी सब कुछ ऑटोमेटिक है। स्कैनिंग मशीनें लगी हैं, आपने जो सामान खरीदने के लिए चुना है, उसको स्कैन कीजिए और कार्ड से अथवा नकद भी भुगतान करके उनको ले जा सकते हैं। आपको स्टोर के किसी व्यक्ति से मदद लेने की आवश्यकता नहीं है, यदि आप स्वयं ऐसा कर पाते हैं तो!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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Tourism for prosperity or destruction!

Today I am discussing  a subject related to tourism. Tourism is a very big industry today in the entire world. There are some small countries having beautiful landscape, rivers, hills etc. where the biggest source of earning is related to tourism.

For tourists the whole country becomes a host, to serve them and earn good money in return, but the basic thing is that we should not become too greedy. It is the natural beauty of Kashmir because of which it is called ‘heaven on the earth’. And this is the reason why Pakistan which is a failed country otherwise, where the elected (?) representatives are always in the grip of military bosses and ISI,  they are so desperate to grab Kashmir from India, thinking that it might help them survive as a nation.

I have lived in cities like Delhi, Jaipur, Mumbai and presently in Goa, which are big tourist destinations. I remember about Jaipur, long back when I was living there I found that many houses in our neighborhood had been converted into hotels. In Goa also there are many people whose earnings are through houses either given to hotels or they are themselves operating them as guest houses.

In Goa since there are very less tourists during rainy season, the income of taxi operators is seasonal, this might be a reason that they never allowed App based taxi services like Ola , Uber to operate there and they charge almost double of the taxi fare charged at other places.

When tourists arrive at any place everybody in the market, who provides any type of facilities or services, get benefited. In any season if tourists do not arrive it is a great loss to government as well as the people connected with this activity.

I have not yet gone to Kashmir but I remember what my son told me after coming from there, there those who provide horse-riding services, they are poor people and solely depend on the earnings from tourists. They gather outside the hotels and when any tourist comes out several of them rush to catch the customer, they urge them to take a ride, say they are hungry and all that. Those opposing tourism, the separatists etc. had spoiled there life, I hope now slowly they would get benefited, since their earnings totally depend on tourists.

So no doubt that tourism is a big booster for the economy, but here we are discussing the bad effects of ‘over tourism’, yes it could be a big problem. We need to earn more but not at the cost of well being of our people. Some people connected with tourism might be getting the benefits from more and more rush of tourists but if it effects the environment or otherwise makes a negative impact on the quality of life there, it must be taken care of.

For reducing the negative impacts of over-tourism I think the facilities for stay of tourists can be spread in more area so that the density of population gets reduced. There could also be some mechanism to manage the rush for which tourists may be motivated to visit more in the periods when they visit less, so that it becomes less in peak season. Some facilities could be developed to make their stay in off-season more comfortable and cheaper.

Laws to maintain cleanliness and good environment, should be applied more strictly, those people who do such activities which harm the environment should get punished. No doubt tourism can become the backbone of any economy but this is not desirable at the cost of harming the environment and our social well being.

I think a more dependable and less polluting transport system, metro trains wherever possible can add to reduction of pollution by so many taxis and it would help the tourists also.

I do not know much about the factors badly affecting the environment or the social life but the local administration can properly assess them and make a proper plan to reduce the bad effects of more rush of tourists at any given time.

I talked about tourist destinations in India but at present I am in London, so I would put pics of London here.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt –

Over-tourism has led to social and environmental problems. What do you think is a good solution… #Tourism

Thanks for reading.

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