पत्र तुम्हारे नाम


आज एक बार फिर से हिन्दी के प्रतिष्ठित, लोकप्रिय और सुरीले गीतकार श्री सोम ठाकुर जी एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| आदरणीय सोम जी ने देश प्रेम, भाषा प्रेम और शुद्ध प्रेम के भी अनूठे गीत लिखे हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है आदरणीय सोम ठाकुर जी का यह प्रेम से परिपूर्ण गीत-

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सुर्ख सुबह
चम्पई दुपहरी
रंग रंग से लिख जाता मन
पत्र तुम्हारे नाम|

बाहों के ख़ालीपन पर यह
बढ़ता हुआ दवाब
चहरे पर थकान के जाले
बुनता हुआ तनाव
बढ़ने लगे देह से लिपटी
यादों के आयाम|

घबराहट भरती चुप्पी ने
नाप लिया है दिन
पत्थर -पत्थर हुए जा रहे
हाथ कटे पलछिन
मिटते नहीं मिटाए अब तो
होंठो लगे विराम|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तनहाइयों का शिकार आदमी!

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी,
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी|

निदा फ़ाज़ली

ये बाज़ी हमने हारी है सितारों तुम तो सो जाओ!

तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया,
ये बाज़ी हमने हारी है सितारों तुम तो सो जाओ|

क़तील शिफ़ाई

हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन!

तुम गए क्या जग हुआ अंधा कुआं
रेल छूटी रह गया केवल धुआं,
हम भटकते ही फिरे बेहाल,
हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन।

किशन सरोज

दर्द पुराने निकले 4

दश्त-ए-तन्हाई ए हिजरा में खड़ा सोचता हूं,
हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले|

अमजद इस्लाम अमजद

दर्द पुराने निकले 3

दिल ने एक ईंट से तामीर किया ताजमहल,
तूने एक बात कही लाख फसाने निकले|

अमजद इस्लाम अमजद

दर्द पुराने निकले 2

फ़स्ल-ए-गुल आई फ़िर एक बार असीनाने-वफ़ा,
अपने ही खून के दरिया में नहाने निकले|

अमजद इस्लाम अमजद

दर्द पुराने निकले!

चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले,
कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले|

अमजद इस्लाम अमजद

जी यहां घबराता है!

आज सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी अपने समय के प्रमुख साहित्यिक कवियों में शामिल थे और उस समय की प्रमुख साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल में शामिल थे|

बाकी तो कविता खुद अपनी बात कहती है, लीजिए प्रस्तुत है सर्वेश्वर जी की यह कविता


अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है|

जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है|

होश अपने का भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त,
द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है|

शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा,
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है|

देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है|


हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है|

दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की
आप ही रोता है औ आप ही समझाता है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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