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सूर्यमुखी का प्रण!

अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में आज यह अंतिम पुरानी रचना है, जो बहुत प्रयास करने पर भी पूरी याद नहीं आ सकी| इसे मैं कुछ जगह इसकी तुरपाई करने के बाद प्रस्तुत कर रहा हूँ|

इस रचना में मैंने जीवन के, दिन के और मौसम के तीन चरणों को एक साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है|

लीजिए प्रस्तुत हैं आज की रचना-

प्रिय तेरा विश्वास लिए मैं कब से सोच रहा हूँ,
सूर्यमुखी के प्रण पर मुझे हँसी किसलिए आई|

बन कागज की नाव, तैरतीं बालक की आशाएं,
इंद्रधनुष के रंग निरूपित करते नव-उपमाएं,
उदित सूर्य की किरणों में बचपन को खोज रहा हूँ,
ताकि कर सकूँ उस सपने की, हल्की सी तुरपाई|

सूरज तपता, धरती तपती, चलतीं गर्म हवाएं,
ताप-ताप संयोग, चैन से कैसे समय बिताएं,
भीतर-बाहर ताप लिए आकुल हो खोज रहा हूँ,
वह आंचल की छाँव जहां यौवन पाए ठंडाई |


धुंधलाया आकाश, धरा अलसाई सी लगती है,
प्रकृति ठिठुरती किन्तु सूर्य को जाने की जल्दी है,
तुलसी की मंजरियों में, स्मृतियों को सूंघ रहा हूँ,
ताकि पा सकूं बीते कल की हल्की सी परछाईं|


सूर्यमुखी के प्रण पर मुझको हँसी किसलिए आई||

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम!

आज ज़नाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल के कुछ शेर शेयर कर रहा हूँ| क़तील साहब भारतीय उपमहाद्वीप के जाने-माने शायर रहे हैं और उनकी ग़ज़लें ग़ुलाम अली साहब और जगजीत सिंह जी जैसे प्रमुख ग़ज़ल गायकों ने गाई हैं|

लीजिए आज क़तील शिफ़ाई साहब की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए, जिसे जगजीत सिंह-चित्रा सिंह की सुरीली जोड़ी गाया है –


मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम,
एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम|

आँसू छलक छलक के सतायेंगे रात भर,
मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम|

जब दूरियों की आग दिलों को जलायेगी,
जिस्मों को चाँदनी में भिगोया करेंगे हम|

गर दे गया दग़ा हमें तूफ़ान भी “क़तील”,
साहिल पे कश्तियों को डूबोया करेंगे हम|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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मटरू का आना और जाना!

मटरू का पता ही नहीं चलता कि कब वो हमारे, मतलब अपने घर में रहेगा और कब बाहर चला जाएगा| एक तरह से देखा जाए तो उसको आवारा कहा जा सकता है, कभी वो रात में अपने स्थान पर सोता है और सुबह होते ही चला जाता है, और कभी रात भर गायब रहता है और सुबह आ जाता है!

अब आपको बता दूँ कि मटरू एक कबूतर है, श्वेत- स्नो व्हाइट नहीं, ऑफ व्हाइट रंग का कबूतर| शुरू में इसके आने पर जब मैंने इसका नाम ‘मटरू’ रखा तब मेरी 6 साल की पोती ने कहा कि ये फ़ीमेल है| मैंने कहा कि अगर फ़ीमेल है तो इसका नाम बहुत पहले ‘चांदनी चौक टू चाइना’ फिल्म में रख दिया गया था- ‘मसक्कली’| लेकिन हम जेंडर के विवाद में नहीं फंसे और उसका नाम ‘मटरू’ ही स्वीकार कर लिया|

चलिए अपने और मटरू के स्थान का भी जिक्र करते हुए आगे बढ़ते हैं| लगभग एक माह पहले जब अन्य स्थानों के साथ-साथ गोवा में भी तूफान आया था, तब मटरू भी उड़ता हुआ हमारे घर आ गया था| हमारा घर या कहें कि फ्लैट, समुद्र के सामने ही छठे फ्लोर पर है| यहाँ हमारी बॉलकनी, जहां से समुद्र का नजारा और सूर्यास्त भी बहुत सुंदर दिखाई देता है, हालांकि मुझे नहीं लगता कि मटरू को इससे कुछ विशेष फर्क पड़ता होगा| हमारी बालकनी में जो स्प्लीट एसी का ब्लोअर है, उसके ऊपर मटरू ने अपना ठिकाना बना लिया|

शुरू में तो हमें लगा कि मटरू आया है, चला जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, शुरू में तो वह हमारे घर के अंदर अपनी बालकनी से दूसरे छोर की बालकनी तक एक-दो बार घूमा| बाद में उसको शायद समझ में आया कि घर के अंदर घूमना उसके लिए उचित नहीं है, वैसे हमारे घर में दो ‘डॉगी’ भी हैं| शुरू में तो हम फर्श पर मटरू के लिए खाना डालने के अलावा, ऊपर ब्लोअर पर भी खाना डालते थे, जहां वह निवास करता है| लेकिन वहाँ खाना डालने से यह खतरा और बढ़ जाता है कि बाहरी कबूतर और कौए उसको वहाँ से भगा देंगे|

लेकिन देखा जाए तो, जीवन में बहुत कठिनाइयाँ हैं, इन छोटे-छोटे प्राणियों के लिए भी| वैसे हमारे घर में पहले से ही बालकनी में कौओं-कबूतरों आदि के लिए दाना डाला जाता रहा है| अब वे जो बाहर के प्राणी हैं, उनको लगने लगा है कि इसके साथ विशेष व्यवहार क्यों किया जा रहा है| कुछ तो इनकी भीड़ में ऐसे भी होते हैं जो हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहते हैं| ऐसे में मटरू को सुरक्षित रखना और यह देखना भी मुश्किल हो जाता है कि वह भरपेट खाना खा ले|

हम लोग हमेशा बालकनी में तो नहीं रहते, हमारे दूर होने पर बाहर के ये योद्धा इसके साथ क्या करेंगे कोई अनुमान नहीं लगा सकता| इसलिए हम देखते हैं कि कभी तो वो सुबह से ही बाहर निकल जाता है और कभी रात में भी घर नहीं आता| जब तक वो यहाँ है, अक्सर शिकायत होती है कि कितनी गंदगी फैलाता है| क्योंकि हमारा काम हम करते हैं, उसको खाना खिलाने का, लेकिन अपना काम तो वो करेगा ही ना! और उसमें गंदगी भी फैलेगी!

खैर मटरू के बहाने कबूतरों में से ही कुछ से थोड़ी पहचान हुई, एक तो वह योद्धा जो सबसे लड़ता रहता है, एक और जो बहुत सुंदर है, श्वेत-श्याम रंग का और ध्यान से देखने पर मालूम हुआ कि उसका एक पंजा ही नहीं है| कैसे-कैसे कष्ट हर स्वरूप में प्राणी झेलते हैं, लेकिन उन सबके लिए हम क्या कर सकते हैं?

हाँ तो जैसे मैंने कहा कि कभी मटरू सुबह से ही निकल जाता है और हम सोचते हैं कि शायद अपना नया ठिकाना देखने गया है| लेकिन जो भी हो मटरू अभी भी हमारे साथ है, जब तक उसका मन हो रहेगा या जब तक इस कठिन जीवन को वह संभालकर रख पाए, क्योंकि खतरे तो हर प्राणी के लिए हैं, अलग तरह के|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पिता के नाम

आज फिर से अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट संपादित रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ| यद्यपि इसे प्रस्तुत करने मेँ थोड़ी देरी हो गई है|

पितृ दिवस के अवसर पर, मैं अपने पूज्य पिताजी का स्मरण करते हुए इस पोस्ट को शेयर कर रहा हूँ, जिनके पास उपलब्धियों के नाम पर कुछ बताने लायक नहीं था, सिर्फ अनवरत संघर्ष और विशेष रूप मेरे लिए अथाह प्रेम| अब प्रस्तुत है वह पोस्ट|

मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

एक बात और, मैं हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस दूसरी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-


पिता के नाम


-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

हे पिता
यदि हो कहीं, तो क्या लिखूं तुमको
बस यही, जो जिस तरह था
उस तरह ही है।

पत्र है अभिवादनों की शृंखला केवल
हम अभी जीवित बचे हैं, यह बताने को,
और आश्वासन इसी अनुरूप पाने को,
मैं न मानूं किंतु प्रचलन
इस तरह ही है।

हाल अपना क्या सुनाऊं, ठीक सा ही है,
गो कि अदना क्लर्क–
कल का महद आकांक्षी,
ओस मे सतरंगदर्शी बावला पंछी–
हो गया है, मुदित सपना, आपके मन का
जी रहा है, और जीवन
उस तरह ही है।

साथ हैं अब कुछ वही एहसास सपनीले-
वह फिसलने फर्श पर मेरा रपट जाना,
और चिंता से तुम्हारा आंख भर लाना,
बीच सड़कों, धुएं, ट्रैफिक के गिरा हूँ मैं
और यह ध्यानस्थ दुनिया-
उस तरह ही है।


और यह दूसरी कविता, बेरोजगारी के दिनों के अनुभव पर आधारित-


इंद्रधनुष सपनों को, पथरीले अनुभव की
ताक पर धरें,
आओ हम तुम मिलकर, रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।

गर्मी में सड़कों का ताप बांट लें,
सर्दी में पेड़ों के साथ कांप लें,
बूंद-बूंद रिसकर आकाश से झरें।
रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें॥


ढांपती दिशाओं को, हीन ग्रंथियां,
फूटतीं ऋचाओं सी मंद सिसकियां।
खुद सुलगे पिंड हम, आग से डरें।
रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।


–-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’


आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।
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चांद आहें भरेगा!

आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक- मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर करूंगा| नायिका के सौंदर्य का वर्णन करने वाले अनेक गीत आपने सुने होंगे, लेकिन इस ऊंचाई वाला गीत बहुत मुश्किल से सुनने को मिलता है, और फिर मुकेश जी की आवाज़ तो इसमें अलग से जान डाल ही रही है|

लीजिए  फिल्म- ‘फूल बने अंगारे’ के लिए आनंद बख्शी जी के लिखे इस गीत का आनंद लीजिए, जिसे कल्याण जी आनंद जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने गाया है-

चांद आहें भरेगा,
फूल दिल थाम लेंगे,
हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


आँखें नाज़ुक सी कलियां,
बात मिश्री की डलियां,
होंठ गंगा के साहिल,
ज़ुल्फ़ें जन्नत की गलियां|
तेरी खातिर फ़रिश्ते,
सर पे इल्ज़ाम लेंगे|

हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


चुप न होगी हवा भी,
कुछ कहेगी घटा भी,
और मुमकिन है तेरा,
ज़िक्र कर दे खुदा भी|
फिर तो पत्थर ही शायद,
ज़ब्त से काम लेंगे|

हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


चाँद आहें भरेगा,
फूल दिल थाम लेंगे,
हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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मोह मोह के धागे!

आज अपने एक मित्र और सहकर्मी के प्रसंग में बात करना चाहूँगा| ये मेरे साथी मेरे बॉस थे, परंतु उनसे बात करते हुए मुझे कभी यह लगा ही नहीं कि वो मेरे बॉस थे| वैसे इस तरह का अनुभव मेरा बहुत से लोगों के साथ रहा है, परंतु उन सबमें शायद ये सबसे सज्जन व्यक्ति थे|

लीजिए मैं उनका सरनेम बता देता हूँ- मिस्टर मूर्ति, हैदराबाद के रहने वाले थे, इतना जान लेने के बाद ही हम अक्सर किसी व्यक्ति को दक्षिण भारतीय अथवा यहाँ तक कि ‘मद्रासी’ भी कह देते हैं|

मूर्ति जी को इस पर सख्त आपत्ति थी, उनको अपनी अलग पहचान बहुत प्यारी थी, वे कहते थे कि वे मध्य भारत से हैं| एक-दो बार तो हमारी कंपनी के उच्च पदाधिकारियों ने उन पर एहसान जताते हुए उनका चेन्नई अथवा केरल स्थानांतरण करने का प्रस्ताव किया| उनका कहना था कि जहां वे मेरे साथ तैनात थे, उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में, वहाँ से अपने घर जाना उनके लिए ज्यादा आसान है, बनिस्बत केरल अथवा चेन्नई के अनेक इलाकों से वहाँ जाने के!

खैर मैं और मूर्ति जी हमउम्र भी थे और मैनेजमेंट द्वारा समान रूप से सताए गए भी| हम अक्सर अपने मन की बात खुलकर किया करते थे| हाँ मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम दोनों समान रूप से संवेदनशील भी थे| एक प्रसंग उनका बताया हुआ याद आ रहा है, कुल मिलाकर एक दृश्य है इस घटना में!

मूर्ति जी विशुद्ध रूप से शाकाहारी थे, मेरी ही तरह और उनके घर में उन्होंने किसी समय एक श्वान अथवा ‘डॉगी’ भी पाला हुआ था, दूसरा नाम लेने पर मुझे घर में डांट पड़ सकती है, वो तो बेचारे सड़क पर हुआ करते हैं| हाँ तो उनका यह डॉगी, नस्ल मुझे याद नहीं, उन्होंने बताई तो थी, ऐसे आकार का था, जैसा कोई घोड़े का बच्चा होता है| वे उसको घर पर सब्जियाँ आदि ही खिलाते थे, और वह उनको ही खाता था|

अब यह पता नहीं कि मूर्ति जी ने कब और कैसे यह डॉगी रख लिया था क्योंकि उनकी धर्मपत्नी को इस प्रजाति से बिल्कुल प्रेम नहीं था| जैसे-तैसे मूर्ति जी का प्रेम उसके प्रवास को खींचता रहा लेकिन अंत में संभवतः डॉगी को दूर करने की अपनी मांग के लिए उनकी धर्मपत्नी को, ऐसा मजबूत आधार मिल गया कि डॉगी को अब विदा किया ही  जाए, और अंततः मूर्ति जी उसको शायद उसी तरह जंगल में छोड़कर आ गए, जैसे शायद लक्ष्मण जी सीता-माता को वन में छोड़कर आए होंगे|

मैंने बताया था कि यह प्रसंग एक क्षण का, अथवा कहें कि एक दृश्य का है| जैसा अभी तक हुआ वह तो बहुत बार हो चुका होगा शायद! मूर्ति जी भी धीरे-धीरे इसको भूल रहे थे| तभी की बात है कि कार द्वारा कहीं जाते समय वे एक सिग्नल पर रुके और कुछ सोच रहे थे, तभी उनको अपने गाल पर कुछ गीला स्पर्श महसूस हुआ, देखा तो उनका वही पुराना डॉगी, उसकी ऊंचाई तो अच्छी थी ही, उसने कार की विंडो में मुंह डालकर उनका मुंह चूम लिया था|

इस प्रसंग में, वास्तव में मुझे याद करते ही आँखों में आँसू आ जाते हैं, लेकिन यह संतोष की बात है कि वह डॉगी अपने नए परिवेश में ठीक से एडजस्ट हो गया था, हम ऐसे ही सोचते हैं, ऊपर वाला भी तो है ना सभी प्राणियों की रक्षा करने के लिए|  

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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भीगी पलकें न झुका!

आज मुझे मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का गाया एक बहुत सुंदर गीत याद आ रहा है | फिल्म- साथी के लिए इस गीत को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इसका संगीत दिया था- नौशाद साहब ने|

कुल मिलाकर इस गीत में ऐसा दिव्य वातावरण तैयार होता है, ऐसा लगता है की प्रेम का एक अनोखा स्वरूप उद्घाटित होता है, जिसमें प्रेम और पूजा, आपस में घुल-मिल जाते हैं| लीजिए इस अमर गीत का आनंद लीजिए-

हुस्न-ए-जानां इधर आ,
आईना हूँ मैं तेरा|
मैं संवारूंगा तुझे,
सारे ग़म दे-दे मुझे,
भीगी पलकें न झुका,
आईना हूँ मैं तेरा|


कितने ही दाग उठाए तूने,
मेरे दिन-रात सजाए तूने,
चूम लूँ आ मैं तेरी पलकों को,
दे दूँ ये उम्र तेरी ज़ुल्फों को,
ले के आँखों के दिए,
मुस्कुरा मेरे लिए,
मेरी तस्वीर-ए-वफ़ा,
आईना हूँ मैं तेरा|


तेरी चाहत है इबादत मेरी,
देखता रहता हूँ सूरत तेरी,
घर तेरे दम से है मंदिर मेरा,
तू है देवी मैं पुजारी तेरा,
सज़दे सौ बार करूं,
आ तुझे प्यार करूं,
मेरे आगोश में आ,
आईना हूँ मैं तेरा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या!

आज फिर से एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे लिखा है ‘ओबेदुल्लाह अलीम’ साहब ने और ग़ुलाम अली साहब ने गाया है|

ग़ुलाम अली साहब का एक प्रसंग याद आ रहा है, मेरे बच्चों को मालूम है कि मुझे ग़ुलाम अली जी बहुत पसंद हैं, तो बेटे ने सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में उनके प्रोग्राम के लिए 5000 रु का एक टिकट मेरे लिए खरीदा और मैं वो प्रोग्राम सुनने गया| इस कार्यक्रम में एक श्रोता ने फरमाइश की- ‘इतनी मुद्दत बाद मिले हो’, ग़ुलाम अली जी फरमाइश को समझ गए, लेकिन बोले मैं तो आता ही रहता हूँ, आप ही नहीं आए होंगे|

मैं कहना यह चाहता था कि वो समय अलग था, जब ग़ुलाम अली साहब जैसे पाकिस्तानी कलाकार यहाँ आते रहते थे, अब तो यह लगभग असंभव हो गया है|


अपने ये कवि-शायर कभी कितने सीधे लगते हैं, जो जितना मिल जाए उसमें संतुष्ट होने की कोशिश करते हैं| अब जैसे इस ग़ज़ल में ही शायर महोदय कहते हैं कि कुछ दिन मेरी आँखों में बस जाओ, फिर भले ही ख्वाब बनकर क्यों न रह जाओ|


बहुत सुंदर ग़ज़ल है, इसका आनंद लीजिए-

कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में,
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या|


कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को,
फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या|


एक आईना था सो टूट गया,
अब खुद से अगर शरमाओ तो क्या|


मैं तन्हा था, मैं तन्हा हूँ,
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या|


जब हम ही न महके फिर साहिब,
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ क्या|


जब देखने वाला कोई नहीं,
बुझ जाओ तो क्या, जल जाओ तो क्या|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय शायर रहे स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब ने गीत, ग़ज़ल, दोहे- हर विधा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है और उनमें जो कबीर साहब जैसी साफ़गोई और फक्कड़पन दिखाई देता है, वह आज के समय में दुर्लभ है|


इस ग़ज़ल में भी उन्होंने सादगी के साथ कितनी गहरी बात कही है, वह महसूस करने लायक है| लीजिए आज प्रस्तुत है निदा फ़ाज़ली साहब की यह रचना, जिसे जगजीत सिंह जी ने अनूठे अंदाज़ में गाया है-

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला,
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़धानी दे मौला|

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला|

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें,
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला|

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा,
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला|


तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो,
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सामने बैठा था मेरे, और वो मेरा न था!

आज एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसके कुछ शेर ग़ुलाम अली जी ने और जगजीत सिंह तथा चित्रा सिंह की जोड़ी ने भी गाए हैं| काफी लंबी ग़ज़ल है ये और सिर्फ एक घटना हो जाने पर ज़िंदगी कितनी बदल जाती है, ये इसमें बहुत खूबसूरती से दर्शाया गया है|


लीजिए आज प्रस्तुत है, अदीम हाशमी जी की लिखी ये खूबसूरत ग़ज़ल-

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था,
सामने बैठा था मेरे, और वो मेरा न था|

वो के ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार सू,
मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था|

रात भर पिछली ही आहट कान में आती रही,
झाँककर देखा गली में कोई भी आया न था|

अक्स तो मौजूद था पर अक्स तनहाई का था,
आईना तो था मगर उसमें तेरा चेहरा न था|

आज उसने दर्द भी अपने अलहदा कर दिए,
आज मैं रोया तो मेरे साथ वो रोया न था|

मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा,

सारी दुनिया में मगर, कोई तेरे जैसा न था|

आज मिलने की ख़ुशी में सिर्फ़ मैं जागा नहीं,
तेरी आँखों से भी लगता है कि तू सोया न था|

ये भी सब वीरानियाँ उस के जुदा होने से थीं,
आँख धुँधलाई हुई थी, शहर धुँधलाया न था|

सैंकड़ों तूफ़ान लफ़्ज़ों में दबे थे ज़ेर-ए-लब,
एक पत्थर था ख़ामोशी का, के जो हटता न था|



याद करके और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’,
भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था|

मस्लहत ने अजनबी हम को बनाया था ‘अदीम’,
वरना कब इक दूसरे को हमने पहचाना न था|


-अदीम हाशमी


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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