तुम्हें याद हो कि न याद हो!

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो,
वही या’नी वा’दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो|

मोमिन खाँ मोमिन

तो ये कैसी बद-गुमानी!

नहीं मुझसे जब तअल्लुक़ तो ख़फ़ा ख़फ़ा से क्यूँ हैं,
नहीं जब मिरी मोहब्बत तो ये कैसी बद-गुमानी|

नज़ीर बनारसी

निर्बीज क्यों हो चले हम!

आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम ठाकुर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत–


इस तरह निर्बीज -से
क्यों हो चले हम आज
हरियल घास पर बैठे हुए

कहाँ हैं अंकुर हमारे
तने – शाखें
ध्वंस बोलो पर सहमकर
टिकी आँखें
तृप्ति का कैसा समंदर हम तरेंगे
मरुथलों की प्यास पर बैठे हुए|

शोक मुद्राएँ
सुबह को दी किसी ने
शाम को दुर्दांत हलचल दी
गाल पर मलने चले थे
रंग -लाल गुलाल
लेकिन राख मल दी
किस लहू की कंदरा में चल पड़े
अरदास पर बैठे हुए
हरियल घास पर बैठे हुए|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कभी हालात पे रोना आया!

कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया|

साहिर लुधियानवी

रसवन्ती!

आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह जी दिनकर जी की एक अलग तरह की कविता शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी इस कविता में दर्शाते हैं कि कवि कोमल कान्त पदावली में अच्छी बातें लिखता रहता है, सोचता रहता है और मानव सभ्यता एक अलग ही रास्ते पर आगे बढ़ जाती है|

लीजिए प्रस्तुत है दिनकर जी की यह कविता –

अरी ओ रसवन्ती सुकुमार !

लिये क्रीड़ा-वंशी दिन-रात
पलातक शिशु-सा मैं अनजान,
कर्म के कोलाहल से दूर
फिरा गाता फूलों के गान।

कोकिलों ने सिखलाया कभी
माधवी-कु़ञ्नों का मधु राग,
कण्ठ में आ बैठी अज्ञात
कभी बाड़व की दाहक आग।

पत्तियों फूलों की सुकुमार
गयीं हीरे-से दिल को चीर,
कभी कलिकाओं के मुख देख
अचानक ढुलक पड़ा दृग-नीर।

तॄणों में कभी खोजता फिरा
विकल मानवता का कल्याण,
बैठ खण्डहर मे करता रहा
कभी निशि-भर अतीत का ध्यान.

श्रवण कर चलदल-सा उर फटा
दलित देशों का हाहाकार,
देखकर सिरपर मारा हाथ
सभ्यता का जलता श्रृंगार.

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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प्रेयसी!

आज हिन्दी कविता के शिखर पुरुष स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की प्रेम से, सौन्दर्य से जुड़ी एक लंबी कविता का कुछ अंश मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ| महाप्राण निराला जी की अन्य कविताओं की तरह यह कविता भी लाज़वाब है|
लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की यह कविता –

घेर अंग-अंग को
लहरी तरंग वह प्रथम तारुण्य की,
ज्योतिर्मयि-लता-सी हुई मैं तत्काल
घेर निज तरु-तन।

खिले नव पुष्प जग प्रथम सुगन्ध के,
प्रथम वसन्त में गुच्छ-गुच्छ।
दृगों को रँग गयी प्रथम प्रणय-रश्मि-
चूर्ण हो विच्छुरित
विश्व-ऐश्वर्य को स्फुरित करती रही
बहु रंग-भाव भर
शिशिर ज्यों पत्र पर कनक-प्रभात के,
किरण-सम्पात से।

दर्शन-समुत्सुक युवाकुल पतंग ज्यों
विचरते मञ्जु-मुख
गुञ्ज-मृदु अलि-पुञ्ज
मुखर उर मौन वा स्तुति-गीत में हरे।
प्रस्रवण झरते आनन्द के चतुर्दिक-
भरते अन्तर पुलकराशि से बार-बार
चक्राकार कलरव-तरंगों के मध्य में
उठी हुई उर्वशी-सी,
कम्पित प्रतनु-भार,
विस्तृत दिगन्त के पार प्रिय बद्ध-दृष्टि
निश्चल अरूप में।

हुआ रूप-दर्शन
जब कृतविद्य तुम मिले
विद्या को दृगों से,
मिला लावण्य ज्यों मूर्ति को मोहकर,-
शेफालिका को शुभ हीरक-सुमन-हार,-
श्रृंगार
शुचिदृष्टि मूक रस-सृष्टि को।

याद है, उषःकाल,-
प्रथम-किरण-कम्प प्राची के दृगों में,
प्रथम पुलक फुल्ल चुम्बित वसन्त की
मञ्जरित लता पर,
प्रथम विहग-बालिकाओं का मुखर स्वर
प्रणय-मिलन-गान,
प्रथम विकच कलि वृन्त पर नग्न-तनु
प्राथमिक पवन के स्पर्श से काँपती;

करती विहार
उपवन में मैं, छिन्न-हार
मुक्ता-सी निःसंग,
बहु रूप-रंग वे देखती, सोचती;
मिले तुम एकाएक;
देख मैं रुक गयी:-
चल पद हुए अचल,
आप ही अपल दृष्टि,
फैला समाष्टि में खिंच स्तब्ध मन हुआ।

दिये नहीं प्राण जो इच्छा से दूसरे को,
इच्छा से प्राण वे दूसरे के हो गये !
दूर थी,
खिंचकर समीप ज्यों मैं हुई।
अपनी ही दृष्टि में;
जो था समीप विश्व,
दूर दूरतर दिखा।

मिली ज्योति छबि से तुम्हारी
ज्योति-छबि मेरी,
नीलिमा ज्यों शून्य से;
बँधकर मैं रह गयी;
डूब गये प्राणों में
पल्लव-लता-भार
वन-पुष्प-तरु-हार
कूजन-मधुर चल विश्व के दृश्य सब,-
सुन्दर गगन के भी रूप दर्शन सकल-
सूर्य-हीरकधरा प्रकृति नीलाम्बरा,
सन्देशवाहक बलाहक विदेश के।
प्रणय के प्रलय में सीमा सब खो गयी !

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ज़िंदगी बता कि वो लम्हे किधर गए!

हर शय से बे-नियाज़ रहे जिनमें हुस्न ओ इश्क़,
ऐ ज़िंदगी बता कि वो लम्हे किधर गए|

महेश चंद्र नक़्श

दोनों को इक साथ न लिखने पाऊँ!

हिन्दू को हिन्दू मुसलमान को लिक्खूँ मुस्लिम,
कभी इन दोनों को इक साथ न लिखने पाऊँ|

राजेश रेड्डी

ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया!

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया,
वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया|

सुदर्शन फ़ाकिर

ये तो अच्छा हुआ भरम टूटे!

रंज इसका नहीं कि हम टूटे,
ये तो अच्छा हुआ भरम टूटे|

सूर्यभानु गुप्त