प्यार हवा मेरे नाम लाई हो!

कोई तो हो जो मेरे तन को रोशनी भेजे,
किसी का प्यार हवा मेरे नाम लाई हो|

परवीन शाकिर

हदें पार न करने देगा!

प्यार तहज़ीब-ए-तअल्लुक़ का अजब बंधन है,
कोई चाहे, तो हदें पार न करने देगा।

वसीम बरेलवी

ख़ामोशी भी है आवाज़ भी है!

मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है,
ये ख़ामोशी भी है आवाज़ भी है|

अर्श मलसियानी

इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती!

दिल में न हो ज़ुरअत तो मोहब्बत नहीं मिलती,
खै‍‌‌रात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती| ‍‌

निदा फ़ाज़ली

बैठा रहूँ मैं गिरफ्तार सा!

खूबसूरत सी पैरों में ज़ंजीर हो,
घर में बैठा रहूँ मैं गिरफ्तार सा|

बशीर बद्र

याद तुझको दिलाएं तेरा पैमां जाना!

आज प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू के जो सर्वश्रेष्ठ शायर हुए हैं, उनमें से एक रहे हैं जनाब अहमद फराज़, वैसे तो श्रेष्ठ कवियों/शायरों के लिए सीमाओं का कोई महत्व नहीं होता, लेकिन यह बता दूँ कि फराज़ साहब पाकिस्तान में थे और उनमें इतना साहस था कि उन्होंने वहाँ मिलिटरी शासन का विरोध किया था|
फराज़ साहब की अनेक गज़लें भारत में भी लोगों की ज़ुबान पर रहती हैं| इस ग़ज़ल के कुछ शेर भी गुलाम अली साहब ने गाये हैं| वैसे मैं भी ग़ज़ल के कुछ चुने हुए शेर ही दे रहा हूँ, जिनमें थोड़ी अधिक कठिन उर्दू है, उनको मैंने छोड़ दिया है|

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारी सी ग़ज़ल–

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जाना,
याद क्या तुझको दिलाएँ तेरा पैमाँ जाना|

यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है,
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना|

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है,
हमने जैसे भी बसर की तेरा एहसां जाना|

दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी,
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादां जाना|

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर,
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जाना|

मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद,
दिल पुकारे ही चला जाता है जाना जाना|

हम भी क्या सादा थे हमने भी समझ रखा था,
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है, ग़म-ए-जाना जाना|


हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ|

जिसको देखो वही ज़न्जीर-ब-पा लगता है,
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िन्दाँ जाना|

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये,
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जाना|

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा!

फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी प्रीत हमारी हो,
फ़र्ज़ करो इस प्रीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो|

इब्ने इंशा

वह व्याकरण खो गया!

हमने पढ़कर जिसे प्यार सीखा कभी
एक गलती से वह व्याकरण खो गया|

रामावतार त्यागी

दिल की हार हो ऐसा नहीं होता!

कहीं तो कोई होगा जिसको अपनी भी ज़रूरत हो,
हरेक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं होता|

निदा फ़ाज़ली

एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता!

जो हो इक बार, वह हर बार हो ऐसा नहीं होता,
हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता|

निदा फ़ाज़ली