Categories
Uncategorized

सपने ताजमहल के हैं!

आज मैं हिन्दी बहुत प्यारे कवि/ गीतकार स्वर्गीय बाल स्वरूप राही जी की एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ| राही जी ने बहुत अच्छे गीत और गज़लें हमें दी हैं| आज की ये गजल भी आशा है आपको पसंद आएगी-

 

 

उनके वादे कल के हैं,
हम मेहमाँ दो पल के हैं ।

 

कहने को दो पलकें हैं,
कितने सागर छलके हैं ।

 

मदिरालय की मेज़ों पर,
सौदे गंगा जल के हैं ।

 

नई सुबह के क्या कहने,
ठेकेदार धुँधलके हैं ।

 

जो आधे में छूटी हम,
मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं ।

 

बिछे पाँव में क़िस्मत है,
टुकड़े तो मखमल के हैं ।

 

रेत भरी है आँखों में,
सपने ताजमहल के हैं ।

 

क्या दिमाग़ का हाल कहें,
सब आसार खलल के हैं ।

 

सुने आपकी राही कौन,
आप भला किस दल के हैं ।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

हम उसी प्यास के समन्दर थे !

आज मैं हिन्दी गीत कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी अत्यंत भावुक और सृजनशील कवि थे और उनको कवि सम्मेलनों में बहुत आदर के साथ सुना जाता था|

अवस्थी जी का यह गीत भी एक अलग प्रकार के अनुभव को चित्रित करता है, कैशौर्य और युवावस्था के वे बेफिक्री भरे दिन, अलग ही तरह के होते हैं| लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-

 

 

याद आते हैं फिर बहुत वे दिन
जो बड़ी मुश्किलों से बीते थे !

 

शाम अक्सर ही ठहर जाती थी
देर तक साथ गुनगुनाती थी !
हम बहुत ख़ुश थे, ख़ुशी के बिन भी
चाँदनी रात भर जगाती थी !

 

हमको मालूम है कि हम कैसे
आग को ओस जैसे पीते थे !

 

घर के होते हुए भी बेघर थे
रात हो, दिन हो, बस हमीं भर थे !
डूब जाते थे मेघ भी जिसमें
हम उसी प्यास के समन्दर थे !

 

उन दिनों मरने की न थी फ़ुरसत,
हम तो कुछ इस तरह से जीते थे !

 

आते-जाते जो लोग मिलते थे
उनके मिलने में फूल खिलते थे !
ज़िन्दगी गंगा जैसी निर्मल थी,
जिसमें हम नाव जैसे चलते थे !

 

गंगा की ऊँची-नीची लहरों से
हम कभी आगे कभी पीछे थे !

 

कोई मौसम हो हम उदास न थे
तंग रहते थे, पर निराश न थे !
हमको अपना बना के छोड़े जो
हम किसी ऐसे दिल के पास न थे !

 

फूल यादों के जल गए कब के
हमने जो आँसुओं से सींचे थे ।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

या गम न दिया होता, या दिल न दिया होता!

आज फिर से बारी है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की, लीजिए प्रस्तुत है-

एक बार और दिल की बात कर लेते हैं, ऐसे ही कुछ बातें और आ रही हैं दिमाग में, आप इसे दिल पर मत लेना।

कितनी तरह के दिल लिए घूमते हैं दुनिया में लोग, एक गीत में किसी ने बताया था- ‘कोई सोने के दिल वाला, कोई चांदी के दिल वाला, शीशे का है मतवाले तेरा दिल’।

 

 

वैसे हमारा दिल, हमें चैन से रखने के लिए क्या कुछ कोशिशें नहीं करता-

 

दिल ढूंढता है, फिर वही फुर्सत के रात दिन,
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जाना किए हुए!

जिगर मुरादाबादी साहब का शेर है-

 

आदमी, आदमी से मिलता है,
दिल मगर कम किसी से मिलता है।

एक शेर बशीर बद्र साहब का याद आ रहा है-

 

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा,
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो।

एक और शेर किसी का याद आ रहा है-

 

एक इश्क़ का गम आफत, और उस पे ये दिल आफत,
या गम न दिया होता, या दिल न दिया होता।

एक शेर फैज़ अहमद फैज़ साहब का है-

 

कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी,
सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी।

और बहादुर शाह ज़फर साहब का ये शेर तो बहुत प्रसिद्ध है-

 

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।

और अब दाग देहलवी साहब का एक शेर याद कर लेते हैं, क्योंकि वैसे तो यह अनंत कथा है-

 

तुम्हारा दिल, मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता,
वो शीशा हो नहीं सकता, ये पत्थर हो नहीं सकता।

चलिए अब एक फिल्मी गीत का मुखड़ा और जोड़ देते हैं-

 

दिल लगाकर हम ये समझे, ज़िंदगी क्या चीज है,
इश्क़ कहते हैं किसे और आशिक़ी क्या चीज है।

ये विषय ऐसा ही कि जब बंद करने की सोचते हैं, तभी कुछ और याद आ जाता है। फिल्मी गीतों के दो मुखड़े और याद आ रहे हैं, उसके बाद बंद कर दूंगा, सच्ची!

 

ये दिल न होता बेचारा, कदम न होते आवारा
जो खूबसूरत कोई अपना हमसफर होता।

और दूसरा-

 

चल मेरे दिल, लहराके चल, मौसम भी है, वादा भी है,
उसकी गली का फासला, थोड़ा भी है, ज्यादा भी है,
चल मेरे दिल।

 

अब चलते रहिए।
नमस्कार।

==================

Categories
Uncategorized

आत्म-मुग्ध, आत्म-लिप्त, आत्म-विरत!

मुझे ‘गर्म हवा’ फिल्म का प्रसंग याद आ रहा है| विभाजन के समय के वातावरण पर बनी थी वह फिल्म, जिसमें स्वर्गीय बलराज साहनी जी ने आगरा के एक मुस्लिम जूता व्यापारी की भूमिका बड़ी खूबसूरती से निभाई थी|

 

 

उस फिल्म में एक मुस्लिम नेता का चरित्र दिखाया गया है, जिसे तालियाँ बजवाने का शौक है, जैसा कि नेताओं को होता ही है| वह अपने भाषणों में कहता है कि वह भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने वाला आखिरी व्यक्ति होगा| इस प्रकार की बात अक्सर नेता लोग तालियाँ पिटवाने के लिए करते हैं| लेकिन बाद में इन नेताजी को लगता है कि बदलते माहौल में यहाँ उनकी नेतागिरी नहीं चलने वाली| ऐसे में वे अचानक अपनी बेगम को बताते हैं कि हम पाकिस्तान जाएंगे, उनका सामान तांगे में लदता है, और अचानक उनकी तसवीर उल्टी हो जाती है और पृष्ठभूमि में तालियों की आवाज आती है| बड़े प्रतीकात्मक तरीके से यहाँ उनके पलटी मारने, कथनी और करनी के अंतर को दर्शाया गया है|

अचानक यह प्रसंग याद आ गया, और एक बात और कि जब वे जा रहे होते हैं, तब उनका जवान बेटा देखता है कि युवक लोग जूलूस निकाल रहे हैं और रोजगार आदि संबंधी अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं| बेटा तांगे से उतर जाता है और बोलता है कि उसकी जगह तो यही है, वह यहाँ रहकर ही अपने युवा साथियों के साथ संघर्ष करेगा|

मैं बात करना चाह रहा था ऐसे लोगों की जो जीवन में आत्म मुग्ध रहते हैं, नेतागण अधिकतर इसी श्रेणी में आते हैं| उनको दूसरों के दोष दिखाई देते हैं और वास्तव में दूसरों के दोष निकालना ही उनका मुख्य काम होता है| वे यह तो सोच ही नहीं पाते कि उनमें भी कोई दोष हो सकता है| यह वास्तव में बहुत खराब स्थिति होती है जब व्यक्ति न केवल अपनी कमियों पर ध्यान देना बंद कर देता है अपितु इस संबंध में सुनना भी नहीं चाहता, तब उसके सुधार की गुंजाइश नहीं बचती और वह क्रमशः लोगों के बीच अपना सम्मान खोता जाता है|

हम जो कुछ एक अधिकारी/कर्मचारी होने के नाते, सिस्टम का एक पार्ट होने के नाते करते हैं, वह हमारी एक भूमिका होती है और उस भूमिका का निर्वाह होने से हमें तसल्ली भी होती है| लेकिन एक यात्रा इसके साथ-साथ चलती है या शायद चलनी चाहिए!

एक प्रसंग याद आ रहा है सेवाकाल का| हमारे एक महाप्रबंधक थे, मिस्टर दुआ, जब मैं एक विद्युत परियोजना में काम करता था| वे अपने पद की भूमिका तो ठीक से निभाते ही थे, लेकिन एक क्रिएटिव व्यक्ति होने के नाते वे संस्कृतिक गतिविधियों में भी रुचि लेते थे और भाग लेते थे| उन्होंने इस दृष्टि से वहाँ लॉयंस क्लब की गतिविधि प्रारंभ कीं| अब वे इसमें रुचि लेते थे तो अधिकारीगण भी सदस्य बनते गए| इस प्रकार एक विशाल नेटवर्क वहाँ तैयार हो गया| आसपास के सोशली एक्टिव लोग भी इसमें जुड़ते गए|

अब कुछ उपयोगी काम तो होते ही होंगे इसके अलावा बहुत से लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने और तालियाँ पिटवाने का भी अवसर मिला| लेकिन मिस्टर दुआ को हमेशा तो वहाँ नहीं रहना था| उनका ट्रांसफर हुआ और एक मिस्टर सिंह उनके स्थान पर आए| महाप्रबंधक से निचले स्टार के लॉयंस क्लब में सक्रिय अधिकारियों ने लॉयन्स क्लब का एक प्रोग्राम रखा और मिस्टर सिंह के पास उसके लिए आमंत्रित करने गए| इस पर मिस्टर सिंह बोले- ‘न मैं जाऊंगा और न तुमको जाने दूंगा| आप यहाँ बिजली पैदा करने आए हैं या ये सब करने आए हैं|’

हर व्यक्ति की इस संबंध में अपनी फिलोसफ़ी है| कुछ लोग सिर्फ सिस्टम का पुर्जा बने रहना पसंद करते हैं, कुछ इन सीमाओं का बार-बार अतिक्रमण करते हैं|

मेरे अपने सेवाकाल के दौरान मैंने ऐसे कई लोगों से प्रेरणा प्राप्त की और स्वयं भी ऐसा व्यक्ति बनने की कोशिश की, जिससे कोई भी व्यक्ति अपने मन की बात कह सकता है, आपकी कमी भी बता सकता है| जबकि एक-दो अधिकारी ऐसे भी थे, जिनके बारे में सभी जानते थे कि उनसे सहज होकर कुछ देर बात करना भी संभव नहीं है| कुछ ही देर में उनके सहज व्यवहार की सीमा समाप्त हो जाती है और किसी न किसी बहाने से ब्लास्ट पाइंट आ जाता है|

आज ऐसे ही खयाल आया कि इन आत्म मुग्ध किस्म के प्राणियों को श्रद्धांजलि दी जाए|

जबकि मैं यह आलेख समाप्त करने को था तभी यह खबर मिली कि प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और मेहनती कलाकार सुशांत सिंह राजपूत ने अपने मुंबई स्थित निवास में आत्महत्या कर ली| ये परेशानियाँ सिर्फ पैसे की कमी से ही नहीं होतीं जी! सबको संतोष प्राप्त हो यही कामना है| ऐसा प्रतिभाशाली कलाकार जिससे समाज को ऐसी अनेक प्रभावशाली भूमिकाएँ निभाए जाने की उम्मीद रहती है, उसके अचानक चले जाने और इस मामले में तो हथियार डाल देने की जानकारी मिलने पर बहुत दुख होता है|

क्यों ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति, और ऐसा सफल व्यक्ति, जीवन में अंदर ही अंदर घुटता रहता है और दुनिया को तभी मालूम होता है जब वह आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम उठा लेता है| काश ये दुनिया ज्यादा रहने लायक होती|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

One Change That I would like to make in the Human World!

Today I would like to mention in the beginning that I am making my submission based on the following #IndiSpire prompt-

Suppose you’re given the boon by god to change one thing in this human world. What will you change? #UltimateChange

 

 

I am selfish to some extent, and yes I think this is justified. But this selfishness is not limited to myself, my family and not even to my city etc. but I think of my country first, then I think for the complete human family.

Now a days the whole world is fighting the demon like Pandemic- Corona Virus. If I could make a change, it could also be that there may not be any disease which could place such a nasty challenge before the human society.

There are so many divisions among the human society- caste, creed, religion, colour etc. I wish there may not be any such division, all may be one and everybody get equal opportunity to achieve whatever he or she can, based on the efforts made by that individual.

But when I think about which one change I would like to make to this human world, if I got the power to do so, I feel that I would make a geographical change. Yes, I wish everybody well, but there are some countries and human beings, who are not born to love. They are always making efforts to destabilize the world, always preparing for wars, spreading hate, terrorism etc.

For my peace-loving country, our two neighbouring countries China and Pakistan are always creating troubles. While we wish to make efforts for the well being of our people, to make steady progress, living in an atmosphere of peace, these two neighbouring countries have joined together to disturb the atmosphere of love and peace.

I would like to make a geographical change and put these two countries, may be next to North Korea. While South Korea is on one side of North Korea, these two war loving countries I might put on another side of North Korea and put some peace-loving countries as our neighbours in their place. So that these two may become the well deserving neighbours of the big-headed premiere of North Korea there and enjoy his company while my country may focus on the well-being of its citizens.

There could be many things which can be done for the well being of my country and the world at large, but this is what came to my mind instantly.

Thanks for reading.

******

Categories
Uncategorized

जैसे कोई हंस अकेला, आंगन में उतरे!

आज हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर माहेश्वर तिवारी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| गीत-कविता आदि स्वयं ही अपनी बात कहते हैं, उसके बारे में अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती| किसी की याद को लेकर कितनी सुंदर अभिव्यक्ति इस गीत में दी गई है, आइए इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे।
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे।

 

लौट रही गायों के
संग-संग
याद तुम्हारी आती,
और धूल के
संग-संग
मेरे माथे को छू जाती,
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे,
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे।

 

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कंगनी पर आ जाए,
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए,
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे|
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

Life lessons!

Life- we all live it, with many hopes, we set several targets and are always trying to achieve them. Some people call it a journey, to many destinations which we might fix for ourselves from to time, but we know that it would terminate, sometimes suddenly and sometimes we might guess in advance, when the destination called ‘death’ is arriving!

 

Anyhow in life, whatever name we may give it,  we always get chance to learn new things, sometimes by choice but mostly we learn from our mistakes and failures. Life is a very tough teacher and sometimes we have to pay very heavily if we don’t learn in time.

I have travelled the most part of this journey called life. We have different co-travelers, whom we call family members, friends, colleagues, neighbors etc. during different phases of our life, since nobody can cover this long journey of life alone.

Further humans are called ‘social animals’, we always work and interact with different people, many times we work in teams. We have shared goals as family, as members of some institution, society, country and world family as a whole.

Any journey or endeavor would have more chances of being successful and certainly you would feel more comfortable, if you have true, kind hearted and loving companions. One thing I would like to mention is that one should always be honest and choose honest and loving companions. Though it is not always possible, but wherever possible one must try to do so.

But the fact is that some people are born to live honestly and spread love, while there are some who love themselves only. They are so engrossed in their own false image, that they can’t love anybody else selflessly. In any journey or activity if you don’t have a good companion half the battle is lost or even if you achieve it, the real joy of this achievement can’t be felt. There might be fight over who contributed more.

So, what I want to emphasize is one must choose his fellow team members, companions very wisely because doing that makes half the battle won.

There could many lessons from life but this came to my mind today. This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- What you have learned from life so far? #life

Thanks for reading.

****

Categories
Uncategorized

अब दो आलम में, उजाले ही उजाले होंगे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे।

 

 

दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में-

 

हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे,
उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।
(डॉ. बालस्वरूप राही)

 

एक अच्छा शेर कहके, मुझको ये महसूस हुआ,
बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं।
(डॉ. सूर्यभानु गुप्त)

सचमुच जब कोई रचनाकार कोई अच्छी रचना लिखता है, शेर तो उसकी सबसे छोटी, लेकिन अपने आप में मुकम्मल इकाई है, तो उसके बाद यह चुनौती उसके सामने होती है कि इससे ज्यादा अच्छी रचना अपने पाठकों/श्रोताओं के सामने रखे।

बहुत अधिक कष्ट और चुनौतियां होती हैं ईमानदारी से प्रभावी अभिव्यक्ति को अंजाम देने के लिए। असल में एक अच्छा सृजनशील रचनाकार, दिल से एक अच्छा प्रेमी होता है, जो अक्सर पूरी दुनिया से प्रेम करता है।

मैं बसाना चाहता हूँ, स्वर्ग धरती पर,
आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर,
उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ।
आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ॥

वैसे किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति के प्रति अनन्य प्रेम भी अद्वितीय रचनाओं का आधार बन सकता है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम और दिव्य होते हैं, जैसे तुलसीदास और उनके ईष्ट श्रीराम, सूरदास और उनके दुलारे श्याम मनोहर।

खैर हम लौकिक सृजन के बारे में ही, हल्की-फुल्की बातें करेंगे। एक गज़ल जो गुलाम अली जी ने गाई है, लेखक हैं परवेज़ जालंधरी,बड़े सुंदर बोल हैं और बड़ी कठिन शर्तें हैं चाहत की-

जिनके होठों पे हंसी, पांव में छाले होंगे,
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे।

 

शमा ले आए हैं हम, जल्वागह-ए-जाना से
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे।

 

मय बरसती है, फज़ाओं में नशा तारीं है,
मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे।

 

हम बड़े नाज़ से आए थे तेरी महफिल में,
क्या खबर थी, लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे।

आज के लिए इतना ही काफी है, वैसे तो कहते हैं ना- हरि अनंत, हरिकथा अनंता, साहित्य के बारे में भी ये बात लागू होती है।

नमस्कार

———–

Categories
Uncategorized

Come I may, but go I must!

There is a question, if I have to describe me in just one word, which word could best describe me. Let me try. I have always loved a poem by Gerald Gould- ‘Wander Thirst’. Since my schooling days I loved this poem, since  I read it for the first time. This poem describes my wander instinct in many ways but just to quote a line, it is-

 

 

 

Come I may, but go I must!

 

I have also been writing poems in my young age, and one of my poems begins like this-

 

पाँवों से धूल झाड़कर, पिछले अनुबंध फाड़कर
रोज जिए हम, बनवासी राम की तरह|

 

Many writers have described life as a journey. We go to many places, meet many type of people and have different types of interactions, experiences. Now a days it is halted to great extent but in our country, the railway network is also like veins in the body and people keep travelling in different directions, like flow of bloods in our body. I remember a line from poem by a poetess Ms. Anjum Rehbar-

 

छुक-छुक रेल चली है जीवन की|

 

I feel like travelling all the time, there is another poem by a famous Hindi poet, Sh. Om Prabhakar Ji, which says-

 

यात्रा के बाद भी, पथ साथ रहते हैं|

 

खेत खंबे तार, सहसा टूट जाते हैं,
हमारे साथ के सब लोग हमसे छूट जाते हैं|
फिर भी हमारी बांह, गर्दन, पीठ को छूते
नरम दो हाथ रहते हैं|

 

घर पहुँचकर भी न होतीं खत्म यात्राएं,
गूँजती हैं सीटियाँ अब हम कहाँ जाएँ|
जहां जाएँ वहीं, सूखे-झुके मुख-माथ रहते हैं|

 

Yes, I feel that I can best describe myself as a traveller, who wishes to travel length and breadth of this world and explore where the human beings love others the most. Where people are happy to the core, always ready to welcome strangers as friends. In fact I not only wish to travel all over the world, but also the universe, for that I wish to fly, may be sometimes at a speed more than a rocket. And that’s not all, I also wish to travel in time, may be to the time of Ramayana and Mahabharata! and my childhood days also.

Some poetry lines by Late Ramanath Awasthi Ji are also coming to my mind, here these are-

 

भीड़ में भी रहता हूँ, वीरान के सहारे,
जैसे कोई मंदिर किसी गाँव के किनारे|

 

मिलने को मिलता है सारा ही ज़माना,
एक नहीं मिलता जो प्यार से पुकारे|

and also

 

मिलना तो मन का होता है, तन तो सिर्फ बहाना है,
जीवन के बेरोक सफर में, मौत मुसाफिरखाना है|

 

So this journey is not only physical but emotional also, and as our philosophical says, we keep travelling after shedding one body or say changing uniform.

That’s all that came to my mind, for expressing on the #IndiSpire prompt- “Define your life in a single word and tell me the story behind that” #SingleWordThatCanDefineMe

 

This also gave me a chance to quote some of my favorite poetry lines in Hindi.

Thanks for reading.

*******

Categories
Uncategorized

जाने कौन आस-पास होता है!

आज गुलज़ार साहब का एक गीत शेयर करने का मन हो रहा है। इस गीत को फिल्म – सीमा के लिए रफी साहब ने शंकर जयकिशन जी के संगीत निर्देशन में गाया है । गुलज़ार साहब तो भाषा में प्रयोग करने के लिए प्रसिद्ध हैं और हमारी फिल्मों को अनेक खूबसूरत गीत उन्होंने दिए हैं।

लीजिए प्रस्तुत है गुलज़ार साहब का यह खूबसूरत गीत-

 

 

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है।

 

होंठ चुपचाप बोलते हों जब
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो,
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें
ठंडी आहों में सांस जलती हो।

 

आँख में तैरती हैं तसवीरें
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए,
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए।

 

कोई वादा नहीं किया लेकिन
क्यों तेरा इंतजार रहता है,
बेवजह जब क़रार मिल जाए
दिल बड़ा बेकरार रहता है।

 

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

*****