हाय रे अकेले छोड़ के जाना, और न आना बचपन का!

आज मुझे अपने परम प्रिय गायक जी का गाया, फिल्म देवर का एक गीत याद आ रहा है, जो अभिनेता धर्मेंद्र जी पर फिल्माया गया था। इस गीत को लिखा था आनंद बख्शी जी ने और रोशन जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने अपने मधुर स्वर में इस गीत को गाकर अमर कर दिया है।

गीत का विषय भी ऐसा ही है, वास्तव कुछ चीजें जो जीवन में अनमोल होती हैं, उनमें से एक है बचपन, और बचपन के अनमोल होने को इस गीत में बहुत सुंदरता में अभिव्यक्त किया गया है।

लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-



आया है मुझे फिर याद वो जालिम,
गुज़रा ज़माना बचपन का,
हाय रे अकेले छोड़ के जाना
और न आना बचपन का,
आया है मुझे फिर याद वो जालिम।


वो खेल वो साथी वो झूले,
वो दौड़ के कहना आ छू ले,
हम आज तलक भी न भूले-
हम आज तलक भी न भूले,
वो ख्वाब सुहाना बचपन का,
आया है मुझे फिर याद वो जालिम।


इसकी सबको पहचान नहीं,
ये दो दिन का मेहमान नहीं-
ये दो दिन का मेहमान नहीं,
मुश्किल है बहुत आसान नहीं,
ये प्यार भुलाना बचपन का,
आया है मुझे फिर याद वो जालिम।


मिल कर रोयें फरियाद करें,
उन बीते दिनों की याद करें,
ऐ काश कहीं मिल जाये कोई-
ऐ काश कही मिल जाये कोई,
जो मीत पुराना बचपन का।
आया है मुझे फिर याद वो जालिम।
गुज़रा ज़माना बचपन का।


आज के लिए इतना ही।



The Fittest Survive!

There was a time when our forefathers lived in jungles, as we are told. In jungles there is the law of the land, which tells that the powerful species survive. We hear about species which existed in the world earlier and do not exist now. Surprisingly some species of earlier time we hear about were so big and powerful, it is surprising to know that they couldn’t survive. Further it is also worth consideration that in the long run either they could survive,  or the small human beings could, let’s take the example of Dianosaurs.



Yes there is a rule in the forest lands, or even the under-water world, that it is the fittest, the strongest who survives. In the jungles the lion and the bigger animals kill the smaller ones. Under water also it is said that the bigger fishes swallow the smaller ones.

The same principle could also apply on human beings, to great extent it might be seen in uncivilized societies. But in case of human society, it is not just the physical power that counts, but more than that it is mental power.

It is mental power only, through which humans initially made weapons for their survival, to kill the wild animals, they also killed them for eating, like the wild animals also do. But humans cooked their food. They invented so many things, houses to live safely, colonies to live as a society. Humans are thinking animals, so they could soon understand that if we live as a co-operative society, we can help each-other in growth and also be safe from external dangers. I think first it was small groups, which later grew larger and larger, and became villages, cities and countries.

Yes if not connected with each other, it would be the principle of survival of the fittest getting applied on us. But we know that in that way the humans would get destroyed and the world would become a big jungle.
Further the fitness or the might of human beings does not mean the physical fitness only. It is the mind and money power, which counts more in today’s world. We also see gangsters, who represent the uncivilized world, totally dependent on their physical might, the weapons and the nasty designs. We also find the rich and powerful moving with their body guards carrying guns, for safeguarding them. We also find artists and popular leaders going among huge crowds giving their message of love.

Today the world has became a global village, we are inter-connected and a person living in a country does also care about the well being of people in other country, if there is any natural calamity, spread of some deadly disease or any kind of trouble. We know today that if we don’t care, the same problem we also might have to face.

So we need to acquire the power of knowledge, necessary gadgets for safeguarding ourselves and our society, because in the human world today, there is nobody who can survive and rule barely on his own fitness or say power, be it of any kind. We have to be a strong and sensible society, that thinks about well-being of ourselves and the whole world.

So in today’s world one should be in good health, be well informed and well connected and be an active and vigilant member of the society. I think that is the requirement to remain a contributing member of society, which is not a jungle in anyway. Yes for those living in jungle, other principles might apply.

These are my humble views on the #IndiSpire prompt- “survival of the fittest,” the Law of the Jungle what do these phrases tell you? I often wonder if we got Charles Darwin’s theory wrong. #Survivalofthefittest

Thanks for reading.



Bee Love Award- Nomination.

Dear friends

Today I would  like to share that a fellow blogger who writes nice posts by the name- साधक, his Blog ID –   has nominated me for ‘Bee Love Award’. I am very thankful to my friend who is a creative writer and I enjoy his writings a lot.

By the name of the award, I understand that it inspires to be an engine for spreading love, whatever we write, we can impress people by our creativity and may be knowledge also, but the basic thing that should always be there is that we  keep the flame of love burning in our heart and wherever possible,  should contribute for spreading love in our society, love for all human beings and not only humans but all living species.

I again thank my fellow blogger , who writes by the name साधक, his blog ID being  Incidentally I do not know his name and he doesn’t know mine. For example while he very graciously nominated me and mentioned my name as ‘Samay’, perhaps by seeing my website name – . I may by the way tell that my name is Shri Krishna Sharma, for others also, since it is not mentioned in my blog posts.  I have also mentioned that he writes with the name साधक. I again thank my fellow blogger and friend for nominating me.

These are the guidelines for those getting this award

1. Attach the Bee Love Logo on the top
2. Ping back to the one who nominated, now say me i.e. (Shri Krishna Sharma)
3. Nominate some of your fellow bloggers.

Now I being a very simple and easy going person. I do not ask any questions and do not take much trouble also.

I have already taken the first 2 steps as per the guidelines, the third one- nominating fellow bloggers for the award, it is rather a very difficult job for me and I treat all my fellow bloggers, my friends as very creative persons and do not want to take the seat of a judge.

I request all my fellow bloggers, who read this post and wish to take it forward, they may consider it a nomination of them from my side and I would be very happy if they take it forward.

I again thank my friend who nominated me and also thank in advance, anybody who would take it forward.
Thanks all.



लबों पे तराने अब आ न सकेंगे!

मुंबई मे हूँ, यहाँ जो कुछ देख पाऊंगा उस पर लिखूंगा, इससे पहले आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

आज मुकेश जी की गाई हुई दो प्रायवेट गज़लें शेयर कर रहा हूँ, ऐसी पहचान रही है मुकेश जी की, कि उन्होंने जो कुछ गाया उसको अमर कर दिया। उनके गायन में शास्त्रीयता का अभाव विद्वान लोग बताते हैं। मैं यह मानता हूँ कि मंदिरों में, पूजा में पहले गाया जाता था, उसके बाद गायन के आधार पर शास्त्रीयता के मानक तैयार किए गए। गायन की प्रभाविता के मूल में थी-आस्था।

जो बात सीधे दिल से निकल रही है, वो दिल तक पहुंचेगी और अमर हो जाएगी, आपके शास्त्रीयता के मानक कुछ भी बताते रहें।

तो आज जो पहली गज़ल मुकेश जी की गाई हुई शेयर कर रहा हूँ, वह है-


जियेंगे मगर मुस्कुरा ना सकेंगे,
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।


लबों पे तराने अब आ न सकेंगे,
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।


बहारें चमन में जो आया करेंगी,
नज़ारों की महफिल सजाया करेंगी,
नज़ारे भी हमको हंसा ना सकेंगे,
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।


जवानी जो लाएगी सावन की रातें,
ज़माना करेगा मुहब्बत की बातें,
मगर हम ये सावन मना ना सकेंगे
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।


आप अगर सिर्फ इस गज़ल को पढ़ रहे हैं, तब भी जो शायर ने कहा है, वह आप तक पहुंच ही रहा है, लेकिन अगर आपने इसको मुकेश जी की आवाज़ में सुना है तो आपको इसका अतिरिक्त आयाम भी महसूस होगा, ऐसी आवाज़ जो गूंगे सुर को गूंज प्रदान करती है, विस्तार देती है। खासकर के उदासी के गानों में तो मुकेश जी कलेजा उंडेल देते हैं, हालांकि मस्ती के गानों में भी उनका कोई जवाब नहीं है।

लगे हाथ एक और प्रायवेट गज़ल मुकेश जी की गाई हुई शेयर कर रहा हूँ-


ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था,
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था।


मुआफ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझको,
वो एक लम्हा कि मैं तुझसे तंग आया था।


शगुफ्ता फूल सिमट के कली बने जैसे,
कुछ इस कमाल से तूने बदन चुराया था।


गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह,
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था।


पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुज़री,
मैं चंद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था।


यहाँ शायरी तो शानदार है ही, लेकिन उसको जो प्रभाव मुकेश जी की गायकी देती है, वो लाजवाब है। जहाँ इस गज़ल में खुद्दारी को ज़ुबान मिली है, वहीं वह शेर भी बहुत अच्छा है कि जैसे कोई ऐसे मिला कि जैसे हमारी आंखों के सामने चमककर लुप्त हो जाए और यह भी कि हर कोई जब इस दुनिया से जाता है तब यह खयाल उसके मन में ज़रूर आता होगा कि काश मैंने यह काम और कर लिया होता, बहुत सारे सपने हमारे यहीं छूट जाते हैं।

खैर मेरा ज्ञान देने का कोई इरादा नहीं है, बस इन गज़लों का आनंद लें।




बहुत तलाश किया कोई आदमी ना मिला!

आज डॉ. बशीर बद्र जी की एक गज़ल याद आ रही है, डॉ. बद्र शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं, इस गज़ल में भी उन्होंने कुछ बहुत अच्छे शेर कहे हैं। यह भी जीवन की एक सच्चाई है कि बहुत सी बार जब हम ज़िंदगी में जो कुछ तलाश करते हैं, वही  नहीं मिलता है।

लीजिए आज इस खूबसूरत गज़ल का आनंद लेते हैं-



मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती ना मिला,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी ना मिला।


घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया कोई आदमी ना मिला।


तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड आया था,
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी ना मिला।


बहुत अजीब है ये कुरबतों की दूरी भी,
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी ना मिला।


खुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैंने,
बस एक शख्स को मांगा मुझे वही ना मिला।


आज के लिए इतना ही,





थोड़ी दूर साथ चलो!

आज ज़नाब अहमद फराज़ साहब की लिखी एक गज़ल याद आ रही है, जिसे गुलाम अली साहब ने बहुत सुंदर ढंग से गाया है। इस छोटी सी गज़ल में बहुत गहरी बात,अहमद फराज़ साहब ने बहुत सरल अंदाज़ में कह दी हैं, आइए इस गज़ल का आनंद लेते हैं-


कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो।
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो।


तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है,
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो।


नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं,
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।


ये एक शब की मुलाक़ात भी गनीमत है,
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो।


तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जाना हमें भी करना है
‘फ़राज़’ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।


अंतिम शेर में ‘तवाफ’ का अर्थ है ‘चक्कर लगाना/घूमकर आना’, बाकी सब तो स्पष्ट ही है।

आज के लिए इतना ही,




यह बात किसी से मत कहना!

आज फिर हिंदी कवि सम्मेलनों में काफी लोकप्रिय कवि रहे- स्व. देवराज दिनेश जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। स्व. देवराज दिनेश जी वैसे व्यंग्य कविताओं के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन उन्होंने बहुत से गीत भी लिखे थे और यह उनके प्रिय गीतों में से एक है। यह एक प्रेमगीत है या कहें ऐसे प्रेम से जुड़ा गीत है, जिसे समाज स्वीकार नहीं करता, वह जातिभेद के कारण हो, या जो भी कारण हो।

ऐसा प्रेम जो गुपचुप किया तो जा सकता है परंतु उसे समाज के सामने स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसका परिणाम कुछ भी हो सकता है, हत्या भी!
लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



मैं तेरे पिंजरे का तोता,
तू मेरे पिंजरे की मैना,
यह बात किसी से मत कहना।


मैं तेरी आंखों में बंदी,
तू मेरी आंखों में प्रतिक्षण,
मैं चलता तेरी सांस–सांस,
तू मेरे मानस की धड़कन,
मैं तेरे तन का रत्नहार,
तू मेरे जीवन का गहना!
यह बात किसी से मत कहना!!


हम युगल पखेरू हंस लेंगे,
कुछ रो लेंगे कुछ गा लेंगे,
हम बिना बात रूठेंगे भी,
फिर हंस कर तभी मना लेंगे,
अंतर में उगते भावों के,
जलजात किसी से मत कहना!
यह बात किसी से मत कहना!!


क्या कहा! कि मैं तो कह दूंगी!
कह देगी तो पछताएगी,
पगली इस सारी दुनियां में,
बिन बात सताई जाएगी।
पीकर प्रिये अपने नयनों की बरसात,
विहंसती ही रहना!
यह बात किसी से मत कहना!!


हम युगों युगों के दो साथी,
अब अलग अलग होने आए,
कहना होगा तुम हो पत्थर,
पर मेरे लोचन भर आए,
पगली इस जग के अतल–सिंधु में,
अलग अलग हमको बहना!
यह बात किसी से मत कहना!!


आज के लिए इतना ही,



संगीत की देवी स्वर-सजनी!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पुरानी ब्लॉग पोस्ट-



ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है,
ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है,
भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में
इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं, कुछ और भी है।


तुम अगर नाज़ उठाओ तो, ये हक़ है तुमको
मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।


आज हक़ीकत और कल्पना पर आधारित कुछ फिल्मी गीतों के बारे में बात करते हैं। ऊपर जिस गीत के बोल लिखे गए हैं, वह हक़ीकत के बोझ से दबे, ज़िम्मेदार शायर के बोल हैं, जो देखता है कि दुनिया में इतने दुख हैं, ऐसे में कैसे किसी एक के प्यार में पागल हुआ जाए।

अब कल्पना की धुर उड़ान के बारे में बात कर ली जाए, जहाँ प्रेमी अपने तसव्वुर में इतना पागल है कि सामने जो हक़ीकत है उसको स्वीकार नहीं कर पाता और देखें उसकी कल्पना की उड़ान कितनी दूर तक जाती है-

चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल, संगीत की देवी स्वर-सजनी,
सुंदरता की हर मूरत से, बढ़कर के है तू सुंदर सजनी।


दीवानगी का एक और आलम ये भी है-


ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम,
हमसे पूछे बिना दिल में आने लगे,
नीची नज़रों से बिजली गिराने लगे।


एक और मिसाल-

मेहताब तेरा चेहरा, एक ख्वाब में देखा था,
ऐ जान-ए-जहाँ बतला,
बतला कि तू कौन है।


और जवाब-

ख्वाबों में मिले अक्सर,
एक राह चले मिलकर,
फिर भी है यही बेहतर-
मत पूछ मैं कौन हूँ।


और इसके बाद फिर हक़ीकत की पथरीली ज़मीन पर आते हैं-

देख उनको जो यहाँ सोते हैं फुटपाथों पर,
लाश भी जिनकी कफन तक न यहाँ पाती है,
पहले उन सबके लिए, एक इमारत गढ़ लूं,
फिर तेरी मांग सितारों से भरी जाएगी।


आज के लिए इतना ही!



कश्ती के मुसाफिर ने समुंदर नहीं देखा!

आज फिर से एक गज़ल शेयर करने का मन है। ये गज़ल है ज़नाब डॉ. बशीर बद्र जी की, जो वर्तमान उर्दू शायरों में एक अलग अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं, गज़ल में बहुत से एक्सपेरीमेंट किए हैं डॉ. बशीर बद्र जी ने। यह गज़ल भी एक अलग तरह की है और कुछ शेर बहुत दमदार हैं।

आइए आज इस गज़ल का आनंद लेते हैं-



आँखों में रहा, दिल में उतर कर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा ।


बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे,
इक उम्र हुई, दिन में कभी घर नहीं देखा ।


जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है,
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ।


ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुम ने मेरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा।


यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैंने,
फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा।


महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें,
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़कर नहीं देखा।


ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं,
वो हाथ कि जिसने कोई ज़ेवर नहीं देखा।


पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा।

आज के लिए इतना ही,



राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह

मैं इन दिनों लंदन प्रवास में हूँ और यहाँ की वर्तमान और पिछले वर्ष की यात्राओं के अनुभव इन दिनों शेयर कर रहा हूँ। ये अनुभव मैं आगे भी शेयर करता रहूंगा।

इस बीच एक और विषय पर बात करने का मन है, अभी ‘राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह’ विषय पर चर्चा चल रही थी, इस विषय में मैंने भी अपने विचार रखे, आज अलग से इससे जुड़े विषय पर अपनी सम्मति देने का मन है।



हमने पिछले कुछ वर्षों में ऐसी गतिविधियां देखी हैं, जिनको राष्ट्रद्रोही कहने में कम से कम मुझे तो कोई संदेह नहीं है। मैं  जेएनयू में हुई गतिविधियों का उल्लेख कर रहा हूँ, जिनमें हमारे सैनिकों के शहीद होने पर खुशी मनाना, बुरहान बानी को फांसी का विरोध और इस प्रकार के नारे लगाया जाना शामिल है- ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’। अभी कश्मीर के संबंध में सरकार द्वारा लिए गए ऐतिहासिक कदम के बाद ‘जेएनयू’ फैक्ट्री से ही निकली एक कश्मीरी युवती ‘शेहला रशीद’  द्वारा ट्वीट करके, झूठी अफवाह फैलाया जाना भी इसका उदाहरण है कि यह प्रतिष्ठित संस्थान आज राष्ट्रद्रोह का अड्डा बन गया है।

इस सबके पीछे देखा जाए तो लॉर्ड मैकाले द्वारा भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने के लिए चलाई गई शिक्षा पद्यति का बहुत बड़ा हाथ है। हमारी बहुत समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर रही है और लॉर्ड मैकाले का यही सिद्धांत था कि भारतीयों को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से काट दो, उनके मन से राष्ट्र-गौरव निकाल दो, तब उनको गुलाम बनाए रखना आसान होगा और वे भौतिक रूप से आज़ाद हो जाएं तब भी वे मानसिक रूप से गुलाम बने रहेंगे, और इसके लिए अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से भारतीय लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे।

हम विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक हैं, हमें विश्व-गुरू का दर्जा प्राप्त था। मैक्समूलर जैसे अनेक विदेशी विद्वान भारतीय संस्कृति का लंबे समय तक अध्ययन करते रहे, फादर क़ामिल बुल्के जैसे विदेशी मानस मर्मज्ञ रहे।

हमारे राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक और कितना सुंदर साहित्य लिखा। उनका एक प्रसंग याद आ रहा है। दिनकर जी ने एम.ए. नहीं किया था, सो उनके मन में आया और उन्होंने एम.ए. के लिए फॉर्म भर दिया। उस समय बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति भी विख्यात हिंदी साहित्यकार थे, मुझे उनका नाम अभी याद नहीं आ रहा, उन्होंने दिनकर जी को बुलाया और कहा- ये क्या कर रहे हो दिनकर, लोग आपकी पुस्तकें, कवितायें आदि कोर्स में पढ़ रहे हैं, उन पर शोध कर रहे हैं, तुम्हे क्या जरूरत है एम.ए. करने की!

मैं जिस तरफ संकेत करना चाहता हूँ वो ये हि कि हमारे यहाँ डिग्री वाले नहीं अध्यवसाय वाले विद्वान रहे हैं, भारत एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश रहा है। हमारे अनपढ़ कबीर को पूरी दुनिया पढ़कर समझने का प्रयास कर रही है। तुलसीदास जी कहाँ के पढ़े-लिखे थे, जिनकी चौपाइयां आज भी गांवों में अनपढ़ बुज़ुर्ग संदर्भ के लिए जब-तब दोहराते हैं।

एक लंबी संस्कृति रही है, पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को आगे बढाने की परंपरा रही है। एक भारतीय संत- स्वामी विवेकानंद जब विश्व धर्म संसद में खड़ा होकर बोलता है, तब उसका संबोधन-‘भाइयो और बहनो’ सबको अकस्मात चौंका देता है, जो तब तक ‘देवियो और सज्जनो’ ही सुनते आए थे, विश्व बंधुत्व की अवधारणा को मन से अपनाने वाले इस संत की वाणी को दुनिया मंत्रमुग्ध होकर सुनती है, यह कोई किस्सा-कहानी नहीं है!

लेकिन आज, मैकाले की सफलता इस बात में है कि हमारे डिग्रीधारी विद्वान इस पश्चिमी अवधारणा को स्वीकार करते हैं कि ‘राष्ट्र’ एक काल्पनिक इकाई है, एक कल्पना है, हम बस यह मान लेते हैं कि यह हमारा देश है।

हाँ यह भी सच है कि बहुत सी बातें विश्वास पर ही कायम हैं, वरना कोई किसी को अपना पिता अथवा संतान भी नहीं माने। सुना है कि ओशो रजनीश के व्याख्यान स्थल पर लिखा रहता था, ‘कृपया अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़कर आएं।‘

आज के डिग्रीधारी विद्वानों के साथ दिक्कत यह है कि जो बात कोई बाहरी विद्वान कहता है उसे वे तुरंत मान लेते हैं, लेकिन जो उनको भारतीय परंपरा से मिलती है उसको वे मानने को तैयार नहीं होते और इसकी परिणति यहाँ तक होती है जैसा जेएनयू में देखने को मिला।

अंत में एक बात अवश्य जोड़ना चाहूंगा, जो लोग दूसरों को सुधारने का, अपने हिसाब से भारतीय बनाने का और जाति और धर्म के नाम पर अत्याचार का काम करते हैं वे भारतीयता के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

ऐसे ही आज कुछ विचार मन में आए, मैं यहाँ किसी को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ, मैं कोई विदेशी लेखक नहीं हूँ इसलिए कुछ लोगों का तो मेरी बात से सहमत होना संभव ही नहीं है।

आज के लिए इतना ही,