ऐ ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहाँ कहाँ!

फ़ुर्क़त हो या विसाल वही इज़्तिराब है,
तेरा असर है ऐ ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहाँ कहाँ|

फ़िराक़ गोरखपुरी

एक छोटी सी मुलाकात!

स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी हिन्दी में अपनी तरह के एक अनूठे कवि थे| उनकी एक कविता जो अक्सर मुझे याद आती है, वह है- ‘उठ मेरी बेटी सुबह हो गई’ जिसमें एक लाचार पिता अपनी बच्ची को जीवन की कुछ समझाता है|
लीजिए प्रस्तुत है, स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता, जिसका कथ्य स्वतः स्पष्ट है-

कुछ देर और बैठो –
अभी तो रोशनी की सिलवटें हैं
हमारे बीच।

शब्दों के जलते कोयलों की आँच
अभी तो तेज़ होनी शुरु हुई है
उसकी दमक
आत्मा तक तराश देनेवाली
अपनी मुस्कान पर
मुझे देख लेने दो

मैं जानता हूँ
आँच और रोशनी से
किसी को रोका नहीं जा सकता
दीवारें खड़ी करनी होती हैं
ऐसी दीवार जो किसी का घर हो जाए।


कुछ देर और बैठो –
देखो पेड़ों की परछाइयाँ तक
अभी उनमें लय नहीं हुई हैं
और एक-एक पत्ती
अलग-अलग दीख रही है।

कुछ देर और बैठो –
अपनी मुस्कान की यह तेज़ धार
रगों को चीरती हुई
मेरी आत्मा तक पहुँच जाने दो
और उसकी एक ऐसी फाँक कर आने दो
जिसे मैं अपने एकांत में
शब्दों के इन जलते कोयलों पर
लाख की तरह पिघला-पिघलाकर
नाना आकृतियाँ बनाता रहूँ
और अपने सूनेपन को
तुमसे सजाता रहूँ।


कुछ देर और बैठो –
और एकटक मेरी ओर देखो
कितनी बर्फ मुझमें गिर रही है।
इस निचाट मैदान में
हवाएँ कितनी गुर्रा रही हैं
और हर परिचित कदमों की आहट
कितनी अपरिचित और हमलावर होती जा रही है।

कुछ देर और बैठो –
इतनी देर तो ज़रूर ही
कि जब तुम घर पहुँचकर
अपने कपड़े उतारो
तो एक परछाईं दीवार से सटी देख सको
और उसे पहचान भी सको।


कुछ देर और बैठो
अभी तो रोशनी की सिलवटें हैं
हमारे बीच।
उन्हें हट तो जाने दो –
शब्दों के इन जलते कोयलों पर
गिरने तो दो
समिधा की तरह
मेरी एकांत
समर्पित

खामोशी!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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रुक जा रात ठहर जा रे चंदा!

स्वर्गीय शैलेन्द्र जी का एक सुंदर गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| फिल्म- ‘दिल एक मंदिर’ के लिए इस गीत का संगीत शंकर जयकिशन की सुरीली जोड़ी ने दिया था और सुर सम्राज्ञी स्वर्गीय लता मंगेशकर जी ने अपनी मधुर वाणी में गाकर इस गीत को अमर कर दिया है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस मधुर गीत के बोल –

रुक जा रात ठहर जा रे चंदा
बीते न मिलन की बेला,
आज चांदनी की नगरी में
अरमानों का मेला|
रुक जा रात …

पहले मिलन की यादें लेकर
आई है ये रात सुहानी
दोहराते हैं चाँद सितारे
मेरी तुम्हारी प्रेम कहानी|
मेरी तुम्हारी प्रेम कहानी||
रुक जा रात …

कल का डरना काल की चिंता
दो तन है मन एक हमारे
जीवन सीमा के आगे भी
आऊँगी मैं संग तुम्हारे|
आऊँगी मैं संग तुम्हारे|
रुक जा रात …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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