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क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

आज मैं स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, आज की पीढ़ी उनको अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में अधिक जानती है, परंतु किसी ज़माने वे हिन्दी कवि सम्मेलनों के अत्यंत लोकप्रिय कवि हुआ करते थे| उनकी ‘मधुशाला’ ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे, लोग इसको सुनकर झूम उठते थे| उन्होंने प्रेम के, विरह के और विद्रोह के भी गीत लिखे हैं, उनकी एक कविता तो फिल्म- अग्निपथ में काफी गूंजी थी| अनेक लोकगीत शैली के गीत भी उन्होंने लिखे थे- जैसे ‘ए री महुआ के नीचे मोती झरें’|


मुझे याद है आकाशवाणी में उनके एक साक्षात्कार में किसी ने उनसे पूछ लिया था कि क्या उनकी ‘कविताओं की लोकप्रियता का कारण यह है कि उनकी भाषा बहुत सरल है’, इस पर वो बोले थे कि ‘भाषा सरल होना इतना आसान नहीं है, यदि आपका मन निर्मल नहीं होगा, तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं पाएगी’|


आज का उनका यह गीत, एक रूमानी गीत है, आइए इसका आनंद लेते हैं-



क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


यह अधिकार कहाँ से लाया?’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये!

एक बार फिर से मैं आज अपने सर्वाधिक प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुकेश जी दर्द भरे गीतों के सरताज माने जाते हैं लेकिन रोमांटिक गीत भी उन्होंने एक से एक अच्छे गाये हैं|

 

 

आज का यह गीत 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘हॉलिडे इन बॉम्बे’ के लिए अंजान जी ने लिखा था और एन दत्ता के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज में इसे गाया था|

प्रस्तुत है उस अमर गायक की याद में यह गीत-

 

आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये,
आँख का काजल क्यूँ शरमाये,
आखिर क्या है बात हंसी क्यूँ
होठों तक आ कर रुक जाये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये||

 

बदली नजर, बदली अदा, आज है हर अंदाज़ नया|
दिल की लगी छुप न सकी,
राज़ ये आखिर खुल ही गया|
रंग बदल कर किधर चली हो,
बदन समेटे, नजर चुराये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये||

 

महकी हवा, बहकी घटा,
ये आलम, ये मदहोशी|
चुप न रहो, कुछ तो कहो,
तोड़ भी दो ये ख़ामोशी|
ये मौसम, ये घडी मिलन की,
रोज कहा जीवन में आये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये|

 

दिल को मेरे मिल ही गया,
साथी प्यार की राहों का|
साथ कभी छूटे ना, इन लहराती बाँहों का|
अब न जुदा हों दिल से तेरी,
बलखाती जुल्फों के साये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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छुप न सकेगा इश्क़ हमारा, चारों तरफ है उनका नज़ारा!

कल एक गीत शेयर किया था, बहुत पुरानी ऐतिहासिक कैरेक्टर्स को लेकर बनाई गई फिल्म से, प्रेम की शक्ति को, प्रेम के हार न मानने वाले जज़्बे को दर्शाने वाला गीत था।

असल में जब मुझे वह गीत याद आया तब मुझे जो फिल्म याद आ रही थी, वह थी- मुगल-ए-आज़म, पता नहीं क्यों ध्यान में यह फिल्म थी और गीत वह याद आ रहा था। आज मुगल-ए-आज़म का एक गीत शेयर करूंगा।

जब मुगल-ए-आज़म फिल्म को याद करता हूँ, तो अकबर के रूप में पृथ्वीराज कपूर जी का व्यक्तित्व याद आता है, अकबर एक शक्तिशाली शासक रहे हैं, लेकिन मुझे संदेह है कि उनका व्यक्तित्व पृथ्वीराज कपूर जी जैसा रौबीला रहा होगा! और उधर दिलीप कुमार जो एक लाडला बच्चा लगते हैं फिल्म में। जब पृथ्वीराज जी (मतलब कि अकबर) कहते हैं कि वे ‘हिंदुस्तान को किसी रक्कासा के पांव की पाज़ेब नहीं बनने देंगे’, तब यह लाडला बच्चा कहता है कि- ‘मेरा दिल भी आपका हिंदुस्तान नहीं है, जिस पर आपकी हुक़ूमत चले!’ (माफ करें मुझे डॉयलाग ठीक से याद नहीं हैं)।

इसी फिल्म में अनारकली जब एक रात के लिए सलीम की बेगम बनने की मांग अकबर-ए-आज़म से करती है, जिससे हिंदुस्तान का होने वाला शहंशाह ‘झूठा साबित न हो’ और अकबर उसकी यह बात मान लेते हैं,शर्तों के साथ, तब वह कहती है- ‘इस एहसान के बदले वह बादशाह को अपना खून माफ करती है’।

ऐसे ही कुछ संवाद, ठीक-ठीक संवाद भी नहीं, उनका कांटेंट याद आ रहा है, एक गीत शेयर करने से पहले। एक और कैरेक्टर बहुत जोरदार है, ‘संगतराश’ अर्थात मूर्तियां बनाने वाला, अकबर उसकी बनाई मूर्तियां देखकर कहते हैं- ‘मुझे मालूम नहीं था कि हमारी सल्तनत में ऐसे कलाकार भी आबाद हैं!’, इस पर संगतराश कहता है कि- ‘सच्चाई तो यह है कि आपकी सल्तनत में, मैं बर्बाद हूँ!’ बाद में जब अनारकली को मृत्युदंड दिया जाने वाला था तब यह कलाकार फिल्म में मुहब्बत की आवाज बुलंद करता है।
मधुबाला जी का ज़िक्र न करूं तो नाइंसाफी होगी, इस फिल्म में अनारकली की भूमिका उन्होंने निभाई है, बहुत खूबसूरत भी लगी हैं और जब चुनौती भरे अंदाज़ में ‘प्यार किया तो डरना क्या’ गीत पर नृत्य करती हैं और हजारों आइनों में उनकी छवि दिखाई देती है तब अकबर-ए-आज़म का रुआब पानी-पानी हो जाता है। आज यही गीत शेयर कर रहा हूँ।

फिल्म- मुगल-ए-आज़म के लिए, शकील बदायुनी जी के लिखे इस गीत को नौशाद जी के संगीत निर्देशन में, लता मंगेशकर जी ने अपने मधुर स्वर में गाया है।

लीजिए इस नायाब गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

इंसान किसी से दुनिया में,
एक बार मोहब्बत करता है।
इस दर्द को लेकर जीता है,
इस दर्द को लेकर मरता है।

 

प्यार किया तो डरना क्या,
जब प्यार किया तो डरना क्या।
प्यार किया कोई चोरी नहीं की,
छुप छुप आहें भरना क्या।
जब प्यार किया तो डरना क्या।

 

आज कहेंगे दिल का फ़साना,
जान भी ले ले, चाहे ज़माना।
मौत वही जो दुनिया देखे
घुट घुट कर यूँ मरना क्या।

 

उनकी तमन्ना दिल में रहेगी,
शमअ इसी महफ़िल में रहेगी।
इश्क में जीना इश्क में मरना,
और हमें अब करना क्या।
जब प्यार किया तो डरना क्या।

 

छुप ना सकेगा इश्क हमारा,
चारों तरफ़ हैं उनका नज़ारा।
परदा नहीं जब कोई खुदा से
बन्दों से परदा करना क्या।

जब प्यार किया तो डरना क्या॥

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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कैसे नादान हैं, शोलों को हवा देते हैं!

आज एक बहुत पुरानी फिल्म और उसका एक गीत याद आ रहे हैं। आज का यह गीत है 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म- ताज महल का, साहिर लुधियानवी जी के लिखे इस गीत को सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने रोशन जी के संगीत निर्देशन में अनूठे ढंग से गाया है।

कुल मिलाकर इतना है कि दुनिया में हुक़ूमतें हैं, सरमायेदारी है, पूरी दुनिया को जीत लेने का, सब कुछ अपने कब्ज़े में कर लेने का ज़ुनून है और दूसरी तरफ मुहब्बत है, जो अपना सब कुछ लुटा देने को तैयार है, सब तरह के ज़ुल्म हंसते-हंसते सह जाती है। तख्त और ताज की उसके लिए कोई अहमियत नहीं है। लीजिए मुहब्बत के इस अमर गीत का आनंद लेते हैं-

 

जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं, 
कैसे नादान हैं, शोलों को हवा देते हैं|
कैसे नादान हैं

 

हमसे दीवाने कहीं तर्क-ए- वफ़ा करते हैं, 
जान जाये कि रहे बात निभा देते हैं।
जान जाये…

 

आप दौलत के तराज़ू मैं दिलों को तौलें, 
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं।
हम मोहब्बत से…

 

तख़्त क्या चीज़ है और लाल-ओ-जवाहर क्या है, 
इश्क़ वाले तो खुदाई भी लुटा देते हैं।
इश्क़ वाले …

 

हमने दिल दे भी दिया, अहद-ए-वफ़ा ले भी लिया, 
आप अब शौक से दीजे जो सज़ा देते हैं।
जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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