हम तुम ना जुदा होंगे!

मोहम्मद रफी साहब का नाम, भारतीय सिने संगीत की दुनिया में किसी परिचय का मोहताज नहीं है| जिस तरह नायकों की दुनिया में राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद की तिकड़ी प्रसिद्ध थे, उसी प्रकार पुरुष गायकों की दुनिया में रफी, मुकेश और किशोर कुमार ऐसे नाम हैं जिनको भुलाया जाना मुश्किल है|

आज और भूमिका बांधे बिना अब मैं फिल्म उस्तादों के उस्ताद से असद भोपाली साहब के लिखे एक गीत के बोल शेयर कर रहा हूँ, जिसे रवि जी के संगीत निर्देशन में, रफी साहब ने अपने लाजवाब अंदाज में गाया है| लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल-



सौ बार जनम लेंगे
सौ बार फ़ना होंगे
ऐ जाने वफा फिर भी
हम तुम ना जुदा होंगे|
सौ बार जनम लेंगे,
सौ बार फ़ना होंगे|

किस्मत हमें मिलने से
रोकेगी भला कब तक,
इन प्यार की राहों में
भटकेगी वफ़ा कब तक,
कदमो के निशा खुद ही
मंजिल का पता होंगे|
सौ बार जनम लेंगे
सौ बार फ़ना होगे|


ये कैसी उदासी है
जो हुस्न पे छाई है,
हम दूर नहीं तुमसे
कहने को जुदाई है,
अरमान भरे दो दिल
फिर एक जगह होंगे|

सौ बार जनम लेंगे
सौ बार फ़ना होंगे|
ऐ जाने वफा फिर भी
हम तुम ना जुदा होंगे|
सौ बार जनम लेंगे
सौ बार फ़ना होंगे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अंखियों का नूर है तू!

आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश से संबंधित एक और बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, यह एक युगल गीत है जो मुकेश जी ने सुमन कल्याणपुर जी के साथ मिलकर गाया है |

फिल्म ‘जौहर महमूद इन गोवा ‘ जो कि किसी बड़े बैनर की और ज्यादा समय तक याद रहने वाली फिल्म नहीं थी, लेकिन उसके लिए क़मर जलालाबादी जी के लिखे इस गीत को कल्याणजी आनंदजी ने अपने संगीत से सजाया है और मुकेश जी और सुमन कल्याणपुर जी ने इसे लाज़वाब अंदाज़ में गाया है|

इस गीत में प्रेम और रोमांस का एक अलग अंदाज़ देखने को मिलता है, लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी और सुमन कल्याणपुर जी का यह सुरीला गीत:

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अँखियों का नूर है तू
अँखियों से दूर है तू
फिर भी पुकारे चले जायेंगे,
तू आये ना आये
फिर भी पुकारे चले जायेंगे |

दिल में पयाम तेरा,
लब पे है नाम तेरा
हो के दीवाने तेरे प्यार में,
लो आये जी आये
हो के दीवाने तेरे प्यार में|


ओ मेरे हमराज़ कहाँ है,
मुझको दे आवाज़ कहाँ है
प्यार की आँखों से तुम देखो,
इश्क़ वहीं है हुस्न जहाँ है |

छुप छुप के आनेवाले,
दिल को जलानेवाले
चुपके से आ जा मेरे सामने
तू आजा रे आ जा,
चुपके से आ जा मेरे सामने

इसलिए आया हूँ मैं छुपके,
देखके हमको दुनिया जले ना
प्यार की महफ़िल कितनी अनोखी,
नूर है लेकिन दीप जले ना|

यादों के दाग़ ले के,
दिल के चिराग ले के
कब से खड़ा हूँ तेरे सामने
तू माने ना माने
कब से खड़ा हूँ तेरे सामने|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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मुझ पे लटें बिखराए!

हम सबके प्यारे मुकेश जी और सुमन कल्याणपुर जी का गाया एक बहुत सुंदर युगल गीत आज शेयर कर रहा हूँ| मुकेश जी ने अनेक बहुत प्यारे गीत लता जी के साथ गए थे, जो उनको अपना बड़ा भाई मानती थीं, वहीं सुमन कल्याणपुर जी के साथ भी मुकेश जी ने कुछ बहुत प्यारे गीत गए हैं|

आज का यह गीत 1968 में रिलीज हुई फिल्म ‘साथी’ से है, इसे राजेन्द्र कुमार जी और वैजयंती माल जी पर फिल्माया गया था, इसका संगीत तैयार किया था नौशाद साहब ने और इस गीत को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने|

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यार भरा रोमांटिक युगल गीत, मुकेश जी और सुमन कल्याणपुर जी के युगल स्वरों में


मेरा प्यार भी तू है ये बहार भी तू है
तू ही नज़रों में जान-ए-तमन्ना, तू ही नज़ारों में

तू ही तो मेरा नील गगन है
प्यार से रौशन आंख उठाये
और घटा के रूप में तू है
कांधे पे मेरे सर को झुकाये
मुझपे लटें बिखराये
मेरा प्यार …

मंज़िल मेरे दिल की वही है
साया जहाँ दिलदार है तेरा
पर्बत पर्बत तेरी बाहें
गुलशन गुलशन प्यार है तेरा
महके है आँचल मेरा
मेरा प्यार…

जागी नज़र का ख्वाब है जैसे
देख मिलन का दिन ये सुहाना
आँख तो मेरे जलवों में गुम है
देखूँ तुझे या देखूँ ज़माना
बेखुद है दीवाना
मेरा प्यार…

मैं हूँ अकेला कब से मगर तू
आज भी मेरे साथ हो जैसे
याद में तेरी यूँ भी हुआ है
हाथ में तेरा हाथ हो जैसे
भूल सकूँ तो कैसे
मेरा प्यार…

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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बहारो थाम लो अब दिल!

आज फिर से एक बार मैं एक युगल गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे लता मंगेशकर जी और मुकेश जी ने गाया है| फिल्म – ‘नमस्ते जी’ के लिए यह गीत लिखा था अंजान साहब ने और इसका संगीत दिया था जी एस. कोहली जी ने| मुकेश जी और लता जी के बहुत से रोमांटिक गीतों में यह गीत भी शामिल है|

लीजिए आज प्रस्तुत है यह मधुर गीत-


बहारो थाम लो अब दिल,
मेरा महबूब आता है,
शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|

कहर अंदाज़ हैं तेरे,
क़यामत हैं तेरी बातें|
मेरी तो जान लेंगे
ये बातें ये मुलाकातें|
सनम शरमाए जब ऐसे,
मज़ा कुछ और आता है|


शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|

लबों पर ये हँसी कातिल,
गज़ब जादू निगाहों में,
कसम तुझको मुहब्बत की
मचल ऐसे न राहों में|
मचल जाता है दिल जब
रू-ब-रू दिलदार आता है|

बहारो थाम लो अब दिल,
मेरा महबूब आता है,
शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आग पानी में लगाते हुए हालात की रात!

पुराने फिल्मी गीतों को सुनकर यही खयाल आता है कि कितनी मेहनत करते थे गीतकार, संगीतकार और गायक भी उन गीतों की अदायगी में जैसे अपनी आत्मा को उंडेल देते थे|


लीजिए आज प्रस्तुत है, 1960 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘बरसात की रात’ के लिए रफ़ी साहब का गाया यह गीत, जिसे लिखा था साहिर लुधियानवी जी ने और इसका संगीत दिया था रोशन जी ने-

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात,
एक अंजान हसीना से मुलाक़ात की रात|

हाय वो रेशमी जुल्फ़ों से बरसता पानी,
फूल से गालों पे रुकने को तरसता पानी|
दिल में तूफ़ान उठाते हुए जज़्बात की रात|
ज़िन्दगी भर…

डर के बिजली से अचानक वो लिपटना उसका,
और फिर शर्म से बलखा के सिमटना उसका,
कभी देखी न सुनी ऐसी तिलिस्मात की रात|
ज़िन्दगी भर…

सुर्ख आँचल को दबाकर जो निचोड़ा उसने,
दिल पर जलता हुआ एक तीर सा छोड़ा उसने,
आग पानी में लगाते हुए हालात की रात|
ज़िन्दगी भर…


मेरे नगमों में जो बसती है वो तस्वीर थी वो,
नौजवानी के हसीं ख्वाब की ताबीर थी वो,
आसमानों से उतर आई थी जो रात की रात|
ज़िन्दगी भर…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बदली क्या जाने है पागल, किसी के मन का मोर!

अपने प्रिय गायक मुकेश जी के अमर गाने शेयर करने के क्रम में, आज मैं 1966 में रिलीज़ हुई फिल्म- लाल बंगला का यह गीत शेयर कर रहा हूँ| गीत को लिखा है- इंदीवर जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- उषा खन्ना जी ने|


गीत के बोल पढ़ने पर यही खयाल आता है कि ये छोटा सा गीत और इसकी याद, इसकी छाप कितनी लंबी है, जो मन से धुंधली ही नहीं हो पाती| गीत में उपमा भी बहुत सुंदर दी गई, ऐसे प्रेमी के लिए, जिसकी प्रेमिका को मालूम ही नहीं कि वह उसको चाहता है|

लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

चाँद को क्या मालूम, चाहता है उसे कोई चकोर,
वो बेचारा दूर से देखे,
करे न कोई शोर|
चाँद को क्या मालूम,
चाहता है उसे कोई चकोर|

दूर से देखे, और ललचाए,
प्यास नज़र की बढ़ती जाए|
बदली क्या जाने है पागल,
किसी के मन का मोर|

चाँद को क्या मालूम,
चाहता है उसे कोई चकोर|

साथ चले तो साथ निभाना,
मेरे साथी भूल न जाना|
मैंने तुम्हारे हाथ में दे दी,
अपनी जीवन डोर|

चाँद को क्या मालूम,
चाहता है उसे कोई चकोर|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

आज मैं स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, आज की पीढ़ी उनको अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में अधिक जानती है, परंतु किसी ज़माने वे हिन्दी कवि सम्मेलनों के अत्यंत लोकप्रिय कवि हुआ करते थे| उनकी ‘मधुशाला’ ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे, लोग इसको सुनकर झूम उठते थे| उन्होंने प्रेम के, विरह के और विद्रोह के भी गीत लिखे हैं, उनकी एक कविता तो फिल्म- अग्निपथ में काफी गूंजी थी| अनेक लोकगीत शैली के गीत भी उन्होंने लिखे थे- जैसे ‘ए री महुआ के नीचे मोती झरें’|


मुझे याद है आकाशवाणी में उनके एक साक्षात्कार में किसी ने उनसे पूछ लिया था कि क्या उनकी ‘कविताओं की लोकप्रियता का कारण यह है कि उनकी भाषा बहुत सरल है’, इस पर वो बोले थे कि ‘भाषा सरल होना इतना आसान नहीं है, यदि आपका मन निर्मल नहीं होगा, तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं पाएगी’|


आज का उनका यह गीत, एक रूमानी गीत है, आइए इसका आनंद लेते हैं-



क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


यह अधिकार कहाँ से लाया?’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये!

एक बार फिर से मैं आज अपने सर्वाधिक प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुकेश जी दर्द भरे गीतों के सरताज माने जाते हैं लेकिन रोमांटिक गीत भी उन्होंने एक से एक अच्छे गाये हैं|

 

 

आज का यह गीत 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘हॉलिडे इन बॉम्बे’ के लिए अंजान जी ने लिखा था और एन दत्ता के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज में इसे गाया था|

प्रस्तुत है उस अमर गायक की याद में यह गीत-

 

आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये,
आँख का काजल क्यूँ शरमाये,
आखिर क्या है बात हंसी क्यूँ
होठों तक आ कर रुक जाये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये||

 

बदली नजर, बदली अदा, आज है हर अंदाज़ नया|
दिल की लगी छुप न सकी,
राज़ ये आखिर खुल ही गया|
रंग बदल कर किधर चली हो,
बदन समेटे, नजर चुराये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये||

 

महकी हवा, बहकी घटा,
ये आलम, ये मदहोशी|
चुप न रहो, कुछ तो कहो,
तोड़ भी दो ये ख़ामोशी|
ये मौसम, ये घडी मिलन की,
रोज कहा जीवन में आये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये|

 

दिल को मेरे मिल ही गया,
साथी प्यार की राहों का|
साथ कभी छूटे ना, इन लहराती बाँहों का|
अब न जुदा हों दिल से तेरी,
बलखाती जुल्फों के साये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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छुप न सकेगा इश्क़ हमारा, चारों तरफ है उनका नज़ारा!

कल एक गीत शेयर किया था, बहुत पुरानी ऐतिहासिक कैरेक्टर्स को लेकर बनाई गई फिल्म से, प्रेम की शक्ति को, प्रेम के हार न मानने वाले जज़्बे को दर्शाने वाला गीत था।

असल में जब मुझे वह गीत याद आया तब मुझे जो फिल्म याद आ रही थी, वह थी- मुगल-ए-आज़म, पता नहीं क्यों ध्यान में यह फिल्म थी और गीत वह याद आ रहा था। आज मुगल-ए-आज़म का एक गीत शेयर करूंगा।

जब मुगल-ए-आज़म फिल्म को याद करता हूँ, तो अकबर के रूप में पृथ्वीराज कपूर जी का व्यक्तित्व याद आता है, अकबर एक शक्तिशाली शासक रहे हैं, लेकिन मुझे संदेह है कि उनका व्यक्तित्व पृथ्वीराज कपूर जी जैसा रौबीला रहा होगा! और उधर दिलीप कुमार जो एक लाडला बच्चा लगते हैं फिल्म में। जब पृथ्वीराज जी (मतलब कि अकबर) कहते हैं कि वे ‘हिंदुस्तान को किसी रक्कासा के पांव की पाज़ेब नहीं बनने देंगे’, तब यह लाडला बच्चा कहता है कि- ‘मेरा दिल भी आपका हिंदुस्तान नहीं है, जिस पर आपकी हुक़ूमत चले!’ (माफ करें मुझे डॉयलाग ठीक से याद नहीं हैं)।

इसी फिल्म में अनारकली जब एक रात के लिए सलीम की बेगम बनने की मांग अकबर-ए-आज़म से करती है, जिससे हिंदुस्तान का होने वाला शहंशाह ‘झूठा साबित न हो’ और अकबर उसकी यह बात मान लेते हैं,शर्तों के साथ, तब वह कहती है- ‘इस एहसान के बदले वह बादशाह को अपना खून माफ करती है’।

ऐसे ही कुछ संवाद, ठीक-ठीक संवाद भी नहीं, उनका कांटेंट याद आ रहा है, एक गीत शेयर करने से पहले। एक और कैरेक्टर बहुत जोरदार है, ‘संगतराश’ अर्थात मूर्तियां बनाने वाला, अकबर उसकी बनाई मूर्तियां देखकर कहते हैं- ‘मुझे मालूम नहीं था कि हमारी सल्तनत में ऐसे कलाकार भी आबाद हैं!’, इस पर संगतराश कहता है कि- ‘सच्चाई तो यह है कि आपकी सल्तनत में, मैं बर्बाद हूँ!’ बाद में जब अनारकली को मृत्युदंड दिया जाने वाला था तब यह कलाकार फिल्म में मुहब्बत की आवाज बुलंद करता है।
मधुबाला जी का ज़िक्र न करूं तो नाइंसाफी होगी, इस फिल्म में अनारकली की भूमिका उन्होंने निभाई है, बहुत खूबसूरत भी लगी हैं और जब चुनौती भरे अंदाज़ में ‘प्यार किया तो डरना क्या’ गीत पर नृत्य करती हैं और हजारों आइनों में उनकी छवि दिखाई देती है तब अकबर-ए-आज़म का रुआब पानी-पानी हो जाता है। आज यही गीत शेयर कर रहा हूँ।

फिल्म- मुगल-ए-आज़म के लिए, शकील बदायुनी जी के लिखे इस गीत को नौशाद जी के संगीत निर्देशन में, लता मंगेशकर जी ने अपने मधुर स्वर में गाया है।

लीजिए इस नायाब गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

इंसान किसी से दुनिया में,
एक बार मोहब्बत करता है।
इस दर्द को लेकर जीता है,
इस दर्द को लेकर मरता है।

 

प्यार किया तो डरना क्या,
जब प्यार किया तो डरना क्या।
प्यार किया कोई चोरी नहीं की,
छुप छुप आहें भरना क्या।
जब प्यार किया तो डरना क्या।

 

आज कहेंगे दिल का फ़साना,
जान भी ले ले, चाहे ज़माना।
मौत वही जो दुनिया देखे
घुट घुट कर यूँ मरना क्या।

 

उनकी तमन्ना दिल में रहेगी,
शमअ इसी महफ़िल में रहेगी।
इश्क में जीना इश्क में मरना,
और हमें अब करना क्या।
जब प्यार किया तो डरना क्या।

 

छुप ना सकेगा इश्क हमारा,
चारों तरफ़ हैं उनका नज़ारा।
परदा नहीं जब कोई खुदा से
बन्दों से परदा करना क्या।

जब प्यार किया तो डरना क्या॥

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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कैसे नादान हैं, शोलों को हवा देते हैं!

आज एक बहुत पुरानी फिल्म और उसका एक गीत याद आ रहे हैं। आज का यह गीत है 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म- ताज महल का, साहिर लुधियानवी जी के लिखे इस गीत को सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने रोशन जी के संगीत निर्देशन में अनूठे ढंग से गाया है।

कुल मिलाकर इतना है कि दुनिया में हुक़ूमतें हैं, सरमायेदारी है, पूरी दुनिया को जीत लेने का, सब कुछ अपने कब्ज़े में कर लेने का ज़ुनून है और दूसरी तरफ मुहब्बत है, जो अपना सब कुछ लुटा देने को तैयार है, सब तरह के ज़ुल्म हंसते-हंसते सह जाती है। तख्त और ताज की उसके लिए कोई अहमियत नहीं है। लीजिए मुहब्बत के इस अमर गीत का आनंद लेते हैं-

 

जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं, 
कैसे नादान हैं, शोलों को हवा देते हैं|
कैसे नादान हैं

 

हमसे दीवाने कहीं तर्क-ए- वफ़ा करते हैं, 
जान जाये कि रहे बात निभा देते हैं।
जान जाये…

 

आप दौलत के तराज़ू मैं दिलों को तौलें, 
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं।
हम मोहब्बत से…

 

तख़्त क्या चीज़ है और लाल-ओ-जवाहर क्या है, 
इश्क़ वाले तो खुदाई भी लुटा देते हैं।
इश्क़ वाले …

 

हमने दिल दे भी दिया, अहद-ए-वफ़ा ले भी लिया, 
आप अब शौक से दीजे जो सज़ा देते हैं।
जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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