लिक्खा था अंधेरा शायद!

दिल की क़िस्मत ही में लिक्खा था अंधेरा शायद,
वर्ना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा|

कैफ़ भोपाली

आपकी इस बात ने रोने न दिया!

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब,
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया|

सुदर्शन फ़ाकिर

गर्दिश-ए-पैमाना हम!

मस्ती-ए-रिंदाना हम सैराबी-ए-मय-ख़ाना हम,
गर्दिश-ए-तक़दीर से हैं गर्दिश-ए-पैमाना हम|

अली सरदार जाफ़री

लकीरें हाथ की वो सब जला लेगा!

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे,
लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा|

वसीम बरेलवी

जिसे मैंने चाहा मिला नहीं!

ये ख़ुदा की देन अजीब है कि इसी का नाम नसीब है,
जिसे तूने चाहा वो मिल गया जिसे मैंने चाहा मिला नहीं|

बशीर बद्र

मेरे घर का रुख़ भी कर लेती!

कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती,
इधर पहुँची, उधर पहुँची, यहाँ आई, वहाँ आई|

मुनव्वर राना

बलायें थीं आसमानी भी!

दिल को अपने भी ग़म थे दुनिया में,
कुछ बलायें थीं आसमानी भी।

फ़िराक़ गोरखपुरी

उस जाने-जहाँ ने लिख दिया!

हो सजावारे-सजा क्यों जब मुकद्दर में मेरे,
जो भी उस जाने-जहाँ ने लिख दिया, मैंने किया|

अहमद फ़राज़

वो तेरे नसीब की बारिशें!

वो तेरे नसीब की बारिशें, किसी और छत पे बरस गईं,
दिले-बेख़बर मेरी बात सुन, उसे भूल जा उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

लौ को ज़रा सा कम कर दे!

चमकने वाली है तहरीर मेरी क़िस्मत की,
कोई चिराग़ की लौ को ज़रा सा कम कर दे|

बशीर बद्र