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आग पानी में लगाते हुए हालात की रात!

पुराने फिल्मी गीतों को सुनकर यही खयाल आता है कि कितनी मेहनत करते थे गीतकार, संगीतकार और गायक भी उन गीतों की अदायगी में जैसे अपनी आत्मा को उंडेल देते थे|


लीजिए आज प्रस्तुत है, 1960 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘बरसात की रात’ के लिए रफ़ी साहब का गाया यह गीत, जिसे लिखा था साहिर लुधियानवी जी ने और इसका संगीत दिया था रोशन जी ने-

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात,
एक अंजान हसीना से मुलाक़ात की रात|

हाय वो रेशमी जुल्फ़ों से बरसता पानी,
फूल से गालों पे रुकने को तरसता पानी|
दिल में तूफ़ान उठाते हुए जज़्बात की रात|
ज़िन्दगी भर…

डर के बिजली से अचानक वो लिपटना उसका,
और फिर शर्म से बलखा के सिमटना उसका,
कभी देखी न सुनी ऐसी तिलिस्मात की रात|
ज़िन्दगी भर…

सुर्ख आँचल को दबाकर जो निचोड़ा उसने,
दिल पर जलता हुआ एक तीर सा छोड़ा उसने,
आग पानी में लगाते हुए हालात की रात|
ज़िन्दगी भर…


मेरे नगमों में जो बसती है वो तस्वीर थी वो,
नौजवानी के हसीं ख्वाब की ताबीर थी वो,
आसमानों से उतर आई थी जो रात की रात|
ज़िन्दगी भर…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरा सूना पड़ा रे संगीत !

मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| आज का ये 1957 में रिलीज़ हुई फिल्म- रानी रूपमती के लिए पंडित भरत व्यास जी ने लिखा था और एस एन त्रिपाठी जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने इसे बड़े मनमोहक अंदाज़ में गाया है|


लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का यह एक अमर गीत-

आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं,
मेरा सूना पड़ा रे संगीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|

बरसे गगन मेरे बरसे नयन, देखो तरसे है मन, अब तो आजा|
शीतल पवन ये लगाए अगन,
ओ सजन अब तो मुखड़ा दिखा जा|
तूने भली रे निभाई प्रीत,
तूने भली रे निभाई प्रीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|
आ लौट…

एक पल है हँसना एक पल है रोना, कैसा है जीवन का खेला|
एक पल है मिलना एक पल बिछड़ना,
दुनिया है दो दिन का मेला|
ये घड़ी न जाए बीत,
ये घड़ी न जाए बीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|
आ लौट…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दिल को वही काम आ गया!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| खास बात ये है आज का ये गीत मुकेश जी ने शम्मी कपूर जी के लिए गाया था, शायद मुकेश जी ने बहुत कम गीत गाये होंगे शम्मी कपूर जी के लिए, मुझे तो कोई और याद नहीं है| फिल्म- ‘ब्लफ़ मास्टर’ के लिए यह गीत- राजेन्द्र कृष्ण जी ने लिखा था और इसका संगीत दिया था – आनंद वीर जी शाह ने|


लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का गाया, कुछ अलग किस्म का यह गीत, जिसमें प्यार करने न करने के बारे में कुछ तर्क-वितर्क किया गया है-

सोचा था प्यार हम न करेंगे,
सूरत पे यार हम न मरेंगे,
लेकिन किसी पे दिल आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे||

बहुत ख़ाक दुनिया की छानी थी हमने,
अब तक किसी की न मानी थी हमने,
धोखे में दिल कैसे आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे|


अगर दिल न देते बड़ा नाम करते,
मगर प्यार से बड़ा काम करते,
दिल को यही काम आ गया|


सोचा था प्यार हम न करेंगे
सूरत पे यार हम न मरेंगे
फिर भी किसी पे दिल आ गया|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हम आपकी आँखों से नींदें ही उड़ा दें तो!

आज गुरुदत्त जी की फिल्म-प्यासा का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे रफी साहब और गीता दत्त जी ने गाया है| इसमें यही सब बताया गया कि नायिका का प्यार पाने के लिए आशिक़ महोदय किस हद तक जाने को तैयार रहते हैं और क्या-क्या सहना पड़ता है मासूम से आशिक़ को|


यह मजेदार गीत, जिसका संगीत दिया है एस डी बर्मन साहब ने और गीतकार हैं – साहिर लुधियानवी जी| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

हम आपकी आँखों में, इस दिल को बसा दें तो,
हम मूँद के पलकों को, इस दिल को सज़ा दें तो|

इन ज़ुल्फ़ों में गूँथेंगे हम फूल मुहब्बत के,
ज़ुल्फ़ों को झटक कर हम ये फूल गिरा दें तो|
हम आपकी आँखों में…

हम आपको ख्वाबों में ला, ला के सतायेंगे,
हम आपकी आँखों से नींदें ही उड़ा दें तो|
हम आपकी आँखों में…

हम आपके कदमों पर गिर जायेंगे ग़श खाकर,
इस पर भी न हम अपने आंचल की हवा दें तो|
हम आपकी आँखों में…

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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देती है खुशी कई गम भी!

सप्ताहांत में लोग आराम के मूड में रहते हैं, ऐसे में मस्तिष्क पर ज्यादा बोझ नहीं डालना चाहिए| मैं देखता हूँ कि शनिवार-रविवार को पोस्ट करने वालों और पोस्ट पढ़ने वालों की संख्या भी कम होती है|

खैर आज मैं 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘कोहरा’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| क़ैफी आज़मी साहब के लिखे इस गीत को हेमंत कुमार साहब ने अपने ही संगीत में निराले अंदाज़ में गाया है| हेमंत दा की आवाज़ वैसे ही लाजवाब थी और यह गीत तो लगता है कि जैसे उनकी आवाज़ में गाये जाने के लिए ही बना था|

लीजिए प्रस्तुत है ये नायाब गीत-


ये नयन डरे-डरे, ये जाम भरे-भरे
ज़रा पीने दो,
कल की किसको खबर, इक रात हो के निडर
मुझे जीने दो|

रात हसीं, ये चाँद हसीं
तू सबसे हसीं मेरे दिलबर,
और तुझसे हसीं तेरा प्यार|
तू जाने ना|
ये नयन डरे डरे…


प्यार में है जीवन की खुशी
देती है खुशी कई गम भी,
मैं मान भी लूँ कभी हार
तू माने ना|
ये नयन डरे डरे…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तेरा नाम ही लेना छोड़ दिया!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| आज का ये शानदार गीत 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘सहेली’ से है, जिसे लिखा है – इंदीवर जी ने और कल्याणजी आनंद जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज़ में गाया है|

जैसे जीवन में बहुत सी गतिविधियों का हमें कभी समापन करना पड़ जाता है, कभी ऐसी भी परिस्थिति आती है कि हमें प्रेम का भी समापन करना पड़ जाता है, यह गीत कुछ ऐसी ही परिस्थिति को बड़े प्रभावी ढंग से दर्शाता है|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

जिस दिल में बसा था प्यार तेरा
उस दिल को कभी का तोड़ दिया, हाय, तोड़ दिया
बदनाम न होने देंगे तुझे
तेरा नाम ही लेना छोड़ दिया, हाय, छोड़ दिया|
जिस दिल में बसा था प्यार तेरा|

जब याद कभी तुम आओगे
समझेंगे तुम्हें चाहा ही नहीं
राहों में अगर मिल जाओगे
सोचेंगे तुम्हें देखा ही नहीं
जो दर पे तुम्हारे जाती थीं
उन राहों को हमने छोड़ दिया हाय, छोड़ दिया|
जिस दिल में बसा था प्यार तेरा
|

हम कौन किसी के होते हैं
कोई हमको याद करेगा क्यूं
अपने दो आंसू भी हम पर
कोई बरबाद करेगा क्यूं – २
उस मांझी को भी गिला हमसे
मंझधार में जिसने छोड़ दिया, हाय, छोड़ दिया|
जिस दिल में बसा था प्यार तेरा …



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ये क्या किया रे दुनियावाले!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| ये शानदार गीत 1969 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘बेटी’ से है, जिसे लिखा है – शकील बदायुनी साहब ने और सोनिक ओमी जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज़ में गाया है|


जीवन में ऐसा भी हो सकता है कि हमारे पास कोई न हो जिससे हम शिकायत कर सकें, लेकिन ऐसे में भी आस्थावान लोगों के पास एक सहारा होता है, ईश्वर का, जिससे वे जी भरकर शिकायत कर सकते हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

ये क्या किया रे दुनियावाले
जहाँ के ग़म तूने
सभी मुझको दे डाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||



ओ बेदर्दी, ओ हरजाई,
देख ली मैंने तेरी खुदाई|
पहले ही मेरा दिल घायल था,
और भी उस पर चोट लगायी|
तूने रुलाके मुझे, दर-दर
फिरा के मुझे,
कब के यह अरमान निकाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले,
जहाँ के ग़म तूने
सभी मुझको दे डाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||


सुबह का सूरज, रात के तारे,
बन गए सब के सब अंगारे|
आस के बंधन तोड़ के तूने,
छीन लिए सभी संग सहारे|
मेरे लहू की कसम,
और भी कर ले सितम,
आज तू दिल की बुझा ले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||
जहाँ के ग़म तूने
सभी मुझको दे डाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चाँद रोया साथ मेरे, रात रोयी बार -बार!

काफी दिन से मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया कोई गीत शेयर नहीं किया है| लीजिए आज मैं ये शानदार गीत शेयर कर रहा हूँ| फिल्म- ‘एक रात’ के लिए यह गीत ‘अंजान’ जी ने लिखा है और उषा खन्ना जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज़ में गाया है|

कविता में उद्दीपन का भी महत्व होता है, बहुत से गीतों में हम सुनते हैं कि नायक अथवा नायिका के मनोभावों को प्रकट करने में प्रकृति, हवा, बादल आदि-आदि भी साथ देते हैं| कुछ ऐसा ही इस गीत में भी है|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

आज तुमसे दूर हो कर, ऐसे रोया मेरा प्यार,
चाँद रोया साथ मेरे, रात रोयी बार बार|

कुछ तुम्हारे बंदिशें हैं, कुछ हैं मेरे दायरे,
जब मुक़द्दर ही बने दुश्मन तो कोई क्या करे,
हाय कोई क्या करे,
इस मुकद्दर पर किसी का, क्या है आखिर इख्तियार|
चाँद रोया साथ मेरे, रात रोयी बार बार …


हर तमन्ना से ज़ुदा मैं, हर खुशी से दूर हूँ,
जी रहा हूँ, क्योंकि जीने के लिये मजबूर हूँ,
हाय मैं मजबूर हूँ|
मुझको मरने भी न देगा, ये तुम्हारा इन्तज़ार|
चाँद रोया साथ मेरे, रात रोयी बार बार ..



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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लोगों का काम है कहना!

फिल्म जगत के बहुत प्रसिद्ध और सफल गीतकार रहे हैं आनंद बख्शी साहब| उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में गीत लिखे हैं, जिनमें कुछ बहुत हल्के-फुल्के भी थे और कुछ गीत बहुत शानदार थे|

आज मैं आनंद बख्शी साहब का यह गीत शेयर कर रहा हूँ जो बहुत सुंदर और भावपूर्ण है, यह गीत फिल्म- अमर प्रेम से है और राजेश खन्ना जी पर फिल्माया गया था| आर डी बर्मन जी के संगीत निर्देशन में यह गीत किशोर कुमार जी ने गाया है|

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना,
छोड़ो बेकार की बातों में कहीं बीत ना जाए रैना|
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना|

कुछ रीत जगत की ऐसी है, हर एक सुबह की शाम हुई,
तू कौन है, तेरा नाम है क्या, सीता भी यहाँ बदनाम हुई|
फिर क्यूँ संसार की बातों से, भीग गये तेरे नयना
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना|



हमको जो ताने देते हैं, हम खोए हैं इन रंगरलियों में,
हमने उनको भी छुप छुपके, आते देखा इन गलियों में,
ये सच है झूठी बात नहीं, तुम बोलो ये सच है ना|
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना|


आज के लिए इतना ही

नमस्कार|

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सपने, सुरीले सपने!

आज एक बार फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर करना चाहूँगा| ये गीत राजेश खन्ना जी और अमिताभ जी के कुशल अभिनय से युक्त फिल्म- आनंद से है, जो 1971 में रिलीज़ हुई थी| इस फिल्म में मुकेश जी का गाया एक और गीत- ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ भी अमर गीतों की श्रेणी में शामिल है|


इस गीत को लिखा है गुलज़ार जी ने लिखा है और संगीत दिया है सलिल चौधरी जी ने|


लीजिए प्रस्तुत है यह लाजवाब गीत-


मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने
सपने, सुरीले सपने,
कुछ हँसते, कुछ गम के
तेरी आँखों के साये चुराए रसीली यादों ने|

छोटी बातें, छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ी
भूले नहीं, बीती हुई एक छोटी घड़ी,
जनम-जनम से आँखे बिछाईं
तेरे लिए इन राहों में,
मैंने तेरे लिए ही सात..
.

भोले-भाले, भोले-भाले दिल को बहलाते रहे
तन्हाई में, तेरे ख्यालों को सजाते रहे,
कभी-कभी तो आवाज देकर
मुझको जगाया ख़्वाबों से,
मैंने तेरे लिए ही सात…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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