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लोगों का काम है कहना!

फिल्म जगत के बहुत प्रसिद्ध और सफल गीतकार रहे हैं आनंद बख्शी साहब| उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में गीत लिखे हैं, जिनमें कुछ बहुत हल्के-फुल्के भी थे और कुछ गीत बहुत शानदार थे|

आज मैं आनंद बख्शी साहब का यह गीत शेयर कर रहा हूँ जो बहुत सुंदर और भावपूर्ण है, यह गीत फिल्म- अमर प्रेम से है और राजेश खन्ना जी पर फिल्माया गया था| आर डी बर्मन जी के संगीत निर्देशन में यह गीत किशोर कुमार जी ने गाया है|

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना,
छोड़ो बेकार की बातों में कहीं बीत ना जाए रैना|
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना|

कुछ रीत जगत की ऐसी है, हर एक सुबह की शाम हुई,
तू कौन है, तेरा नाम है क्या, सीता भी यहाँ बदनाम हुई|
फिर क्यूँ संसार की बातों से, भीग गये तेरे नयना
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना|



हमको जो ताने देते हैं, हम खोए हैं इन रंगरलियों में,
हमने उनको भी छुप छुपके, आते देखा इन गलियों में,
ये सच है झूठी बात नहीं, तुम बोलो ये सच है ना|
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना|


आज के लिए इतना ही

नमस्कार|

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सपने, सुरीले सपने!

आज एक बार फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर करना चाहूँगा| ये गीत राजेश खन्ना जी और अमिताभ जी के कुशल अभिनय से युक्त फिल्म- आनंद से है, जो 1971 में रिलीज़ हुई थी| इस फिल्म में मुकेश जी का गाया एक और गीत- ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ भी अमर गीतों की श्रेणी में शामिल है|


इस गीत को लिखा है गुलज़ार जी ने लिखा है और संगीत दिया है सलिल चौधरी जी ने|


लीजिए प्रस्तुत है यह लाजवाब गीत-


मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने
सपने, सुरीले सपने,
कुछ हँसते, कुछ गम के
तेरी आँखों के साये चुराए रसीली यादों ने|

छोटी बातें, छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ी
भूले नहीं, बीती हुई एक छोटी घड़ी,
जनम-जनम से आँखे बिछाईं
तेरे लिए इन राहों में,
मैंने तेरे लिए ही सात..
.

भोले-भाले, भोले-भाले दिल को बहलाते रहे
तन्हाई में, तेरे ख्यालों को सजाते रहे,
कभी-कभी तो आवाज देकर
मुझको जगाया ख़्वाबों से,
मैंने तेरे लिए ही सात…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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गाते-गाते रोये मयूरा, फिर भी नाच दिखाए|

आज भी पुरानी ब्लॉग-पोस्ट फिर से शेयर कर रहा हूँ| लंदन की एक यात्रा का विवरण पूरा किया, अगले प्रवास के बारे में आगे लिखूंगा|

इस बीच फिर से अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो महान कलाकार और भारत के सबसे बड़े शो मैन राजकपूर जी की शुरू की एक फिल्म- ‘आशिक़’ से है, गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और संगीतकार है- शंकर जयकिशन की जोड़ी। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस फिल्म के निर्देशक थे- श्री हृषिकेश मुकर्जी।

इसे बालगीत कहा जा सकता है, हालांकि इसमें सरल भाषा में जो समझाया गया, उसको अगर इंसान समझ ले तो शायद यह ज़िंदगी में बहुत काम आ सकता है। हाँ यह भी सही है कि यह समझाना, ऐसे संस्कारों को प्रस्थापित करना, बच्चों के साथ बहुत दूरगामी प्रभाव वाला और उपयोगी हो सकता है।

आइए इस गीत का आनंद लेते हैं-

तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो,
और हंसते-गाते इस जीवन की
उलझी राह संवारो।


शाम का सूरज, बिंदिया बनके,
सागर में खो जाए,
सुबह सवेरे वो ही सूरज
आशा लेकर आए,
नई उमंगें, नई तरंगें,
आस की जोत जगाए रे,
आस की जोत जगाए।


तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो
|

दुख में जो गाए मल्हारें,
वो इंसां कहलाए,
जैसे बंसी के सीने में
छेद हैं फिर भी गाए,
गाते-गाते रोये मयूरा,
फिर भी नाच दिखाए रे-
फिर भी नाच दिखाए।


तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो,
और हंसते-गाते इस जीवन की
उलझी राह संवारो।


इसके साथ ही मैं कामना करता हूँ कि आपका जीवन आशा, उमंग और उत्साह से भरा रहे।

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किसी से हाय दिल को लगा के!

आज फिर से अपने प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा मानना है की मुकेश जी का गाया लगभग हर गीत अमर है| अपनी आवाज का दर्द जब वे गीत में पिरो देते थे, तब चमत्कार ही हो जाता था|


आज का यह गीत फिल्म- बारात से है, गीत के बोल लिखे हैं मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इस गीत का संगीत तैयार किया था, चित्रगुप्त जी ने, यह गीत वैसे अजित जी पर फिल्माया गया था|

लीजिए प्रस्तुत है यह नायाब गीत-

मुफ्त हुए बदनाम
किसी से हाय दिल को लगा के,
जीना हुआ इल्जाम
किसी से हाय दिल को लगा के|
मुफ्त हुए बदनाम|


गए अरमान ले के
लुटे लुटे आते हैं,
लोग जहां में कैसे
दिल को लगाते हैं|
दिल को लगाते हैं,
अपना बनाते हैं,
हम तो फिर नाकाम,
किसी से हाय दिल को लगा के,
मुफ्त हुए बदनाम|


समझे थे साथ देगा,
किसी का सुहाना ग़म
उठी जो नज़र तो देखा
तनहा खड़े हैं हम,
तनहा खड़े हैं हम,
दिन भी रहा है कम|

रस्ते में हो गयी शाम,
किसी से हाय दिल को लगा के,
मुफ्त हुए बदनाम|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मैं प्यार का परवाना!

आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| मजे की बात ये है कि यह गीत भी 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘दीवाना’ से ही है- यह गीत लिखा है हसरत जयपुरी जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- शंकर जयकिशन की संगीतमय जोड़ी ने|


इस एक ही फिल्म का यह पाँचवाँ गीत है, जो मैं शेयर कर रहा हूँ| असल में यह इस फिल्म का ‘थीम सांग’ है| ये एक तरह से सादगी का सेलीब्रेशन है| जैसे कहा जाए की हम सरल, सिंपल हैं और हमें इस पर गर्व है!

अब बिना और भूमिका बनाए, लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

दिवाना मुझको लोग कहें,
मैं समझूँ जग है दिवाना, ओ
मैं समझूँ जग है दिवाना,
दिवाना मुझको लोग कहें|

हँसता है कोई सूरत पे मेरी,
हँसता है कोई हालत पे मेरी,
छोटा ही सही, पर दिल है बड़ा,
मैं झूमता पैमाना|


मैं इंसां सीधा-साधा हूँ,
ईमान का मैं शहजादा हूँ,
है कौन बुरा मालिक जाने,
मैं प्यार का परवाना|

मैं यार की खातिर लुट जाऊँ,
और प्यार की खातिर मिट जाऊँ,
चलता ही रहूँ, हर मंज़िल तक,
अंजाम से बेगाना|


दीवाना मुझको लोग कहें,
मैं समझूँ जग है दीवाना, ओ
मैं समझूँ जग है दीवाना,
दिवाना मुझको लोग कहें|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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आना ही होगा, तुझे आना हो होगा !

आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| मजे की बात ये है कि यह गीत भी 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘दीवाना’ से ही है- यह गीत लिखा है हसरत जयपुरी जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- शंकर जयकिशन की संगीतमय जोड़ी ने|


एक ही फिल्म का यह चौथा गीत है, जो मैं शेयर कर रहा हूँ| कैसा दिव्य समय था वह, बहुत सी फिल्मों के सभी गाने हिट होते थे, और यह फिल्म भी ऐसी ही थी और सभी गाने मुकेश जी के गाये हुए|


अब बिना और भूमिका बनाए, लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

तारों से प्यारे दिल के इशारे,
प्यासे है अरमां आ मेरे प्यारे,
आना ही होगा तुझे आना ही होगा आना ही होगा|

दिल तुझे याद करे और फ़रियाद करे,
पेड़ों की छाँव तले तेरा इंतज़ार करे,
साँझ-सकारे दिल ये पुकारे,
प्यासे है अरमां आ मेरे प्यारे|
आना ही होगा, तुझे आना हो होगा, आना ही होगा
|

हाल-ए-दिल जान ले तू, हमको पहचान ले तू,
हम कोई गैर नहीं बात ये मान ले तू,
बात ये मान ले तू|
हम हैं बेचारे, किस्मत के मारे,
प्यासे है अरमां आ मेरे प्यारे|

तारों से प्यारे दिल के इशारे|
प्यासे हैं अरमां आ मेरे प्यारे,
आना ही होगा तुझे आना हो होगा आना ही होगा|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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न तुम हारे, न हम हारे!

लीजिए आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और अमर गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत भी 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘दीवाना’ से ही है- यह गीत लिखा है शैलेंद्र जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- शंकर जयकिशन की संगीतमय जोड़ी ने|


पिछले गीत की तरह इस गीत में भी, सीधे-सादे सरल हृदय लेकिन प्रेम से भरपूर देहाती व्यक्ति के मनोभावों को बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त किया गया है|


एक बात और, आजकल मैनेजमेंट गुरू लोगों को ‘विन-विन’ का पाठ बड़े ग्राफिक्स के साथ और लंबी-चौड़ी व्याख्या करते हुए समझाते हैं, इस गीत में इस सिद्धान्त को बड़ी सरल भाषा में व्यक्त कर दिया गया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय
न तुम हारे, न हम हारे|
सफ़र साथ जितना था, हो ही गया तय
न तुम हारे, न हम हारे|

तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय|


याद के फूल को हम तो अपने, दिल से रहेंगे लगाए,
और तुम भी हँस लेना जब ये, दीवाना याद आए,
मिलेंगे जो फिर से मिला दें सितारे|
न तुम हारे, न हम हारे|
तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय|


वक़्त कहाँ रुकता है तो फिर, तुम कैसे रुक जाते
चाँद छुआ है आख़िर किसने, हम ही क्यूँ हाथ बढ़ाते
जो उस पार हो तुम, तो हम इस किनारे,
न तुम हारे, न हम हारे|
तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय|

था तो बहुत कहने को लेकिन, अब तो चुप बेहतर है,
ये दुनिया है एक सराय, जीवन एक सफ़र है,
रुका भी है कोई किसीके पुकारे|
न तुम हारे, न हम हारे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मुझे भी तो मोहब्बत दी है!

लीजिए एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और अमर गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत है 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘दीवाना’ से, गीत को लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- शंकर जयकिशन की संगीतमय जोड़ी ने|

सीधे-सादे, सरल हृदय लेकिन प्रेम से भरपूर देहाती व्यक्ति के मनोभावों को इस गीत में बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है|

लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

ऐ सनम जिसने तुझे चाँद सी सूरत दी है;
उसी मालिक ने मुझे भी तो मोहब्बत दी है|


फूल उठा ले तो कलाई में लचक आ जाए,
तुझ हसीना को खुदा ने वो नज़ाकत दी है|
मैं जिसे प्यार से छू लूं वही हो जाए मेरा,
उसी मालिक ने मुझे भी तो मोहब्बत दी है|


मैं गुज़रता ही गया तेरी हसीं राहों से
एक तेरे नाम ने क्या क्या
मुझे हिम्मत दी है|
मेरे दिल को भी ज़रा देख कहाँ तक हूँ मैं
उसी मालिक ने मुझे भी तो मोहब्बत दी है|


तू अगर चाहे तो दुनिया को नचा दे ज़ालिम
चाल दी है तुझे मालिक ने क़यामत दी है|
मैं अगर चाहूं तो पत्थर को बना दूं पानी,
उसी मालिक ने मुझे भी तो मोहब्बत दी है|

ऐ सनम जिसने तुझे चाँद सी सूरत दी है,
उसी मालिक ने मुझे भी तो मोहब्बत दी है|


आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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काहे दिया परदेस, टुकड़े को दिल के!

आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और अमर गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत है 1960 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘बंबई का बाबू’ से, गीत को लिखा है- मजरूह सुल्तानपुरी जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- सचिन देव बर्मन जी ने|


हमारी फिल्मी दुनिया में समय के साथ अलग-अलग समूह बनते गए, जैसे राज कपूर जी और मनोज कुमार जी ने अपने लिए मुख्यतः मुकेश जी को चुना, वहीं देव आनंद जी ने , दिलीप कुमार जी ने अपने लिए – किशोर कुमार जी को और मोहम्मद रफी साहब को चुन लिया| लेकिन हम जानते हैं की दिलीप साहब की शुरू की फिल्मों के लिए मुकेश जी के गाये गीत अमर हैं, जैसे ‘ये मेरा दीवानापन है’, ‘सुहाना सफर और ये मौसम हसीं’ आदि-आदि, वहीं आज का ये गीत भी मुकेश जी ने देव आनंद जी की फिल्म के लिए गाया है| विवाह के बाद कन्या की विदाई के माहौल पर शायद ही इससे अधिक सुंदर कोई और गीत होगा| लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-



चल री सजनी अब क्या सोचे,
कजरा ना बह जाये रोते-रोते|


बाबुल पछताए हाथों को मल के
काहे दिया परदेस टुकड़े को दिल के,
आँसू लिये, सोच रहा, दूर खड़ा रे|
चल री सजनी…


ममता का आँगन, गुड़ियों का कंगना
छोटी बड़ी सखियाँ, घर गली अंगना,
छूट गया, छूट गया, छूट गया रे|
चल री सजनी…


दुल्हन बन के गोरी खड़ी है
कोई नही अपना कैसी घड़ी है,
कोई यहाँ, कोई वहाँ, कोई कहाँ रे|
चल री सजनी…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर!

कल मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक गीत शेयर किया था, तो आज भी मन हो रहा है| वैसे मुकेश जी के गीत ही ऐसे हैं कि यादों में लिपटे रहते हैं| आज का ये गीत है 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘पूर्णिमा’ का, गीत लिखा है- गुलज़ार जी ने और इसका संगीत दिया है- कल्याणजी आनंद जी ने| इस फिल्म के नायक थे सदाबहार अभिनेता धर्मेन्द्र जी|


मुकेश जी ऐसे महान गायक थे कि उनके लिए नौशाद जी कहते थे- ‘तुम गा दो, मेरा गीत अमर हो जाए’| मुकेश जी ने रफी साहब, किशोर कुमार जी और लता जी से कम गीत गाए हैं, लेकिन लोकप्रियता के मामले में वे किसी से कम नहीं हैं| अपने जीवित रहते उन्हें किसी भी पुरूष गायक से अधिक फिल्मफेयर पुरस्कार मिले थे और आज भी लोगों को उनके गीत याद आते हैं|

यह भी बात है कि लाजवाब गीत-संगीत का जो समय पहले था, वो तो अब आना संभव ही नहीं है, किसी को इतनी फुर्सत नहीं है कि वह गीत-संगीत पर इतनी मेहनत करे|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|
तुम्हें पा के हम खुद से दूर हो गए थे,
तुम्हें छोड़कर अपने पास आ गए हैं|



तुम्हारी वफ़ा से शिकायत नहीं है,
निभाना तो कोई रवायत नहीं है|
जहाँ तक कदम आ सके आ गए हैं,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|


चमन से चले हैं ये इल्ज़ाम लेकर,
बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर|
मुरादों की मंज़िल से दूर आ गए थे,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|


तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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