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जनकवि शैलेन्द्र

फिल्मी दुनिया के जनकवि स्वर्गीय शैलेन्द्र जी की मृत्यु होने पर जनकवि बाबा नागार्जुन जी द्वारा उनके प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप लिखी गई एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| इस कविता से मालूम होता कि बाबा नागार्जुन के मन में, फिल्मी दुनिया में सक्रिय अपने इस सृजनशील साथी के प्रति कितना स्नेह, लगाव और आदर था|


लीजिए आज बाबा नागार्जुन जी द्वारा शैलेन्द्र जी के प्रति उनकी श्रद्धांजलि के रूप में लिखी गई इस कविता का आस्वादन करते हैं-


गीतों के जादूगर का मैं छंदों से तर्पण करता हूँ ।’

सच बतलाऊँ तुम प्रतिभा के ज्योतिपुत्र थे,छाया क्या थी,
भली-भाँति देखा था मैंने, दिल ही दिल थे, काया क्या थी ।

जहाँ कहीं भी अंतर्मन से, ॠतुओं की सरगम सुनते थे,
ताज़े कोमल शब्दों से तुम रेशम की जाली बुनते थे ।

जन मन जब हुलसित होता था, वह थिरकन भी पढ़ते थे तुम,
साथी थे, मज़दूर-पुत्र थे, झंडा लेकर बढ़ते थे तुम ।


युग की अनुगुंजित पीड़ा ही घोर घन-घटा-सी छाई
प्रिय भाई शैलेन्द्र, तुम्हारी पंक्ति-पंक्ति नभ में लहराई ।

तिकड़म अलग रही मुस्काती, ओह, तुम्हारे पास न आई,
फ़िल्म-जगत की जटिल विषमता, आख़िर तुमको रास न आई ।

ओ जन मन के सजग चितेरे, जब-जब याद तुम्हारी आती,
आँखें हो उठती हैं गीली, फटने-सी लगती है छाती ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है!

संतोषानंद जी के बहाने आज की बात करना चाहूँगा| मेरे विचार में संतोषानंद जी इसका उदाहरण हैं, कि किस प्रकार साहित्य की शुद्धतावादी मनोवृत्ति वास्तव में कविता को ही नुकसान पहुंचाती है|

संतोषानंद जी की आज जो स्थिति हो गई है, उसके पीछे उनके पुत्र के साथ हुआ हादसा जिम्मेदार है, मैं उसको भूलते हुए, उससे पहले की उनकी स्थिति की बात करना चाहूँगा|

मुझे अक्सर यह खयाल आता है कि यदि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने समकालीन विद्वद-जनों के अनुमोदन की प्रतीक्षा की होती तो क्या वे ऐसे अमर ग्रंथ दे पाते, सच्चाई तो यह है कि उनके समकालीन विद्वानों ने तो उनको मान्यता दी ही नहीं थी|

सच्चाई यह भी है कि मैं और मेरे साथी कविगणों ने संतोषानंद जी को कभी गंभीरता से नहीं लिया था, फिल्मों में सफल होने के बावज़ूद! मुझे याद है कि मैंने अपने संस्थान में उनको एक कवि सम्मेलन में आमंत्रित किया था क्योंकि मेरे बॉस उनके फैन थे, और मेरे बॉस कोई कवि नहीं थे, बहरहाल मैंने संतोषानंद जी को आमंत्रित किया, जिस कवि सम्मेलन का संचालन- श्रीकृष्ण तिवारी जी कर रहे थे और कई साहित्यिक रूप से मान्यता प्राप्त कवि उसमें शामिल थे|

उस कवि सम्मेलन में भी कुछ आत्म मुग्ध कवियों ने संतोषानंद जी को उचित सम्मान नहीं दिया, और उस समय तो संतोषानंद जी भी सफलता के नशे में चूर थे और बोले कि मंच पर बैठे सभी कवि मुझसे जलते हैं, क्योंकि ये लोग मेरी तरह सफल नहीं हो पाए|

उस समय उनका यह कथन मुझे अहंकार से भरा लगा, लेकिन मुझे अब लगता है कि इसमें मठाधीशों से मान्यता न मिलने का उनका दर्द शामिल था| सामान्य जन को आपके साहित्यिक मानदंडों से मतलब नहीं है| जो बात दिल से निकलकर दिल तक पहुँचती है, वही वास्तविक रचना है –

एक प्यार का नग़मा है, मौजों की रवानी है,
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है|

कवि ने कुछ कहा, लोगों के दिल तक पहुँच गया, और चमत्कार हो गया| आप सोचते रहिए लोगों को क्या पसंद आया, क्यों पसंद आया!
फिर यही बात होती है- ‘उतर-दखिन के पंडिता, रहे विचार-विचार

ध्यान से सोचता हूँ तो खयाल आता है, कि संतोषानंद जी ने कितने सहज तरीके से ये बड़ी बातें कह दी हैं-

कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है
जीवन का मतलब तो, आना और जाना है|

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दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है|
आदि-आदि|

उनके अनेक गीत ऐसे हैं जिन्होंने लोगों के दिलों में अपना स्थान बना लिया है|

आज संतोषानंद जी की आर्थिक स्थित, उनकी रुग्णता और उनके बेटे के साथ हुए गंभीर हादसे के कारण बहुत खराब है, लेकिन मन है कि उनकी रचनाशीलता को प्रणाम करूं और उनका जीवन सुख से व्यतीत होने की कामना करूं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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