जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल!

आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का एक बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, और इस गीत के माध्यम से ही मैं मुकेश जी, राज कपूर साहब और मजरूह सुल्तानपुरी साहब को भी याद कर रहा हूँ|

यह गीत फिल्म – ‘धरम करम’ से है, जिसमें राज कपूर साहब ने पहली बार अपने बेटे रणधीर कपूर के निर्देशन में काम किया था |

इस गीत का संगीत राहुल देव बर्मन जी ने तैयार किया था और मजरूह सुल्तानपुरी साहब के लिखे इस गीत में जीवन जीने के तरीके के बारे में एक खूबसूरत संदेश भी दिया गया है| लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी के मधुर स्वर में तैयार किया गया यह सुरीला गीत:


इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल,
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत
कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल
इक दिन बिक जायेगा …

ला ला ललल्लल्ला

अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाए
होनी तो फिर भी बिछड़ा यार मिलाए,
ये बिरहा ये दूरी, दो पल की मजबूरी
फिर कोई दिलवाला काहे को घबराये, तरम्पम,
धारा, जो बहती है, बहके रहती है
बहती धारा बन जा, फिर दुनिया से डोल
एक दिन …

परदे के पीछे बैठी साँवल गोरी
थाम के तेरे मेरे मन की डोरी,
ये डोरी ना छूटे, ये बन्धन ना टूटे
भोर होने वाली है अब रैना है थोड़ी, तरम्पम,
सर को झुकाए तू, बैठा क्या है यार
गोरी से नैना जोड़, फिर दुनिया से डोल
एक दिन …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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मेरे सपनों से मगर!

अभी कहीं यह उल्लेख हुआ था कि ‘राइटर्स ब्लॉक’ को तोड़ने के लिए, मतलब कि अगर आप कुछ नया नहीं लिख पा रहे हों, तो आपको अपने कोई स्वप्न याद करने चाहिएं और उनको लिख डालना चाहिए, अब यह फैसला आप बाद में कर सकते हैं कि उसको शेयर करना है या नहीं, हाँ इससे आपका लिखने का ‘मोमेंटम’ फिर से बन जाएगा। यह किसी बड़े लेखक का अपनाया हुआ फार्मूला था।

 

मुझे ऐसे ही खयाल आ रहा कि स्वप्नों के बारे में बात की जाए, जो स्वप्न नींद में आते हैं वो तो मुझे याद नहीं रहते। वैसे भी अब्दुल क़लाम साहब ने कहा कि असली स्वप्न वो नहीं होते जो नींद में आते हैं बल्कि वो होते हैं जो आपको सोने नहीं देते। उन्होंने यह भी कहा है कि ‘छोटे सपने देखना अपराध है’।

फिल्म नगरी में मेरे उस्ताद- स्व. राज कपूर जी तो ‘सपनों का सौदागर’ कहलाते थे।

उनके द्वारा अभिनीत इसी नाम वाली एक फिल्म का गीत भी है-

सपनों का सौदागर आया, ले लो ये सपने ले लो,
तुमसे किस्मत खेल चुकी, अब तुम किस्मत से खेलो।
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ये रंग-बिरंगे सपने, ये जीवन के उजियारे,
ये तनहाई के साथी, ये भीड़ में संग-सहारे,
ये ढलती रात के सूरज, ये जगती आंख के तारे।
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जैसा मुझे याद है लिख दिया, इस तरह की बहुत सारी खूबियां सपनों की इस गीत में बताई गई हैं।

एक शेर याद आ रहा है दुष्यंत कुमार जी के गज़ल संकलन ‘साये में धूप’ से जो उन्होंने आपात्काल में लिखा था, जब एक प्रकार से सपने देखना भी अपराध हो गया था। यह शेर है-

लेकर फिरे है ज़ेहन में जाने कहाँ के ख्वाब,
इस सिरफिरे की जामा-तलाशी तो लीजिए।

जितने लोग अपने समय से आगे सोचने वाले रहे हैं, वे अपनी-अपनी तरह से आगे के बारे में सोचते रहे हैं, स्वप्न देखते रहे हैं। वो प्लेटो हों या सुकरात हों, स्वामी विवेकानंद हों या आधुनिक समय में गांधी जी ही क्यों न रहे हों। उनसे लोग चमत्कृत भले ही होते रहे हों, लेकिन लोगों ने उनका अनुसरण बहुत कम किया है।

वैसे फिल्मी गीतों की बात की जाए तो वहाँ सपनों को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया, बहुत सारी मिसाल मिल जाएंगी, मैं यहाँ एक ही दे रहा हूँ, ये देखिए-

हम आपको ख्वाबों में आ-आ के सताएंगे।

और जवाब है-

हम आपकी आंखों से नींदें ही उड़ा दें तो!

सपनों के बारे में बातें बहुत हो सकती हैं, मूड होगा तो आगे करूंगा, आज अंत में डॉ. कुंवर बेचैन जी की पंक्तियां दोहरा देता हूँ-

विरहिन की मांग सितारे नहीं संजो सकते,
प्रेम के सूत्र नज़ारे नहीं पिरो सकते,
मेरी कुटिया से माना कि महल ऊंचे हैं,
मेरे सपनों से मगर ऊंचे नहीं हो सकते।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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संगीत की देवी स्वर-सजनी!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

 

 

ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है,
ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है,
भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में
इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं, कुछ और भी है।

 

तुम अगर नाज़ उठाओ तो, ये हक़ है तुमको
मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।

 

आज हक़ीकत और कल्पना पर आधारित कुछ फिल्मी गीतों के बारे में बात करते हैं। ऊपर जिस गीत के बोल लिखे गए हैं, वह हक़ीकत के बोझ से दबे, ज़िम्मेदार शायर के बोल हैं, जो देखता है कि दुनिया में इतने दुख हैं, ऐसे में कैसे किसी एक के प्यार में पागल हुआ जाए।

अब कल्पना की धुर उड़ान के बारे में बात कर ली जाए, जहाँ प्रेमी अपने तसव्वुर में इतना पागल है कि सामने जो हक़ीकत है उसको स्वीकार नहीं कर पाता और देखें उसकी कल्पना की उड़ान कितनी दूर तक जाती है-

चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल, संगीत की देवी स्वर-सजनी,
सुंदरता की हर मूरत से, बढ़कर के है तू सुंदर सजनी।

 

दीवानगी का एक और आलम ये भी है-

 

ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम,
हमसे पूछे बिना दिल में आने लगे,
नीची नज़रों से बिजली गिराने लगे।

 

एक और मिसाल-

मेहताब तेरा चेहरा, एक ख्वाब में देखा था,
ऐ जान-ए-जहाँ बतला,
बतला कि तू कौन है।

 

और जवाब-

ख्वाबों में मिले अक्सर,
एक राह चले मिलकर,
फिर भी है यही बेहतर-
मत पूछ मैं कौन हूँ।

 

और इसके बाद फिर हक़ीकत की पथरीली ज़मीन पर आते हैं-

देख उनको जो यहाँ सोते हैं फुटपाथों पर,
लाश भी जिनकी कफन तक न यहाँ पाती है,
पहले उन सबके लिए, एक इमारत गढ़ लूं,
फिर तेरी मांग सितारों से भरी जाएगी।

 

आज के लिए इतना ही!
नमस्कार।

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