तुमने भी अगर देखा है!

क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना,
मेरे महबूब को तुमने भी अगर देखा है|

मजरूह सुल्तानपुरी

मुश्किल से इधर देखा है!

आज इस एक नज़र पर मुझे मर जाने दो,
उसने लोगों बड़ी मुश्किल से इधर देखा है|

मजरूह सुल्तानपुरी

दीदा-ए-तर देखा है!

हम पे हँसती है जो दुनियाँ उसे देखा ही नहीं,
हमने उस शोख को जो दीदा-ए-तर देखा है|

मजरूह सुल्तानपुरी

तुम्हें एक नज़र देखा है!

पहले सौ बार इधर और उधर देखा है,
तब कहीं जा के तुम्हें एक नज़र देखा है|

मजरूह सुल्तानपुरी

गुनहगार की तरह!

‘मजरूह’ लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम,
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह|

मजरूह सुल्तानपुरी   

निगाह-ए-यार की तरह!

वो तो हैं कहीं और मगर दिल के आस पास,
फिरती है कोई शै निगाह-ए-यार की तरह|

मजरूह सुल्तानपुरी

दौलत-ए-बेदार की तरह!

इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है के एक जाम,
हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह|

मजरूह सुल्तानपुरी

हर निगाह ख़रीदार की तरह!

हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह,
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह|

मजरूह सुल्तानपुरी

उठेगी तुम्हारी नज़र धीरे-धीरे!

आज स्वर्गीय मजरूह सुल्तानपुरी साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
यह गीत 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘एक राज़’ के लिए लता मंगेशकर जी ने अपने सुमधुर स्वर में गाया था| इसका मधुर संगीत तैयार किया था चित्रगुप्त जी ने|

लीजिए प्रस्तुत है, मजरूह साहब का लिखा और स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी का गाया यह भावपूर्ण गीत-

उठेगी तुम्हारी नज़र धीरे-धीरे,
मुहब्बत करेगी असर धीरे-धीरे|

ये माना ख़लिश है अभी हल्की-हल्की
ख़बर भी नहीं है तुम को मेरे दर्द-ए-दिल की
ख़बर हो रहेगी मगर धीरे-धीरे
उठेगी तुम्हारी नज़र …

मिलेगा जो कोई हसीं चुपके-चुपके
मेरी याद आ जाएगी वहीं चुपके-चुपके
सताएगा दर्द-ए-जिगर धीरे-धीरे
उठेगी तुम्हारी नज़र …

सुलगते हैं कब से इसी चाह में हम
पड़े हैं निगाहें डाले इसी राह में हम
कि आओगे तुम भी इधर धीरे-धीरे
उठेगी तुम्हारी नज़र …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल!

आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का एक बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, और इस गीत के माध्यम से ही मैं मुकेश जी, राज कपूर साहब और मजरूह सुल्तानपुरी साहब को भी याद कर रहा हूँ|

यह गीत फिल्म – ‘धरम करम’ से है, जिसमें राज कपूर साहब ने पहली बार अपने बेटे रणधीर कपूर के निर्देशन में काम किया था |

इस गीत का संगीत राहुल देव बर्मन जी ने तैयार किया था और मजरूह सुल्तानपुरी साहब के लिखे इस गीत में जीवन जीने के तरीके के बारे में एक खूबसूरत संदेश भी दिया गया है| लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी के मधुर स्वर में तैयार किया गया यह सुरीला गीत:


इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल,
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत
कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल
इक दिन बिक जायेगा …

ला ला ललल्लल्ला

अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाए
होनी तो फिर भी बिछड़ा यार मिलाए,
ये बिरहा ये दूरी, दो पल की मजबूरी
फिर कोई दिलवाला काहे को घबराये, तरम्पम,
धारा, जो बहती है, बहके रहती है
बहती धारा बन जा, फिर दुनिया से डोल
एक दिन …

परदे के पीछे बैठी साँवल गोरी
थाम के तेरे मेरे मन की डोरी,
ये डोरी ना छूटे, ये बन्धन ना टूटे
भोर होने वाली है अब रैना है थोड़ी, तरम्पम,
सर को झुकाए तू, बैठा क्या है यार
गोरी से नैना जोड़, फिर दुनिया से डोल
एक दिन …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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