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ओर छोर छप्पर का टपके!

आज वरिष्ठ कवि और बहुत अच्छे इंसान- श्री सत्यनारायण जी के बारे में कुछ बात करूंगा, जो एक श्रेष्ठ कवि हैं, पटना में रहते हैं, शत्रुघ्न सिन्हा जी के मित्र और पड़ौसी हैं और सबसे बड़ी बात कि साहित्यिक गरिमा के साथ कवि सम्मेलन का श्रेष्ठ संचालन करते हैं|

पहली बार मैंने उनके संचालन में हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के झारखंड क्षेत्र स्थित कॉम्प्लेक्स में कवि सम्मेलन सुना था, तब से मेरा उनको पुनः संचालन एवं कविता पाठ हेतु बुलाने का मन था| एनटीपीसी की विंध्याचल परियोजना में उनको बुलाने का अवसर मिला|

एक बात और उस समय आज जैसी इंटरनेट, मोबाइल आदि की सुविधाएं नहीं थी और मैं अक्सर कवियों के घर पर ही आमंत्रित करने के लिए जाता था| इस प्रकार मुझे अन्य अनेक लोगों के अलावा नीरज जी, मुंबई में व्यंग्यकार- शरद जोशी जी आदि के घर भी जाने का अवसर मिला|

श्री सत्यनारायण जी के ‘कदम कुआं’ स्थित आवास पर भी मैं गया था और शत्रुघ्न सिन्हा का पड़ौस भी देख लिया था| वैसे सत्यनारायण जी ने शत्रुघ्न सिन्हा की किसी फिल्म, शायद- ‘काला पत्थर’ में गीत भी लिखे हैं|

उनकी कविता शेयर करने से पहले एक दो संस्मरण और- मैं पटना एक बार घूमने गया था तब सत्यनारायण जी से, जिस होटल में मैं रुका था वहाँ मुलाकात हुई थी| हमने काफी लंबी बैठक की थी, और मैंने उनको जगजीत सिंह जी की गायी हुई ग़ज़ल सुनाई थी, जिसको उन्होंने बहुत सराहा था, उस समय मुझे भी यह नहीं मालूम था कि वह निदा फ़ाज़ली साहब की लिखी हुई है और उन्होंने तो तब तक उसे सुना ही नहीं था, लेकिन सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए थे और बोले थे कि निश्चित रूप से किसी बहुत अच्छे कवि-शायर ने इसे लिखा होगा| यह ग़ज़ल थी- ‘गरज बरस प्यासी धरती को फिर पानी दे मौला’|

मिलने पर वे यही बोलते थे कि कवि सम्मेलन तो चलते रहते हैं, इस बहाने हम लोग आपस में मिल लेते हैं, ये बड़ी बात है|

अब उनकी कविता शेयर करने से पहले एक बात और कहूँगा ऊंचाहार के कवि सम्मेलन में नीरज जी भी थे और उन्होंने सत्यनारायण जी के संचालन और उनके काव्य-पाठ की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी|

मैं 2010 में एनटीपीसी से रिटायर हो गया था, उससे पहले ही सत्यनारायण जी से मुलाकात हुई थी, कामना करता हूँ कि वे स्वस्थ एवं प्रसन्न हों| उनका नवगीत संकलन है – ‘सभाध्यक्ष हँस रहा है’|

अब प्रस्तुत है उनका एक नवगीत-

सूने घर में
कोने-कोने
मकड़ी बुनती जाल

अम्मा बिन
आँगन सूना है
बाबा बिन दालान,
चिट्ठी आई है
बहिना की
साँसत में है जान,
नित-नित

नए तगादे भेजे
बहिना की ससुराल ।


भ‍इया तो
परदेश विराजे
कौन करे अब चेत,
साहू के खाते में
बंधक है
बीघा भर खेत,
शायद
कुर्की ज़ब्ती भी
हो जाए अगले साल ।


ओर छोर
छप्पर का टपके
उनके काली रात,
शायद अबकी
झेल न पाए
भादों की बरसात
पुरखों की
यह एक निशानी
किसे सुनाए हाल ।


फिर भी
एक दिया जलता है
जब साँझी के नाम,
लगता
कोई पथ जोहे
खिड़की के पल्ले थाम,
बड़ी-बड़ी दो आँखें
पूछें
फिर-फिर वही सवाल ।


सूने घर में
कोने-कोने
मकड़ी बुनती जाल ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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अभिनंदन के शाल-दुशाले!

स्वर्गीय भाई किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए और उनके एक गीत का सहारा लेते हुए कुछ बातें कहना चाहूँगा| यह गीत मैंने पहले भी एक से अधिक बार शेयर किया है, आज इसका सहारा लेकर कुछ बातें कहने का मन है|

किशन जी से कवि सम्मेलनों के सिलसिले में कुछ बार भेंट हुई और उस सहृदय इंसान को थोड़ा बहुत निकट से जानने का अवसर मिला| वैसे मैं आयोजनों के सिलसिले में जिन कवियों से मिला, केवल आयोजक के रूप में मिला’ कवि के रूप में नहीं|

हां तो आज जिस गीत के बहाने मैं बात करना चाहूंगा उसका मुखड़ा इस प्रकार है-

नागफनी आंचल में बांध सको तब आना,
धागों बिंधे गुलाब हमारे पास नहीं|


कवि सम्मेलन के मंच पर कविगण, इस उम्मीद के साथ आते हैं कि सामने बैठे श्रोताओं के मन में स्थान बना सकें और प्रशंसा प्राप्त कर लें| लेकिन मैंने मंचों पर अक्सर देखा है कि किशन जी, सोम ठाकुर आदि को श्रोतागण शांत रहकर सुन लें, यही बड़ी बात है| जो लोग ‘वाह’ करते हैं, विशाल भीड़ में उनकी नगण्य संख्या के कारण वह इतनी धीमी होती है कि मंच तक नहीं पहुँचती|

चलिए इस गीत का पहला अंतरा प्रस्तुत कर रहा हूँ-

हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोये, आधे जागे,
थोड़े सुख के लिये उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे,
कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित,
इसका सही हिसाब, हमारे पास नहीं।


मैं यह भी बताना चाहूँगा कि सोम ठाकुर जी और किशन सरोज जी में एक दूसरे के प्रति बहुत गहरा सम्मान का भाव रहा है| मुझे याद है एक बार सोम जी कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे थे और उन्होंने किशन सरोज जी को एक गीत के लिए आमंत्रित किया- ‘वो देखो कुहरे में चंदन वन डूब गया’, यह गीत श्रोता समुदाय सामान्यतः पचा नहीं पाता, लेकिन इससे पहले सोम जी ने जो भूमिका बांधी, और अंत में कहा इसको आप एक डाक्यूमेंट्री की तरह महसूस कीजिए, और इसके बाद श्रोताओं ने उस गीत का भरपूर आनंद लिया|

वास्तव में कवि, विशेष रूप से भावुकता से भरे गीतकार, इतने संवेदनशील होते हैं कि उनको उपेक्षित होने पर बहुत चोट लगती है| लोगों के दिल तक पहुँचने के लिए वे क्या-क्या प्रयास नहीं करते, परंतु अक्सर सही वातावरण नहीं मिलता| आज के गीत का दूसरा छंद प्रस्तुत है-

हमने व्यथा अनमनी बेची,
तन की ज्योति कंचनी बेची,
कुछ न मिला तो अंधियारों को,
मिट्टी मोल चांदनी बेची।
गीत रचे जो हमने उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं।


कवि के पास इसके अलावा और क्या है, सब कुछ वह अपने पाठक / श्रोता के लिए समर्पित कर देता है, लेकिन उसके बाद भी जब अपमान और उपेक्षा मिलती है, तब उसका दिल टूट जाता है| रमानाथ अवस्थी जी अक्सर कहते थे कि मैं तो यही चाहूँगा कि मैं आपके पास न आऊँ, मेरे गीत ही आपके पास आएं|

मैं भी अक्सर ब्लॉगिंग के माध्यम से प्रयास करता हूँ, कि श्रेष्ठ रचनाएं आपके पास पहुँचें |
एक बात और बहुत से अन्य कवियों की तरह किशन सरोज जी भी पीते काफी थे, बहुत संवेदनशील और नाजुक हृदय वाले व्यक्ति थे, जिनको श्रोताओं की प्रतिक्रिया से बहुत फर्क पड़ता था| वो बोलते थे कि पीने के बाद श्रोताओं को ‘फेस’ करने की हिम्मत आ जाती है| लेकिन कविता में बेइमानी उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं थी| लीजिए यह छंद प्रस्तुत है-

झिलमिल करतीं मधुशालाएँ,
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ,
घड़ी-घड़ी हर घूँट-घूँट हम,
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ,
पीकर जिसको चित्र तुम्हारा धुंधला जाए,
इतनी कड़ी शराब, हमारे पास नहीं।


और अंत में यही कि ईमानदार कवि अपनी रचना में अपना सब कुछ समर्पित कर देता है और यह अपेक्षा करता है कि श्रोता / पाठक दिल से उसकी रचनाओं के साथ हों| इसकी उम्मीद सामान्य श्रोताओं/पाठकों से ज्यादा होती है, क्योंकि कविगण तो अक्सर इतने आत्म-मुग्ध होते हैं, कि वे दूसरों को आशीर्वाद ही देने की मुद्रा में रहते हैं, प्रशंसा नहीं| ऐसा कवि सम्मेलन में उनके नेपथ्य संवाद से भी समझा जा सकता है|

आखर-आखर दीपक बाले,
खोले हमने मन के ताले,
तुम बिन हमें न भाए पल भर,
अभिनन्दन के शाल-दुशाले,
अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, ये मत पूछो,
कोई अभी जवाब, हमारे पास नहीं।


इस बहाने मैंने आज एक बार फिर स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह लाजवाब गीत शेयर कर लिया आशा है यह सामान्य पाठकों को तो पसंद आएगा|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

यह उस समय की एक पोस्ट है जब मैं अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों, सेवा स्थलों के अनुभवों के बारे में लिख रहा था| ये सभी पुरानी ब्लॉग पोस्ट आप कभी फुर्सत में पढ़ सकते हैं, इनमें श्रेष्ठ कवियों की रचनाएँ भी शामिल हैं|

लगभग ढाई वर्ष के लखनऊ प्रवास और सात वर्ष के ऊंचाहार प्रवास की कुछ छिटपुट घटनाएं याद करने का प्रयास करता हूँ।

एक घटना जो याद आ रही है, वह है लखनऊ के पिकप प्रेक्षागृह में आयोजित कवि सम्मेलन, जिसमें श्री सोम ठाकुर, माणिक वर्मा जी, पं. चंद्रशेखर मिश्र, ओम प्रकाश आदित्य जी आदि के अलावा डॉ. वसीम बरेलवी भी शामिल हुए थे।

इस आयोजन के समय पं. चंद्र शेखर मिश्र जी से काफी विस्तार से बातचीत हुई थी और कुछ समय बाद ही शायद उनका देहांत भी हो गया था। मुझे वाराणसी में अस्सी घाट के निकट उनके आवास पर जाने का भी अवसर मिला था। बहुत श्रेष्ठ रचनाकार थे और विशेष रूप से भोजपुरी साहित्य को उनकी भेंट अतुल्य है। ओम प्रकाश आदित्य जी और माणिक वर्मा जी तो इसके बाद भी हमारे एक-दो आयोजनों में ऊंचाहार आए थे। हास्य-व्यंग्य में जिस गरिमा को उन्होंने बनाए रखा, वह बेमिसाल है। आज वे भी हमारे बीच नहीं हैं, उनको मेरी विनम्र श्रंद्धांजलि।

इस आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में डॉ. वसीम बरेलवी की शायरी और श्री सोम ठाकुर जी का काव्य पाठ रहे थे। मुझे आज भी याद है सोम जी ने जब इस आयोजन में अपने गीत ‘ये प्याला प्रेम का प्याला है’ का पाठ किया था तब श्रोता मदमस्त हो गए थे।

मुझे ऊंचाहार के लिए एक आयोजन निश्चित करने का प्रसंग याद आ रहा है। भोजपुरी अभिनेता और गायक (जो अभी राजनेता बन गए हैं) श्री मनोज तिवारी का कार्यक्रम निश्चित करना था। जैसा कि एनटीपीसी में होता है, इसके लिए मानव संसाधन, वित्त और शायद क्रय विभाग के सदस्यों को शामिल करते हुए एक कमेटी बनाई गई। सुल्तानपुर में रामलीला के मंच पर, श्री मनोज तिवारी का कार्यक्रम था, यह निश्चित हुआ कि वहाँ जाकर ही हम उनसे बात करेंगे।

इसमें कोई संदेह नहीं कि श्री मनोज तिवारी बहुत लोकप्रिय जन-गायक रहे हैं। यह निश्चित हुआ कि वे कार्यक्रम के बाद चुपचाप अपनी जीप में एक देहाती टाइप रेस्टोरेंट में आ जाएंगे और हम लोग वहीं उनसे मिलकर बात कर लेंगे। इस प्रकार हम लोग कुछ उसी अंदाज में उस रात मिले, जैसे फिल्मों में गैंग्स्टर मिलते हैं। फर्क इतना है कि हमारे हाथों में बंदूकों की जगह कागज़-कलम थे।
बाद में तिवारी जी ने यह भी बताया कि फिल्मों में जाने से पहले वे भी ओएनजीसी में हिंदी अनुवादक के रूप में कार्य करते थे। खैर यह कार्यक्रम भी अन्य कार्यक्रमों की तरह अत्यंत सफल रहा।

अंत में सोम ठाकुर जी की एक श्रेष्ठ रचना प्रस्तुत है, जिसमें बताया गया है कि अमर तो कवि-कलाकार ही होते हैं, क्योंकि वे हमारे दिलों पर राज करते हैं-

यूं दिये पर हर इक रात भारी रही, रोशनी के लिए जंग जारी रही
हम कि जो रात में भोर बोये रहे, सीप में मोतियों को संजोए रहे।


क्या करें हम समंदर के विस्तार का, जिसके पानी की हर बूंद खारी रही।


वक्त का जो हर इक पल भुनाते रहे, जो सदा जग-सुहाती सुनाते रहे,
वो हैं शामिल ज़हीनों की फेहरिस्त में, सरफिरों में हमारी शुमारी रही।


लोग थे जो ज़माने पे छाए रहे, जिनके घर सत्य भी सिर झुकाए रहे।
उनके पर्चम भले ही किलों पर रहे, पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही।


वक्त के वो कदम चूमकर क्या करे, राजधानी में वो घूमकर क्या करे।
वो किसी शाह के घर मिलेगा नहीं, सोम की तो फक़ीरों से यारी रही।


फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।

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आना-जाना रहे, रहे ना रहे!

आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग,जो मेरे लिए अविस्मरणीय है।


दिल्ली में सरकारी सेवा के दौरान ही मैंने स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की एक और परीक्षा दी, जो हिंदी अनुवादक के पद पर चयन के लिए थी। इस परीक्षा में मैं सफल हुआ और उसके आधार पर ही आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक पद के लिए मेरा चयन हुआ।
इस परीक्षा के प्रश्न-पत्र का एक प्रश्न मुझे आज तक याद है। प्रश्न शायद‌ था ‘लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र’। इस प्रश्न के उत्तर में मैंने एच.जी.वेल्स के विज्ञान आधारित उपन्यास ‘द आइलैंड ऑफ डॉ. मोया’ का उदाहरण देते हुए इसकी व्याख्या की थी। मैंने लिखा था कि जैसे कि यह माना जाता है कि हमारे पूर्वज बंदर थे और विकसित होते-होते आज के मानव का परिष्कृत रूप सामने आया है।

उपर्युक्त उपन्यास के आधार पर मैंने लिखा था कि डॉ. मोया इसमें विभिन्न प्रजातियों के जानवरों को लाकर एक द्वीप पर रखते हैं और उनको इंसान की तरह व्यवहार करना सिखाते हैं। किस तरह उठना-बैठना है, किस तरह खाना-पीना है। इस प्रकार सभी जानवर इंसान जैसा व्यवहार करने लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती है, उनको अनुशासित रखना मुश्किल होता जाता है, जहाँ मौका मिलता है, कुत्ता जीभ निकालकर उसी तरह पानी पीने लगता है, जैसे पहले पीता था, हिंसक जानवरों की मूल प्रवृत्ति वापस लौटने लगती है और डॉ. मोया वहाँ से अपनी जान बचाकर भागते हैं।


उपर्युक्त उदाहरण देकर मैंने यह लिखा था कि यह माना जाता है कि हम पशु से विकसित होकर मनुष्य बने थे लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती जा रही है, हमारे अंदर की पाशविक प्रवृत्ति पुनः पनपने लगी है।

खैर, जो भी हो मैं परीक्षा में सफल हुआ और आकाशवाणी, जयपुर में मेरी हिंदी अनुवादक के पद पर नियुक्ति हुई। उद्योग मंत्रालय तथा संसदीय राजभाषा समिति में 6 वर्ष सेवा करने के बाद 30 सितंबर,1980 की रात में मैंने दिल्ली छोड़ी और 1 अक्तूबर को आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण किया।

जयपुर के साहित्यिक मित्रों और वहाँ के परिदृश्य के संबंध में, मैं शुरू के ही एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ, कुछ और बातें, जो पहले नहीं कह पाया था अब कहूंगा।

आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था और मेरी मित्रता वहाँ कार्यक्रम विभाग के लोगों से अधिक थी।


प्रशासन शाखा में, मेरे सामने बैठते थे- श्री राम चंद्र बैरवा, जो हेड क्लर्क थे, कार्यक्रम विभाग के सभी लोगों की फाइलें, सर्विस-बुक आदि उनके पास ही आती थीं और वो पूरा समय इस बात को लेकर कुढ़ते रहते थे कि कार्यक्रम विभाग के लोगों को कितनी अधिक तनख्वाह मिलती है।


मेरे बगल में श्री राम प्रताप बैरवा थे, जो क्लर्क थे और बाहरी कलाकारों को अन्य केंद्रों पर प्रोग्राम आदि के अनुबंध वही जारी करते थे अतः कलाकार उनके पास आते रहते थे। मुझे याद है कि उनके पास आने पर मैंने ज़नाब अहमद हुसैन, मुहम्मद हुसैन के साथ अनेक बार चाय पी है।

आकाशवाणी के बाहर ही एम. आई. रोड पर एक चाय की दुकान थी और अक्सर ऐसा होता था कि हेड क्लर्क महोदय किसी एक के साथ चाय पीकर वापस लौटते थे और किसी दूसरे के साथ वापस चले जाते थे।

आकाशवाणी में एक उद्घोषक थे, नाम याद नहीं आ रहा है, उन्होंने अपने कमरे में यह शेर लिखकर लगाया हुआ था-

हर दौर में हम हाफिज़-ए-किरदार रहेंगे
खुद्दार थे, खुद्दार हैं, खुद्दार रहेंगे।


वैसे पता नहीं वो खुद्दारी का मतलब क्या समझते थे, क्योंकि उनका सबसे झगड़ा रहता था।
एक और मित्र थे, कार्यक्रम विभाग में- श्री बैजनाथ गौतम, जो ईसुरी के प्रसिद्ध लोकगीत बड़े मन से गाते थे. जैसे-

हम खें जुगनिया बना गए, अपुन जोगी हो गए राजा।
दस दरवाज़ों का महल बना गए,
ताही में पिंजरा टंगा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।

पिंजरे में तोता और मैना बिठा गए,
बोली अनेकों रटा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।


शायद ईसुरी के लोकगीत के आधार पर ही राज कपूर जी ने अपनी फिल्म में यह गीत रखा था-

रंगमहल के दस दरवाजे,
ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी,
सैंया निकस गए, मैं ना लड़ी थी।


तीन साल के जयपुर प्रवास में जहाँ मैंने हिंदी में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की, वहीं केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के तीन माह के प्रशिक्षण में प्रथम स्थान प्राप्त करके, डा. कर्ण सिंह जी के कर कमलों से सिल्वर मैडल भी प्राप्त किया। इस प्रशिक्षण के प्रतिभागियों में मैं बहुत जूनियर था तथा यह मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी और यह मैडल बाद में मेरे काफी काम आया।

जयपुर प्रवास के दौरान हम तीन मकानों में बहुत थोड़ी अवधि के लिए और एक मकान में लंबे समय रहे, जिसमें टीन की छत थी, लेकिन हमारे मकान मालिक का प्रेम ऐसा था कि हम उसे छोड़ ही नहीं पाते थे। इस मकान में जाने की कहानी भी विशेष थी, हम यह मकान देख चुके थे लेकिन टीन की छत होने के कारण जाना नहीं चाहते थे। हमने एक मकान पसंद करके, पहला मकान छोड़ दिया और हम अपना घर का सामान, जो कि उस समय एक ठेले पर ही आ गया था, साथ लेकर नए मकान की ओर चल दिए, जिसके बारे में एक दिन पहले ही बात हो चुकी थी। लेकिन उस लालची आदमी को हमारे बाद शायद किसी ने ज्यादा पैसे ऑफर कर दिए और उसने वह मकान उसको दे दिया।


अब हम, ठेले पर अपने सामान के साथ सड़क पर थे, तब हम अचानक टीन की छत वाले इस मकान पर गए और उन्होंने हमारा भरपूर स्वागत किया। मेरे मकान मालिक मुझे भाई साहब कहते थे और मेरी पत्नी को बेटी कहते थे। जयपुर प्रवास का अधिकतम समय हमने इसी घर में बिताया।

अब अंत में श्री बलबीर सिंह रंग जी के एक दो शेर याद आ रहे हैं –

आब-ओ-दाना रहे, रहे ना रहे
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे।

हमने गुलशन की खैर मांगी है,
आशियाना रहे, रहे ना रहे।


फिलहाल इतना ही, नमस्कार।
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मोह मोह के धागे!

आज अपने एक मित्र और सहकर्मी के प्रसंग में बात करना चाहूँगा| ये मेरे साथी मेरे बॉस थे, परंतु उनसे बात करते हुए मुझे कभी यह लगा ही नहीं कि वो मेरे बॉस थे| वैसे इस तरह का अनुभव मेरा बहुत से लोगों के साथ रहा है, परंतु उन सबमें शायद ये सबसे सज्जन व्यक्ति थे|

लीजिए मैं उनका सरनेम बता देता हूँ- मिस्टर मूर्ति, हैदराबाद के रहने वाले थे, इतना जान लेने के बाद ही हम अक्सर किसी व्यक्ति को दक्षिण भारतीय अथवा यहाँ तक कि ‘मद्रासी’ भी कह देते हैं|

मूर्ति जी को इस पर सख्त आपत्ति थी, उनको अपनी अलग पहचान बहुत प्यारी थी, वे कहते थे कि वे मध्य भारत से हैं| एक-दो बार तो हमारी कंपनी के उच्च पदाधिकारियों ने उन पर एहसान जताते हुए उनका चेन्नई अथवा केरल स्थानांतरण करने का प्रस्ताव किया| उनका कहना था कि जहां वे मेरे साथ तैनात थे, उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में, वहाँ से अपने घर जाना उनके लिए ज्यादा आसान है, बनिस्बत केरल अथवा चेन्नई के अनेक इलाकों से वहाँ जाने के!

खैर मैं और मूर्ति जी हमउम्र भी थे और मैनेजमेंट द्वारा समान रूप से सताए गए भी| हम अक्सर अपने मन की बात खुलकर किया करते थे| हाँ मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम दोनों समान रूप से संवेदनशील भी थे| एक प्रसंग उनका बताया हुआ याद आ रहा है, कुल मिलाकर एक दृश्य है इस घटना में!

मूर्ति जी विशुद्ध रूप से शाकाहारी थे, मेरी ही तरह और उनके घर में उन्होंने किसी समय एक श्वान अथवा ‘डॉगी’ भी पाला हुआ था, दूसरा नाम लेने पर मुझे घर में डांट पड़ सकती है, वो तो बेचारे सड़क पर हुआ करते हैं| हाँ तो उनका यह डॉगी, नस्ल मुझे याद नहीं, उन्होंने बताई तो थी, ऐसे आकार का था, जैसा कोई घोड़े का बच्चा होता है| वे उसको घर पर सब्जियाँ आदि ही खिलाते थे, और वह उनको ही खाता था|

अब यह पता नहीं कि मूर्ति जी ने कब और कैसे यह डॉगी रख लिया था क्योंकि उनकी धर्मपत्नी को इस प्रजाति से बिल्कुल प्रेम नहीं था| जैसे-तैसे मूर्ति जी का प्रेम उसके प्रवास को खींचता रहा लेकिन अंत में संभवतः डॉगी को दूर करने की अपनी मांग के लिए उनकी धर्मपत्नी को, ऐसा मजबूत आधार मिल गया कि डॉगी को अब विदा किया ही  जाए, और अंततः मूर्ति जी उसको शायद उसी तरह जंगल में छोड़कर आ गए, जैसे शायद लक्ष्मण जी सीता-माता को वन में छोड़कर आए होंगे|

मैंने बताया था कि यह प्रसंग एक क्षण का, अथवा कहें कि एक दृश्य का है| जैसा अभी तक हुआ वह तो बहुत बार हो चुका होगा शायद! मूर्ति जी भी धीरे-धीरे इसको भूल रहे थे| तभी की बात है कि कार द्वारा कहीं जाते समय वे एक सिग्नल पर रुके और कुछ सोच रहे थे, तभी उनको अपने गाल पर कुछ गीला स्पर्श महसूस हुआ, देखा तो उनका वही पुराना डॉगी, उसकी ऊंचाई तो अच्छी थी ही, उसने कार की विंडो में मुंह डालकर उनका मुंह चूम लिया था|

इस प्रसंग में, वास्तव में मुझे याद करते ही आँखों में आँसू आ जाते हैं, लेकिन यह संतोष की बात है कि वह डॉगी अपने नए परिवेश में ठीक से एडजस्ट हो गया था, हम ऐसे ही सोचते हैं, ऊपर वाला भी तो है ना सभी प्राणियों की रक्षा करने के लिए|  

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

चलिए पुराने पन्ने पलटते हुए, एक क़दम और आगे बढ़ते हैं।
आज फिर से जीवन का एक पुराना पृष्ठ, कुछ पुरानी यादें, एक पुराना ब्लॉग!


जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं।


एक और बात हम दिल्ली से जयपुर ट्रेन में बैठकर चले गए थे, एक दो अटैची साथ लेकर, कोई और लगेज नहीं था हमारे साथ। जो सामान हमारा छूटा, घरेलू सामान थोड़ा बहुत मां के पास रहा, बाकी 50-60 किलो तो रहा ही होगा, किताबों और पत्रिकाओं के रूप में। पत्रिकाओं में सबसे बड़ा भाग था सारिका के अंक, जिनमें बहुत से कथा- ऋषि विशेषांक भी थे, जिनमें दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखकों की रचनाएं शामिल थीं।
पता नहीं क्यों मुझे एक पाकिस्तानी लेखक की रचना याद आ रही है, जो ऐसे ही एक अंक में छपी थी। कहानी संक्षेप में यहाँ दोहरा देता हूँ-
महानगर पालिका में बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है। काफी लंबी बहस के बाद फैसला हुआ कि इन लोगों को नगर की सीमा के बाहर बसा दिया जाए। ऐसा ही किया गया, पहले वहाँ एक पान वाले ने अपनी दुकान खोली, चाय वाला आया, फिर कुछ और दुकानें खुलीं।


दस साल बाद, महानगर पालिका में फिर से बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है!


खैर, ये तो मुझे याद आया और मैंने संक्षेप में कहानी शेयर कर ली। मैं बता यह रहा था कि हम अपना साहित्य भंडार वकील साहब के यहाँ छोड़ आए, जो मेरे बड़े भाई लगते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक इस अमानत की बंधी हुई पोटलियों को संभालकर रखा, बाद में चूहों में साहित्य पिपासा कुछ अधिक जाग गई तो उन्होंने यह सब लायब्रेरी में दे दिया।


दिल्ली के जो महत्वपूर्ण वृतांत छूट गए, उनमें एक यह भी है कि हमने बच्चों की एक पत्रिका ‘कलरव’ के कुछ अंक भी प्रकाशित किए थे। दिल्ली प्रेस में मेरे एक साथी थे- श्री रमेश राणा, जिनको मेरी साहित्यिक प्रतिभा में कुछ ज्यादा ही विश्वास था, उन्होंने यह प्रस्ताव रखा। इसमें संपादन की ज़िम्मेदारी मेरी थी, बाकी सब उनके जिम्मे था। मैं सामग्री का चयन करता था और ‘नन्हे नागरिक से’ शीर्षक से संपादकीय भी लिखता था। यह संपादकीय सबसे सुरक्षित था, क्योंकि नन्हे पाठकों से कोई शिकायत मिलने की गुंजाइश नहीं थी। श्री बालकवि वैरागी ने इस पत्रिका के लिए कई रचनाएं भेजीं और उपयोगी सुझाव भी दिए।


अब याद नहीं कि इस पत्रिका के कितने अंक छपे थे और इस प्रयास में कितना आर्थिक नुकसान हुआ ये तो भाई रमेश राणा ही जानते होंगे क्योंकि मेरा तो एक धेला भी खर्च नहीं हुआ था। बस एक अनुभव था-


किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है,
हम जब थककर रुक जाएंगे, औरों को समझाएंगे।


जयपुर के बाद हम बिहार के संथाल परगना इलाके में गए, जो अब झारखंड में आता है। कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं, जो जैसे समय आता है, मुझे याद आते हैं और मैं शेयर करता जाता हूँ, लेकिन बिहार में कार्यग्रहण का किस्सा ऐसा है, जिसे सुनाने की मुझे भी बेचैनी रहती है, वो सब मैं अगले ब्लॉग में बताऊंगा। (यह पोस्ट मैंने पिछले सप्ताह ही शेयर की है|)


फिलहाल मैं यह बता दूं कि ईश्वर की कृपा से मुझे कभी किसी नौकरी के लिए सिफारिश की ज़रूरत नहीं पड़ी और मैं जब इंटरव्यू देने जाता था तब मैं बता देता था कि मैं यहाँ ज्वाइन करने वाला हूँ। हाँ मैं मुकेश जी का गाया यह भजन भी अक्सर गाता था और गाते-गाते मेरी आंखों में आंसू निकल आते थे-

तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते,
जो निराश हैं उनकी झोली, आशा से भर देते,
अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारका आता,
पांव आंसुओं से धोकर मैं, मन की आग बुझाता,
तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवान, करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते,
नहीं डूबने दाता, नैया पार लगाते,
तुम न सुनोगे तो किसको मैं, अपनी व्यथा सुनाऊं,
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन, और कहाँ मैं जाऊं।
प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


सब कुछ देता है ऊपर वाला, लेकिन फिर-

बहुत दिया देने वाले ने तुझको,
आंचल ही न समाए तो क्या कीजे।



फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।
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यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

अपनी शुरू की ब्लॉग पोस्ट्स में, मैंने अपनी जीवन यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों का ज़िक्र किया था, आज उनमें से ही एक पोस्ट को दोहरा रहा हूँ, क्योंकि इसमें आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक प्यारा सा गीत शामिल है और प्रसंग भी मुझे आशा है कि आपको पसंद आएगा|
जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी आ गया।

इस बीच मेरे दूसरे पुत्र का जन्म जयपुर में हो चुका था। और आगे की यात्रा पर जाने वाले हम चार लोग थे।


मुझे जाना था बिहार के संथाल परगना क्षेत्र में, जो अब झारखंड में आता है। टाटानगर से लगभग 40 कि.मी. दूर है यह इलाका। जाने से पहले ही मैंने अखबार में यह खबर पढ़ी कि वहाँ गैर आदिवासी लोगों को 10 इंच छोटा करने (गर्दन काटने) की घटनाएं हो रही थीं। परम आदरणीय शिबू सोरेन जी का इलाका है वह।


खैर मैं वहाँ पहली बार जा रहा था और इत्तफाक से मुझे कोई सही मार्गदर्शन करने वाला भी नहीं मिला, बल्कि एक सज्जन ने अधूरे ज्ञान के आधार पर मुझे जो बताया वह मुझे बहुत महंगा पड़ सकता था। मैंने वहाँ जाने के लिए टाटानगर एक्सप्रेस पकड़ी, जो बताया गया था कि सुबह 6 बजे पहुंचेगी, लेकिन वह 9 बजे के बाद पहुंची। वहाँ से मुझे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कार्यालय, मऊभंडार जाना था, जहाँ जाने के लिए केवल टेम्पो मिलते हैं, जो सवारियां ठूंसकर भरने पर चलते हैं, और 40 किलोमीटर का वह जंगली रास्ता भी माशाअल्ला था।


खैर रोते-धोते मैं 11 बजे के बाद वहाँ पहुंचा, जबकि उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा वहाँ 10 बजे से प्रारंभ होकर पूरी हो चुकी थी और अब साक्षात्कार होना था। मैंने अपनी परिस्थितियां बताईं और मुझे अनुमति दे दी गई, जबकि अन्य लोगों का साक्षात्कार शुरु हो रहा था, मुझे टेस्ट देने के लिए बिठा दिया गया और अंत में मेरा साक्षात्कार हो गया।

जैसा मैंने बताया था कि केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के प्रशिक्षण के उपरांत मुझे मिला मेडल मेरे काफी काम आया बाकी चयन परीक्षा का निष्पादन तो होगा ही।
बाद में जब मैं गेस्ट हाउस में रुका तो मुझे मालूम हुआ कि प्रत्याशियों में एक ऐसे सज्जन भी शामिल थे, जो केंद्रीय मंत्री रहीं श्रीमती राम दुलारी सिन्हा के पर्सनल स्टॉफ में शामिल रहे थे और वे यह मान रहे थे कि उनका चयन तो कोई रोक नहीं सकता। बाद में मुझे बताया गया कि वहाँ के उप महाप्रबंधक (का. एवं प्रशा.)- श्री राज सिंह निर्वाण ने वहाँ के वरि. प्रबंधक (राजभाषा)- डॉ. राम सेवक गुप्त से कहा था कि वह मिनिस्टर का आदमी है अतः उसका चयन कर लें वरना दिक्कत हो जाएगी। इस पर गुप्ता जी ने कहा था कि आप कर लीजिए, मैं तो उसी को चुनूंगा, जो मुझे ठीक लग रहा है। खैर निर्वाण जी भी गलत काम करना नहीं चाहते थे।


काफी समय बाद जब मैं वहाँ से आ रहा था, तब मुझे वहाँ के सतर्कता प्रभारी ने मुझे वे पत्र दिखाए, जो दो केंद्रीय मंत्रियों- श्री वसंत साठे और श्री एन.के.पी. साल्वे ने मेरी नियुक्ति के विरुद्ध लिखे थे। इन दोनो मंत्रियों ने श्रीमती सिन्हा के स्टाफ में रहे उस व्यक्ति की शिकायत को अग्रेषित किया था। उन सज्जन को भी एक पाइंट यह मिल गया था कि मैं देर से पहुंचा था। खैर इसका मेरे मैडल और निष्पादन का हवाला देते हुए, समुचित उत्तर दे दिया गया था।


हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इस इकाई का नाम इंडियन कॉपर कॉम्प्लेक्स था, जो पहले अंग्रेजो द्वारा चलाई जाती थी और उस समय उसका नाम था- इंडियन कॉपर कार्पोरेशन था। वहाँ की माइंस थीं मुसाबनी माइंस, जो देश की सबसे गहरी ऑपरेशनल खदानें थीं। किसी जमाने में, अंग्रेजों ने यहाँ से तांबे के अलावा बड़ी मात्रा में सोना, चांदी भी निकाले थे। खदानों के मामले में यह लागू होता है कि खदान जितनी गहरी होती जाएगी, खनन की लागत उतनी ही बढ़ती जाएगी। जबकि खदान में तांबे की मात्रा बहुत कम हो गई थी और खनन लागत बढ़ती जा रही थी। कई बार ऐसा लगता था कि स्टाफ को यदि घर बिठाकर पैसा दिया जाए तो घाटा कम होगा, खनन करने पर ज्यादा। खैर कई उपाय अपनाए जा रहे थे वहाँ पर खनन लागत को कम करने के लिए। वैसे अब स्थिति यह है कि, ये खदानें कई वर्ष पहले बंद की जा चुकी हैं।


अंग्रेजों के समय से ही वहाँ की टाउनशिप बनी थी, और उसे लोगों को बांटने की अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही बसाया गया था। ऑफिस के कर्मचारियों को अलग बसाया गया था, उसका नाम था स्टाफ कालोनी, अंग्रेज काफी बड़ी संख्या में नेपालियों को भी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए ले आए थे और उनके लिए नेपाली कालोनी बना दी थी, उनके बच्चों का अब कोई भविष्य नहीं था, वे पूरा दिन जुआ खेलते थे। अंग्रेजों ने कर्मचारियों को बांटकर रखा, उनको अच्छी सुविधाएं दीं लेकिन शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।


हिंदुस्तान कॉपर में आने के बाद यहाँ शिक्षा की सुविधाएं विकसित करने का प्रयास किया गया। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कलकत्ता स्थित मुख्यालय में श्रेष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र कार्यरत थे, उनके एक आशावादी गीत के साथ यह ब्लॉग समाप्त करते हैं, वहाँ के बारे में बाकी बातें बाद में करेंगे-


एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।
सपनों की ओस गूंथती कुस की नोंक है,
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है,
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,
इस अंधेर में कैसे प्रीत का निबाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है,
चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे,
ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


गूंजती गुफाओं में कल की सौगंध है,
हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,
कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे,
पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे…
.


कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,
बंसी की डोर बहुत कांप रही आज है,
यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे,
जाने किस नागिन में प्रीति का उछाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो॥

( पुरइन पात- कमल का पत्ता)


डा. बुद्धिनाथ मिश्र
फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।

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काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी!

कल मैंने अपने एक संस्मरण में, एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अन्य लोगों के साथ स्वर्गीय कुमार शिव जी को भी याद किया था और उनके एक-दो गीतों का उल्लेख किया था| आज उनको श्रद्धांजलि स्वरूप उनका एक पूरा गीत यहाँ दे रहा हूँ| इस गीत में उन्होंने अपनी खुद्दारी की प्रभावी अभिव्यक्ति की है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह गीत –

काले कपड़े पहने हुए
सुबह देखी
देखी हमने अपनी
सालगिरह देखी !

हमको सम्मानित होने का
चाव रहा,
यश की मंडी में पर मंदा
भाव रहा|
हमने चाहा हम भी बनें
विशिष्ट यहाँ,
किन्तु हमेशा व्यर्थ हमारा
दाँव रहा|
किया काँच को काला
सूर्यग्रहण देखा,
और धूप भी हमने
इसी तरह देखी !


हाथ नहीं जोड़े हमने
और नहीं झुके,
पाँव किसी की अगवानी में
नहीं रुके|
इसीलिए जो बैसाखियाँ
लिए निकले,
वो भी हमको मीलों पीछे
छोड़ चुके|
वो पहुँचे यश की
कच्ची मीनारों पर,
स्वाभिमान की हमने
सख़्त सतह देखी !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में!

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट- अपनी शुरू की ब्लॉग-पोस्ट्स में मैंने अपने जीवन के कुछ प्रसंगों, कुछ घटनाओं के बारे में लिखा था। आज जयपुर नगरी से जुड़ा एक बहुत पुराना प्रसंग दोहरा रहा हूँ।

श्रेष्ठ नवगीतकार श्री कुमार शिव जी की मृत्यु का दुखद समाचार मिला, उनकी स्मृति में यह ब्लॉग पोस्ट दुहरा रहा हूँ|

हज़ारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते
है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुख ना झेला।
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला ।


फिलहाल जीवन के एक पड़ाव की बात कर रहा हूँ। मैंने 30 सितंबर,1980 की रात में दिल्ली छोड़ी क्योंकि 1अक्तूबर,1980 को मुझे आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण करना था, हिंदी अनुवादक के रूप में। बहुत पुरानी बात है ना!

इत्तफाक से 2 अक्तूबर,1980 को ही वहाँ, रामनिवास बाग में, प्रगतिशील लेखक सम्मेलन था, शायद प्रेमचंद जी की स्मृतियों को समर्पित था यह सम्मेलंन। यह आयोजन काफी चर्चित हुआ था क्योंकि महादेवी जी इस आयोजन की मुख्य अतिथि थीं और अपने संबोधन में उनका कहना था कि हम जंगली जानवरों के लिए अभयारण्य बना रहे हैं, परंतु मनुष्यों के लिए भय का परिवेश बन रहा है।

महादेवी जी के वक्तव्य पर वहाँ मौज़ूद राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री- जगन्नाथ पहाड़िया नाराज़ हो गए, वो बोले कि ‘महादेवी जी की कवितायें तो कभी भी मेरी समझ में नही आईं, मैं यहाँ साहित्यकारों के लिए कुछ अनुदान की घोषणा करने आया था, अब नहीं करूंगा। सत्ता के नशे में चूर पहाड़िया ये समझ ही नहीं पाए कि महादेवी होने का मतलब क्या है! बाद में काफी दिनों तक इस पर बहस चली और जगन्नाथ पहाड़िया को माफी मांगनी पड़ी थी।

खैर मुझे यह आयोजन किसी और कारण से भी याद है। इस तरह की संस्थाओं पर, विशेष रूप से जिनके साथ ‘प्रगतिशील’ शब्द जुड़ा हो, उन पर सभी जगह कम्युनिस्टों का कब्ज़ा रहा है। उनके लिए किसी का कवि या कहानीकार होना उतना आवश्यक नहीं है, जितना कम्युनिस्ट होना। वैसे मुझे सामान्यतः इस पर कोई खास आपत्ति नही रही है। वहाँ जाने से पहले मैं काफी समय से कवितायें, गीत आदि लिख रहा था और विनम्रतापूर्वक बताना चाहूंगा कि अनेक श्रेष्ठ साहित्यकारों से मुझे प्रशंसा भी प्राप्त हो चुकी थी।

जयपुर जाते ही क्योंकि इस आयोजन में जाने का अवसर मिल गया तो मुझे लगा कि यह अच्छा अवसर है कि यहाँ कविता पाठ करके, स्थानीय साहित्यकारों के साथ परिचय प्राप्त कर लिया जाए। रात में जब कवि गोष्ठी हुई तो मैंने भी अपनी एक ऐसी रचना का पाठ कर दिया, जिसके लिए मैं दिल्ली में भरपूर प्रशंसा प्राप्त कर चुका था। यह घटना भुलाना काफी समय तक मेरे लिए बहुत कठिन रहा। कोई रचना पाठ करता है तब रचना बहुत अच्छी न हो तब भी प्रोत्साहन के लिए ताली बजा देते हैं। लेकिन वहाँ मुझे लगा कि किसी ने मेरी कविता जैसे सुनी ही नहीं थी। ऐसा सन्नाटा मैंने वहाँ देखा। शायद उन महान आयोजकों को इस बात का अफसोस था कि एक अनजान व्यक्ति ने कविता-पाठ कर कैसे दिया!

खैर वहाँ एक-दो रचनाकारों को सुना, जिनसे बाद में घनिष्ठ परिचय बना, उनमें से एक हैं कृष्ण कल्पित, जो अभी शायद आकाशवाणी महानिदेशालय में कार्यरत हैं। उनके एक प्रसिद्ध गीत की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

राजा-रानी प्रजा मंतरी, बेटा इकलौता
मां से कथा सुनी थी, जिसका अंत नहीं होता।

बिना कहे महलों में कैसे आई पुरवाई,
राजा ने दस-बीस जनों को फांसी लगवाई।

राम-राम रटता रहता था, राजा का तोता।
मां से कथा सुनी थी जिसका अंत नहीं होता॥


आकाशवाणी, जयपुर में 3 साल रहा, बहुत अच्छे कलाकारों और कवियों से वहाँ मुलाकात हुई। एक थे लाज़वाब तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी, बहुत घनिष्ठ संबंध हो गए थे हमारे। मेरे बच्चे का जन्मदिन आया तो वो स्वयं घर पर आए और घंटों तक गज़लें प्रस्तुत कीं। आकाशवाणी में वे तबला वादक थे, परंतु वे गायन के कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। वो बोलते भी थे कि सरकार को हाथ बेचे हैं , गला नहीं। इसके बाद जब तक हम वहाँ रहे, ऐसे अवसरों पर वे आकर कार्यक्रम करते रहे। एक बार हमारे मकान मालिक के बच्चे का जन्मदिन था, उनसे कहा तो बोले, शर्माजी आप तो हमारे घर के आदमी हैं, अगर हम हर किसी के यहाँ ऐसे ही गायेंगे,तो क्या ये ठीक होगा?

वहाँ रहते हुए आकाशवाणी की कई कवि गोष्ठियों में भाग लिया। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर रिकॉर्ड की जा रही एक कवि गोष्ठी याद आ रही है, उसमें केंद्र निदेशक श्री गिरीश चंद्र चतुर्वेदी भी स्टूडियो में बैठे थे। प्रसिद्ध गीतकार कुमार शिव जी का नंबर आया तो वे बोले, यह गीत मैंने अपने जन्मदिन पर लिखा था, प्रस्तुत कर रहा हूँ-

काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी,
देखी हमने अपनी सालगिरह देखी।


इस पर केंद्र निदेशक तुरंत उछल पड़े, नहीं ये गीत नहीं चलेगा, कोई और पढ़िए। वास्तव में वह गीत स्वतंत्रता दिवस से ही जोड़कर देखा जाता।

उनके एक और गीत की पंक्तियां आज तक याद हैं-

फ्यूज़ बल्बों के अद्भुद समारोह में
रोशनी को शहर से निकाला गया।


आकाशवाणी में मेरी भूमिका हिंदी अनुवादक की थी, इस प्रकार मैं प्रशासन विंग में था, लेकिन मेरी मित्रता वहाँ प्रोग्राम विंग के क्रिएटिव लोगों के साथ अधिक थी। एक पूरा आलेख आकाशवाणी के कार्यकाल पर लिखा जा सकता है, लेकिन फिलहाल इतना ही।

अंत में जयपुर के एक और अनन्य शायर मित्र को याद करूंगा- श्री मिलाप चंद राही। बहुत अच्छे इंसान और बहुत प्यारे शायर थे। जयपुर में रहते हुए ही एक दिन यह खबर आई कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनकी इन पंक्तियों के साथ उनको याद कर रहा हूँ-

रवां-दवां थी, सियासत में रंग भरते हुए,
लरज़ गई है ज़ुबां, दिल की बात करते हुए।

ये वाकया है तेरे शहर से गुज़रते हुए,
हरे हुए हैं कई ज़ख्म दिल के भरते हुए।

मुझे पता है किसे इंतज़ार कहते हैं,
कि मैंने देखा है लम्हात को ठहरते हुए।

खुदा करे कि तू बाम-ए-उरूज़ पर जाकर
किसी को देख सके सीढ़ियां उतरते हुए।

नजर-नवाज़ वो अठखेलियां कहाँ राही,
चले है बाद-ए-सबा अब तो गुल कतरते हुए।


आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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आखिर टूट जाता है!

आज फिर से दिन है पुरानी पोस्ट का, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी पोस्ट-

आज फिर दिल की बात होनी है, वैसे तो मैं समझता हूँ कि हर दिन इसी विषय पर बात की जा सकती है। एक गीत का मुखड़ा याद आ रहा है, ‘फिर वही दिल लाया हूँ’, जिस अंदाज़ में इसे रफी साहब ने गाया है, उससे यही लगता है कि यह शम्मी कपूर जी पर फिल्माया गया होगा, शायद फिल्म का नाम भी यही था-

बंदापरवर, थाम लो जिगर, बनके प्यार फिर आया हूँ,
खिदमद में आपकी हुज़ूर, फिर वही दिल लाया हूँ!


तो मैं भी आज, फिर से दिल के बारे में ही बात कर रहा हूँ। ये दिल वैसे तो विशेष रूप से फिल्मी गीतों में एक खिलौना ही बनकर रह गया है- ‘खिलौना जानकर तुम तो मेरा दिल तोड़ जाते हो’, ‘न तूफां से खेलो, न साहिल से खेलो, मेरे पास आओ, मेरे दिल से खेलो’, ‘एक दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई इधर गिरा, कोई उधर गिरा’! फिर से मुकेश जी का एक गीत याद आ रहा है-

वो तेरे प्यार का गम, एक बहाना था सनम,
अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी, कि दिल टूट गया।

वर्ना क्या बात है तुम, कोई सितमगर तो नहीं,
तेरे सीने में भी दिल है, कोई पत्थर तो नहीं,
तूने ढाया है सितम, तो यही समझे हैं हम,
अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी, कि दिल टूट गया॥


अब हर गीत पूरा नहीं शेयर करूंगा। लेकिन कुल मिलाकर यही लगता है कि दिल जो अपने पास है, वो खिलौना है, शीशा है और दूसरे लोग दिल के नाम पर पत्थर लिए घूम रहे हैं। और फिर ये तो होना ही है-

शीशा हो या दिल हो, आखिर टूट जाता है!

एक और बात, कवि-शायर एक खास तरह की शब्दावली का प्रयोग करते हैं, जो उनकी पहचान बन जाती है। अब जैसे ‘दिल’ तो टूटता ही रहता है, शायद उसकी किस्मत में यही है, लेकिन यह बात सामान्यतः ‘हृदय’ के बारे में सुनने को नहीं मिलती, लेकिन फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ के गीत में ‘इंदीवर’ जी ने सोचा कि हृदय ही क्यों बचा रहे, सो उन्होंने उसको भी तोड़ दिया-

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे,
तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे,
तब तुम मेरे पास आना प्रिये,
मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा,
तुम्हारे लिए।


अब जैसे इंदीवर जी ने टूटने के लिए ‘दिल’ के स्थान पर ‘हृदय’ जैसे पवित्र शब्द का प्रयोग किया, विषय अलग है लेकिन मुझे भारत भूषण जी की याद आ गई। गीतों में सौंदर्य वर्णन तो बहुत लोग करते हैं, लेकिन उनकी शब्दावली देखिए-

सीपिया बरन, मंगलमय तन,
जीवन-दर्शन बांचते नयन।
साड़ी की सिकुड़न-सिकुड़न में
लिख दी कैसी गंगा लहरी।


आखिर में एक फिल्मी गीत की दो पंक्तियां और याद आ रही हैं-

इस दिल में अभी और भी ज़ख्मों की जगह है,
अबरू की कटारी को दो आब और ज्यादा।


मौका लगेगा तो दिल के बारे में आगे भी बात करेंगे। आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।
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