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आवारा, छलिया, अनाड़ी, दीवाना!

हाल ही में मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी की पुण्य तिथि पर उनका एक गीत शेयर किया था| आज मन है कि स्वर्गीय राज कपूर जी के साथ उनके अंतरंग संबंध को याद करूं| राजकपूर जी के अधिकांश गाने मुकेश जी ने गाए थे| राज कपूर जी और मुकेश जी मानो दो जिस्म एक जान थे| जब मुकेश जी की मृत्यु हुई तब राज साहब ने कहा था कि मेरी तो आवाज़ ही चली गई! जिस्म रह गया है और आत्मा जा चुकी है| एक बड़ा ही सुरीला समूह था| राज साहब, मुकेश जी, शैलेंद्र-हसरत जयपुरी, शंकर जयकिशन, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आदि|


मुकेश साहब क्योंकि राज साहब की फिल्मी यात्रा के हमसफर थे, इसीलिए यह गीत जिसमें राज साहब की कुछ भूमिकाओं का ज़िक्र किया गया है, कल्लू-क़व्वाल के बहाने से, इसे भी अभिव्यक्ति मुकेश जी ने दी है| वर्ष 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म- दूल्हा-दुल्हन के लिए, गुलशन बावरा जी का लिखा यह गीत मुकेश जी और लता मंगेशकर जी ने बड़े सुंदर ढंग से – कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में गाया था| कल्याणजी आनंदजी का भी मुकेश जी के साथ काफी अच्छा साथ रहा है|

एक बात और राज कपूर साहब ने साधारण इन्सानों की भूमिकाएँ बहुत निभाई हैं, जैसे कोई गाँव से आया है नौकरी की तलाश में और कैसे सीधेपन से वह चालाकी की तरफ बढ़ता है| यहाँ तक कि जेबकतरा भी- ‘शहजादे तलवार से खेले, मैं अश्कों से खेलूँ’|


लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-

मुझे कहते हैं कल्लू कव्वाल-कल्लू कव्वाल
कि तेरा मेरा तेरा मेरा साथ रहेगा|


मैं हूँ ठुमरी तो तू है ख़याल
तेरा मेरा साथ रहेगा|

मुझे कहते हैं कल्लू क़व्वाल|


-राजा मैं गीतों का तू सुर की रानी
तू सुर की रानी


गा के सुनाएं हम अपनी कहानी,
अपनी कहानी|

-तू मेरे गीतों की है ज़िंदगानी


-तेरे गीतों में
तेरे गीतों में है वो कमाल, ओ कल्लू कव्वाल
तेरा मेरा …


-सूरत से पहचाने, मुझको ज़माना
मुझको ज़माना|


आवारा छलिया अनाड़ी दीवाना
अनाड़ी दीवाना|


कैसा हूँ दिल का किसी ने न जाना|

-नहीं दुनिया में तेरी मिसाल ओ कल्लू कव्वाल
तेरा मेरा मेरा साथ रहेगा|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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किसी के जाने पर!

उर्दू का एक प्रसिद्ध शेर है, किसी के जाने की ज़िद को लेकर, शायर का नाम मुझे याद नहीं आ रहा-

 

 

अभी आए, अभी बैठे, अभी दामन सँभाला है,
तुम्हारी जाऊँ, जाऊँ ने हमारा दम निकाला है|

 

एक और फिल्मी गीत की पंक्ति हैं-

चले जाना ज़रा ठहरो, किसी का दम निकलता है,
ये मंज़र देखकर जाना|

पता नहीं क्यों, मेरे मन में इस विषय पर लिखने की बात बिजली के जाने के प्रसंग से आई| आजकल बंगलौर में हूँ, जहां हमारी सोसायटी में तो दिन में 20-25 बार बिजली जाती है| इस विषय में चकाचक ‘बनारसी’ की एक हास्य गजल की पंक्तियाँ थीं-

डरती नहीं हुक्काम से बिजली चली गई
बिजली थी जब कहा था अस्सलाम वालेकुम,
वालेकुम अस्सलाम पे बिजली चली गई|

एक गीत फिल्म- कन्हैया का है, मुकेश जी की आवाज़ में, जिसमे राजकपूर एक लुढ़क रही दारू की बोतल को पुकारते हुए गाते हैं, लेकिन लोग उसे नायिका से जोड़ लेते हैं| गीत है-

रुक जा ओ जाने वाली, रुक जा
मैं तो राही तेरी मंज़िल का|
देखा भी नहीं तुझको, सूरत भी न पहचानी,
तू आ के चली छम से, ज्यों धूप के दिन पानी!

जाने के इस तरह बहुत से उदाहरण हैं, जैसे ‘शाम’ अचानक चली जाती है| मीना कुमारी जी की पंक्तियाँ हैं शायद-

ढूंढते रह जाएंगे, साहिल पे क़दमों के निशां,
रात के गहरे समंदर में उतार जाएगी शाम|

जाने के बारे में ही तो यह गीत है-

तेरा जाना, दिल के अरमानों का लुट जाना,
कोई देखे, बनके तक़दीरों का लुट जाना|

एक शेर और याद आ रहा है, वसीम बरेलवी साहब का-

वो मेरे सामने ही गया और मैं, 
रास्ते की तरह देखता रह गया|

 

वैसे जाने के बाद भी आने की उम्मीद तो लगी ही रहती है, और जाने वाले लौटकर भी कभी आते हैं| लेकिन ऐसा भी तो लगता है न –

 

तेरे जाने में, और आने में,
हमने सदियों का फासला देखा|

 

और जैसा हम जानते हैं, एक जाना तो ऐसा भी होता है, जिसके बाद वापसी नहीं होती-

 

दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ!

 

जाने है वो कौन नगरिया, आए-जाए खत न खबरिया!
आएँ जब-जब उनकी यादें, आएँ होठों पर फरियादें,
जाके फिर न आने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ!

गीत, गजल तो बहुत होंगे, किसी के जाने को लेकर और इस विषय पर कई आलेख लिखे जा सकते हैं, परंतु अंत में स्वर्गीय किशन सरोज जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं, जो लाजवाब हैं-

तुम गए क्या, जग हुआ अंधा कुआं,
रेल छूटी, रह गया केवल धुआँ,
गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात,
हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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पेट की पगडंडियों के जाल से आगे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

आज क़तील शिफाई जी की एक गज़ल याद आ रही है, क्या निराला अंदाज़ है बात कहने का! शायर महोदय, जिनकी नींद उड़ गई है परेशानियों के कारण, वो रात भर जागते हैं, आसमान की तरफ देखते रहते हैं और उनको लगता है कि सितारे भी उनके दुख में आज जाग रहे हैं, रोज तो सो जाते थे, दिखाई नहीं देते थे (सोने के बाद)।

लीजिए पहले इस गज़ल के शेर ही शेयर कर लेता हूँ-

परेशां रात सारी है, सितारो तुम तो सो जाओ,
सुकूत-ए-मर्ग ता’री है, सितारो तुम तो सो जाओ।

 

हमें भी नींद आ जाएगी, हम भी सो ही जाएंगे,
अभी कुछ बेक़रारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

 

हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा,
यही क़िस्मत हमारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

 

तुम्हें क्या हम अगर लूटे गए राह-ए-मुहब्बत में,
ये बाज़ी हमने हारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

 

कहे जाते हो रो-रोकर हमारा हाल दुनिया से,
ये कैसी राज़दारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

 

अज्ञेय जी ने अपने उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ में लिखा है, उसमें जो मुख्य पात्र है, क़ैदी है वह जेल की दीवारों पर कुछ बातें लिखता है, उनमें से ही एक है-

 

वेदना में शक्ति है, जो दृष्टि देती है, जो प्रेम करता है, वह स्वयं भले ही मुक्त न हो, यह प्रयास करता है कि जिससे वह प्रेम करता है, उसको मुक्त रखे’ (शब्द कुछ अलग होंगे, जैसा मुझे याद है, वैसा लिख दिया)।

 

श्री रमेश रंजक जी की गीत पंक्ति हैं, शायद पहले भी मैंने इनका उल्लेख किया हो-

 

दिन हमें जो तोड़ जाते हैं,
वो इकहरे आदमी से जोड़ जाते हैं।

 

पेट की पगडंडियों के जाल से आगे,
टूट जाते हैं जहाँ पर ग्लोब के धागे,
मनुजता की उस सतह पर छोड़ जाते हैं।

 

हम स्वयं संसार होकर, हम नहीं होते,
फूटते हैं रोशनी के इस क़दर सोते,
हर जगह से देह-पर्बत फोड़ जाते हैं।

 

इस गज़ल के बहाने फिर से दर्द की बात आ गई, ये ससुरी बिना बताए आ ही जाती है।

 

एक रूसी कहानीकार की कहानी याद आ रही है, शायद इसका भी उल्लेख मैंने पहले किया हो। एक तांगाचालक था, जिसका बेटा मर गया था। उसके बाद वह तांगा चलाता है, किसी न किसी बहाने से वह सवारियों को बेटे की मौत के बारे में बताना चाहता है। कोई नहीं सुनता, अंत में वह पूरी कहानी अपने घोड़े को सुनाता है और पूछता है, ‘तूने सुन ली न!’ और घोड़ा सिर हिलाता है।

 

आज की दर्द कथा, यहीं विश्राम लेती है!

नमस्कार

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निंदा, समीक्षा और आलोचना

आज फिर से एक बार पुराना समय याद कर रहा हूँ| पुराने समय को कभी-कभी याद करना बुरा नहीं है, हाँ अतीत में रहना अवश्य बुरी बात है|

 

हाँ तो बात उस समय की है जब मैं अपने अनेक मित्रों के साथ, जो कविता लेखन के क्षेत्र में नए थे, मेरी तरह, और हम सभी पुरानी दिल्ली स्टेशन के सामने ‘दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में जाया करते थे| वहाँ प्रत्येक शनिवार को कवियों का मेला लगता था, जिसका नाम था ‘लिटरेचर स्टडी ग्रुप’ और प्रत्येक सोमवार को भाषण देने वालों, विचारों का आदान-प्रदान करने वालों की सभा होती थी, ‘सोशल स्टडी ग्रुप’ के नाम से| मेरा वहाँ जाना कविता वाले दिन अर्थात शनिवार को अधिक होता था| वहाँ अनेक अच्छी रचना करने वाले आते थे, जिनमें ‘राना सहरी’ भी थे जो वहाँ शायद सबसे युवा थे और अभी लिखना शुरू ही कर रहे थे| उनसे उनके उस्ताद कुँवर महेंदर सिंह बेदी ‘सहर’ जी के बारे में भी बात होती थी|

उस ग्रुप में भी हमारा एक छोटा सा ग्रुप था, जिसे हम ‘यमुना पार’ का ग्रुप कह सकते हैं, इस ग्रुप में हमारे नायक थे जो हम सबसे बड़े थे और उस समय कुछ कवि-सम्मेलनों में भी जाते थे| हमारे लिए वे आदर्श जैसे थे| लेकिन उनमें एक आदत ऐसी भी थी जो शायद ‘कवि सम्मेलन’ संस्कृति की ही उपज थी| उनके माध्यम से ही हमने अनेक श्रेष्ठ कवियों को अधिक निकट से जाना, परंतु जो एक गुण अथवा अवगुण उनमें था, वह धीरे-धीरे हमारे भीतर भी स्थान बनाता जा रहा था, वह था बड़े और श्रेष्ठ कवियों के बारे में, जिनके रचना-कर्म को हम ज्यादा नहीं जानते थे, उनकी किसी एक कविता को, किसी पंक्ति को लेकर उनकी निंदा करना| बाद में अपने सहयोगी कवियों के बारे में भी हम ऐसा करने लगे थे|

अपने से अधिक सफल लोगों की निंदा करने के मूल में असल में असुरक्षा की भावना ही होती है| यह जस्टीफ़ाई करने की कोशिश होती है, कि हम उनके जैसे क्यों नहीं बन पाए! ऐसे लोग क्रमशः आत्ममुग्द्ध बनते जाते हैं, वे किसी भी बहाने से अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं और दूसरे का कोई गुण देखने में उनको काफी कष्ट होता है|

उस समूह में ही एक साथी थे, जो शायद चाँदनी चौक में ही कहीं रहते थे, बाद में वे विदेश में हिन्दी पढ़ाने लगे थे, नाम शायद उनका ‘सुरेश किसलय’ था, अच्छे गीत लिखते और मेरी रचनाओं को पसंद करते थे| उन्होंने मेरे भीतर पनपते इस अवगुण को पहचाना और इसके स्रोत को भी वे जानते थे| उन्होने मुझसे कहा कि आप एक अच्छे रचनाकार और अच्छे इंसान हो, यह अवगुण आपका बहुत नुकसान कर सकता है| नकारात्मकता किसी भी इंसान को बर्बाद कर सकती है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति हमेशा दूसरों में बुराई ही देखता है| इसका मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा और बाद में सेवाकाल में मेरी ऐसी छवि बनी कि मेरे विभाग के लोग कहते थे ‘उस विभाग के लोग बहुत झगड़ालू हैं, जहां आप जा रहे हो, लेकिन आपसे कौन झगड़ा करेगा!

मुझे नकारात्मकता के बारे में शिव खेड़ा जी के द्वारा अपनी पुस्तक ‘जीत आपकी’ में दिया गया एक उदाहरण याद आता है, वे लिखते हैं कि एक व्यक्ति को ऐसा कुत्ता मिला जो पानी पर चल सकता था , वे बहुत प्रसन्न हुए और अपने मित्रों को दिखाने ले गए| उस कुत्ते को देखकर उनके नकारात्मकता से भरे मित्र बोले- ‘इसको तैरना नहीं आता शायद!’ उनके लिए पानी पर चलने के इस दिव्य गुण की भी प्रशंसा करना संभव नहीं था|

जीवन में नकारात्मकता से भरे लोग तो मिलते ही रहेंगे, उनके लिए किसी से प्रेम करना भी संभव नहीं होता| बस इस नकारात्मकता के परिवेश में आप सकारात्मक बने रहिए, क्योंकि अंततः आपके इसी गुण को लोग याद करेंगे|

उन दिनों की अपनी एक कविता को यहाँ शेयर कर रहा हूँ-

 

शब्दों के पिरामिड सजाओगे, पढ़कर तुम बासी अखबार
पर इससे होगा क्या यार|

 

घिसी हुई रूढ़ स्थापनाओं को, मंत्रों सी जब-तब दोहराओगे,
कविता की बात खुद चलाकर तुम, कविता की राजनीति गाओगे,
उगलोगे जितना पढ़ डाला है, ले भी लेते जरा डकार|

 

गंधों के मकबरे गिनाना फिर, एक गंध अपनी तो बो लो तुम,
प्रवचन की मुद्रा फिर धारणा, पहले सचमुच कुछ जी तो लो तुम,
अंतर के स्पंदन मे खोजोगे, केवल रस-छंद-अलंकार
पर इससे होगा क्या यार|

 

प्रतिभा है तुम में माना मैंने, हर दिन कविता को वर लोगे तुम,
अड़ जाओगे जिस भी झूठ पर, उसको सच साबित कर लोगे तुम,
मंचों से रात दिन उंडेलोगे, उथले मस्तिष्क के विकार|
पर इससे होगा क्या यार|

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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बीते हुए दिन!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

 

अतीत में रहना अक्सर लोगों को अच्छा लगता है, मेरी उम्र के लोगों को और भी ज्यादा। कुछ लोग तो जब मौका मिलता है अतीत में जाकर दुबक जाते हैं, या ऐसा कहते रहते हैं, हमारे समय में तो ऐसा होता है। वैसे मेरा तो यही प्रयास है कि हर समय, मेरा समय रहे, लेकिन अनुभव को मन में दोहराने के लिए कभी-कभार अतीत में डुबकी लगा लेना तो अच्छी बात है।

आज एक दृश्य याद आ रहा है, आकाशवाणी जयपुर में सेवा के समय का, वहाँ मैं 1980 से 1983 तक रहा था। मैं अपने पुराने ब्लॉग्स में उस अवधि के बारे में बता चुका हूँ। हाँ तो एक दृश्य याद आ रहा है, रिकॉर्डिंग स्टूडियो का, एक लाइन का संवाद, लेकिन उससे पहले लंबी-चौड़ी भूमिका तो बांध सकता हूँ, कैरेक्टर्स के बारे में बताने के बहाने।

हाँ तो आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था, हिंदी अनुवादक होने के नाते, रिकॉर्डिंग स्टूडियो से मेरा सीधे तौर पर कोई नाता नहीं था, लेकिन मैं अक्सर रिकॉर्डिंग स्टूडियो में रहता था कभी किसी कवि-गोष्ठी में, कभी कविता रिकॉर्ड कराने के लिए और कभी अपनी आवाज़ में कोई कहानी रिकॉर्ड कराने के लिए।

मेरी मित्रता भी प्रशासन शाखा से बाहर, प्रोग्राम विभाग के लोगों से अधिक थी, जबकि प्रशासन शाखा के बहुत से लोग प्रोग्राम विभाग के लोगों से ईर्ष्या करते थे, क्योंकि उनको पैसा और ख्याति, दोनों अधिक मिलते हैं।

हाँ तो कार्यक्रम विभाग में एक थे- श्री राजेंद्र वोहरा, कार्यक्रम निष्पादक, बहुत ही सृजनशील व्यक्ति थे, बाद में वे केंद्र निदेशक के स्तर तक पहुंचे थे। एक थे मेरे मित्र- बैजनाथ गौतम, कृषि विभाग में कार्यक्रम सहायक थे। ईसुरी के लोकगीत बड़े सुरीले अंदाज में गाते थे। और एक थे श्री एस.एस.धमौरा, वे बहुत अच्छे कलाकार थे, पगड़ी बांधकर, पूरी तरह राजस्थानी परिधान में रहते थे। इस दृश्य में ये तीन व्यक्ति ही प्रमुख रूप से थे, वैसे आकाशवाणी में अनेक कलाकार मेरे मित्र थे, जिनमें बहुत जाने-माने तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी भी शामिल थे।

हाँ तो एक लाइन के संवाद वाले इस दृश्य के बारे में बात करते हैं। मैं किसी रिकॉर्डिंग के मामले में स्टूडियो गया था और इस दृश्य में मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

दरअसल कृषकों के लिए चौपाल की रिकॉर्डिंग होनी थी, धमौरा जी ने कहा- ‘राम राम बैजनाथ भाई, क्या हाल है, आज की चौपाल में चर्चा शुरू की जाए? इस पर श्री बैजनाथ गौतम बोले- ‘हाँ धमौरा भाई मैं तो मजे में हूँ, चर्चा शुरू करते हैं, बस थोड़ा ‘वोहरा साहब’ आ जाएं।‘

इतना बोलना था, कि धमौरा जी, जो रुतबे में गौतम जी से बहुत छोटे थे, लेकिन अनुभवी कलाकार थे, उन्होंने रिकॉर्डिंग बंद करा दी और चिल्लाए- ‘ये वोहरा साहब क्या होता है? यहाँ प्रोग्राम में कोई किसी का साहब नहीं है!

बस यही अचानक याद आया, हर जगह का अलग संस्कार होता है, दफ्तर में अगर नाम के साथ साहब न लगाएं तो वह अशिष्टता है और चौपाल में अगर किसी के नाम के साथ साहब लगाएं तो वह गलत है।

आज के लिए यही एक बहाना था, अतीत में झांकने का, और उन पलों को दोहराने का, जगजीत जी की गाई गज़ल के शेर याद आ रहे हैं-

झूठ है सब तारीख हमेशा अपने को दोहराती है,
फिर से मेरा ख्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो।
शफक़, धनुख, महताब, घटाएं, तारे, नगमे, बिजली, फूल,
उस दामन में क्या-क्या कुछ है, वो दामन हाथ में आए तो।

 

नमस्कार।

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कविता का मायाजाल!

एक समय था जब दिल्ली-शाहदरा में रहते हुए मैंने बहुत सी कवितायें, नवगीत आदि लिखे थे। मेरा जन्म 1950 में हुआ था दरियागंज, दिल्ली में लेकिन पढ़ाई शाहदरा में जाने के बाद ही शुरू हुई और 1980 तक, अथवा 30 वर्ष की आयु तक मैं शाहदरा में ही रहा। इस बीच शुरू की नौकरियां कीं, दिल्ली जंक्शन के सामने, दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में कविता की शनिवारी सभा में भाग लेता रहा। दिल्ली में और आसपास होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों में भाग लेता रहा और आकाशवाणी से कविताओं का प्रसारण भी थोड़ा-बहुत प्रारंभ हो गया था।

 

1980 में आकाशवाणी, जयपुर में नौकरी लग गई, प्रशासन विभाग में, अनुवादक के तौर पर तो वहाँ तो साहित्यिक गतिविधियों से सीधे तौर पर जुड़ गया। बहुत से साहित्यिक मित्र भी बने जयपुर में, जिनमें कृष्ण कल्पित भी एक थे।

जयपुर के बाद मेरी नई नौकरी थी आज के झारखण्ड में स्थित हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में, हिंदी अधिकारी के रूप में। इत्तफाक से मेरे जयपुर के कवि मित्र कृष्ण कल्पित भी आकाशवाणी, रांची मे कार्यकम निष्पादक बनकर आ गए थे और उन्होंने मुझे अनेक बार वहाँ रहते हुए कविताओं की रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया।

यहाँ ये भी बता दूं कि दिल्ली में रहते हुए जिन श्रेष्ठ साहित्यकारों से परिचय हुआ उनमें स्व. श्री रमेश रंजक भी शामिल थे, उन्होंने मेरा एक गीत सुनकर कहा कि ये मुझे लिखकर दे दो, नचिकेता जी गीत संकलन ‘अंतराल-4’ निकाल रहे हैं, जिसमें देश के श्रेष्ठ नवगीतकार शामिल होंगे, तब मैंने एक गीत लिखकर दिया और वह उसमें प्रकाशित हुआ।

यह मैं इसलिए बता रहा हूँ कि छपने पर मेरा कभी जोर नहीं रहा, जो कविताएं प्रकाशित हुईं वे सामान्यतः लघु-पत्रिकाओं में ही प्रकाशित हुईं और निरंतर स्थान बदलते रहने के कारण मैं वे पत्र-पत्रिकाएं आदि भी संभालकर नहीं रख पाया। दिल्ली में हमारे एक संबंधी के यहाँ बहुत दिन तक मेरी मेरी पुस्तकें/पत्रिकाएं आदि पड़ी रहीं , जिनको उन्होंने बाद में किसी पुस्तकालय को दान कर दिया, क्योंकि चूहों की रुचि उस संग्रह में काफी बढ़ गई थी।

खैर आकाशवाणी से नाता मेरा, आकाशवाणी, रीवा तक रहा लेकिन पत्र-पत्रिकाओं से संपर्क दूरस्थ इलाकों में रहने के कारण नहीं रह पाया।

फिर दिल्ली की याद आ रही है, क्योंकि मेरा अधिकतर लेखन दिल्ली में रहते हुए ही हुआ था। दिल्ली में ही मेरे साहित्यकार मित्र – श्री योगेंद्र दत्त शर्मा जी, प्रकाशन विभाग की पत्रिका –‘आजकल’ का संपादन करते थे, उसमें उन्होंने मेरी कुछ कविताएं प्रकाशित कीं। मैं यह भी बताना चाहूंगा कि मेरे नवगीतों को वरिष्ठ रचनाकारों से काफी प्रशंसा प्राप्त हुई थी और नवगीत से संबंधित पुस्तकों, शोध में भी उनका कई बार उल्लेख किया गया है।

यह बात मुझे इसलिए याद आ रही है कि मैं देखता हूँ ऑनलाइन हिंदी कवियों और उनकी रचनाओं के संकलन उपलब्ध हैं और उनमें मेरा नाम नहीं आ पाया है। वैसे भी आज के समय में लोगों को अपना ढिंढोरा खुद ही पीटना पड़ता है।

इसी क्रम में मुझे एक घटना याद आ रही है। मेरे साहित्यकार-संपादक मित्र- श्री योगेंद्र दत्त शर्मा जब सेवानिवृत्त हुए, तब मुझे यह खबर मिली, असल में दुर्गम स्थानों पर पोस्टिंग रहने के कारण मैं ज्यादातर अपने मित्रों से संपर्क में नहीं रह पाया।

हाँ तो जब मैंने श्री योगेंद्र दत्त शर्मा जी को फोन कियाा, बताया कि मैं श्रीकृष्ण शर्मा बोल रहा हूँ, तो उन्होंने पूछा- शाहदरा वाले ना? मैंने कहा इसका मतलब? तब वे बोले कि इस नाम से लिखने वाले दो और लोगों को वह जानते हैं, एक जयपुर वाले और एक शायद आगरा वाले!

मुझे लगता है कि एक ही जैसे नाम होने पर तो पहचान का संकट हो जाता है, इसलिए मैं अपने नाम में ‘अशेष’ जोड़कर उनको, अपने फोटो के साथ अपनी कुछ रचनाएं ब्लॉग पोस्ट्स में शेयर करूंगा, इस प्रकार कविताएं भी एक बार दोहरा ली जाएंगी और शायद कहीं बाद में नाम रह जाने की संभावना बने, बाकी तो ऊपर वाला मालिक है।

आप ही बताइये, कैसा विचार है!
नमस्कार।

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ताऊ जी!

 

आज ताऊ जी के बारे में कुछ बात कर लेते हैं।

 

 

ताऊ जी, हमारे बहुत पहले छूटे हुए गांव के एक ऐसे कैरेक्टर हैं, जिनको शुरू से ही घूमना, विशेष रूप से शहर की रौनक देखना पसंद रहा है।

ताऊ जी जब घर में आते हैं तो थोड़ा बहुत गांव भी घर में आ जाता है, घर के बने ताज़ा गुड़ और देसी घी की गंध में लिपटा हुआ। हाँ घर में लोगों को कुछ समझाना पड़ता है कि वे अपनी आधुनिकता का, शहरीपन का प्रदर्शन थोड़ा कम करें, और अपने मन में सहेजकर रखे गए गांव को झाड़-पोंछकर कुछ हद तक जागृत करने का प्रयास करें।

हाँ यह भी है कि जब ताऊ जी वापस गांव लौटते हैं तब शहर में नए-नए प्रचलन में आए खिलौने भी साथ लेकर जाते हैं, उनके ऊपर गांव में कुछ खास ज़िम्मेदारी भी नहीं है, उनके बच्चे ही वहाँ का कामकाज संभालते हैं, (वैसे अब तो बहुत ज्यादा रहा भी नहीं है संभालने के लिए!), हाँ तो ताऊ जी जब यहाँ आते तब यहाँ बच्चे यह जानने को बेचैन रहते हैं कि गांव से क्या लेकर आए हैं और इसी प्रकार यहाँ से जो आधुनिक रंग-बिरंगी लाइट वाले खिलौने वो लेकर जाते थे, उनसे भी वहाँ कुछ दिन तक तो काफी रौनक रहती है, शायद कुछ युद्ध भी लड़े जाते हों।

ताऊ जी कुछ बातों को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं होते, जैसे मुझे याद है कि जब नील आर्मस्ट्रॉन्ग के चांद पर पहुंचने की खबर आई थी तब उन्होंने यह माना ही नहीं कि कोई चांद पर चला जाएगा और वहाँ से नीचे धरती पर नहीं गिरेगा!

ताऊ जी किस्से बहुत अच्छे सुनाते हैं, जैसे अंग्रेजों के ज़माने में देहात के किसी व्यक्ति ने किस प्रकार उस इलाके की रानी को बचाया था, उसके किस्से वे सुनाते थे और आल्हा-ऊदल के किस्से भी वो कहानी में और वीरता भरे गीत के रूप में सुनाया करते थे। इसलिए पहले जब वे आते थे तब घर में वीर-रस का माहौल बन जाता था। बच्चे इसके लिए बेचैन रहते थे कि कब मौका मिले और वे ताऊ जी से वीरता की और कुछ रहस्य की भी रोचक कहानियां सुनें।

समय के साथ ताऊ जी का आना कुछ कम हो गया है, बच्चे भी अब उस उम्र के नहीं रहे कि वे उनसे कहानियां सुनें। वीरता की जगह उनकी रुचि अब आध्यात्म में बढ़ गई है। हर बार उनका आना कुछ अलग तरह से होता है, गांव की सूचनाएं भी ऐसी कि अब उनको सुनकर ज्यादा खुशी नहीं होती थी। जहाँ उनके आने पर हमें पहले गांव के भाईचारे की खबरें मिलती थीं, किस प्रकार सब मिल-जुलकर रहते थे, इसकी अनेक मिसाल पहले देखने को मिलती थीं। अब आते हैं तो ऐसी खबरें सुनाते हैं कि किसने किस पर मुकदमा किया हुआ है, किन लोगों के बीच जमकर मारपीट हुई। गांव में डॉक्टर की, शिक्षकों आदि की भले ही ठीक से कमाई न हो पा रही हो, लेकिन वकीलों को गांव से काफी कमाई की उम्मीद रहती है।

एक फर्क़ और पड़ा है, पहले आते थे तो उनके साथ पान-तंबाकू की व्यवस्था रहती थी, उसके बाद कुछ  वर्षों तक पान-तंबाकू वाली थैली की जगह उनके साथ दवाइयों की व्यवस्था होती थी, सुबह के लिए, दोपहर के लिए और शाम के लिए अलग-अलग टेब्लेट और कैप्सूल उनके साथ हुआ करते थे। लेकिन वो ज़माना भी अब गुज़र चुका है, अब ताऊ जी को दवाइयों से कोई उम्मीद नहीं रह गई है। अब उनके हाथ में सुमिरनी रहती थी और वे ईश्वर से ही लगन लगाए रहते थे।

जो ताऊ जी पहले किस्सागोई के लिए प्रसिद्ध थे, मौका मिलते ही कोई किस्सा छेड़ देते थे, अब कुछ गिने-चुने वाक्य ही उनके मुंह से निकलते हैं, जैसी ईश्वर की इच्छा!  कुछ प्रश्न पूछने पर अक्सर गहरी निगाहों से देखते रह जाते हैं अब, कुछ उत्तर देते-देते फिर रुक जाते हैं। अब कोई खबर उनको विचलित नहीं करती, जैसे वे एक प्रकार से अपनी अंतिम-यात्रा के लिए तैयार हैं और प्लेटफॉर्म पर धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर रहे हैं। और शायद उनके साथ ही हमारे सपनों का गांव भी अब अंतिम पड़ाव पर है। जैसे हम अपने शहरों में पुराने नाम सुनकर जानते हैं कि यहाँ कुछ गांव थे, धीरे-धीरे वे गांव शहर के विकास के लिए अपना अस्तित्व न्यौछावर करते जाते हैं।

बस आज ऐसे ही काल्पनिक ताऊ जी को, और इस बहाने छूटे हुए गांव के सुनहरे परिवेश को याद कर लिया।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।