Categories
Poetry

जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें!

ज़नाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| ‘नूर’ साहब उस समय शायरी के क्षेत्र में सक्रिय गिने-चुने हिन्दू शायरों में से एक थे| कई बार ऐसी प्रतियोगिता भी होती थीं, जिनमें एक मिसरे को लेकर ग़ज़ल के शेर लिखने को कहा जाता था|


एक बार ग़ज़ल लिखने के लिए मिसरा दिया गया था- ‘क़ाफिर हैं वो लोग जो कायल नहीं इस्लाम के’| इस पर नूर साहब ने शेर इस प्रकार लिखा था- ‘लाम के मानिंद हैं, गेसू मेरे घनश्याम के, क़ाफ़िर हैं वो लोग जो कायल नहीं ‘इस लाम’ के| खैर ये कहीं पढ़ा था अचानक याद आ गया|


लीजिए नूर साहब की ग़ज़ल का आनंद लीजिए-


यारो घिर आई शाम, चलो मयकदे चलें,
याद आ रहे हैं जाम, चलो मयकदे चलें|

दैरो-हरम पे खुल के जहाँ बात हो सके,
है एक ही मुक़ाम, चलो मयकदे चलें|

अच्छा, नहीं पियेंगे जो पीना हराम है,
जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें|


यारो जो होगा देखेंगे, ग़म से तो हो निजात,
लेकर ख़ुदा का नाम, चलो मयकदे चलें|

साक़ी भी है, शराब भी, आज़ादियाँ भी हैं,
सब कुछ है इंतज़ाम, चलो मयकदे चलें|

ऐसी फ़ज़ा में लुत्फ़े-इबादत न आएगा,
लेना है उसका नाम, चलो मयकदे चलें|


फ़ुरसत ग़मों से पाना अगर है तो आओ ‘नूर’,
सबको करें सलाम, चलो मयकदे चलें||


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*******

Categories
Poetry

जिस दिन अपने जूड़े में ,उसने कुछ फूल सजाये थे!

लीजिए एक बार फिर से जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल का आनंद लेते हैं| जैसा कि आप जानते ही हैं क़तील साहब भारतीय उपमहाद्वीप के एक महान शायर थे और अनेक प्रसिद्ध गायकों ने उनकी ग़ज़लों आदि को अपना स्वर दिया है|

यह भी क़तील साहब की अलग किस्म की ग़ज़ल है, हमारे इरादे कुछ और होते हैं, लेकिन होता वही है जो होना होता है, लीजिए इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

हिज्र की पहली शाम के साये दूर उफ़क़ तक छाये थे,
हम जब उसके शहर से निकले सब रास्ते सँवलाये थे|

जाने वो क्या सोच रहा था अपने दिल में सारी रात,
प्यार की बातें करते करते उस के नैन भर आये थे|

मेरे अन्दर चली थी आँधी ठीक उसी दिन पतझड़ की,
जिस दिन अपने जूड़े में उसने कुछ फूल सजाये थे|

उसने कितने प्यार से अपना कुफ़्र दिया नज़राने में,
हम अपने ईमान का सौदा जिससे करने आये थे|


कैसे जाती मेरे बदन से बीते लम्हों की ख़ुश्बू,
ख़्वाबों की उस बस्ती में कुछ फूल मेरे हम-साये थे|

कैसा प्यारा मंज़र था जब देख के अपने साथी को,
पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने अपने पर फैलाये थे|


रुख़्सत के दिन भीगी आँखों उसका वो कहना हाए “क़तील”,
तुम को लौट ही जाना था तो इस नगरी क्यूँ आये थे|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*******

Categories
Uncategorized

गीत ऋषि- देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’

आज के समय में काव्य-लेखन को साधना का नाम देने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता| आज अधिकांश लोग लिखना शुरू करते हैं तो उनके सामने एक लक्ष्य होता है, वह मंच हो या किसी अन्य प्रकार से प्रकाशन-प्रसारण आदि के माध्यम से कमाई और ख्याति अर्जित करना|

इन परिस्थितियों में स्वर्गीय देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी जैसे लोग आज की दुनिया में लगभग नहीं के बराबर हैं| मेरे साहित्यिक मित्र श्री योगेंद्र दत्त शर्मा के, फेसबुक में लिखे गए आलेख के माध्यम से ज्ञात हुआ कि श्री देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी नहीं रहे, जीवन है तो मृत्यु भी इससे जुड़ी एक सच्चाई है, परंतु यह समाचार सुनकर कुछ पुरानी यादें उमड़ आईं, इस बहाने से आज मैं कविता और विशेष रूप से नवगीत को समर्पित इस महान व्यक्तित्व का स्मरण करना चाहूँगा, जिन्होंने आज भी काव्य-लेखन को एक साधना का रूप दिया हुआ था|

एक बात और बताना चाहूँगा, मेरा विवाह भी इंद्र जी ने अपनी रिश्तेदारी में करा दिया था और इस प्रकार हम रिश्तेदार भी थे, परंतु इंद्र जी का रिश्तों की औपचारिकता में बिल्कुल विश्वास नहीं था, वे बोलते थे- ‘रिश्ता तोड़कर रिश्ता जोड़िए’|

मैं यहाँ संदर्भ के लिए बताना चाहूँगा कि मेरे बचपन से लेकर कुछ प्रारंभिक नौकरियां करने तक का समय, दिल्ली-शाहदरा में बीता जहां ‘इंद्र’ जी श्याम लाल कालेज में पढ़ाते थे| वहीं कवि गोष्ठियों में उनसे मिलने का सिलसिला प्रारंभ हुआ, मेरे वरिष्ठ कवि मित्र- श्री धनंजय सिंह के माध्यम से ही मेरा अधिकांश कवियों से मिलना हुआ और इंद्र जी से मुलाक़ात भी उनके माध्यम से ही हुई|


एकांत साधना क्या होती है, इसका उदाहरण मुझे इंद्र जी के जीवन में ही देखने को मिला| मैं भी उस समय थोड़ा बहुत गीत आदि लिख लेता था, और उसके लिए मुझे इंद्र जी जैसे अत्यंत वरिष्ठ कवि से जो प्रशंसा मिलती थी, उसको सुनकर मैं वास्तव में शर्मिंदा महसूस करता था| मैं काफी कम बोलता हूँ, इस पर इंद्र जी कहते थे ‘क्या तुमने कसम खाई है कि, जब बोलोगे गीत ही बोलोगे’!


खैर दिल्ली मैंने बहुत पहले 1980 में छोड़ दी थी, अतः लंबे समय से मैं इंद्र जी से संपर्क में नहीं था| इतना अवश्य कहना चाहता हूँ कि इंद्र जी की धर्मपत्नी का बहुत पहले स्वर्गवास हो चुका था और उनके बेटे भी उनके पास नहीं रहते थे, एक पुत्री थी जो उस समय जवान होने को थी लेकिन मानसिक रूप से अविकसित थी, बच्चों जैसी हरकतें करती थी, बाद में क्या स्थिति हुई पता नहीं, उस बच्ची के कारण वे कहीं जा भी नहीं पाते थे, ऐसे में वह क्या लगन थी जो उनसे निरंतर गीत लिखवाती जाती थी!


दिल्ली छोड़ने के बाद की एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा, मैं उस समय हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की खेतड़ी इकाई में काम करता था| मैंने चाहा कि इंद्र जी जैसे श्रेष्ठ रचनाकारों को भी कविता के मंच पर आना चाहिए| मैंने उनसे निवेदन किया तो उनकी शर्त वही थी, जिसे मैं जानता था, उन्होंने कहा कि मैं कोई मानदेय नहीं लूँगा| वे मानते थे कि कविता तो उनकी मानस-पुत्री है और बेटी की कमाई नहीं खानी चाहिए| खैर वे आयोजन में आए और हमने उनका सम्मान करने का सौभाग्य प्राप्त किया| यह संभवतः 1987 की बात है|


इंद्र जी के अनेक काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने नवगीत, ग़ज़ल और दोहे- सभी क्षेत्रों में अपना उत्कृष्ट योगदान किया है|


बातें तो बहुत सारी हो सकती हैं, उस एकांत साधना करने वाले नवगीत विधा के शिखर पुरुष के संबंध में, परंतु मैं यहाँ उनका एक गीत शेयर करके उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहूँगा-


फूलों के बिस्तर पर
नींद क्यों नहीं आती,
चलो, कहीं सूली पर, सेज हम बिछाएँ ।

दूर-दूर तक कोई
नदी नहीं दिखती है ।
हिरणों की आँखों में
रेत प्यास लिखती है ।
घाटी में हँसते हैं,
बुत ही बुत पत्थर के,
चलो, कहीं सूने में, ख़ुद से बतियाएँ ।


आग हुई धुआँ-धुआँ
अँधियारा गहराया ।
पेड़ों पर पसर गया
गाढ़ा काला साया ।
आगे है मोड़ों पर
बियाबान सन्नाटा
चलो, कहीं पिछली पगडण्डी गुहराएँ ।


तुम से जो मुमकिन था
अभिनय वह ख़ूब किया ।
वह देखो सूर्यध्वज
जुगनू ने थाम लिया ।
मंच पर उभरने को
एक भीड़ आतुर है,
चलो, कहीं पर्दे के पीछे छिप जाएँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*******

Categories
Uncategorized

शाम आई-याद आई!

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है, एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट-



कविताओं और फिल्मी गीतों में शाम को अक्सर यादों से जोड़ा जाता है। यह खयाल आता है कि ऐसा क्या है, जिसके कारण शाम यादों से जुड़ जाती है! यहाँ दो गीत याद आते हैं जो शाम और यादों का संबंध दर्शाते हैं। एक गीत रफी साहब का गाया हुआ, जिसकी पंक्तियां हैं-

हुई शाम उनका खयाल आ गया,
वही ज़िंदगी का सवाल आ गया।


अभी तक तो होंठों पे था, तबस्सुम का इक सिलसिला,
बहुत शादमां थे हम उनको भुलाकर, अचानक ये क्या हो गया,
कि चेहरे पे रंज़-ओ-मलाल आ गया।
हुई शाम उनका खयाल आ गया॥


हमें तो यही था गुरूर, गम-ए-यार है हमसे दूर,
वही गम जिसे हमने किस-किस जतन से, निकाला था इस दिल से दूर,
वो चलकर क़यामत की चाल आ गया।
हुई शाम उनका खयाल आ गया॥


लगता यही है कि दिन होता है गतिविधियों के लिए, जिनमें व्यक्ति व्यस्त रहता है, शाम होती है तो इंसान क्या पशु-पक्षी भी अपने बसेरों की ओर लौटते हैं। यह समय काम का नहीं सोचने का, चिंता का होता है। एक कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं-

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है,
बच्चे प्रत्याशा में होंगे, नीड़ों से झांक रहे होंगे,
यह ध्यान परों में पंछी के, भरता कितनी चंचलता है।
हो जाए न पथ में रात कहीं, मंज़िल भी तो है दूर नहीं,
यह सोच थका दिन का पंथी, भी जल्दी-जल्दी चलता है।


खैर मैं बात कुछ और कर रहा था, ये पंक्तियां अचानक याद आ गईं, क्योंकि ये भी शाम और चिंता का संबंध जोड़ती हैं। हाँलाकि इसमें याद उन लोगों की आ रही है, जो अभी भी साथ हैं, शायद घर पर इंतज़ार कर रहे हैं।

शाम और याद के संबंध में दूसरा गीत जो याद आ रहा है, वो मुकेश जी का गाया हुआ फिल्म ‘आनंद’ का गीत है-

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
शाम की दुल्हन बदन चुराए, चुपके से आए,
मेरे खयालों के आंगन में, कोई सपनों के दीप जलाए।


कभी यूं ही, जब हुईं बोझल सांसें, भर आईं बैठे-बैठे जब यूं ही आंखें।
तभी मचल के, प्यार से चलके, छुए कोई मुझे पर नज़र न आए।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए।।


कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते, कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,
घनी ये उलझन, बैरी अपना मन, अपना ही होके सहे दर्द पराये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए।।


दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे, हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने, मुझसे जुदा न होंगे, इनके ये साये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए॥


वैसे देखें तो शाम का और यादों का संबंध जोड़ने वाले बहुत सारे गीत मिल जाएंगे, और जब ये मर्ज़ बढ़ता है, तब तो पूरी रात भी जागकर गुज़रने लगता है, और इंसान तारों की चिंता करके उनसे कहने लगता कि यार तुम तो सो जाओ!

आज की शाम के लिए इतनी चिंता ही काफी है!
नमस्कार
========

Categories
Uncategorized

लंदन छूटा जाए!

यह रिपोर्ट है जून-जुलाई 2018 में की गई लंदन यात्रा की! यात्राएं तो लगी रहती हैं| आज इस यात्रा का समापन करूंगा और उसके बाद अगस्त-सितंबर,2019 में की गई दूसरी लंदन यात्रा के कुछ प्रसंग शेयर करूंगा|

एक महीने के प्रवास के बाद कल सुबह लंदन छोड़ देंगे। कल दोपहर की फ्लाइट यहाँ से है, सो सुबह ही घर छोड़ देंगे, हाँ उस समय जब भारत में दोपहर होती है। फिर मुंबई होते हुए, परसों सुबह गोआ पहुंचेंगे।

बहुत लंबे समय तक यमुना मैया के पास, दिल्ली में यमुना पार- शाहदरा में रहे, एक वर्ष समुद्र के आकर्षण वाली नगरी मुंबई में रहे, अब गोआ में रहते हैं, जो समुद्र और अनेक ‘बीच’ होने के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन लंदन का अनुभव एकदम अलग था, जहाँ घर को छूते हुए ही समुद्र जैसी लगने वाली नदी ‘थेम्स’ बहती है।



दिन भर यहाँ रंग-बिरंगे आकर्षक शिप और बोट घर से ही देखने को मिलते थे, जो एक अलग ही अनुभव था। दुनिया के दूसरे छोर पर आकर यहाँ के स्थानों और अलग रंग, सभ्यता और संस्कृति वाले लोगों के बीच समय बिताने, एक दूसरी ही दुनिया को देखने का अवसर मिला।

कुछ लोगों की रुचि स्थानों में अधिक होती है, मेरी मनुष्यों में भी समान रूप से रुचि है, हालांकि यहाँ अधिक लोगों से बातचीत का अवसर तो नहीं मिला।

इससे पहले दुबई और यूएई के प्रांतों तथा तंजानिया में घूमने का अवसर मिला था। निश्चित रूप से हर अनुभव अपने आप में नया होता है।

लंबे समय तक एनटीपीसी में सेवा की लेकिन उस सेवा के दौरान कभी विदेश भ्रमण का अवसर नहीं मिला। मुझे याद एक बार एक कवि आए थे, मैं वहाँ कवि सम्मेलनों का आयोजन करता था। तो वे कवि, उनको दिखता भी कम था, ‘भोंपू’ नाम था उनका, उन्होंने एकदम अपनी आंखों से सटाकर मेरा हाथ देखा था और कहा था कि मैं तो पता नहीं जिंदा रहूंगा या नहीं, लेकिन आप दुनिया के कई देश घूमोगे!

मैं सेवा से रिटायर भी हो गया फिर सोचा कि अब कहाँ विदेश जाऊंगा, लेकिन बच्चों का प्रताप है कि कई देशों में घूमना हो गया। कुछ लोगों के लिए विदेश जाना सहज ही रूटीन का हिस्सा होता है लेकिन मेरे मामले में ऐसा नहीं था।

खैर, आज ज्यादा लंबी बात नहीं करूंगा और इसके बाद गोआ पहुंचने के बाद ही बात होगी।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

Categories
Uncategorized

लंदन की खुरचन!

शीर्षक पढ़कर आप सोच सकते हैं कि मैं किस डिश, किस व्यंजन की बात कर रहा हूँ और क्या ऐसी कोई डिश भी लंदन की विशेषता है! दरअसल मुझे तो किसी भी डिश की जानकारी नहीं है इसलिए ऐसी बात की तो उम्मीद न कीजिए।

असल में जब किसी भी विषय में बातचीत का समापन करना हो, तो एक तरीका यह भी है कि जहाँ लगे कि यह बात बतानी रह गई है, कुछ यहाँ से, कुछ वहाँ से, वे बातें ही कर ली जाएं। जैसे कड़ाही में हलुआ आदि खत्म होने पर उसे खुरचकर निकालते हैं! हाँ इतना ज्ञान तो मुझे है खाने-पीने के पदार्थों का!
हाँ तो कुछ बातें, जो मुझे यहाँ अच्छी लगीं, उनका ज़िक्र कर लेते हैं, वैसे कमियां भी सभी जगह होती हैं, लेकिन उन पर मेरा ध्यान तो गया नहीं है, एक माह के इस संक्षिप्त प्रवास में। हाँ जो बातें मैं कहूंगा, वो जितना अनुभव मुझे यहाँ हुआ है, उसके आधार पर ही कहूंगा, हो सकता है कुछ इलाकों में स्थिति इससे अलग हो।

कुछ बातें हैं जिन पर अपने देश में तो सरकारों ने कभी ध्यान दिया नहीं है, और ऐसा करके शायद कुछ व्यवसायों को हमारे देश में बहुत बढ़ावा मिला है!

जैसे एक है पीने का शुद्ध पानी! क्या ये हमारी सरकारों, नगर निकायों आदि की ज़िम्मेदारी नहीं है कि नागरिकों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जाए! अपने संक्षिप्त प्रवास में मुझे तो यहाँ कोई पानी शुद्ध करने के लिए आरओ सिस्टम, फिल्टर आदि इस्तेमाल करते नहीं दिखा। दुकानों में भी मैंने ये सामान बिकते नहीं देखा। होटल में रुकने पर भी यह बताया गया कि आपके कमरे, बाथ रूम में जो पानी आ रहा है, उसी को आप पीने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सोचिए यदि हमारी सरकारें इस तरफ ध्यान देतीं तो नागरिकों का कितना भला होता, लेकिन तब यह फिल्टर, आरओ सिस्टम का उद्योग कैसे पनपता!

इसी प्रकार यहाँ मैंने किसी को जेनरेटर, इन्वर्टर आदि इस्तेमाल करते नहीं देखा। मैं गुड़गांव में 7-8 साल रहा हूँ, सोचिए वहाँ तो इन्वर्टर के बिना काम ही नहीं चलता, कितना पनपाया है इन उद्योगों को हमारी सरकारों के निकम्मेपन ने! इसके अलावा जिन हाउसिंग सोसायटियों में पॉवर बैक-अप दिया जाता है, वो कितना ज्यादा पैसा वसूलती हैं लोगों से और इसके लिए भी हमारी सरकारों का निकम्मापन ही ज़िम्मेदार हैं।

यहाँ लंदन की बसों में केवल ड्राइवर होता है और भुगतान बस, ट्रेन आदि सभी में कार्ड द्वारा किया जाता है। यहाँ मैंने पाया कि विकलांग व्यक्ति भी काफी संख्या में हैं। लेकिन वे गतिविधि के मामले में कहीं किसी से कम नहीं लगते। मैंने देखा कि यहाँ उनके पास सामान्य व्हील चेयर नहीं बल्कि मोटरचालित चेयर होती है। बस में जब कोई विकलांग व्यक्ति आता है तो ड्राइवर एक बटन दबाकर गेट से एक स्लोप वाला प्लेटफॉर्म निकाल देता है और वह व्यक्ति उससे बस में चढ़ जाता है। यहाँ सभी बसों में, ट्रेन में विकलांग व्यक्ति अपनी मोटरचालित कुर्सी के साथ चढ़ते हैं।

हर जगह- बस, रेल, मार्केट में आपको विकलांगों की मोटरचालित कुर्सी और बच्चों की प्रैम अवश्य दिखाई देंगी। सक्रियता में यह विकलांग व्यक्ति कहीं किसी से कम नहीं लगते और इनके लिए सुविधाएं भी हर जगह हैं, जिससे ये किसी पर निर्भर नहीं रहते।

बच्चों के मामले में भी ये है कि यहाँ पर वे या तो प्रैम में होते हैं या अपने पैरों पर, वे गोदी में दिखाई नहीं देते, और उनकी प्रैम के लिए भी सभी स्थानों पर व्यवस्था है। आपकों बस, ट्रेन और मार्केट में कुछ मोटरचालित व्हील चेयर और कुछ प्रैम अवश्य मिल जाएंगी।

अंत में एक बात याद आ रही है, शायद निर्मल वर्मा जी ने लिखा था कि लंदन जाने के बाद मेरी सबसे पहली इच्छा ये थी कि जिन अंग्रेजों ने हमारे देश पर इतने लंबे समय तक राज किया है, उनमें से किसी से अपने जूतों पर पॉलिश कराऊं। तो यहाँ मैंने देखा कि यहाँ शॉपिंग मॉल आदि में पॉलिश करने के लिए एक ऊंचे प्लेटफॉर्म पर कुर्सी रखी रहती है जिस पर पॉलिश कराने वाला बैठता है, उसके सामने ही पॉलिश करने वाला, फर्श पर रखी कुर्सी पर बैठकर पॉलिश करता अथवा करती है। उसको पॉलिश करते देखकर ही आप जान पाएंगे कि वह पॉलिश करने वाला अथवा वाली है, अन्यथा नहीं। सफाई कर्मी भी एक कूड़ा उठाने के साधन से, खड़े-खड़े ही नीचे पड़ा कूड़ा उठकर अपने पास रखी थैली में बिना छुए डाल देता है। हर काम की गरिमा यहाँ पर है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

*******

Categories
Uncategorized

तू खुशी से मेरी जल गया!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-
आज एक पुराना गीत याद आ रहा है, जिसे मुझे मेरे एक पुराने मित्र और सहकर्मी- श्री चुन्नी लाल जी गाया करते थे। ये गीत बहुत पुरानी फिल्म- दिल-ए-नादां का है, जिसे शकील बदायुनी जी ने लिखा है और गुलाम मुहम्मद जी के संगीत निर्देशन में तलत महमूद जी ने गाया है।

कुल मिलाकर फिल्मी गीतों में बहुत ज्यादा कांटेंट नहीं होता, सीमित समय में गीत गाया जाना होता है, दो या तीन अंतरे का! लेकिन जो छाप इन कुछ पुराने गीतों की मन पर पड़ती है, उसका वर्णन करना मुश्किल है। इस गीत को भगवान से एक शिकायत भरी प्रार्थना के रूप में देख सकते हैं। मेरे मित्र भी पूरी तरह डूबकर इस गीत को गाते थे, लीजिए इस गीत को याद कर लेते हैं-

ज़िंदगी देने वाले सुन,
तेरी दुनिया से दिल भर गया,
मैं यहाँ जीते जी मर गया।

रात कटती नहीं, दिन गुज़रता नहीं,
ज़ख्म ऐसा दिया है कि भरता नहीं,
आंख वीरान है,
दिल परेशान है,
ग़म का सामान है,
जैसे जादू कोई कर गया।


बेख़ता तूने मुझ से खुशी छीन ली,
ज़िंदा रखा मगर ज़िंदगी छीन ली,
कर दिया दिल का खूं,
चुप कहाँ तक रहूं,
साफ क्यूं न कहूं,
तू खुशी से मेरी जल गया।
ज़िंदगी देने वाले सुन॥


इतना ही कहूंगा कि अगर आपको भगवान से प्रेम है, उस पर भरोसा है तो आप उससे क्या नहीं कह सकते! और लड़ तो सकते ही हैं।

आज के लिए इतना ही

नमस्कार।

*****

Categories
Uncategorized

ये जो मन की सीमा-रेखा है!

पिछले लगभग एक माह की अवधि में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश चंद माथुर जी का जन्म दिन (22 जुलाई) और पुण्य तिथि 27 अगस्त दोनो ही आए| 27 अगस्त,1976 को ही इस महान सुरीले गायक और फिल्मी दुनिया में इंसानियत की एक महान मिसाल, मुकेश जी का डेट्रायट, अमरीका में दर्शकों के समक्ष संगीत का कार्यक्रम देते हुए, दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया था| स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी भी मुकेश जी से बहुत प्रेम करती थीं और उनको अपना बड़ा भाई मानती थीं|


आज मुकेश जी की स्मृति में उनका गाया एक मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ, जो योगेश जी ने लिखा था और 1974 में रिलीज़ हुई फिल्म- रजनीगंधा के लिए, सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने बड़े मोहक अंदाज़ में गाया और इसे अमोल पालेकर जी पर फिल्माया गया था| किस प्रकार एक समय ऐसा आता है, जब हमारा मन अपने बंधनों को, अपनी सीमारेखा को तोड़ने लगता है|


लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-



कई बार यूँ भी देखा है
ये जो मन की सीमारेखा है
मन तोड़ने लगता है
अनजानी प्यास के पीछे
अनजानी आस के पीछे
मन दौड़ने लगता है


राहों में, राहों में, जीवन की राहों में
जो खिले हैं फूल, फूल मुस्कुरा के
कौन सा फूल चुरा के
मैं रख लूँ मन में सज़ा के
कई बार यूँ भी…


जानूँ ना, जानूँ ना, उलझन ये जानूँ ना
सुलझाऊँ कैसे कुछ समझ ना पाऊँ
किसको मीत बनाऊँ
मैं किसकी प्रीत भुलाऊँ
कई बार यूँ भी…



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*********

Categories
Uncategorized

सबसे पहले चमेली पुष्प – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The First Jasmines’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 

 सबसे पहले चमेली पुष्प

 

आह, ये चमेली के फूल, ये सफेद चमेली के फूल!
मुझे याद आता है वह पहला दिन, जब मैंने अपने हाथ भर लिए थे, चमेली के फूलों से,
चमेली के इन सफेद फूलों से।

 

मैंने प्यार किया है सूरज की रोशनी से, आसमान से और हरी-भरी धरती से;
मैंने आधी रात के गहन अंधकार में, नदी की द्रवीय गुनगुनाहट सुनी है मैंने ;
शरद ऋतु के सूर्यास्त अक्सर सामने आए हैं, वीरान बंजर क्षेत्र में सड़क के किसी मोड़ पर;
जैसे कोई दुल्हन उठाती हो अपना घूंघट, अपने प्रेमी को स्वीकार करने के लिए।
लेकिन मेरी स्मृतियों में अभी भी मधुरता भरी है, चमेली के उन पहले श्वेत पुष्पों की,
जो मैंने अपनी हथेलियों में भर लिए थे, जब मैं बच्चा था।

 

जीवन में खुशी के  दिन आए हैं, और मैं हंसा हूँ,खुशदिल लोगों के साथ,पर्व की रातों में।
बरसात की धुली हुई सुबहों में मैंने एकांत में अनेक गीत गुनगुनाए हैं।
मैंने अपनी गर्दन पर शाम के समय प्रेम से बुने गए बकुला-वस्त्र लपेटे हैं।
परंतु अभी भी मेरी स्मृतियों में भरी हुई है, सबसे पहले वाले श्वेत चमेली पुष्पों की गंध,
जिनको मैंने अपनी हथेलियों में भर लिया था, जब मैं छोटा बच्चा था।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

The First Jasmines

 

Ah, these jasmines, these white jasmines!
I seem to remember the first day when I filled my hands with
these jasmines, these white jasmines.

 

I have loved the sunlight, the sky and the green earth;
I have heard the liquid murmur of the river thorough the
darkness of midnight;
Autumn sunsets have come to me at the bend of a road in the
lonely waste, like a bride raising her veil to accept her lover.
Yet my memory is still sweet with the first white jasmines
that I held in my hands when I was a child.

 

Many a glad day has come in my life, and I have laughed with
merrymakers on festival nights.
On grey mornings of rain I have crooned many an idle song.
I have worn round my neck the evening wreath of bakulas woven
by the hand of love.
Yet my heart is sweet with the memory of the first fresh
jasmines that filled my hands when I was a child.

 

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************