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लंदन छूटा जाए!

यह रिपोर्ट है जून-जुलाई 2018 में की गई लंदन यात्रा की! यात्राएं तो लगी रहती हैं| आज इस यात्रा का समापन करूंगा और उसके बाद अगस्त-सितंबर,2019 में की गई दूसरी लंदन यात्रा के कुछ प्रसंग शेयर करूंगा|

एक महीने के प्रवास के बाद कल सुबह लंदन छोड़ देंगे। कल दोपहर की फ्लाइट यहाँ से है, सो सुबह ही घर छोड़ देंगे, हाँ उस समय जब भारत में दोपहर होती है। फिर मुंबई होते हुए, परसों सुबह गोआ पहुंचेंगे।

बहुत लंबे समय तक यमुना मैया के पास, दिल्ली में यमुना पार- शाहदरा में रहे, एक वर्ष समुद्र के आकर्षण वाली नगरी मुंबई में रहे, अब गोआ में रहते हैं, जो समुद्र और अनेक ‘बीच’ होने के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन लंदन का अनुभव एकदम अलग था, जहाँ घर को छूते हुए ही समुद्र जैसी लगने वाली नदी ‘थेम्स’ बहती है।



दिन भर यहाँ रंग-बिरंगे आकर्षक शिप और बोट घर से ही देखने को मिलते थे, जो एक अलग ही अनुभव था। दुनिया के दूसरे छोर पर आकर यहाँ के स्थानों और अलग रंग, सभ्यता और संस्कृति वाले लोगों के बीच समय बिताने, एक दूसरी ही दुनिया को देखने का अवसर मिला।

कुछ लोगों की रुचि स्थानों में अधिक होती है, मेरी मनुष्यों में भी समान रूप से रुचि है, हालांकि यहाँ अधिक लोगों से बातचीत का अवसर तो नहीं मिला।

इससे पहले दुबई और यूएई के प्रांतों तथा तंजानिया में घूमने का अवसर मिला था। निश्चित रूप से हर अनुभव अपने आप में नया होता है।

लंबे समय तक एनटीपीसी में सेवा की लेकिन उस सेवा के दौरान कभी विदेश भ्रमण का अवसर नहीं मिला। मुझे याद एक बार एक कवि आए थे, मैं वहाँ कवि सम्मेलनों का आयोजन करता था। तो वे कवि, उनको दिखता भी कम था, ‘भोंपू’ नाम था उनका, उन्होंने एकदम अपनी आंखों से सटाकर मेरा हाथ देखा था और कहा था कि मैं तो पता नहीं जिंदा रहूंगा या नहीं, लेकिन आप दुनिया के कई देश घूमोगे!

मैं सेवा से रिटायर भी हो गया फिर सोचा कि अब कहाँ विदेश जाऊंगा, लेकिन बच्चों का प्रताप है कि कई देशों में घूमना हो गया। कुछ लोगों के लिए विदेश जाना सहज ही रूटीन का हिस्सा होता है लेकिन मेरे मामले में ऐसा नहीं था।

खैर, आज ज्यादा लंबी बात नहीं करूंगा और इसके बाद गोआ पहुंचने के बाद ही बात होगी।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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लंदन की खुरचन!

शीर्षक पढ़कर आप सोच सकते हैं कि मैं किस डिश, किस व्यंजन की बात कर रहा हूँ और क्या ऐसी कोई डिश भी लंदन की विशेषता है! दरअसल मुझे तो किसी भी डिश की जानकारी नहीं है इसलिए ऐसी बात की तो उम्मीद न कीजिए।

असल में जब किसी भी विषय में बातचीत का समापन करना हो, तो एक तरीका यह भी है कि जहाँ लगे कि यह बात बतानी रह गई है, कुछ यहाँ से, कुछ वहाँ से, वे बातें ही कर ली जाएं। जैसे कड़ाही में हलुआ आदि खत्म होने पर उसे खुरचकर निकालते हैं! हाँ इतना ज्ञान तो मुझे है खाने-पीने के पदार्थों का!
हाँ तो कुछ बातें, जो मुझे यहाँ अच्छी लगीं, उनका ज़िक्र कर लेते हैं, वैसे कमियां भी सभी जगह होती हैं, लेकिन उन पर मेरा ध्यान तो गया नहीं है, एक माह के इस संक्षिप्त प्रवास में। हाँ जो बातें मैं कहूंगा, वो जितना अनुभव मुझे यहाँ हुआ है, उसके आधार पर ही कहूंगा, हो सकता है कुछ इलाकों में स्थिति इससे अलग हो।

कुछ बातें हैं जिन पर अपने देश में तो सरकारों ने कभी ध्यान दिया नहीं है, और ऐसा करके शायद कुछ व्यवसायों को हमारे देश में बहुत बढ़ावा मिला है!

जैसे एक है पीने का शुद्ध पानी! क्या ये हमारी सरकारों, नगर निकायों आदि की ज़िम्मेदारी नहीं है कि नागरिकों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जाए! अपने संक्षिप्त प्रवास में मुझे तो यहाँ कोई पानी शुद्ध करने के लिए आरओ सिस्टम, फिल्टर आदि इस्तेमाल करते नहीं दिखा। दुकानों में भी मैंने ये सामान बिकते नहीं देखा। होटल में रुकने पर भी यह बताया गया कि आपके कमरे, बाथ रूम में जो पानी आ रहा है, उसी को आप पीने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सोचिए यदि हमारी सरकारें इस तरफ ध्यान देतीं तो नागरिकों का कितना भला होता, लेकिन तब यह फिल्टर, आरओ सिस्टम का उद्योग कैसे पनपता!

इसी प्रकार यहाँ मैंने किसी को जेनरेटर, इन्वर्टर आदि इस्तेमाल करते नहीं देखा। मैं गुड़गांव में 7-8 साल रहा हूँ, सोचिए वहाँ तो इन्वर्टर के बिना काम ही नहीं चलता, कितना पनपाया है इन उद्योगों को हमारी सरकारों के निकम्मेपन ने! इसके अलावा जिन हाउसिंग सोसायटियों में पॉवर बैक-अप दिया जाता है, वो कितना ज्यादा पैसा वसूलती हैं लोगों से और इसके लिए भी हमारी सरकारों का निकम्मापन ही ज़िम्मेदार हैं।

यहाँ लंदन की बसों में केवल ड्राइवर होता है और भुगतान बस, ट्रेन आदि सभी में कार्ड द्वारा किया जाता है। यहाँ मैंने पाया कि विकलांग व्यक्ति भी काफी संख्या में हैं। लेकिन वे गतिविधि के मामले में कहीं किसी से कम नहीं लगते। मैंने देखा कि यहाँ उनके पास सामान्य व्हील चेयर नहीं बल्कि मोटरचालित चेयर होती है। बस में जब कोई विकलांग व्यक्ति आता है तो ड्राइवर एक बटन दबाकर गेट से एक स्लोप वाला प्लेटफॉर्म निकाल देता है और वह व्यक्ति उससे बस में चढ़ जाता है। यहाँ सभी बसों में, ट्रेन में विकलांग व्यक्ति अपनी मोटरचालित कुर्सी के साथ चढ़ते हैं।

हर जगह- बस, रेल, मार्केट में आपको विकलांगों की मोटरचालित कुर्सी और बच्चों की प्रैम अवश्य दिखाई देंगी। सक्रियता में यह विकलांग व्यक्ति कहीं किसी से कम नहीं लगते और इनके लिए सुविधाएं भी हर जगह हैं, जिससे ये किसी पर निर्भर नहीं रहते।

बच्चों के मामले में भी ये है कि यहाँ पर वे या तो प्रैम में होते हैं या अपने पैरों पर, वे गोदी में दिखाई नहीं देते, और उनकी प्रैम के लिए भी सभी स्थानों पर व्यवस्था है। आपकों बस, ट्रेन और मार्केट में कुछ मोटरचालित व्हील चेयर और कुछ प्रैम अवश्य मिल जाएंगी।

अंत में एक बात याद आ रही है, शायद निर्मल वर्मा जी ने लिखा था कि लंदन जाने के बाद मेरी सबसे पहली इच्छा ये थी कि जिन अंग्रेजों ने हमारे देश पर इतने लंबे समय तक राज किया है, उनमें से किसी से अपने जूतों पर पॉलिश कराऊं। तो यहाँ मैंने देखा कि यहाँ शॉपिंग मॉल आदि में पॉलिश करने के लिए एक ऊंचे प्लेटफॉर्म पर कुर्सी रखी रहती है जिस पर पॉलिश कराने वाला बैठता है, उसके सामने ही पॉलिश करने वाला, फर्श पर रखी कुर्सी पर बैठकर पॉलिश करता अथवा करती है। उसको पॉलिश करते देखकर ही आप जान पाएंगे कि वह पॉलिश करने वाला अथवा वाली है, अन्यथा नहीं। सफाई कर्मी भी एक कूड़ा उठाने के साधन से, खड़े-खड़े ही नीचे पड़ा कूड़ा उठकर अपने पास रखी थैली में बिना छुए डाल देता है। हर काम की गरिमा यहाँ पर है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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तू खुशी से मेरी जल गया!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-
आज एक पुराना गीत याद आ रहा है, जिसे मुझे मेरे एक पुराने मित्र और सहकर्मी- श्री चुन्नी लाल जी गाया करते थे। ये गीत बहुत पुरानी फिल्म- दिल-ए-नादां का है, जिसे शकील बदायुनी जी ने लिखा है और गुलाम मुहम्मद जी के संगीत निर्देशन में तलत महमूद जी ने गाया है।

कुल मिलाकर फिल्मी गीतों में बहुत ज्यादा कांटेंट नहीं होता, सीमित समय में गीत गाया जाना होता है, दो या तीन अंतरे का! लेकिन जो छाप इन कुछ पुराने गीतों की मन पर पड़ती है, उसका वर्णन करना मुश्किल है। इस गीत को भगवान से एक शिकायत भरी प्रार्थना के रूप में देख सकते हैं। मेरे मित्र भी पूरी तरह डूबकर इस गीत को गाते थे, लीजिए इस गीत को याद कर लेते हैं-

ज़िंदगी देने वाले सुन,
तेरी दुनिया से दिल भर गया,
मैं यहाँ जीते जी मर गया।

रात कटती नहीं, दिन गुज़रता नहीं,
ज़ख्म ऐसा दिया है कि भरता नहीं,
आंख वीरान है,
दिल परेशान है,
ग़म का सामान है,
जैसे जादू कोई कर गया।


बेख़ता तूने मुझ से खुशी छीन ली,
ज़िंदा रखा मगर ज़िंदगी छीन ली,
कर दिया दिल का खूं,
चुप कहाँ तक रहूं,
साफ क्यूं न कहूं,
तू खुशी से मेरी जल गया।
ज़िंदगी देने वाले सुन॥


इतना ही कहूंगा कि अगर आपको भगवान से प्रेम है, उस पर भरोसा है तो आप उससे क्या नहीं कह सकते! और लड़ तो सकते ही हैं।

आज के लिए इतना ही

नमस्कार।

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ये जो मन की सीमा-रेखा है!

पिछले लगभग एक माह की अवधि में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश चंद माथुर जी का जन्म दिन (22 जुलाई) और पुण्य तिथि 27 अगस्त दोनो ही आए| 27 अगस्त,1976 को ही इस महान सुरीले गायक और फिल्मी दुनिया में इंसानियत की एक महान मिसाल, मुकेश जी का डेट्रायट, अमरीका में दर्शकों के समक्ष संगीत का कार्यक्रम देते हुए, दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया था| स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी भी मुकेश जी से बहुत प्रेम करती थीं और उनको अपना बड़ा भाई मानती थीं|


आज मुकेश जी की स्मृति में उनका गाया एक मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ, जो योगेश जी ने लिखा था और 1974 में रिलीज़ हुई फिल्म- रजनीगंधा के लिए, सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने बड़े मोहक अंदाज़ में गाया और इसे अमोल पालेकर जी पर फिल्माया गया था| किस प्रकार एक समय ऐसा आता है, जब हमारा मन अपने बंधनों को, अपनी सीमारेखा को तोड़ने लगता है|


लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-



कई बार यूँ भी देखा है
ये जो मन की सीमारेखा है
मन तोड़ने लगता है
अनजानी प्यास के पीछे
अनजानी आस के पीछे
मन दौड़ने लगता है


राहों में, राहों में, जीवन की राहों में
जो खिले हैं फूल, फूल मुस्कुरा के
कौन सा फूल चुरा के
मैं रख लूँ मन में सज़ा के
कई बार यूँ भी…


जानूँ ना, जानूँ ना, उलझन ये जानूँ ना
सुलझाऊँ कैसे कुछ समझ ना पाऊँ
किसको मीत बनाऊँ
मैं किसकी प्रीत भुलाऊँ
कई बार यूँ भी…



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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सबसे पहले चमेली पुष्प – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The First Jasmines’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 

 सबसे पहले चमेली पुष्प

 

आह, ये चमेली के फूल, ये सफेद चमेली के फूल!
मुझे याद आता है वह पहला दिन, जब मैंने अपने हाथ भर लिए थे, चमेली के फूलों से,
चमेली के इन सफेद फूलों से।

 

मैंने प्यार किया है सूरज की रोशनी से, आसमान से और हरी-भरी धरती से;
मैंने आधी रात के गहन अंधकार में, नदी की द्रवीय गुनगुनाहट सुनी है मैंने ;
शरद ऋतु के सूर्यास्त अक्सर सामने आए हैं, वीरान बंजर क्षेत्र में सड़क के किसी मोड़ पर;
जैसे कोई दुल्हन उठाती हो अपना घूंघट, अपने प्रेमी को स्वीकार करने के लिए।
लेकिन मेरी स्मृतियों में अभी भी मधुरता भरी है, चमेली के उन पहले श्वेत पुष्पों की,
जो मैंने अपनी हथेलियों में भर लिए थे, जब मैं बच्चा था।

 

जीवन में खुशी के  दिन आए हैं, और मैं हंसा हूँ,खुशदिल लोगों के साथ,पर्व की रातों में।
बरसात की धुली हुई सुबहों में मैंने एकांत में अनेक गीत गुनगुनाए हैं।
मैंने अपनी गर्दन पर शाम के समय प्रेम से बुने गए बकुला-वस्त्र लपेटे हैं।
परंतु अभी भी मेरी स्मृतियों में भरी हुई है, सबसे पहले वाले श्वेत चमेली पुष्पों की गंध,
जिनको मैंने अपनी हथेलियों में भर लिया था, जब मैं छोटा बच्चा था।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

The First Jasmines

 

Ah, these jasmines, these white jasmines!
I seem to remember the first day when I filled my hands with
these jasmines, these white jasmines.

 

I have loved the sunlight, the sky and the green earth;
I have heard the liquid murmur of the river thorough the
darkness of midnight;
Autumn sunsets have come to me at the bend of a road in the
lonely waste, like a bride raising her veil to accept her lover.
Yet my memory is still sweet with the first white jasmines
that I held in my hands when I was a child.

 

Many a glad day has come in my life, and I have laughed with
merrymakers on festival nights.
On grey mornings of rain I have crooned many an idle song.
I have worn round my neck the evening wreath of bakulas woven
by the hand of love.
Yet my heart is sweet with the memory of the first fresh
jasmines that filled my hands when I was a child.

 

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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