न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम!

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब,
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम|

अहमद फ़राज़

तेरा ठिकाना बहुत हुआ!

क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल,
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ|

अहमद फ़राज़

मिरे पैरों के निशाँ कैसे हैं!

ऐ सबा तू तो उधर ही से गुज़रती होगी,
उस गली में मिरे पैरों के निशाँ कैसे हैं|

राही मासूम रज़ा

जो अक्सर हमें याद आए हैं!

हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें,
हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं|

राही मासूम रज़ा

उगा रक्खे हैं सूरज इतने!

उसकी यादों ने उगा रक्खे हैं सूरज इतने,
शाम का वक़्त भी आए तो सहर लगता है|

वसीम बरेलवी

सारे रास्तों की याद बचपन में!

लिपट जाती है सारे रास्तों की याद बचपन में,
जिधर से भी गुज़रता हूँ मैं रस्ता याद रहता है|

मुनव्वर राना

इतवार होना चाहिए!

अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे,
इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए|

मुनव्वर राना

बुझ गया दिल चराग़ जलते ही!

आ गई याद शाम ढलते ही,
बुझ गया दिल चराग़ जलते ही|


मुनीर नियाज़ी

सूखे हुए फूल किताबों में मिलें!

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें|

अहमद फ़राज़

चुटकी ले नर्म नर्म गालों में!

रात तेरी यादों ने दिल को इस तरह छेड़ा,
जैसे कोई चुटकी ले नर्म नर्म गालों में|

बशीर बद्र