चार हर्फ़ों का जो नाम रह गया!

अब क्या बताएँ कौन था क्या था वो एक शख़्स,
गिनती के चार हर्फ़ों का जो नाम रह गया|

निदा फ़ाज़ली

नाम भी इस में कहीं लिखा होगा!

पुराने वक़्तों का है क़स्र* ज़िंदगी मेरी,
तुम्हारा नाम भी इस में कहीं लिखा होगा|

*महल, History
शीन काफ़ निज़ाम

तेरी आवाज़ आ रही है अभी!

याद के बे-निशाँ जज़ीरों से,
तेरी आवाज़ आ रही है अभी|

नासिर काज़मी

दिल धड़कने का सबब याद आया!

दिल धड़कने का सबब याद आया,
वो तिरी याद थी अब याद आया|

नासिर काज़मी

पंटर चला गया!

बीता दिन पंटर का आखिरी दिन था| पिछले 15 वर्ष हमारे साथ बिताने के बाद हमारा प्रिय पंटर आखिर चला गया| एक महीने का था जब हमारे पास आया था, जब हम एनटीपीसी की ऊंचाहार परियोजना में थे| दिल्ली में बेटे ने अपने एक मित्र से उसको लिया था और वहाँ से अपनी पहली रेल यात्रा करके पंटर हमारे पास आया था|


उस समय उसको कार में घूमने का बहुत शौक था और कॉलोनी के लोग, विशेष रूप से बच्चे उसको बड़े चाव से देखते थे क्योंकि लंबे बालों वाला, विदेशी नस्ल का छोटे आकार वाला ऐसा डॉगी वहाँ तो उस समय नहीं था| उसकी ब्रीड शायद ‘टैरियर’ थी जो ‘ल्हासा एप्सो’ से मिलती-जुलती ब्रीड है| वहाँ पूरे मुहल्ले का वह प्यारा था और कुछ घरों में तो बेरोकटोक जा सकता था| हमारा विभागीय ड्राइवर कहता था कि बड़ी किस्मत लिखवाकर आया है जो साहब से सेवा करवा रहा है|

कुछ वर्ष पंटर के साथ ऊंचाहार में बिताने के बाद मैं सेवानिवृत्त हो गया और हम कुछ समय उसके साथ लखनऊ के अपने आवास में आकर रहे जहां पंटर पहले भी बहुत बार हमारे साथ कार में यात्रा करके, उसकी खिड़की से पूरे रास्ते का मुआयना करते हुए आ चुका था| बाद में हम गुड़गांव शिफ्ट हुए, यह पंटर की दूसरी रेल यात्रा थी| पाँच वर्ष तक हमारे साथ पंटर गुड़गांव में रहा और उसके बाद जब हम गोवा शिफ्ट हुए, तब विमान यात्रा करनी थी और इस यात्रा में पंटर के साथ उसका छोटा भाई ‘कालू’ भी था, जो गुडगांव में ही हमारे परिवार का हिस्सा बना था| कालू ‘पग’ ब्रीड का है, जैसा वोडाफोन के विज्ञापन में आता है|

गोवा में 6 वर्ष रहने के बाद पंटर लगभग 15 वर्ष की आयु में कल चल बसा| मरने से पहले दो दिन अस्पताल में भी रहा, उसको ग्लूकोज चढ़ाया गया और ऑक्सीजन देने की कोशिश की गई जो सफल नहीं हो पाई| कुछ दिन से वह चल-फिर भी नहीं पा रहा था और इस प्रकार कहा जाएगा कि उसको ‘मुक्ति’ मिल गई| अब कालू अकेला रह गया है|

आज इसके अलावा कुछ और पोस्ट नहीं करूंगा, कल का पता नहीं|

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की!

अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है,
जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की|

परवीन शाकि

बड़ी धूम-धाम हो गई है!

पुरानी यादों ने जब भी लगा लिया फेरा,
इस उजड़े दिल में बड़ी धूम-धाम हो गई है|

राजेश रेड्डी

किसी शख़्स के हाथ आए हैं!

याद जिस चीज़ को कहते हैं वो परछाईं है,
और साए भी किसी शख़्स के हाथ आए हैं|

राही मासूम रज़ा

तुझे कैसे भूल जाऊँ!

आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, दुष्यंत जी की बहुत सी ग़ज़लें और कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, जैसा कि आप जानते हैं आपातकाल में लिखी गई ग़ज़लों के संकलन ‘साए में धूप’ से दुष्यंत जी को विशेष प्रसिद्धि मिली थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह कविता–

अब उम्र की ढलान उतरते हुए मुझे
आती है तेरी याद‚ तुझे कैसे भूल जाऊँ।

गहरा गये हैं खूब धुंधलके निगाह में
गो राहरौ नहीं हैं कहीं‚ फिर भी राह में–
लगते हैं चंद साए उभरते हुए मुझे
आती है तेरी याद‚ तुझे कैसे भूल जाऊँ।

फैले हुए सवाल सा‚ सड़कों का जाल है‚
ये सड़क है उजाड़‚ या मेरा ख़याल है‚
सामाने–सफ़र बाँधते–धरते हुए मुझे
आती है तेरी याद‚ तुझे कैसे भूल जाऊँ।

फिर पर्वतों के पास बिछा झील का पलंग
होकर निढाल‚ शाम बजाती है जलतरंग‚
इन रास्तों से तनहा गुज़रते हुए मुझे
आती है तेरी याद‚ तुझे कैसे भूल जाऊँ।

उन सिलसिलों की टीस अभी तक है घाव में
थोड़ी–सी आंच और बची है अलाव में‚
सजदा किसी पड़ाव में करते हुए मुझे
आती है तेरी याद‚ तुझे कैसे भूल जाऊँ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चला हूँ किसी रौशनी के साथ!

तेरा ख़याल, तेरी तलब तेरी आरज़ू,
मैं उम्र भर चला हूँ किसी रौशनी के साथ|

वसीम बरेलवी