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ये ‘मी टू’ क्या है जी!

आजकल एक विषय विशेष रूप से चर्चा में है। ऐसा बहुत सी बार होता है, विदेशों में, पश्चिम में कोई विषय शुरू होता है और फिर एक फैशन के तहत वो भारत में फैल जाता है। जैसे टेलीविज़न के बहुत से ‘शो’, वो ‘गेम शो’ हों या ‘टेलेंट शो’ हों, वे पश्चिम में शुरू होते हैं और हूबहू उसी फॉर्मेट में वो भारत में धूम मचाते हैं।

लेकिन ‘गेम शो’ आदि तो अलग बात हैं, जिस विषय को आज हिंदुस्तान ने कैच किया हुआ, वो कोई खेल का विषय नहीं है। ऐसा विषय नहीं है, जिसे इतना हल्के में लिया जाए, एक फैशन की तरह फैलाया जाए।

बड़ा सेंसिटिव विषय है, लेकिन जिस तरह इसको प्रचारित किया जा रहा है, उसमें कहीं गंभीरता दिखाई नहीं देती।

पहले एक महिला अभिनेत्री का मामला सामने आया था, जिसने अभिनेता नाना पाटेकर पर इल्ज़ाम लगाया था, उसके बोलने में गंभीरता दिखाई देती थी, काफी लंबी बहस भी उसने टेलीविज़न चैनल पर की और शिकायत भी दर्ज कराई है। फैसला करने वाले हम कोई नहीं हैं, अगर साक्ष्य हैं तो शिकायत दर्ज करानी चाहिए और मामले को आगे बढ़ाना चाहिए।

लेकिन आज तो ऐसा लगता है कि ये खुद को प्रकाश में लाने के लिए, ‘पेज-3’ वाली महिलाएं आरोप लगा रही हैं, मैं इस संदर्भ में छोटी सी, काल्पनिक कहानी शेयर करना चाहूंगा।

नलिनी एक अच्छी पत्रकार रही हैं, ठीक-ठाक नाम था उसका किसी समय मीडिया जगत में, वो अपनी एक सहेली उन्नति के पास आती है, वह भी उसकी सहकर्मी रही किसी समय, बाद में वे अलग-अलग समाचार पत्रिकाओं में चली गई थीं।

वे मिलती हैं, गप्पें होती हैं, उन्नति पूछती है कि आज अचानक कैसे याद आ गई जो मिलने चली आईं। नलिनी बताती है कि किस तरह उनके सीनियर रहे, सतीश सर के खिलाफ आजकल कई महिला पत्रकारों ने बयान दिए हैं और उन पर सेक्सुअली शोषण करने का आरोप लगाया है। इस पर उन्नति कहती है कि हाँ ये तो उसके साथ बहुत बुरा हो रहा है। हम लोगों ने सतीश सर से बहुत कुछ सीखा है, और हाँ वे महिला साथियों को पसंद करते थे, काफी बढ़ावा देते थे, हम लोग भी शायद इतना आगे नहीं बढ़ पाते अगर कोई इतना सपोर्ट और गाइड करने वाला बॉस नहीं मिलता और हाँ उन्होंने कभी किसी को मजबूर तो नहीं किया था, कोई महिला साथी अगर उनके नज़दीक गई थी तो अपनी मर्जी से ही गई थी और लोगों ने उनका भरपूर फायदा भी उठाया। हाँ कमलिनी जो उनके गाइड करने पर भी सही परफार्म नहीं कर पाई, उसको उनसे शिकायतें थीं और उसने ही सबसे पहले शिकायत की और कुछ और को भी मिला लिया, जिनके बारे में सब लोग जानते थे कि वे उनके नज़दीक थीं।

इस पर उन्नति बोली कि ये तो बहुत गलत हो रहा है सतीश सर के साथ! इस पर नलिनी बोलती है, अब हमें सही-गलत नहीं सोचना है, हमारे पास एक ही ऑप्शन है कि हम भी सतीश सर के खिलाफ बयान दे दें। इस बहाने हमारा नाम एक तरह से फिर से जनता के सामने आ जाएगा, कुछ लेख, इंटरव्यू वगैरा भी छप जाएंगे। और ये भी देख लो कि जिन लोगों ने शिकायत की है, वो ये भी जानती हैं कि हम लोग सतीश सर के कितना नज़दीक थे!

हमारे पास दो ही ऑप्शन हैं, या तो हम शिकायत करने वाले बन जाएं, या हमको भी सतीश सर का साथी होने के नाते अपराधी की श्रेणी में डाल दिया जाएगा। और हमको पॉलिटिकल माइलेज भी तो मिलेगा ना, क्योंकि बड़ी बात तो ये है कि सतीश सर आजकल एक बड़े पॉलिटिशियन हैं!

जी ऊपर मैंने एक काल्पनिक कहानी छोटी सी लिख दी, जो मुझे लगा कि शायद सच्चाई के निकट हो सकती है।

मैं अपने अनुभव के आधार पर बता सकता हूँ कि बॉस लोगों का अपनी जूनियर्स के साथ रोमांस अथवा फायदे के लिए बनाया गया संबंध एक अक्सर होने वाली बात है, और दफ्तरों में ऐसी एक-दो कहानियां तो होती हैं। इसमें अगर किसी को मजबूर किया गया है तो वह निश्चित रूप से गलत है, लेकिन ये कौन तय करेगा!

मुझे ऐसे बहुत से उदाहरण याद आ रहे हैं, जहाँ किसी कंपनी में बड़े बॉस के नज़दीक होने के कारण किसी महिला कर्मचारी ने बहुत अधिक तरक्की की थी।

मैं कहना इतना ही चाहूंगा कि अगर किसी के साथ गलत हुआ है अथवा होता है तो उसको शिकायत करनी चाहिए और अपराध करने वाले को कड़ी सज़ा दिलवानी चाहिए लेकिन इसको एक पब्लिसिटी स्टंट की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

एक कवि की लिखी बहुत सुंदर पंक्ति याद आ रही है-

दुख में सब एक-वचन, कोई नहीं दूसरा!

जी हाँ दुख के गीत कोरस में नहीं गाए जाते, दुख अक्सर अकेले ही झेलना पड़ता है और उसके खिलाफ अकेले ही युद्ध लड़ना पड़ता है।

नमस्कार।
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