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कोरोना काल के फरिश्ते!

आज एक बार फिर से कोरोना संकट और लॉक डाउन की परिस्थितियों के बहाने चर्चा कर रहा हूँ|

 

ऐसे राष्ट्रीय संकट के समय भी राजनीति और फिल्म जगत, व्यावहारिक रूप से हर क्षेत्र के लोगों का अलग-अलग चरित्र उजागर होता है| हमारी प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी और लंबे समय तक सत्तारूढ़ रही पार्टी- कांग्रेस का चरित्र इस समय  घृणा के योग्य प्रतीत होता है | जो पार्टी और उसका प्रमुख नेता, संकट की इस घड़ी में भी, किसी न किसी बहाने से राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध खड़े होते हैं| ऐसी असंभव किस्म की मांगें सरकार के रास्ते में  रोड़े अटकाने के लिए करते हैं जिससे राहत के लिए किए जा रहे कार्यों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है| वे किसी न किसी बहाने से जनता में असंतोष पैदा करना चाहते हैं|

आज यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा मुझे इस समाचार से मिली कि फिल्म अभिनेता सोनू सूद ने, कुछ साथियों के साथ मिलकर, मुंबई के प्रवासी मजदूरों को उनके घर वापस भेजने का अभियान चलाया है, अनेक लोगों को वे वापस भेज चुके हैं और प्रवासी मजदूरों के प्रति उनका यह संकल्प है कि जब तक एक भी प्रवासी मजदूर वहाँ उनसे सहायता चाहता है, वे इस अभियान को जारी रखेंगे| मैं सोनू सूद जी और उनकी टीम को इस अभियान के लिए साधुवाद देता हूँ और कामना करता हूँ कि ईश्वर उनको सफलता की नई ऊँचाइयाँ प्रदान करें| मेरी निगाह में वे अनुराग कश्यप, जावेद अख्तर, नसीरुद्दीन शाह जैसे बुद्धिजीवियों से लाख दर्जे अच्छे हैं|

एक और इसी प्रकार का समाचार और पढ़कर बहुत अच्छा लगा कि कुछ छात्रों ने अपने पैसों से हवाई यात्रा का टिकट कराकर कुछ प्रवासी मजदूर परिवारों को उनके घर वापस भिजवाया|

जिस देश में ऐसी भावना से भरे जागरूक और लोगों का दर्द समझने वाले नागरिक मौजूद हैं, वह किसी भी बड़े से बड़े संकट का मुक़ाबला कर लेगा| बस कामना यही है कि इन सभी लाचार मजदूरों को ऐसा कोई हमदर्द मिल जाए, क्योंकि बहुत से लोग तो यह भी नहीं जानते कि श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे कराते हैं| किसी भी रूप में जो लोग इन लोगों की मदद करते हैं, जो पीएम केयर्स फंड अपना विनम्र योगदान करते हैं, वे उन बौद्धिकों से लाख दर्जे अच्छे हैं, जो केवल नकारात्मक वातावरण बनाने में ही लगे रहते हैं|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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कोरोना के असहाय शिकार!

आज कोरोना के खतरे के बाद देश में बनी परिस्थितियों की चर्चा कर रहा हूँ| कितनी भयंकर विपदा यह संपूर्ण मानव जाति पर आई है, ये आप सभी जानते हैं| चीन से शुरू होकर कोरोना के इस दैत्य ने इटली, अमरीका आदि में जैसी तबाही मचाई है, शुक्र है हम अभी वैसी स्थिति में नहीं हैं और ईश्वर ने चाहा तो वैसा यहाँ नहीं होगा, लेकिन जो हुआ है वह भी बहुत डराने वाला है| आज इन परिस्थितियों पर ही कुछ चर्चा कर लेते हैं|

 

 

समाचार चैनल ‘टीवी 18’ के एक एंकर हैं – प्रतीक त्रिवेदी जो ‘भैया जी कहिन’ नाम से चर्चा का एक लोकप्रिय कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं| शाम के समय प्रसारित होने वाला यह कार्यक्रम पहले आउटडोर लोकेशन से सीधे प्रसारित होता था, जिनमें एक लोकेशन अक्सर कनॉट प्लेस की होती थी| काफी भीड़ एकत्रित होती थी इस कार्यक्रम में! अब तो लोगों को इकट्ठा करने वाले कार्यक्रम बंद ही हैं| बहस के कार्यक्रम भी अब स्काइप आदि के माध्यम से चर्चा द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं|

हाँ तो ‘भैया जी’ ने भी जहां तक मुझे याद है 2-3 दिन तो स्टूडिओ से कार्यक्रम प्रस्तुत किए, लेकिन उसके बाद उन्होंने बाहर लोकेशन्स पर जाना शुरू कर दिया| एक लंबी डंडी वाला माइक अब वे इस्तेमाल करते हैं, जिससे दूर खड़े होकर प्रश्न पूछे जा सकते हैं| अब भी वे बाज़ारों, बैंकों, अस्पतालों आदि में जाकर प्रश्न पूछते हैं और बहस के लिए जबकि उनके मेहमान स्काइप के माध्यम से जुडते हैं, वे बाहर की ही किसी लोकेशन पर होते हैं और वहाँ से ही कार्यक्रम का संचालन करते हैं| अक्सर कनॉट प्लेस का उनका शॉट दिखाया जाता है, जिसमें वे कहते हैं – यहाँ पर ही हजारों लोगों की भीड़ जमा होती थी| कुछ स्थितियाँ अतीत की ऐसी होती हैं, जिनकी कमी हमें खलती है| हमें भरोसा है की वे परिस्थितियाँ फिर से वापस लौटेंगी|

लॉक डाउन बढ़ता ही जा रहा है, जरूरत तो यही है कि पूरे अनुशासन के साथ, सभी मिलकर इस स्थिति का सामना करें, परंतु सभी के लिए ऐसा करना संभव नहीं है| कुछ लोगों के लिए दो जून की रोटी का प्रबंध करना भी संभव नहीं है और जबकि प्रदेश की सरकारों द्वारा ऐसा दावा तो किया जा रहा है कि सभी के भोजन और आर्थिक सहायता का प्रबंध किया जा रहा है, लेकिन ये सरकारी प्रयास कितने प्रभावी होते हैं, ये विचारणीय है|

एक समस्या जो भारत में विशेष रूप से है, वह है प्रवासी मजदूरों की| अन्य शहरों में पढ़ने वाले छात्रों को तो पिछले दिनों उनके घरों तक पहुंचाने का काम किया गया और अब मजदूरों को उनके मूल स्थान पर ले जाने का काम भी शुरू किया गया है| मजदूरों को वापस ले जाने का ये काम एक तो आसान नहीं है, ऐसे मजदूर असंख्य हैं| इसके अलावा अब जरूरत इस बात की भी है कि लॉक डाउन को धीरे-धीरे सावधानी के साथ खोला जाए| और जहां ये मजदूर अभी हैं, वहाँ ये रोजगार के लिए आए हैं और रोजगार इनको यहाँ ही मिल पाएगा| इन परिस्थितियों में आवश्यकता इस बात की है कि इनका हौसला बढ़ाया जाए, आवश्यक सहायता सुनिश्चित की जाए और इनको यथाशीघ्र कमाई का साधन उपलब्ध कराया जाए, क्योंकि अभी लौट जाने पर जल्दी ही इनको फिर वापस आने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा|

महाराष्ट्र में रेल पटरी पर हुई 16 मजदूरों की मृत्यु एक हृदय विदारक घटना थी और हमको इस विषय में सोचने के लिए विवश करती है कि इन प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर गंभीरता पूर्वक विचार करने और इनको सहायता और परामर्श प्रदान करने और इनका हौसला बढ़ाने की आवश्यकता है|

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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