अक्स न उसका दिखाई दे!

क्यूँ आईना कहें उसे पत्थर न क्यूँ कहें,
जिस आईने में अक्स न उसका दिखाई दे|

कृष्ण बिहारी नूर

आइना दिखाए मुझे!

अगर यक़ीं नहीं आता तो आज़माए मुझे,
वो आइना है तो फिर आइना दिखाए मुझे|

बशीर बद्र

मैं कभी न गर्द-ओ-ग़ुबार लूँ!

कहीं और बाँट दे शोहरतें कहीं और बख़्श दे इज़्ज़तें,
मिरे पास है मिरा आईना मैं कभी न गर्द-ओ-ग़ुबार लूँ|

बशीर बद्र

आइने को लगे अजनबी से हम!

जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम,
ख़ुद अपने आइने को लगे अजनबी से हम|

निदा फ़ाज़ली

साफ़गोई में दम-ब-दम टूटे!

आईने, आईने रहे, गरचे,
साफ़गोई में दम-ब-दम टूटे|

सूर्यभानु गुप्त

आईना है शाना है!

ख़ुद हुस्न-ओ-शबाब उनका क्या कम है रक़ीब अपना,
जब देखिए अब वो हैं आईना है शाना है|

जिगर मुरादाबादी

’नक़्श’ ने फिर न आइना देखा!

जाने चेहरे पे क्या नज़र आया,
’नक़्श’ ने फिर न आइना देखा।

नक़्श लायलपुरी

नहीं अक्स कोई भी मुस्तक़िल!

ये जो रात दिन का है खेल सा, उसे देख इसपे यकीं न कर,
नहीं अक्स कोई भी मुस्तक़िल सरे-आईना उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

आग का दरिया मुझे!

उसको आईना बनाया, धूप का चेहरा मुझे,
रास्ता फूलों का सबको, आग का दरिया मुझे|

बशीर बद्र