रहज़नी है कि दिल-सितानी है!

रहज़नी है कि दिल-सितानी है,
ले के दिल, दिलसितां रवाना हुआ|

मिर्ज़ा ग़ालिब

बन्दगी में मेरा भला न हुआ!

क्या वो नमरूद की ख़ुदायी थी,
बन्दगी में मेरा भला न हुआ|

मिर्ज़ा ग़ालिब

गालियां खा के बे मज़ा न हुआ!

कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब,
गालियां खा के बे मज़ा न हुआ|

मिर्ज़ा ग़ालिब

जलती है सहर होते तक!

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़मर्ग इलाज,
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक |

मिर्ज़ा ग़ालिब

तुम को ख़बर होते तक!

हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन,
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक|

मिर्ज़ा ग़ालिब

हम पे भी भारी हैं सहर होते तक!

ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र,
सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होते तक|


मिर्ज़ा ग़ालिब