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बड़ी भूल हुई अरे हमने, ये क्या समझा, ये क्या जाना!

आज मोहम्मद रफी साहब का गाया एक बेहद खूबसूरत गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत 1967 मे रिलीज़ हुई फिल्म- ‘पत्थर के सनम’ के लिए मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने लिखा था और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी के संगीत निर्देशन में रफी साहब ने बेहद खूबसूरती और फीलिंग्स की साथ गाया है|

 

 

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत गीत-

 

पत्थर के सनम, तुझे हमने मोहब्बत का खुदा जाना,
बड़ी भूल हुई अरे हमने, ये क्या समझा, ये क्या जाना|

 

चेहरा तेरा दिल में लिए चलते रहे अंगारों पे,
तू हो कहीं, सजदे किये, हमने तेरे रुखसारो के|
हमसा ना हो, कोई दीवाना|

 

सोचा था ये बढ़ जाएगी, तनहाईयाँ जब रातों की, 
रस्ता हमें दिखलाएगी, शम-ए-वफ़ा उन हाथों की|
ठोकर लगी, तब पहचाना|

 

ऐ काश के होती खबर, तूने किसे ठुकराया है,
शीशा नहीं, सागर नहीं, मंदिर सा एक दिल ढाया है|
ता-आसमां, है वीराना|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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चेहरा है जैसे झील मे हँसता हुआ कंवल!

जैसा कि मेरे नियमित पाठक जानते होंगे, मुकेश जी मेरे परम प्रिय गायक हैं, जब मैं फिल्मी गीत शेयर करता हूँ तब सबसे पहले मेरा ध्यान मुकेश जी के गाये हुए गीतों की ओर जाता है, इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य गायकों के प्रति मेरा उतना सम्मान नहीं है। ऐसे भी लोग हैं जो जब पुराने गीतों की बात करते हैं तब उनको मुकेश जी का नाम लेने में ही संकोच होता है।

हाँ जी अपनी-अपनी पसंद है। खैर आज मैं रफी साहब का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, मुझे रफी साहब के भी बहुत सारे गीत प्रिय हैं, पहले भी कुछ गीत शेयर किए हैं मैने उनके। आज का यह गीत 1960 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘चौदहवीं का चांद’ से है, शकील बदायुनी जी के लिखे इस गीत को रफी साहब ने रवि जी के संगीत निर्देशन में गाया था।

इस गीत में शकील साहब ने सौंदर्य की बहुत सुंदर उपमायें दी हैं और रफी साहब ने इसे बड़े सुरीले अंदाज़ में गाया है। लीजिए प्रस्तुत है यह अमर प्रेम गीत-

 

 

चौदहवीं का चाँद हो, या आफ़ताब हो,
जो भी हो तुम खुदा की क़सम, लाजवाब हो।
चौदहवीं का चाँद हो।

 

ज़ुल्फ़ें हैं जैसे काँधों पे बादल झुके हुए,
आँखें हैं जैसे मय के पयाले भरे हुए,
मस्ती है जिसमें प्यार की तुम वो शराब हो।
चौदहवीं का चाँद हो।

 

चेहरा है जैसे झील मे हँसता हुआ कंवल,
या ज़िंदगी के साज़ पे छेड़ी हुई गज़ल,
जाने बहार तुम किसी शायर का ख़्वाब हो।
चौदहवीं का चाँद हो।

 

होंठों पे खेलती हैं तबस्सुम की बिजलियाँ,
सज़दे तुम्हारी राह में करती हैं कहकशाँ,
दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का तुम ही शबाब हो,
चौदहवीं का चाँद हो, या आफ़ताब हो
जो भी हो तुम खुदा की क़सम, लाजवाब हो।
चौदहवीं का चाँद हो।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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