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अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद!

प्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल मैं आज शेयर कर रहा हूँ| उनके उपन्यास – आधा गाँव, दिल एक सादा कागज, टोपी शुक्ला, मैं एक फेरीवाला आदि बहुत प्रसिद्ध हुए थे और बड़ी भावुकता और राजनीति पर पैनी दृष्टि के साथ उन्होंने ये उपन्यास लिखे हैं| उनको पद्मश्री, पद्मभूषण आदि प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था| उनके लिखे कई गीत भी काफी लोकप्रिय हुए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की ये खूबसूरत ग़ज़ल, जिसे जगजीत सिंह जी ने भी गाया है-

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद,
अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद|

जिन आँखों में काजल बनकर, तैरी काली रात,
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद|

रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर,
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद|

चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते,
मेरे बिन किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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