उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है!

अब हो मुझे देखिए कहाँ सुब्ह,
उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला!

सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरत,
रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला|

अहमद फ़राज़

विसर्जन!

छायावाद युग की कविताओं को शेयर करने के क्रम में आज उस युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| महादेवी जी को उनके सुमधुर गीतों के लिए जाना जाता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की यह कविता –

निशा की, धो देता राकेश
चाँदनी में जब अलकें खोल,
कली से कहता था मधुमास
बता दो मधुमदिरा का मोल;

बिछाती थी सपनों के जाल
तुम्हारी वह करुणा की कोर,
गई वह अधरों की मुस्कान
मुझे मधुमय पीडा़ में बोर;

झटक जाता था पागल वात
धूलि में तुहिन कणों के हार;
सिखाने जीवन का संगीत
तभी तुम आये थे इस पार!

गये तब से कितने युग बीत
हुए कितने दीपक निर्वाण!
नहीं पर मैंने पाया सीख
तुम्हारा सा मनमोहन गान।


भूलती थी मैं सीखे राग
बिछलते थे कर बारम्बार,
तुम्हें तब आता था करुणेश!
उन्हीं मेरी भूलों पर प्यार!

नहीं अब गाया जाता देव!
थकी अँगुली हैं ढी़ले तार
विश्ववीणा में अपनी आज
मिला लो यह अस्फुट झंकार!


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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रात है जो कटी नहीं है!

इक सुब्ह है जो हुई नहीं है,
इक रात है जो कटी नहीं है|

अली सरदार जाफ़री

सामने फ्लैट पर!

स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की पहचान मुख्य रूप से एक व्यंग्य लेखक के रूप में थी लेकिन उन्होंने कुछ सुंदर कविताएं भी लिखी थीं| आज मैं स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जिसमें दिन का चित्रण देखिए किस-किस रूप में किया गया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता –

सामने फ्लैट पर
जाड़ों की सुबह ने
अलसाकर जूड़ा बाँधा;

नीचे के तल्ले में
मफ़लर से मुँह ढाँप
सुबह ने सिगरेट पी

चिक पड़ी गोश्त की दुकान पर
सुबह के टुकड़े-टुकड़े किए गए,

मेरे बरामदे में
सुबह ने अख़बार फ़ेंका;

इसके बाद बंबा खोल
मांजने लगी बरतन

किनारे की बस्तियों से
कमर पर गट्ठर लाद
सुबह चली नदी की ओर;

सिगनल के पास
मुँह में कोयला भरे लाल सीटी देती
सुबह पुल पर गुज़री।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जलती है सहर होते तक!

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़मर्ग इलाज,
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक |

मिर्ज़ा ग़ालिब

सुर्ख़ियों मे बिखेरता है मुझे!

सुब्‌ह अख़बार की हथेली पर,
सुर्ख़ियों मे बिखेरता है मुझे|

बेकल उत्साही

कहीं शाम तक न पहुँचे!

नयी सुबह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है,
ये सहर भी रफ़्ता-रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे।

शकील बदायूँनी

तितली मुस्कुराती है!

चमन में सुबह का मंज़र बड़ा दिलचस्प होता है,
कली जब सो के उठती है तो तितली मुस्कुराती है|

मुनव्वर राना

उठ मेरी बेटी सुबह हो गई!

लीजिए आज एक बार फिर से स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता प्रस्तुत है| जैसा कि मैंने पहले भी उनके बारे में लिखा है वे साप्ताहिक समाचार पत्रिका- ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में थे और हिन्दी के श्रेष्ठ कवि थे| कुछ कविताओं में उनकी अभिव्यक्ति वास्तव में अद्वितीय रही है| आज की कविता में उन्होंने सोती हुई बेटी को जगाने के बहाने कुछ अच्छी बातें की हैं| जैसे सुलाने के लिए लोरी सुनाते हैं वैसे जगाने के लिए भी कविता में कुछ बढ़िया बातें की गई हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता –

पेड़ों के झुनझुने,
बजने लगे;
लुढ़कती आ रही है
सूरज की लाल गेंद।
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।

तूने जो छोड़े थे,
गैस के गुब्बारे,
तारे अब दिखाई नहीं देते,
(जाने कितने ऊपर चले गए)
चांद देख, अब गिरा, अब गिरा,
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।

तूने थपकियां देकर,
जिन गुड्डे-गुड्डियों को सुला दिया था,
टीले, मुंहरंगे आंख मलते हुए बैठे हैं,
गुड्डे की ज़रवारी टोपी
उलटी नीचे पड़ी है, छोटी तलैया
वह देखो उड़ी जा रही है चूनर
तेरी गुड़िया की, झिलमिल नदी
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।

तेरे साथ थककर
सोई थी जो तेरी सहेली हवा,
जाने किस झरने में नहा के आ गई है,
गीले हाथों से छू रही है तेरी तस्वीरों की किताब,
देख तो, कितना रंग फैल गया

उठ, घंटियों की आवाज धीमी होती जा रही है
दूसरी गली में मुड़ने लग गया है बूढ़ा आसमान,
अभी भी दिखाई दे रहे हैं उसकी लाठी में बंधे
रंग बिरंगे गुब्बारे, कागज़ पन्नी की हवा चर्खियां,
लाल हरी ऐनकें, दफ्ती के रंगीन भोंपू,
उठ मेरी बेटी, आवाज दे, सुबह हो गई।

उठ देख,
बंदर तेरे बिस्कुट का डिब्बा लिए,
छत की मुंडेर पर बैठा है,
धूप आ गई।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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