मैं शिवालों को क्या करूँ!

दिल ही बहुत है मेरा इबादत के वास्ते,
मस्जिद को क्या करूँ मैं शिवालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

मै-कदों में मगर दूर दूर था!

‘मुल्ला’ का मस्जिदों में तो हमने सुना न नाम,
ज़िक्र उसका मै-कदों में मगर दूर दूर था|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

घर में कहीं ख़ुदा रखना!

मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये,
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना|

निदा फ़ाज़ली

फिर ज़मीं पर कहीं–

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है|

सुदर्शन फाक़िर