सुदामा और बिल्लू बार्बर!

तुलना करना अक्सर प्रासंगिक नहीं होता, लेकिन हमारी आदत है कि हम तुलना करते रहते हैं| वैसे यह बहुत सी बार चीजों, व्यक्तियों और परिस्थितियों को समझने में सहायक भी होती है|



आज अचानक मन हुआ, दो व्यक्तियों की मित्रता की तुलना करने का| यद्यपि इनमें से एक को तो हम ईश्वर का दर्जा देते हैं और एक फिल्मी कैरेक्टर है, सुपर स्टार का, जिस भूमिका को वास्तव में एक सुपर स्टार शाहरुख खान ने निभाया था|

हां तो मैं बता दूं कि पहला प्रसंग तो कृष्ण और सुदामा की मित्रता का है, जिसका उल्लेख मैंने कुछ दिन पहले ही अपने ब्लॉग में किया था कि किस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण का बालसखा सुदामा उनके महल में जाता है और उसकी स्थिति देखकर द्वारपाल अचंभे में पड़ जाता है, उसको लगता है कि जैसी स्थिति इस व्यक्ति की है, इसको तो मैं भी अपना मित्र न बनाऊँ और यह बताता है कि यह महाराज श्रीकृष्ण का मित्र है| लेकिन वह श्रीकृष्ण जी को खबर देता है और उन दोनों मित्रों का मिलना होता है, बाकी सब कहानी आपको ज्ञात ही है| रहीम दास जी कहते हैं:

जो गरीब पर हित करें, ते रहीम बड़ लोग,
कहां सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग!


खैर इस प्रसंग को याद करते समय ही अचानक मुझे फिल्म ‘बिल्लू बार्बर’ की याद आ गई, इस फिल्म में जो प्रसंग है वह वास्तविकता के बहुत निकट लगता है| इस कहानी में इरफान खान ने बिल्लू बार्बर की भूमिका निभाई है, जो शाहरुख खान (साहिर) का बचपन का मित्र था, जो बाद में सुपर स्टार साहिर खान बन जाता है| बिल्लू बार्बर की भी आज गांव में वही स्थिति है जो गरीब सुदामा की थी, बच्चों के स्कूल छोड़ने की भी नौबत आ रही है|

ऐसे में अचानक खबर आती है कि सुपर स्टार ‘साहिर खान’ गांव में शूटिंग के लिए आ रहे हैं, लोगों ने बिल्लू की साहिर खान के साथ दोस्ती के बारे में सुना था, सब उसके माध्यम से साहिर खान से मिलना चाहते हैं| उसकी पत्नी भी जिद करती है कि वह अपने दोस्त से मिलकर मदद मांगे| मजबूर होकर स्वाभिमानी बिल्लू मिलने की कोशिश करता है, कोई उसको पहचानने को तैयार नहीं होता, वह साहिर के रूम पर फोन करता है, जिसे उसका सहायक उठाता है और उसका नाम बिल्लू बार्बर सुनकर हँसता है, और साहिर खान को उसकी खबर नहीं देता|

खैर स्कूल के एक समारोह में साहिर खान खुद, अपने बचपन के दोस्त बिल्लू बार्बर का उल्लेख अपनी आँखों में आँसू लाते हुए करता है और फिर उनका मिलना होता है|

मुझे ऐसे ही इन दो मित्रताओं का स्मरण हो आया, यद्यपि इनमें से एक तो फिल्मी कहानी है, लेकिन उसमें जो स्थितियां दिखाई गई हैं, वे वास्तविक लगती हैं| श्रीकृष्ण जी के या कहें राजा महाराजाओं के जमाने में तो उनके पास तक पहुँचना संभव था, लेकिन आज जो स्टार बन जाता है, उससे मिलना संभव नहीं होता|

ऐसे ही मुझे अपना प्रसंग याद आ गया| मुझे वैसे प्रसिद्ध व्यक्तियों के पीछे भागने का शौक नहीं है, लेकिन याद आया तो यह जिक्र कर रहा हूँ| कवि कुमार विश्वास जब मंचों पर इतना जमे नहीं थे, हां संचालन बहुत बढ़िया करते थे, तब मैंने उनको तीन बार एनटीपीसी में आयोजित कवि सम्मेलनों में बुलाया, मेरा मानना था कि तब हमारी अच्छी मित्रता हो गई थी|

2010 में रिटायर होने के बाद मैं गुड़गांव आ गया तब कई बार उनसे बात हुई, उन्होंने कहा कि कभी घर आओ, मैं गाड़ी भेजकर बुला लूँगा, मैंने इसमें तब कोई रुचि नहीं दिखाई, बाद में वे राजनीति में भी सक्रिय हो गए, जब उन्होंने पुराने कवियों की कविताओं पर आधारित वीडियो बनाए तब उनके बारे में अपनी राय देने के लिए मैंने शायद दो बार फोन किया, तब लगता है मेरी स्थिति भी बिल्लू बार्बर वाली हो गई थी, उनके सहायक ने पूछा आप कौन हैं और या तो उसने विश्वास जी को नहीं बताया या संभव है कि उन्होंने ही टाल दिया हो|

अब तो मैं पिछले लगभग चार साल से गुड़गांव छोड़कर गोवा में रह रहा हूँ, इसलिए वैसे भी विश्वास जी से मिलना संभव नहीं है|

बस ऐसे ही खयाल आया कि कृष्ण सुदामा, साहिर बिल्लू बार्बर आदि की श्रेणी में अपना भी नाम लिखकर देख लिया जाए|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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काहे को दुनिया बनाई!

एक बार फिर से आज सामान्य जन के कवि, शैलेन्द्र जी की बात करते हैं और उनके ड्रीम प्रोजेक्ट, फिल्म- ‘तीसरी कसम’ का एक गीत शेयर करूंगा| शैलेन्द्र जी की इस नायाब फिल्म की खास बात यह है कि फणीश्वरनाथ रेणु जी की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ऐसी फिल्म बनाना एक बहुत बड़ा जोखिम था, जिसे शैलेन्द्र जी ने उठाया और सखा रआज कपूर जी ने , जो ड्रीम मर्चेन्ट थे, भव्य सेट्स पर बनने वाली फिल्मों के लिए जाने जाते थे, उन्होंने इस फिल्म के लिए एक सीधे-सादे देहाती की भूमिका निभाई, और यह भूमिका उन्होंने मांग कर ली, शैलेन्द्र किसी कम प्रसिद्ध कलाकार को यह भूमिका देना चाहते थे, जिसकी ग्लैमरस इमेज न हो, लेकिन मानना पड़ेगा कि रआज कपूर जी ने इस भूमिका के साथ पूरा न्याय किया|

फिल्म के बारे में बहुत सी बातें की जा सकती हैं, फिलहाल मैं जो गीत शेयर कर रहा हूँ, उसकी ही बात करूंगा और उसे शेयर करूंगा| शैलेन्द्र जी के लिखे इस गीत के लिए संगीत शंकर जयकिशन की सुरीली जोड़ी ने दिया है और इसे सीधे-साधे गाड़ीवान बने रआज कपूर पर फिल्माया गया है| गीत में शैलेन्द्र जी ने जैसे एक सरल और निष्कपट ग्रामीण के मन को जैसे खोलकर रख दिया है, किस तरह सरलता के साथ वह ईश्वर से संवाद और शिकायत करता है| बाकी तो गीत अपने आप बयान करता है| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-


दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तूने काहे को दुनिया बनायी|

काहे बनाये तूने माटी के पुतले
धरती ये प्यारी प्यारी मुखड़े ये उजले
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला
जिसमें लगाया जवानी का मेला
गुप-चुप तमाशा देखे वाह रे तेरी खुदाई|
काहे को दुनिया बनायी|



तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर
तूफां ये प्यार का मन में छुपाकर
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
आंसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी
बोल क्या सूझी तुझको
काहे को प्रीत जगाई
काहे को दुनिया बनायी
तूने काहे को दुनिया बनायी|



प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया
हँसना सिखाया, रोना सिखाया
जीवन के पथ पर मीत मिलाये
मीत मिला के तूने सपने जगाए
सपने जगा के तूने, काहे को दे दी जुदाई
काहे को दुनिया बनायी तूने
दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनाई|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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झूठी कहानी पे रोये!

आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रची गई एक संभवतः काल्पनिक प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ से है, जो अपने आप में ही एक ऐतिहासिक फिल्म थी| उस समय तक शायद ऐसे भव्य सेट्स और ऐसी स्टार-कास्ट वाली और फिल्में नहीं बनी थीं| इस फिल्म में पृथ्वी राज कपूर साहब, दिलीप कुमार जी, मधुबाला जी, दुर्गा खोटे जी और अनेक अन्य कलाकारों ने लाजवाब अभिनय किया था| के. आसिफ साहब की यह फिल्म, हिन्दी फिल्मों के इतिहास में एक मील का पत्थर थी|

लीजिए अब मैं लता मंगेशकर जी के गाये इस मधुर गीत को शेयर कर रहा हूँ, जो प्रेम में मिली भयंकर चोट को बयां करता है| गीत लिखा है- शकील बदायुनी साहब ने और इसका मधुर संगीत दिया है नौशाद अली साहब ने| प्रस्तुत है यह गीत-



मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये,

बड़ी चोट खाई
जवानी पे रोये
जवानी पे रोये|

मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये

न सोचा न समझा
न देखा न भाला
तेरी आरज़ू ने हमें मार डाला
तेरे प्यार की मेहरबानी
पे रोये, रोये|


मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये|

खबर क्या थी होठों
को सीना पड़ेगा,
मोहब्बत छुपा
के भी जीना पड़ेगा,
जिए तो मगर
ज़िंदगानी पे रोये रोये|

मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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शकुंतला देवी के बहाने!

ग्रेट मेथमेटिकल जीनियस, गणित के कठिन से कठिन सवाल मिनटों में हल कर देने वाली शकुंतला देवी के जीवन पर बनी फिल्म देख ली, उनके बारे में अनेक जानकारियाँ प्राप्त करके अच्छा लगा|


मुझे आशा है कि इस फिल्म के लिए अच्छी शोध की गई होगी और शकुंतला देवी के किरदार को पर्दे पर विद्या बालन जी के रूप में देखना अच्छी बात है क्योंकि विद्या जी अपनी प्रत्येक भूमिका के लिए पूरी मेहनत करती हैं और निर्देशक अनु मेनन भी इस अच्छी फिल्म के लिए बधाई के पात्र हैं|


शकुंतला देवी का गणित ज्ञान अत्यंत चमत्कारी था यह तो हमने सुना ही था, लेकिन यह मालूम नहीं था कि उनको औपचारिक स्कूली शिक्षा प्राप्त करने का अवसर ही प्राप्त नहीं हो पाया था| जैसा फिल्म में दिखाया गया है, गाँव-देहात में रहने वाली इस बालिका के चमत्कार को देखते हुए उनके पिता उनको जगह-जगह स्कूलों, क्लबों आदि में उनका चमत्कार दिखाकर कमाई करने के लिए ले जाते रहते थे| उनको इस बालिका की आवश्यकताओं का बिलकुल खयाल नहीं रहता था, उसके ‘शो’ कराने का अलावा वो बस बैठकर अखबार पढ़ते थे|


इस प्रकार शकुंतला देवी को एक सामान्य बालिका की तरह खेलने-कूदने का अवसर नहीं मिला, बचपन पूरी तरह छिन गया| पिता से तो शकुंतला देवी कोई उम्मीद रखती नहीं परंतु उनको अपनी माँ से शिकायत रहती है कि वो कुछ नहीं बोलती, लेकिन माँ एक सामान्य गृहिणी है जो शांत ही रहती है| बचपन का सिलसिला जवानी तक जारी रहता है और वह पाती है कि उसका प्रेमी भी उसका शोषण करना चाहता था| अंततः ऐसी परिस्थिति बनती है कि वह भारत छोड़कर लंदन चली जाती है, अपने गणित के चमत्कारों के बल पर कमाने के लिए, जबकि उनको अँग्रेजी का भी पर्याप्त ज्ञान नहीं है|


किसी तरह संघर्ष करके वह अपना स्थान बनाती है, इतना ही नहीं, वह अथाह ख्याति और धन अर्जित करती है| वह कलकत्ता के एक अधिकारी से शादी भी करती है| लेकिन उसने चुना था कि वह अपनी माँ जैसी नहीं बनेगी, माँ एकदम बोलती नहीं थी और वह किसी को बोलने नहीं देती| उसकी एक पुत्री होती है और उसके बाद वह अपने शो करने के लिए विदेश भ्रमण पर चली जाती है| कुछ समय बाद वह अपने पति से झगड़कर अपनी बेटी को भी साथ ले जाती है और उसको गणित के चमत्कार सिखाने की कोशिश करती है| लेकिन बेटी महसूस करती है कि प्यार तो उसको अपने पिता से ही मिलता था|


शकुंतला देवी को बचपन नहीं मिल पाया था उनके पिता के लालच के कारण लेकिन वे अपनी बच्ची के बचपन के बारे में, उसकी आकांक्षाओं के बारे में सोच ही नहीं पातीं, क्योंकि वह उनके साथ दुनिया घूम रही है, बड़े-बड़े लोगों से मिल रही है, अपनी ख्याति की चकाचौंध में यह सोच ही नहीं पातीं कि बच्ची की कुछ और भी अभिलाषाएँ होंगी| परिणाम यह कि उनकी बेटी भी उनसे वैसे ही नफरत करती है, जैसे वो अपनी माँ से करती थीं|


कुल मिलाकर यह कि इस फिल्म से हमने शकुंतला देवी के चमत्कारिक जीवन, उनकी उपलब्धियों की झलक तो देखी ही, उसके अलावा मनोवैज्ञानिक स्तर पर संबंधों की प्रस्तुति और उसका विश्लेषण भी बहुत सुंदर किया गया है|


ये कुछ बातें हैं जो ‘शकुंतला देवी’ फिल्म देखने के बाद मेरे मन में आईं, सो मैंने आपसे शेयर कर लीं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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लूटकेस की यात्रा!

आज बात कर लेते हैं हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई फिल्म- ‘लूटकेस’ को देखने के अनुभव के बारे में| क्षमा करें मैं अपने आप को क्रिटिक की भूमिका में रखकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता, बस इस फिल्म को देखने के अनुभव के बारे में बात कर लेता हूँ|


हाँ तो इस फिल्म का नायक कुणाल खेमू एक आम आदमी है, जो एक प्रेस में काम करता है, प्रेस का मालिक उसको ईमानदार मानता है और उसको इसके लिए एक बार ईनाम भी दिया जाता है| हाँ तो जिस प्रकार किसी आम ईमानदार इंसान के दिन बीतते हैं, वैसे ही फिल्म के नायक नंदन कुमार (कुणाल खेमू) के भी दिन बीतते हैं| जब वह किसी मामले में पैसे नहीं दे पाता तो पत्नी पूछती है कि ‘कुछ पैसे अपनी बहन को दे दिए क्या?’ और हाँ दिन वैसे ही बीत रहे होते हैं, जैसे किसी आम ईमानदार व्यक्ति के बीतते हैं!


ऐसे में नायक को अचानक दो हजार के नोटों की गड्डियों से भरा एक विशाल सूटकेस मिलता है| शुरू में अपनी ईमानदारी और भय से लड़ने के बाद वह उस सूटकेस को उठाकर किसी तरह अपने घर तक पहुँच जाता है| इन नोटों को लेकर अपने घर तक पहुँचने और फिर उनको अपनी अति ईमानदार पत्नी से छिपाकर रखने का संघर्ष भी देखने लायक होता है|


इन नोटों का, इस विशाल धनराशि का इस्तेमाल कर पाना भी उस छोटे-छोटे सपनों वाले आम आदमी के लिए लगभग असंभव है| हाँ इतना अवश्य है कि अब उसकी पत्नी और बेटे को अपनी मनवांछित सुविधाएं बड़े आराम से मिल जाती हैं और पत्नी को यह नहीं कहना पड़ता कि ‘अपनी बहन को पैसे दे दिए क्या?’ लेकिन नायक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पैसे को संभालकर कहाँ रखे और कैसे उनका उपयोग करे| एक तरीका है बस कि मकान खरीद लिया जाए लेकिन यह काम भी नकद पैसे से करना संभव नहीं है|


उधर इस पैसे के जो असली मालिक थे, राजनीति और अपराध की दुनिया के चरित्र- एक तो विधायक जी- गजराज राव और दूसरे गैंगस्टर – विजय राज, दोनों ही मंजे हुए कलाकार हैं| इन लोगों के लिए इतनी बड़ी रकम का व्यवहार करना कोई बड़ी बात नहीं है और हाँ उन लोगों के संघर्ष के बीच ही यह सूटकेस सड़क पर छूट गया था, जहां से यह नायक, इस सामान्य नागरिक के हाथ लग गया और वह इसको संभालने में ही परेशान है और उसके व्यवहार में भी उसका यह असमंजस झलकने लगा और शायद उसी के बल पर नेताजी का पाला हुआ पुलिस वाला उस तक पहुँच जाता है|


इस पुलिस वाले को पैसे के साथ रखी फाइल के माध्यम से नेताजी के काले कारनामों का पता चलता है और वह भी खुद इस पैसे को रख लेना चाहता है| लेकिन वहाँ नेताजी, गैंगस्टर और पुलिस वाला, सब एक-दूसरे का पीछा करते हैं और अंत में सब निपट जाते हैं| एक बार फिर से लूट का वह बैग नायक के सामने होता है, अब वह क्या करेगा!कुल मिलाकर इस फिल्म को देखने में भरपूर आनंद आया|


आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|


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क़ीमत नहीं चुकाई गइ इक ग़रीब से!

आज फिल्म- ‘एक महल हो सपनों का’ से किशोर कुमार साहब का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| 1975 में रिलीज़ हुई इस फिल्म का यह गीत लिखा है- साहिर लुधियानवी जी ने और इसके लिए संगीत दिया था- रवि जी ने|

वास्तव में कविता और गीत ज़िंदगी के खट्टे-मीठे अनुभवों के आधार पर ही लिखे जाते हैं और कड़ुवे अनुभवों पर आधारित गीत शायद ज्यादा प्रभाव डालते हैं| दुनिया में वैसे तो शायद सभी लोग ये मानते हैं की वे प्रेम करने के लिए आए हैं, लेकिन बहुत से लोगों के लिए यह दुर्लभ ही रह जाता है| क्योंकि जहां हिसाब-किताब है वहाँ प्रेम नहीं है और जहां प्रेम है, वहाँ हिसाब-किताब नहीं है| प्रेम तो सिर्फ देना जानता है, लेकिन ऐसा सबके साथ कहाँ हो पाता है|

 

 

लीजिए आप किशोर दा के गाये  इस गीत का आनंद लीजिए-

 

देखा है ज़िंदगी को, कुछ इतना करीब से,
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से|

 

कहने को दिल की बात जिन्हें ढूँढते थे हम,
महफ़िल में आ गये हैं वो अपने नसीब से|
देखा है ज़िंदगी को, कुछ इतना करीब से||

 

नीलाम हो रहा था किसी नाज़नीं का प्यार,
क़ीमत नहीं चुकाई गइ इक ग़रीब से|
देखा है ज़िंदगी को, कुछ इतना करीब से||

 

तेरी वफ़ा की लाश पे, ला मैं ही डाल दूँ,
रेशम का ये कफ़न जो मिला है रक़ीब से|
देखा है ज़िंदगी को, कुछ इतना करीब से||

 

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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शरमा न जाएं फूलों के साये!

आज ऐसे ही एक पुरानी फिल्म का गीत याद आ रहा है, यह गीत है 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘नज़राना’ का, जिसके नायक राज कपूर जी थे और नायिका थीं वैजयंती माला जी। इस गीत को लिखा है राजिंदर कृष्ण जी ने और रवि जी के संगीत निर्देशन में इसे गाया है- मेरे प्रिय गायक मुकेश जी और स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने।

बस यूं ही इस गीत को सुनकर यह खयाल आता है कि प्रेम में, रोमांस में अपनी बात कहने के लिए, कवि-शायर लोग क्या-क्या बेतुकी लगने वाली कल्पनाएं कर लेते हैं। बहुत सुंदर गीत है, इसकी लिरिक को पढ़कर इस मधुर गीत को याद कर लीजिए-

 

 

बिखरा के जुल्फें चमन में न जाना
क्यों-
इसलिए, कि शरमा न जाएं फूलों के साये,
मोहब्बत के नग्में तुम भी ना गाना
क्यों-
इसलिए, कि भँवरा तुम्हारी हँसी ना उड़ाये।

 

मोहब्बत की भँवरे को पहचान क्या
ये कलियों से पूछो हमें क्या पता,
सौदाई होगा
हम तो नहीं हैं
कहीं सीख लेना ना इसकी अदा,
ज़ुबां पर कभी बात ऐसी ना लाना
क्यों-
इसलिए, कि दुनिया से रस्म-ए-वफ़ा मिट ना जाये।

 

कहो साथ दोगे कहाँ तक मेरा
वहाँ तक जहाँ आसमान झुक रहा,
बोलो चलोगी
जो तुम ले चलोगे,
कहीं राह में हो ना जाना जुदा।
मेरा प्यार देखेगा सारा ज़माना,
क्यों-
इसलिए, कि वादे किए और कर के निभाए।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।
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