क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी!

हमारे शौक़ की ये इंतिहा थी,
क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी|

जावेद अख़्तर

चाँद से आगे निकल गए!

दीवाना-वार चाँद से आगे निकल गए,
ठहरा न दिल कहीं भी तिरी अंजुमन के बा’द|

कैफ़ी आज़मी

आगे निकल के देखते हैं!

रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-ख़िराम कोई तो हो,
सो आज अपने आप से आगे निकल के देखते हैं|


अहमद फ़राज़

उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ!

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे
फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ,
बार-हा तोड़ चुका हूँ जिनको
उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ|

कैफ़ी आज़मी

गुबारे-कारवाँ मेरा!

बचाकर रख उसे मंज़िल से पहले रूठने वाले,
तुझे रस्ता दिखाएगा गुबारे-कारवाँ मेरा|

बेकल उत्साही

पत्थर का हो जायेगा !

लोगो मेरे साथ चलो तुम जो कुछ है वो आगे है,
पीछे मुड़ कर देखने वाला पत्थर का हो जायेगा|

क़तील शिफ़ाई