ये दयार-ए-इश्क़ है!

ये दयार-ए-इश्क़ है इसमें सहर,
बस्तियाँ कम कम हैं वीराने बहुत|

महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’

देने हैं नज़राने बहुत!

ये जिगर, ये दिल, ये नींदें, ये क़रार,
इश्क़ में देने हैं नज़राने बहुत|

महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’

हक़ीक़त के हैं अफ़साने बहुत!

ये हक़ीक़त है कि मुझको प्यार है,
इस हक़ीक़त के हैं अफ़साने बहुत|

महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’

बनते हैं अंजाने बहुत!

क्या तग़ाफ़ुल का अजब अन्दाज़ है,
जानकर बनते हैं अंजाने बहुत|

महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’

हैं वरना मयखाने बहुत!

साक़िया हम को मुरव्वत चाहिए,
शहर में हैं वरना मयखाने बहुत|

महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’

मुझको समझाने बहुत!

आ रहे हैं मुझको समझाने बहुत,
अक़्ल वाले कम हैं, दीवाने बहुत|

महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’