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बहारो थाम लो अब दिल!

आज फिर से एक बार मैं एक युगल गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे लता मंगेशकर जी और मुकेश जी ने गाया है| फिल्म – ‘नमस्ते जी’ के लिए यह गीत लिखा था अंजान साहब ने और इसका संगीत दिया था जी एस. कोहली जी ने| मुकेश जी और लता जी के बहुत से रोमांटिक गीतों में यह गीत भी शामिल है|

लीजिए आज प्रस्तुत है यह मधुर गीत-


बहारो थाम लो अब दिल,
मेरा महबूब आता है,
शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|

कहर अंदाज़ हैं तेरे,
क़यामत हैं तेरी बातें|
मेरी तो जान लेंगे
ये बातें ये मुलाकातें|
सनम शरमाए जब ऐसे,
मज़ा कुछ और आता है|


शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|

लबों पर ये हँसी कातिल,
गज़ब जादू निगाहों में,
कसम तुझको मुहब्बत की
मचल ऐसे न राहों में|
मचल जाता है दिल जब
रू-ब-रू दिलदार आता है|

बहारो थाम लो अब दिल,
मेरा महबूब आता है,
शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
* *****

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छोड़ गए बालम!

आज एक बार फिर से मैं राज कपूर साहब की एक फिल्म- बरसात का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे लता मंगेशकर जी और मुकेश जी ने गाया है| यह गीत लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इसका संगीत दिया था शंकर जयकिशन की जोड़ी ने| जैसा कि आप गीत के बोल पढ़कर याद कर सकते हैं, यह बहुत ही प्यारा गीत है|

लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-


छोड़ गए बालम
मुझे हाय अकेला छोड़ गए
तोड़ गए बालम
मेरा प्यार भरा दिल तोड़ गए|

छूट गया बालम
हाय साथ हमारा छूट गया|
टूट गया बालम
मेरा प्यार भरा दिल टूट गया|


फूल संग मुस्काएं कलियाँ
मैं कैसे मुस्काऊँ
बादल देख के भर आई अंखियाँ
छम-छम नीर बहाऊँ
मैं छम-छम नीर बहाऊँ|

छूट गया बालम
हाय साथ हमारा छूट गया,
टूट गया बालम
मेरा प्यार भरा दिल टूट गया|


दिल की लगी को क्या कोई जाने
मैं जानूं दिल जाने,
पलकों की छाया में नाचे
दर्द भरे अफ़साने
हाय दर्द भरे अफ़सा
ने,

छोड़ गए बालम
मुझे हाय अकेला छोड़ गए|
तोड़ गए बालम
मेरा प्यार भरा दिल तोड़ गए|


पहले मन में आग लगी और
फिर बरसी बरसात,
ऐसी चली बिरहा की आंधी
तड़पत हूँ दिन-रात
मैं तड़पत हूँ दीन-रात|


छूट गया बालम
हाय साथ हमारा छूट गया|
छोड़ गए बालम
मुझे हाय अकेला छोड़ गए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बदनाम न हो प्यार मेरा!

आज मैं एक बार फिर से हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी और लता जी का गाया एक युगल गीत शेयर कर रहा हूँ, 1953 में रिलीज़ हुई राज कपूर जी की फिल्म- ‘आह’ के लिए इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी जी ने और शंकर – जयकिशन की संगीतमय जोड़ी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी और लता मंगेशकर जी ने गाया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है मुकेश जी और लता जी का यह बहुत प्यारा सा गीत –


आजा रे अब मेरा दिल पुकारा
रो-रो के ग़म भी हारा
बदनाम न हो प्यार मेरा|

मौत मेरी तरफ आने लगी
जान तेरी तरफ जाने लगी
बोल शाम-ए-जुदाई क्या करे
आस मिलने की तड़पाने लगी|

घबराए हाय रे दिल
सपनों में आ के कभी मिल|


अपने बीमार-ए-ग़म को देख ले
हो सके तो तू हम को देख ले
तूने देखा न होगा ये समां
कैसे जाता है दम वो देख ले|

आजा रे अब मेरा दिल पुकारा
रो-रो के ग़म भी हारा
बदनाम न हो प्यार मेरा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दम भर जो उधर मुँह फेरे!

आज मुकेश जी और लता जी का एक रोमांटिक युगल गीत याद आ रहा है| गीतकार शैलेन्द्र जी का लिखा यह गीत, 1951 में रिलीज़ हुई फिल्म-‘आवारा’ में राज कपूर और नर्गिस की सदाबहार जोड़ी पर फिल्माया गया था और इसका मधुर संगीत शंकर-जयकिशन की संगीतमय जोड़ी ने तैयार किया था|

हमारे कवि-रचनाकार चांद से भी क्या-क्या काम करवाते हैं| इस गीत में शर्मीली नायिका तो चांद से अनुरोध करती है कि वह छिप जाए, जिससे वह नायक से कुछ प्यार कर सके| लेकिन नायक जो अपने आप को खुले-आम चोर घोषित करता है, वो चांद से कहता है कि वह देखे और इसकी गवाही भी दे कि वह किस तरह दिल चुराता है|

लीजिए प्रस्तुत है फिल्म- ‘आवारा’ का यह चुलबुला गीत-


दम भर जो उधर मुँह फेरे, ओ चंदा,
मैं उनसे प्यार कर लूँगी, बातें हज़ार कर लूँगी|

दिल करता है प्यार के सजदे, और मैं भी उनके साथ
चांद को चंदा रोज ही देखे, मेरी पहली रात,
बादल में अब छुप जा रे, ओ चंदा
मैं उनसे प्यार कर लूँगी, बातें हज़ार कर लूँगी|


दमभर जो इधर मुँह फेरे, ओ चंदा
मैं उन से प्यार कर लूँगा, नज़रें तो चार कर लूँगा

मैं चोर हूँ काम है चोरी, दुनिया में हूँ बदनाम
दिल को चुराता आया हूँ, ये ही है मेरा काम
आना तू गवाही देने, ओ चंदा
मैं उनसे प्यार कर लूँगा, नज़रें तो चार कर लूँगा|


दिल को चुरा के खो मत जाना, राह न जाना भूल
इन कदमों से कुचल न देना मेरे दिल का फूल
ये बात उन्हे समझा दे, ओ चंदा
मैं उन से प्यार कर लूँगी, बातें हज़ार कर लूँगी|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेक़रार!

आज मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक अत्यंत मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे मुकेश जी और लता जी ने 1974 में रिलीज़ हुई फिल्म – फिर कब मिलोगी के लिए गाया था और इस गीत में प्रत्येक पंक्ति के बाद जो गूंज रह जाती है, वह विशेष प्रभाव छोड़ती है| मजरूह सुल्तानपुरी साहब के लिखे इस गीत को मुकेश जी और लता जी ने, आर डी बर्मन साहब के संगीत निर्देशन में अनोखे अंदाज़ में गाया है|

 

 

लीजिए गीत के बोलों को सुनकर उस अनोखी अदायगी को याद कीजिए-

 

कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार,  जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेकरार|

 

दूर ज़ुल्फों की छाँव से, कहता हूँ ये हवाओं से,
उसी बुत की अदाओं के, अफ़साने हज़ार|
वो जो बाहों मे मचल जाती, हसरत ही निकल जाती,
मेरी दुनिया बदल जाती, मिल जाता करार|

 

कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार,  जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेकरार|

 

अरमां है कोई पास आए, इन हाथों मे वो हाथ आए,
फिर खवाबों की घटा छाये, बरसाए खुमार|
फिर उन्ही दिन रातों पे, मतवाली मुलाक़ातों पे,
उलफत भारी बातों पे, हम होते निसार|

 

कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार,  जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेकरार|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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