भीगी पलकें न झुका!

एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट और मुकेश जी का एक प्यारा गीत, एक बार और!

आज मुझे मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का गाया एक बहुत सुंदर गीत याद आ रहा है | फिल्म- साथी के लिए इस गीत को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इसका संगीत दिया था- नौशाद साहब ने|

कुल मिलाकर इस गीत में ऐसा दिव्य वातावरण तैयार होता है, ऐसा लगता है की प्रेम का एक अनोखा स्वरूप उद्घाटित होता है, जिसमें प्रेम और पूजा, आपस में घुल-मिल जाते हैं| लीजिए इस अमर गीत का आनंद लीजिए-

हुस्न-ए-जानां इधर आ,
आईना हूँ मैं तेरा|
मैं संवारूंगा तुझे,
सारे ग़म दे-दे मुझे,
भीगी पलकें न झुका,
आईना हूँ मैं तेरा|

कितने ही दाग उठाए तूने,
मेरे दिन-रात सजाए तूने,
चूम लूँ आ मैं तेरी पलकों को,
दे दूँ ये उम्र तेरी ज़ुल्फों को,
ले के आँखों के दिए,
मुस्कुरा मेरे लिए,
मेरी तस्वीर-ए-वफ़ा,
आईना हूँ मैं तेरा|


तेरी चाहत है इबादत मेरी,
देखता रहता हूँ सूरत तेरी,
घर तेरे दम से है मंदिर मेरा,
तू है देवी मैं पुजारी तेरा,
सज़दे सौ बार करूं,
आ तुझे प्यार करूं,
मेरे आगोश में आ,
आईना हूँ मैं तेरा|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दिल भी जलाया मैंने!!

आज मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है, यह  गीत उन्होंने फिल्म- ‘दिल भी तेरा, हम भी तेरे’ में धर्मेंद्र जी  के लिए गाया है, संगीतकार हैं- कल्याणजी आनंदजी, जो उन संगीतकारों में से एक हैं, जिन्होंने मुकेश जी की अनूठी आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया है। इसके गीतकार हैं- शमीम जयपुरी।

मैं कह नहीं सकता कि इस गीत में क्या कोई अनूठी बात है, लेकिन मुकेश जी की आवाज़ पाकर यह गीत जैसे अमर हो गया है। और जो इसके बोल हैं, उनके अनुरूप, शुरुआत में ऐसा लगता है कि जैसे आवाज़ जंगल में गूंज रही हो, तनहाई जैसे असीम लगती है।

अब ज्यादा कुछ नहीं बोलते हुए, इस गीत के बोल शेयर कर लेता हूँ, मौका लगे तो इस गीत को एक बार फिर मुकेश जी की आवाज़ में सुनकर, यादें ताज़ा कर लीजिए-

मुझको इस रात की तनहाई में, आवाज़ न दो,

जिसकी आवाज़ रुला दे, मुझे वो साज़ न दो।

रोशनी हो न सकी दिल भी जलाया मैंने,

तुमको भूला ही नहीं लाख भुलाया मैंने,

मैं परेशां हूँ, मुझे और परेशां न करो।

आवाज़ न दो॥

इस क़दर जल्द किया मुझसे किनारा तुमने,

कोई भटकेगा अकेला ये न सोचा तुमने,

छुप गए हो तो मुझे याद भी आया न करो।

आवाज़ न दो।।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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कल रात की तौबा!

एक पुरानी घटना याद आ गई और उसके साथ ही ये खयाल आया कि दुनिया कितनी बदल गई है| कला की सारी सौगातें, गीत-संगीत तो सब वही हैं लेकिन टेक्नोलॉजी और उसका आम आदमी द्वारा उपयोग कितना बदल गया है, बस यही खयाल आया इस घटना को याद करके|



मैं एनटीपीसी में राजभाषा के क्षेत्र में काम करता था| वैसे तो सरकारी संस्थानों में राजभाषा का क्षेत्र ऐसा है कि यहाँ कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता, आंकड़ों में दिखाने की महारत हो तो रिपोर्ट आप, अपनी झूठ बोलने की क्षमता के अनुसार तैयार कर सकते हैं, क्योंकि यहाँ आपके हाथ में कुछ भी नहीं है, आप सिर्फ निवेदन कर सकते हैं और ये उम्मीद आपसे की जाती है कि आप रिपोर्ट में बढ़िया स्थिति दर्शाएं|

अब याद आ गई है उस जमाने की तो यह संतोष होता है कि मैं पत्रिका आदि प्रकाशित करके, कवि सम्मेलनों का आयोजन करके अपनी पसंद के कुछ काम कर सकता था और यह दर्द भी झलकता है कि अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले मानो मुंबई की ‘फास्ट लोकल’ थे जो तेजी से आगे निकल जाते थे और आप हर जगह रुकते हुए ‘स्लो लोकल’ की तरह ही आगे बढ़ते थे|

एक बात और कि अन्य क्षेत्र में काम करने वालों के लिए प्रशिक्षण आदि के नाम पर विदेश दौरे भी उपलब्ध थे, वहीं राजभाषा अधिकारियों के लिए कंपनी की ही विभिन्न परियोजनाओं में आयोजित होने वाले राजभाषा सम्मेलन ही विभिन्न परियोजनाओं में जाने का साधन थे जो सामान्यतः बड़े शहरों से दूर होते हैं और हाँ कुछ निजी संस्थानों द्वारा कुछ पर्यटन स्थलों पर राजभाषा सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं, जिनमें अगर राजभाषा अधिकारियों को भाग लेने की अनुमति मिल जाए तो वह एक दुर्लभ अवसर होता था| ऐसे कुछ अवसरों का लाभ मैंने भी उठाया था और आज एक ऐसे ही अवसर के बहाने से बात कर रहा हूँ, जो अचानक याद आ गया|

हाँ तो प्रसंग कुछ ऐसा है कि पांडिचेरी में एक राजभाषा सम्मेलन का आयोजन था जिसमें भाग लेने के लिए मेरी परियोजना की ओर से मैंने अपना नामांकन करा लिया था| ऐसे आयोजनों का उद्देश्य भी वैसे राजभाषा के बहाने पैसा कमाना ही होता है, जिसे एक बड़े उद्देश्य के साथ जोड़कर प्रचारित किया जाता है| हाँ तो मैं शायद दिल्ली से चेन्नई की ट्रेन में बैठा था, एसी टू टियर में सोता हुआ जा रहा था तभी भोपाल से एक सज्जन बगल की बर्थ पर आए दाढ़ी काफी बढ़ी हुई थी जिसके कारण शुरू में यह पहचानना मुश्किल था कि वह मेरे साथ एनटीपीसी में काम कर चुके अखिलेश जैन थे, जो अब भोपाल की एक कंपनी में कार्य कर रहे थे और अपनी कंपनी में अन्य कामों के साथ वो राजभाषा का काम भी देख रहे थे और उनकी मंजिल भी वह राजभाषा सम्मेलन ही था, जिसमें मैं जा रहा था|

मैं यहाँ इस राजभाषा सम्मेलन के बारे में कुछ बताने नहीं जा रहा, छोटी सी बात जो याद आई थी बस अब वही बताकर बात पूरी करूंगा| चेन्नई से हमको पांडिचेरी जाना था, वहाँ जिस होटल में हमारे रुकने की व्यवस्था आयोजकों द्वारा की गई थी, दोनों ने वहाँ जाने के लिए टैक्सी भाड़े पर ली, अखिलेश जानते थे कि मुझे मुकेश जी के फिल्मी गीत गाने का शौक था तो रास्ते में मैंने कई गीत गए, उनमें से ही एक गीत जो मुझे अत्यंत प्रिय है वह था ‘याद आई आधी रात को कल रात की तौबा, दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा’| बहुत प्यारा गीत है ये जिसमें ये दिखाया गया है कि कैसे कोई शराबी रोज न पीने की कसम खाता है और रोज भूल जाता है|

खैर प्रसंग मात्र इतना सा है कि अखिलेश बोले कि यह गीत फिल्म- ‘तीसरी कसम’ का है, मैंने यह फिल्म देखी है और मुझे पूरा भरोसा था कि यह इस फिल्म का गीत नहीं था, लेकिन किस फिल्म का था ये मुझे याद नहीं था| अखिलेश शर्त लगाने को तैयार थे कि यह गीत उसी फिल्म का है और मुझे पूरा विश्वास था कि उस फिल्म के देहाती नायक के साथ इस गीत का कोई तालमेल ही नहीं है, लेकिन उस समय इसका कोई फैसला हम नहीं कर पाए|

मैं कहना क्या चाह रहा था इस आलेख में! मुझे याद नहीं आ रहा कि उस समय हम लोग मोबाइल फोन रखते थे या नहीं, ये वर्ष 2000 से पहले की बात है, हम फोन रखते भी हों तो शायद सिर्फ बात करने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते होंगे| आज इस गीत का जिक्र आया तो तुरंत गूगल पर देखकर मैं बता सकता हूँ कि ये गीत फिल्म- ‘कन्हैया’ का गीत है| यही नहीं दुनिया की लगभग हर जानकारी आज के बच्चे आज गूगल पर तुरंत प्राप्त कर सकते हैं, हम भले ही आज भी इस मामले में कुछ पिछड़े रह जाएं!

ऐसे ही याद आया कि साहित्य, कला, संगीत आदि में शायद हम यह गर्व कर सकते हैं कि पूर्व में बहुत महान उपलब्धियां हुई हैं लेकिन टेक्नोलॉजी तो आज की ही चीज़ है और इस क्षेत्र में नित्य नई उपलबधियां हो रही हैं|

ऐसे ही आज इस प्रसंग के बहाने कुछ बात कहने का मन हुआ जी और वह बात अब पूरी हो गई है|

नमस्कार|
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हमने अपना सब कुछ खोया!

आज फिल्म- ‘सरस्वतीचन्द्र’ के लिए इंदीवर जी का लिखा एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ जिसे मुकेश जी ने अपने अनूठे अंदाज़ में गाया था| फिल्म- सरस्वतीचन्द्र के लिए कल्याणजी आनंदजी द्वारा संगीतबद्ध किए गए कई गीत काफी प्रसिद्ध हुए थे, जिनमें – ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में’, ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश‘ भी शामिल हैं|

मुकेश जी को विशेष रूप से ऐसे दर्द भरे गीतों के लिए जाना जाता है , यद्यपि उन्होंने मस्ती भरे गीत भी बहुत गाये हैं, लेकिन उनकी पहचान दर्द भरे गीतों से ज्यादा बनी है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस मुकेश जी के द्वारा गाये गए इस मधुर गीत के बोल:

हमने अपना सब कुछ खोया
प्यार तेरा पाने को,
छोड़ दिया क्यों प्यार ने तेरे
दर-दर भटकाने को|
प्यार तेरा पाने को|
हम ने अपना …

वो आँसू जो बह नहीं पाए,
वो बातें जो कह नहीं पाए,
दिल में छुपाए फ़िरते हैं अब,
घुटकर मर जाने को|
प्यार तेरा पाने को|
हम ने अपना …

उसकी रहे तू जिसकी हो ली,
तुझको मुबारक़ प्यार की डोली,
बैठ गए हम ग़म की चिता पर,
ज़िन्दा जल जाने को|
प्यार तेरा पाने को
हम ने अपना …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना !

आज मैं फिर से हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी का एक बहुत प्यारा सा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| कल के गीत की तरह, यह गीत भी राज कपूर साहब द्वारा अभिनीत फिल्म- ‘दिल ही तो है’ के लिए साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा था और इसका संगीत रोशन साहब ने तैयार किया था|

लीजिए प्रस्तुत हैं, कुछ अलग ही अन्दाज़ वाले इस गीत के नटखट बोल, जो आपने अवश्य सुने होंगे:


ग़ुस्से में जो निखरा है उस हुस्न का क्या कहना,
कुछ देर अभी हम से तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना
|

उस हुस्न के शो’ले की तस्वीर बना लें हम,
उन गर्म निगाहों को सीने से लगा लें हम,
पल-भर इसी आलम में ऐ जान-ए-अदा रहना|
कुछ देर अभी हम से तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना |


ये दहका हुआ चेहरा ये बिखरी हुई ज़ुल्फ़ें,
ये बढ़ती हुई धड़कन ये चढ़ती हुई साँसें,
सामान-ए-क़ज़ा हो तुम सामान-ए-क़ज़ा रहना|
कुछ देर अभी हम से तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना |


पहले भी हसीं थीं तुम लेकिन ये हक़ीक़त है,
वो हुस्न मुसीबत था ये हुस्न क़यामत है,
औरों से तो बढ़ कर हो ख़ुद से भी सिवा रहना|
कुछ देर अभी हम से तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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तो मुश्किल होगी!

 एक बार फिर से आज मैं हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी का एक बहुत प्यारा सा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| राज कपूर साहब द्वारा अभिनीत फिल्म- ‘दिल ही तो है’ के लिए यह गीत साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा था और इसका संगीत रोशन साहब ने तैयार किया था|  

लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल, जो आज भी हमारे दिल में गूंजते है:

तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं,
तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी|

अब अगर मेल नहीं है तो जुदाई भी नहीं
बात तोड़ी भी नहीं तुमने बनाई भी नहीं,
ये सहारा भी बहुत है मेरे जीने के लिये
तुम अगर मेरी नहीं हो तो पराई भी नहीं,
मेरे दिल को न सराहो तो कोई बात नहीं
गैर के दिल को सराहोगी, तो मुश्किल…

तुम हसीं हो, तुम्हें सब प्यार भी करते होंगे
मैं जो मरता हूँ तो क्या और भी मरते होंगे,
सब की आँखों में इसी शौक़ का तूफ़ां होगा
सब के सीने में यही दर्द उभरते होंगे,
मेरे ग़म में न कराहो तो कोई बात नहीं
और के ग़म में कराहोगी तो मुश्किल…


फूल की तरह हँसो, सब की निगाहों में रहो
अपनी मासूम जवानी की पनाहों में रहो,
मुझको वो दिन न दिखाना तुम्हें अपनी ही क़सम
मैं तरसता रहूँ तुम गैर की बाहों में रहो,
तुम जो मुझसे न निभाओ तो कोई बात नहीं
किसी दुश्मन से निभाओगी तो मुश्किल…

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

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मैं पल दो पल का शायर हूँ!

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मुझसे पहले कितने शायर, आए और आकर चले गए,
कुछ आहें भरकर लौट गए, कुछ नग़मे गाकर चले गए,
क्यों कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे,
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बर्बाद करे|

मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है|
पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है|

साहिर लुधियानवी

नग़मों की खिलाती कलियां चुनने वाले!

कल और आएंगे नग़मों की खिलाती कलियां चुनने वाले,
मुझसे बहते कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले|

साहिर लुधियानवी

सुहानी चांदनी रातें|

आज एक गीत फिल्म ‘मुक्ति’ से, हमारे प्रिय गायक मुकेश जी के मधुर स्वर में, इसका संगीत तैयार किया है राहुल देव बर्मन जी ने और गीत लिखा था आनंद बख्शी जी ने| मुकेश जी का यह रोमांटिक गीत आज भी हमारे मन में गूंजता रहता है|

लीजिए प्रस्तुत हैं फिल्म- ‘मुक्ति’ के लिए मुकेश जी द्वारा गाये गए इस मधुर गीत के बोल :

सुहानी चांदनी रातें, हमें सोने नहीं देतीं
तुम्हारे प्यार की बातें, हमें सोने नहीं देतीं
सुहानी चांदनी रातें, हमें सोने नहीं देतीं|

तुम्हारी रेशमी जुल्फ़ों में दिल के फूल खिलते थे
इन्हीं फूलों के मौसम में, कभी हम तुम भी मिलते थे,
पुरानी वो मुलाकातें, हमें सोने नही देतीं
तुम्हारे प्यार की बातें, हमें सोने नहीं देतीं|
सुहानी चांदनी रातें …

कहीं ऐसा न हो लग जाये दिल में आग पानी से
बदल ले रास्ता अपना घटाएं मेहरबानी से,
कि यादों की ये बरसातें, हमें सोने नहीं देतीं
तुम्हारे प्यार की बातें, हमें सोने नहीं देतीं|
सुहानी चांदनी रातें …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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पूछो मेरे दिल से!

आज एक गीत फिल्म ‘अनिता’ से, हमारे प्रिय गायक मुकेश जी के मधुर स्वर में, इसका संगीत तैयार किया है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की संगीतमय जोड़ी ने और गीत लिखा था राजा मेहदी आली खां साहब ने| मुझे यह गीत भी विशेष रूप से प्रिय है और आज भी यह हमारे मन में गूँजता रहता है|

लीजिए प्रस्तुत हैं फिल्म- ‘अनिता’ के लिए मुकेश जी के इस मधुर गीत के बोल :

तुम बिन जीवन कैसे बीता,
पूछो मेरे दिल से, पूछो मेरे दिल से

सावन के दिन आए, बीती यादें लाए
कौन झुकाकर आँखें, मुझको पास बिठाए
कैसा था प्यारा रूप तुम्हारा,
पूछो मेरे दिल से, पूछो मेरे दिल से
तुम बिन जीवन …

प्रेम का सागर हाय, चारों तरफ़ लहराए
जितना आगे जाऊँ, गहरा होता जए
ग़म के भंवर में, क्या क्या डूबा,
पूछो मेरे दिल से, पूछो मेरे दिल से
तुम बिन जीवन …

जैसे जुगनू बन में, तू चमके अंसुवन में
बन कर फूल खिली हो, जाने किस बगियन में
मै अपनी किस्मत पे रोया,
पूछो मेरे दिल से, पूछो मेरे दिल से
तुम बिन जीवन …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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