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ओ जाने वाले हो सके तो!

कल हमारे प्रिय गायक, महान कलाकार और इंसान मुकेश चंद्र माथुर जी का जन्म दिन है| जिन्हें हम प्रेम से सिर्फ ‘मुकेश’ नाम से पुकारते हैं|

उनकी स्मृति में प्रस्तुत आज का यह गीत फिल्म- ‘बंदिनी’ से है, जिसे लिखा था शैलेन्द्र जी ने और इसका संगीत दिया था सचिन देव बर्मन जी ने|

मुकेश जी के गाए गीत मुझ जैसे बहुत से लोगों को जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं|

आइए आज उस महान गायक की स्मृति में उनका गाया यह गीत दोहराते हैं-


ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना,
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना|


बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे,
ढूंढेंगे तुझे गली-गली सब ये ग़म के मारे|
पूछेगी हर निगाह कल तेरा ठिकाना|
ओ जाने वाले —

है तेरा वहां कौन सभी लोग हैं पराए,
परदेश की गर्दिश में कहीं, तू भी खो न जाए|
कांटों भरी डगर है तू दामन बचाना|
ओ जाने वाले—


दे देके ये आवाज कोई हर घड़ी बुलाए,
फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए,
है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना|
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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सदा खुश रहे तू !

आज मैं फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘प्यार का सागर’ के लिए मुकेश जी ने रवि जी के संगीत निर्देशन में गाया था,इस गीत के रचनाकार थे प्रेम धवन जी|

लीजिए प्रस्तुत है यह गीत, जो इतना समय बीत जाने के बाद, आज भी लोगों को याद है –

सदा खुश रहे तू जफ़ा करने वाले
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले|

सुनाते ग़म-ए-दिल, जो तुम पास होते
मेरी बेकसी पे भी क्या तुम न रोते

मगर क्या दिखाएं तुम्हे दिल के छाले
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले
सदा खुश रहे तू|

सितम और भी हों तो वो भी किये जा
हो ग़म और भी हों तो वो भी दिए जा
नहीं फिर भी तुझसे गिला करने वाले|
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले||

सदा खुश रहे तू, जफ़ा करने वाले
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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रहम जब अपने पे आता है तो हंस लेता हूँ!

आज पुरानी फिल्म- किनारे-किनारे के लिए मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत लिखा है न्याय शर्मा जी ने और इसका संगीत दिया है जयदेव जी ने|

यह जीवन बहुत जटिल है| कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं कि किस बात पर हंसा जाए और किस बात पर रोया जाए पता ही नहीं चलता| कुछ ऐसी ही स्थिति का गीत है ये|

लीजिए आज प्रस्तुत है, मुकेश जी का गाया यह अमर गीत –

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ,
हादसा याद जब आता है
तो हँस लेता हूँ|

मेरी उजड़ी हुई दुनिया में
तमन्ना का चिराग़,
जब कोई आ के जलाता है
है तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ|


कोई दावा नहीं फ़रियाद नहीं
तंज़ नहीं,
रहम जब अपने पे आता है
तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता
है तो हँस लेता हूँ.


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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हम हैं अनाड़ी!

आज 1959 में रिलीज हुई फिल्म -अनाड़ी, का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे शैलेन्द्र जी ने लिखा है और शंकर जयकिशन जी ने इसका संगीत दिया है| इस गीत के लिए गीत लेखन, संगीत और गायन तीनों श्रेणियों में सर्वश्रेष्ठ होने के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार प्रदान किए गए थे|

राजकपूर साहब पर फिल्माए गए इस गीत को गाया था मेरे प्रिय गायक – मुकेश जी ने|

कुछ बातों को हम आज के ज़माने में ज्यादा महत्व नहीं देते हैं, उनमें से एक है सादगी, ईमानदारी, सरलता| निदा फाज़ली साहब की एक पंक्ति मुझे बहुत अच्छी लगती है- ‘सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला‘|

खैर आज आप इस अमर गीत का आनंद लीजिए-

सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी
सच है दुनिया वालों, कि हम हैं अनाड़ी |

दुनिया ने कितना समझाया, कौन है अपना कौन पराया,
फिर भी दिल की चोट छुपाकर, हमने आपका दिल बहलाया|
खुद ही मर मिटाने की ये ज़िद है हमारी|

सच है दुनिया वालों, कि हम हैं अनाड़ी ||

दिल का चमन उजड़ते देखा, प्यार का रंग उतरते देखा,
हमने हर जीने वाले को, धन दौलत पर मरते देखा,
दिल पे मरने वाले, मरेंगे भिखारी|
सच है दुनिया वालों, कि हम हैं अनाड़ी ||


असली नकली चेहरे देखे, दिल पे सौ सौ पहरे देखे,
मेरे दुखते दिल से पूछो, क्या-क्या ख्वाब सुनहरे देखे,
टूटा जिस तारे पे, नजर थी हमारी|
सच है दुनिया वालों, कि हम हैं अनाड़ी ||

आज के लिए इतना ही|

नमस्कार|

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चांद आहें भरेगा!

आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक- मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर करूंगा| नायिका के सौंदर्य का वर्णन करने वाले अनेक गीत आपने सुने होंगे, लेकिन इस ऊंचाई वाला गीत बहुत मुश्किल से सुनने को मिलता है, और फिर मुकेश जी की आवाज़ तो इसमें अलग से जान डाल ही रही है|

लीजिए  फिल्म- ‘फूल बने अंगारे’ के लिए आनंद बख्शी जी के लिखे इस गीत का आनंद लीजिए, जिसे कल्याण जी आनंद जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने गाया है-

चांद आहें भरेगा,
फूल दिल थाम लेंगे,
हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


आँखें नाज़ुक सी कलियां,
बात मिश्री की डलियां,
होंठ गंगा के साहिल,
ज़ुल्फ़ें जन्नत की गलियां|
तेरी खातिर फ़रिश्ते,
सर पे इल्ज़ाम लेंगे|

हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


चुप न होगी हवा भी,
कुछ कहेगी घटा भी,
और मुमकिन है तेरा,
ज़िक्र कर दे खुदा भी|
फिर तो पत्थर ही शायद,
ज़ब्त से काम लेंगे|

हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


चाँद आहें भरेगा,
फूल दिल थाम लेंगे,
हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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भीगी पलकें न झुका!

आज मुझे मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का गाया एक बहुत सुंदर गीत याद आ रहा है | फिल्म- साथी के लिए इस गीत को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इसका संगीत दिया था- नौशाद साहब ने|

कुल मिलाकर इस गीत में ऐसा दिव्य वातावरण तैयार होता है, ऐसा लगता है की प्रेम का एक अनोखा स्वरूप उद्घाटित होता है, जिसमें प्रेम और पूजा, आपस में घुल-मिल जाते हैं| लीजिए इस अमर गीत का आनंद लीजिए-

हुस्न-ए-जानां इधर आ,
आईना हूँ मैं तेरा|
मैं संवारूंगा तुझे,
सारे ग़म दे-दे मुझे,
भीगी पलकें न झुका,
आईना हूँ मैं तेरा|


कितने ही दाग उठाए तूने,
मेरे दिन-रात सजाए तूने,
चूम लूँ आ मैं तेरी पलकों को,
दे दूँ ये उम्र तेरी ज़ुल्फों को,
ले के आँखों के दिए,
मुस्कुरा मेरे लिए,
मेरी तस्वीर-ए-वफ़ा,
आईना हूँ मैं तेरा|


तेरी चाहत है इबादत मेरी,
देखता रहता हूँ सूरत तेरी,
घर तेरे दम से है मंदिर मेरा,
तू है देवी मैं पुजारी तेरा,
सज़दे सौ बार करूं,
आ तुझे प्यार करूं,
मेरे आगोश में आ,
आईना हूँ मैं तेरा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

चलिए पुराने पन्ने पलटते हुए, एक क़दम और आगे बढ़ते हैं।
आज फिर से जीवन का एक पुराना पृष्ठ, कुछ पुरानी यादें, एक पुराना ब्लॉग!


जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं।


एक और बात हम दिल्ली से जयपुर ट्रेन में बैठकर चले गए थे, एक दो अटैची साथ लेकर, कोई और लगेज नहीं था हमारे साथ। जो सामान हमारा छूटा, घरेलू सामान थोड़ा बहुत मां के पास रहा, बाकी 50-60 किलो तो रहा ही होगा, किताबों और पत्रिकाओं के रूप में। पत्रिकाओं में सबसे बड़ा भाग था सारिका के अंक, जिनमें बहुत से कथा- ऋषि विशेषांक भी थे, जिनमें दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखकों की रचनाएं शामिल थीं।
पता नहीं क्यों मुझे एक पाकिस्तानी लेखक की रचना याद आ रही है, जो ऐसे ही एक अंक में छपी थी। कहानी संक्षेप में यहाँ दोहरा देता हूँ-
महानगर पालिका में बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है। काफी लंबी बहस के बाद फैसला हुआ कि इन लोगों को नगर की सीमा के बाहर बसा दिया जाए। ऐसा ही किया गया, पहले वहाँ एक पान वाले ने अपनी दुकान खोली, चाय वाला आया, फिर कुछ और दुकानें खुलीं।


दस साल बाद, महानगर पालिका में फिर से बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है!


खैर, ये तो मुझे याद आया और मैंने संक्षेप में कहानी शेयर कर ली। मैं बता यह रहा था कि हम अपना साहित्य भंडार वकील साहब के यहाँ छोड़ आए, जो मेरे बड़े भाई लगते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक इस अमानत की बंधी हुई पोटलियों को संभालकर रखा, बाद में चूहों में साहित्य पिपासा कुछ अधिक जाग गई तो उन्होंने यह सब लायब्रेरी में दे दिया।


दिल्ली के जो महत्वपूर्ण वृतांत छूट गए, उनमें एक यह भी है कि हमने बच्चों की एक पत्रिका ‘कलरव’ के कुछ अंक भी प्रकाशित किए थे। दिल्ली प्रेस में मेरे एक साथी थे- श्री रमेश राणा, जिनको मेरी साहित्यिक प्रतिभा में कुछ ज्यादा ही विश्वास था, उन्होंने यह प्रस्ताव रखा। इसमें संपादन की ज़िम्मेदारी मेरी थी, बाकी सब उनके जिम्मे था। मैं सामग्री का चयन करता था और ‘नन्हे नागरिक से’ शीर्षक से संपादकीय भी लिखता था। यह संपादकीय सबसे सुरक्षित था, क्योंकि नन्हे पाठकों से कोई शिकायत मिलने की गुंजाइश नहीं थी। श्री बालकवि वैरागी ने इस पत्रिका के लिए कई रचनाएं भेजीं और उपयोगी सुझाव भी दिए।


अब याद नहीं कि इस पत्रिका के कितने अंक छपे थे और इस प्रयास में कितना आर्थिक नुकसान हुआ ये तो भाई रमेश राणा ही जानते होंगे क्योंकि मेरा तो एक धेला भी खर्च नहीं हुआ था। बस एक अनुभव था-


किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है,
हम जब थककर रुक जाएंगे, औरों को समझाएंगे।


जयपुर के बाद हम बिहार के संथाल परगना इलाके में गए, जो अब झारखंड में आता है। कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं, जो जैसे समय आता है, मुझे याद आते हैं और मैं शेयर करता जाता हूँ, लेकिन बिहार में कार्यग्रहण का किस्सा ऐसा है, जिसे सुनाने की मुझे भी बेचैनी रहती है, वो सब मैं अगले ब्लॉग में बताऊंगा। (यह पोस्ट मैंने पिछले सप्ताह ही शेयर की है|)


फिलहाल मैं यह बता दूं कि ईश्वर की कृपा से मुझे कभी किसी नौकरी के लिए सिफारिश की ज़रूरत नहीं पड़ी और मैं जब इंटरव्यू देने जाता था तब मैं बता देता था कि मैं यहाँ ज्वाइन करने वाला हूँ। हाँ मैं मुकेश जी का गाया यह भजन भी अक्सर गाता था और गाते-गाते मेरी आंखों में आंसू निकल आते थे-

तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते,
जो निराश हैं उनकी झोली, आशा से भर देते,
अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारका आता,
पांव आंसुओं से धोकर मैं, मन की आग बुझाता,
तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवान, करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते,
नहीं डूबने दाता, नैया पार लगाते,
तुम न सुनोगे तो किसको मैं, अपनी व्यथा सुनाऊं,
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन, और कहाँ मैं जाऊं।
प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


सब कुछ देता है ऊपर वाला, लेकिन फिर-

बहुत दिया देने वाले ने तुझको,
आंचल ही न समाए तो क्या कीजे।



फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।
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मेरा सूना पड़ा रे संगीत !

मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| आज का ये 1957 में रिलीज़ हुई फिल्म- रानी रूपमती के लिए पंडित भरत व्यास जी ने लिखा था और एस एन त्रिपाठी जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने इसे बड़े मनमोहक अंदाज़ में गाया है|


लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का यह एक अमर गीत-

आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं,
मेरा सूना पड़ा रे संगीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|

बरसे गगन मेरे बरसे नयन, देखो तरसे है मन, अब तो आजा|
शीतल पवन ये लगाए अगन,
ओ सजन अब तो मुखड़ा दिखा जा|
तूने भली रे निभाई प्रीत,
तूने भली रे निभाई प्रीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|
आ लौट…

एक पल है हँसना एक पल है रोना, कैसा है जीवन का खेला|
एक पल है मिलना एक पल बिछड़ना,
दुनिया है दो दिन का मेला|
ये घड़ी न जाए बीत,
ये घड़ी न जाए बीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|
आ लौट…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ये क्या किया रे दुनियावाले!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| ये शानदार गीत 1969 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘बेटी’ से है, जिसे लिखा है – शकील बदायुनी साहब ने और सोनिक ओमी जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज़ में गाया है|


जीवन में ऐसा भी हो सकता है कि हमारे पास कोई न हो जिससे हम शिकायत कर सकें, लेकिन ऐसे में भी आस्थावान लोगों के पास एक सहारा होता है, ईश्वर का, जिससे वे जी भरकर शिकायत कर सकते हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

ये क्या किया रे दुनियावाले
जहाँ के ग़म तूने
सभी मुझको दे डाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||



ओ बेदर्दी, ओ हरजाई,
देख ली मैंने तेरी खुदाई|
पहले ही मेरा दिल घायल था,
और भी उस पर चोट लगायी|
तूने रुलाके मुझे, दर-दर
फिरा के मुझे,
कब के यह अरमान निकाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले,
जहाँ के ग़म तूने
सभी मुझको दे डाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||


सुबह का सूरज, रात के तारे,
बन गए सब के सब अंगारे|
आस के बंधन तोड़ के तूने,
छीन लिए सभी संग सहारे|
मेरे लहू की कसम,
और भी कर ले सितम,
आज तू दिल की बुझा ले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||
जहाँ के ग़म तूने
सभी मुझको दे डाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सपने, सुरीले सपने!

आज एक बार फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर करना चाहूँगा| ये गीत राजेश खन्ना जी और अमिताभ जी के कुशल अभिनय से युक्त फिल्म- आनंद से है, जो 1971 में रिलीज़ हुई थी| इस फिल्म में मुकेश जी का गाया एक और गीत- ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ भी अमर गीतों की श्रेणी में शामिल है|


इस गीत को लिखा है गुलज़ार जी ने लिखा है और संगीत दिया है सलिल चौधरी जी ने|


लीजिए प्रस्तुत है यह लाजवाब गीत-


मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने
सपने, सुरीले सपने,
कुछ हँसते, कुछ गम के
तेरी आँखों के साये चुराए रसीली यादों ने|

छोटी बातें, छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ी
भूले नहीं, बीती हुई एक छोटी घड़ी,
जनम-जनम से आँखे बिछाईं
तेरे लिए इन राहों में,
मैंने तेरे लिए ही सात..
.

भोले-भाले, भोले-भाले दिल को बहलाते रहे
तन्हाई में, तेरे ख्यालों को सजाते रहे,
कभी-कभी तो आवाज देकर
मुझको जगाया ख़्वाबों से,
मैंने तेरे लिए ही सात…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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