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ये जो मन की सीमा-रेखा है!

पिछले लगभग एक माह की अवधि में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश चंद माथुर जी का जन्म दिन (22 जुलाई) और पुण्य तिथि 27 अगस्त दोनो ही आए| 27 अगस्त,1976 को ही इस महान सुरीले गायक और फिल्मी दुनिया में इंसानियत की एक महान मिसाल, मुकेश जी का डेट्रायट, अमरीका में दर्शकों के समक्ष संगीत का कार्यक्रम देते हुए, दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया था| स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी भी मुकेश जी से बहुत प्रेम करती थीं और उनको अपना बड़ा भाई मानती थीं|


आज मुकेश जी की स्मृति में उनका गाया एक मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ, जो योगेश जी ने लिखा था और 1974 में रिलीज़ हुई फिल्म- रजनीगंधा के लिए, सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने बड़े मोहक अंदाज़ में गाया और इसे अमोल पालेकर जी पर फिल्माया गया था| किस प्रकार एक समय ऐसा आता है, जब हमारा मन अपने बंधनों को, अपनी सीमारेखा को तोड़ने लगता है|


लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-



कई बार यूँ भी देखा है
ये जो मन की सीमारेखा है
मन तोड़ने लगता है
अनजानी प्यास के पीछे
अनजानी आस के पीछे
मन दौड़ने लगता है


राहों में, राहों में, जीवन की राहों में
जो खिले हैं फूल, फूल मुस्कुरा के
कौन सा फूल चुरा के
मैं रख लूँ मन में सज़ा के
कई बार यूँ भी…


जानूँ ना, जानूँ ना, उलझन ये जानूँ ना
सुलझाऊँ कैसे कुछ समझ ना पाऊँ
किसको मीत बनाऊँ
मैं किसकी प्रीत भुलाऊँ
कई बार यूँ भी…



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कोई सपनों के दीप जलाए!

आज फिल्म- ‘आनंद’  के लिए मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है, जो आज तक लोगों की ज़ुबान पर है। उस समय राजेश खन्ना जी सुपर स्टार थे और अमिताभ बच्चन के कैरियर को आगे बढ़ाने में इस फिल्म की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

योगेश जी के लिखे इस गीत को मुकेश जी ने सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में गाया था। आइए इसके बोलों के बहाने मुकेश जी के गाये इस अमर गीत को याद कर लेते हैं-

 

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए,
मेरे ख़यालों के आँगन में,
कोई सपनों के दीप जलाए।

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए।
कभी यूँ हीं, जब हुईं, बोझल साँसें,
भर आई बैठे बैठे, जब यूँ ही आँखें,
तभी मचल के, प्यार से चल के,
छुए कोई मुझे पर नज़र न आए, नज़र न आए।

 

कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते,
कहीं से निकल आए, जनमों के नाते।
घनी थी उलझन, बैरी अपना मन,
अपना ही होके सहे दर्द पराये।
दिल जाने, मेरे सारे, भेद ये गहरे,
खो गए कैसे मेरे, सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने,
मुझसे जुदा न होंगे इनके ये साये, इनके ये साये।

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए।

 

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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