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तेरा मेला पीछे छूटा, राही चल अकेला!

फिल्म-संबंध, जो 1969 में रिलीज़ हुई थी, उसका एक गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| यह गीत राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत कविताएं लिखते थे, जैसे ‘आओ बच्चे तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की’ आदि-आदि| आज के इस गीत के लिए संगीत दिया है ओ पी नैयर जी का और इसे गाया है मेरे प्रिय गायक- मुकेश जी ने|


इस गीत में एक जीवन जीने का महत्वपूर्ण सिद्धान्त दर्शाया गया है, जैसा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी ने भी लिखा था, ‘जदि तोर डाक सुनी केऊ न आशे, तबे एकला चलो रे’| इस गीत में भी यही कहा गया है की हजारों मील लंबे रास्ते हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं और हमें अकेले ही इन पर चलाने का साहस करना होगा|


लीजिए इस गीत का स्मरण कराते हैं-


चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला,
तेरा मेला पीछे छूटा, राही चल अकेला|

हजारों मील लम्बे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,
है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुःख ना झेला|
चल अकेला…

तेरा कोई साथ ना दे तो खुद से प्रीत जोड़ ले,
बिछौना धरती का कर ले अरे आकाश ओढ़ ले,
यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का तूने कहाँ है खेला|

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला,
तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये!

एक बार फिर से मैं आज अपने सर्वाधिक प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुकेश जी दर्द भरे गीतों के सरताज माने जाते हैं लेकिन रोमांटिक गीत भी उन्होंने एक से एक अच्छे गाये हैं|

 

 

आज का यह गीत 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘हॉलिडे इन बॉम्बे’ के लिए अंजान जी ने लिखा था और एन दत्ता के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज में इसे गाया था|

प्रस्तुत है उस अमर गायक की याद में यह गीत-

 

आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये,
आँख का काजल क्यूँ शरमाये,
आखिर क्या है बात हंसी क्यूँ
होठों तक आ कर रुक जाये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये||

 

बदली नजर, बदली अदा, आज है हर अंदाज़ नया|
दिल की लगी छुप न सकी,
राज़ ये आखिर खुल ही गया|
रंग बदल कर किधर चली हो,
बदन समेटे, नजर चुराये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये||

 

महकी हवा, बहकी घटा,
ये आलम, ये मदहोशी|
चुप न रहो, कुछ तो कहो,
तोड़ भी दो ये ख़ामोशी|
ये मौसम, ये घडी मिलन की,
रोज कहा जीवन में आये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये|

 

दिल को मेरे मिल ही गया,
साथी प्यार की राहों का|
साथ कभी छूटे ना, इन लहराती बाँहों का|
अब न जुदा हों दिल से तेरी,
बलखाती जुल्फों के साये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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