कोई दरीचा खुला न था!

राशिद किसे सुनाते गली में तेरी गज़ल,
उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था।

मुमताज़ राशिद

हवा का पता न था!

पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,
जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था।

मुमताज़ राशिद

अपना शरीक-ए-ग़म!

परछाइयों के शहर की तनहाइयां न पूछ,
अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था।

मुमताज़ राशिद