क़लंदर हो गदा हो नहीं सकता!

दरबार में जाना मिरा दुश्वार बहुत है,
जो शख़्स क़लंदर हो गदा हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

ये क़र्ज़ अदा हो नहीं सकता!

पेशानी को सज्दे भी अता कर मिरे मौला,
आँखों से तो ये क़र्ज़ अदा हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

बाद-ए-सबा हो नहीं सकता!

इस ख़ाक-ए-बदन को कभी पहुँचा दे वहाँ भी,
क्या इतना करम बाद-ए-सबा हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

मुझे तूने मुसीबत से निकाला!

ऐ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला,
सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

इस शहर में क्या हो नहीं सकता!

बस तू मिरी आवाज़ से आवाज़ मिला दे,
फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

इतना तो दिया हो नहीं सकता!

दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें,
रौशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता!

मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता,
अब इससे ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

तिरी याद न जाने निकल आए!

एक ख़ौफ़ सा रहता है मिरे दिल में हमेशा,
किस घर से तिरी याद न जाने निकल आए|

मुनव्वर राना

बहुत आगे ज़माने निकल आए!

अब तेरे बुलाने से भी हम आ नहीं सकते,
हम तुझ से बहुत आगे ज़माने निकल आए|

मुनव्वर राना

भिगोने के बहाने निकल आए!

ऐ रेत के ज़र्रे तिरा एहसान बहुत है,
आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए|

मुनव्वर राना