पार उतर जाएँ हम तो क्या!

दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र,
दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या|

मुनीर नियाज़ी

लौट के घर जाएँ हम तो क्या!

अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ,
शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या|

मुनीर नियाज़ी

जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या!

हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने,
इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या|

मुनीर नियाज़ी

गुज़र जाएँ हम तो क्या!

ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या,
दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या|

मुनीर नियाज़ी

तंगी में उसको शराब क्या देते!

शराब दिल की तलब थी शरा के पहरे में,
हम इतनी तंगी में उसको शराब क्या देते|

मुनीर नियाज़ी

एक ही घर का अज़ाब क्या देते!

हवा की तरह मुसाफ़िर थे दिलबरों के दिल,
उन्हें बस एक ही घर का अज़ाब क्या देते|

मुनीर नियाज़ी

बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में!

ख़राब सदियों की बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में,
अब इन बे-अंत ख़लाओं में ख़्वाब क्या देते|

मुनीर नियाज़ी

अपने अमल का हिसाब क्या देते!

किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते,
सवाल सारे ग़लत थे जवाब क्या देते|

मुनीर नियाज़ी

हुस्न ओ जाम ओ बादा कर लिया!

एक ऐसा शख़्स बनता जा रहा हूँ मैं ‘मुनीर’ ,
जिसने ख़ुद पर बंद हुस्न ओ जाम ओ बादा कर लिया|

मुनीर नियाज़ी

ख़ुद को उससे आधा कर लिया!

ग़ैर से नफ़रत जो पाली ख़र्च ख़ुद पर हो गई,
जितने हम थे हमने ख़ुद को उससे आधा कर लिया|

मुनीर नियाज़ी