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मेरा सूना पड़ा रे संगीत !

मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| आज का ये 1957 में रिलीज़ हुई फिल्म- रानी रूपमती के लिए पंडित भरत व्यास जी ने लिखा था और एस एन त्रिपाठी जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने इसे बड़े मनमोहक अंदाज़ में गाया है|


लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का यह एक अमर गीत-

आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं,
मेरा सूना पड़ा रे संगीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|

बरसे गगन मेरे बरसे नयन, देखो तरसे है मन, अब तो आजा|
शीतल पवन ये लगाए अगन,
ओ सजन अब तो मुखड़ा दिखा जा|
तूने भली रे निभाई प्रीत,
तूने भली रे निभाई प्रीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|
आ लौट…

एक पल है हँसना एक पल है रोना, कैसा है जीवन का खेला|
एक पल है मिलना एक पल बिछड़ना,
दुनिया है दो दिन का मेला|
ये घड़ी न जाए बीत,
ये घड़ी न जाए बीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|
आ लौट…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दिल को वही काम आ गया!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| खास बात ये है आज का ये गीत मुकेश जी ने शम्मी कपूर जी के लिए गाया था, शायद मुकेश जी ने बहुत कम गीत गाये होंगे शम्मी कपूर जी के लिए, मुझे तो कोई और याद नहीं है| फिल्म- ‘ब्लफ़ मास्टर’ के लिए यह गीत- राजेन्द्र कृष्ण जी ने लिखा था और इसका संगीत दिया था – आनंद वीर जी शाह ने|


लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का गाया, कुछ अलग किस्म का यह गीत, जिसमें प्यार करने न करने के बारे में कुछ तर्क-वितर्क किया गया है-

सोचा था प्यार हम न करेंगे,
सूरत पे यार हम न मरेंगे,
लेकिन किसी पे दिल आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे||

बहुत ख़ाक दुनिया की छानी थी हमने,
अब तक किसी की न मानी थी हमने,
धोखे में दिल कैसे आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे|


अगर दिल न देते बड़ा नाम करते,
मगर प्यार से बड़ा काम करते,
दिल को यही काम आ गया|


सोचा था प्यार हम न करेंगे
सूरत पे यार हम न मरेंगे
फिर भी किसी पे दिल आ गया|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे!

आज सोचता हूँ कि गुलाम अली जी की गाई एक और ग़ज़ल शेयर करूं| इस ग़ज़ल के लेखक हैं ज़नाब परवेज़ जालंधरी साहब|


इस ग़ज़ल में मानो एक चुनौती है, या कहें कि जो अपने आपको कुर्बान करने को तैयार हो, वही ‘तुमसे’ इश्क़ कर पाएगा, कहा गया है न, ‘शीश उतारे भुईं धरे, सो पैठे घर माहीं’| चुनौती तो बड़ी ज़बरदस्त है ना!


लीजिए प्रस्तुत है यह खूबसूरत ग़ज़ल-

जिनके होंठों पे हँसी पाँव में छाले होंगे
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे|

मय बरसती है फ़ज़ाओं पे नशा तारीं है,
मेरे साक़ी ने कहीं जाम उछाले होंगे|

उनसे मफ़हूम-ए-ग़म-ए-ज़ीस्त अदा हो शायद,
अश्क़ जो दामन-ए-मिजग़ाँ ने सम्भाले होंगे|

शम्मा ले आये हैं हम जल्वागह-ए-जानाँ से,
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे|

हम बड़े नाज़ से आये थे तेरी महफ़िल में,
क्या ख़बर थी लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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ये कहानी फिर सही!

कविताओं और शायरी के मामले में, मूल परंपरा तो यही रही है कि हम रचनाओं को उनके रचयिता याने कवि अथवा शायर के नाम से जानते रहे हैं| लेकिन यह भी सच्चाई है कि बहुत सी अच्छी रचनाएँ सामान्य जनता तक तभी पहुँच पाती हैं जब उन्हें कोई अच्छा गायक, अच्छे संगीत के साथ गाता है| इसके लिए हमें उन विख्यात गायकों का आभारी होना चाहिए जिनके कारण बहुत सी बार गुमनाम शायर भी प्रकाश में आ पाते हैं|


आज मैं गुलाम अली साहब की गाई एक प्रसिद्ध गजल शेयर कर रहा हूँ, जिसे जनाब मसरूर अनवर साहब ने लिखा है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल, मुझे विश्वास है कि आपने इसे अवश्य सुना होगा-


हमको किसके ग़म ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने…

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने…

नफरतों के तीर खाकर, दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने…

क्या बताएँ प्यार की बाजी, वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने..


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है!

आज ‘इंडियन आइडल’ के एक ताज़ा एपिसोड को देखने के अनुभव को शेयर करना चाहूँगा| इस प्रोग्राम में अनेक युवा प्रतिभाएँ आती हैं, युवक-युवतियाँ हो गायन के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा के बल पर कुछ पाना चाहते हैं| इस प्रोग्राम में कुछ प्रतिष्ठित गायक, संगीतकार आदि निर्णायकों के रूप में और संगीत के क्षेत्र की कुछ बड़ी हस्तियाँ विशिष्ट अतिथि के रूप में सम्मिलित होती हैं|


एक उम्मीद इस कार्यक्रम के माध्यम से युवा गायक-गायिकाओं में पैदा होती है कि यहाँ प्राप्त अनुभव और अर्जित नाम के बल पर वे संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना पाएंगे| अच्छी बात है उम्मीद पर दुनिया कायम है, यद्यपि हम जानते हैं कि ‘इंडियन आइडल’ के कितने प्रोग्राम अब तक हो चुके हैं और इनके माध्यम से कितने लोग संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना पाए हैं!


हाल ही के जिस एपिसोड का अनुभव मैं शेयर कर रहा हूँ, उसमें लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की प्रसिद्ध जोड़ी के सदस्य प्यारेलाल जी शामिल हुए थे और उनके संगीतबद्ध किए गए गीत प्रतिभागियों ने गाकर सुनाए, और हमेशा की तरह इन युवा प्रतिभाओं ने अपनी अमिट छाप छोड़ी|


विशेष बात जिसका उल्लेख मैं करना चाहूँगा, और वास्तव में इसे देखकर धक्का भी लगा, वह थी प्रसिद्ध फिल्मी गीतकार – संतोषानंद जी का इस प्रोग्राम में आना| उनके बारे में काफी पहले यह तो सुना था कि उनका बेटा किसी बड़ी आर्थिक परेशानी में फंस गया था और यह मुझे याद नहीं था कि उनके बेटे और बहू ने आत्महत्या कर ली थी|


मैंने संतोषानंद जी को उनके शुरू के दिनों से ही दिल्ली में देखा है, उनको दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी के अपने कार्यक्रमों में और अन्य आयोजनों में भी आमंत्रित किया था और बहुत बाद में एनटीपीसी अपने आयोजन में भी बुलाया था|


एक बात तो मैं जानता हूँ कि शायद शुरू से ही संतोषानंद जी कभी अपने पैरों पर सीधे नहीं चल पाए, वे हमेशा से छड़ी लेकर चलते रहे और उनके साथ दुर्घटनाएँ भी होती रहीं, लेकिन इस कार्यक्रम में वे व्हीलचेयर पर जिस स्थिति में आए, उसे देखकर दिल दुखी हुआ, लकवा हो जाने के बाद और अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण, उनको देखकर लगा कि जैसे उस कुर्सी पर कोई बच्चा बिलख रहा या पुलक रहा हो|


एक बात और जिसने मुझे इस कार्यक्रम निर्णायक मण्डल में से एक- सुश्री नेहा कक्कड़ का मुरीद बना दिया| जी हाँ, कलाकार तो बहुत से होते हैं, परंतु नेहा जी जिस प्रकार संतोषानंद जी की दयनीय आर्थिक स्थिति के बारे में जानकर, जिस प्रकार द्रवित हो गईं, उनके आँसू रुक नहीं रहे थे और उन्होंने संतोषानंद जी के मना करने पर भी, जिस प्रकार आग्रह पूर्वक, खुद को उनकी पोती के रूप में प्रस्तुत करते हुए पाँच लाख रुपये की भेंट की, वह वास्तव में उनकी विशाल हृदयता का परिचय देता है|


आज संतोषानंद जी की इन गीत पंक्तियों को दोहराते हुए यही कामना करता हूँ कि उनका शेष जीवन सुख से बीते और ईश्वर नेहा जी को उनके इस नेक काम के लिए यश और धन से भरपूर जीवन दे|

एक प्यार का नगमा है
मौजों की रवानी है,
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं
तेरी मेरी कहानी है|


कुछ पाकर खोना है
कुछ खोकर पाना है,
जीवन का मतलब तो
आना और जाना है|
दो पल के जीवन से
इक उम्र चुरानी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तेरा नाम ही लेना छोड़ दिया!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| आज का ये शानदार गीत 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘सहेली’ से है, जिसे लिखा है – इंदीवर जी ने और कल्याणजी आनंद जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज़ में गाया है|

जैसे जीवन में बहुत सी गतिविधियों का हमें कभी समापन करना पड़ जाता है, कभी ऐसी भी परिस्थिति आती है कि हमें प्रेम का भी समापन करना पड़ जाता है, यह गीत कुछ ऐसी ही परिस्थिति को बड़े प्रभावी ढंग से दर्शाता है|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

जिस दिल में बसा था प्यार तेरा
उस दिल को कभी का तोड़ दिया, हाय, तोड़ दिया
बदनाम न होने देंगे तुझे
तेरा नाम ही लेना छोड़ दिया, हाय, छोड़ दिया|
जिस दिल में बसा था प्यार तेरा|

जब याद कभी तुम आओगे
समझेंगे तुम्हें चाहा ही नहीं
राहों में अगर मिल जाओगे
सोचेंगे तुम्हें देखा ही नहीं
जो दर पे तुम्हारे जाती थीं
उन राहों को हमने छोड़ दिया हाय, छोड़ दिया|
जिस दिल में बसा था प्यार तेरा
|

हम कौन किसी के होते हैं
कोई हमको याद करेगा क्यूं
अपने दो आंसू भी हम पर
कोई बरबाद करेगा क्यूं – २
उस मांझी को भी गिला हमसे
मंझधार में जिसने छोड़ दिया, हाय, छोड़ दिया|
जिस दिल में बसा था प्यार तेरा …



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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गाते-गाते रोये मयूरा, फिर भी नाच दिखाए|

आज भी पुरानी ब्लॉग-पोस्ट फिर से शेयर कर रहा हूँ| लंदन की एक यात्रा का विवरण पूरा किया, अगले प्रवास के बारे में आगे लिखूंगा|

इस बीच फिर से अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो महान कलाकार और भारत के सबसे बड़े शो मैन राजकपूर जी की शुरू की एक फिल्म- ‘आशिक़’ से है, गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और संगीतकार है- शंकर जयकिशन की जोड़ी। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस फिल्म के निर्देशक थे- श्री हृषिकेश मुकर्जी।

इसे बालगीत कहा जा सकता है, हालांकि इसमें सरल भाषा में जो समझाया गया, उसको अगर इंसान समझ ले तो शायद यह ज़िंदगी में बहुत काम आ सकता है। हाँ यह भी सही है कि यह समझाना, ऐसे संस्कारों को प्रस्थापित करना, बच्चों के साथ बहुत दूरगामी प्रभाव वाला और उपयोगी हो सकता है।

आइए इस गीत का आनंद लेते हैं-

तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो,
और हंसते-गाते इस जीवन की
उलझी राह संवारो।


शाम का सूरज, बिंदिया बनके,
सागर में खो जाए,
सुबह सवेरे वो ही सूरज
आशा लेकर आए,
नई उमंगें, नई तरंगें,
आस की जोत जगाए रे,
आस की जोत जगाए।


तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो
|

दुख में जो गाए मल्हारें,
वो इंसां कहलाए,
जैसे बंसी के सीने में
छेद हैं फिर भी गाए,
गाते-गाते रोये मयूरा,
फिर भी नाच दिखाए रे-
फिर भी नाच दिखाए।


तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो,
और हंसते-गाते इस जीवन की
उलझी राह संवारो।


इसके साथ ही मैं कामना करता हूँ कि आपका जीवन आशा, उमंग और उत्साह से भरा रहे।

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तुम जो न सुनते, क्यों गाता मैं!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं।



मैंने कहीं पढ़ा था कि शैलेंद्र जी इप्टा से जुड़े थे और वहीं किसी नाटक के मंचन के समय पृथ्वीराज कपूर जी उनसे मिले, बताया कि उनके बेटे राज कपूर अपनी पहली फिल्म बनाने वाले हैं और उनसे फिल्म में गीत लिखने का अनुरोध किया।

शैलेंद्र उस समय अपनी विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उन्होंने कहा कि वे फिल्म के लिए गीत नहीं लिखेंगे। पृथ्वीराज जी ने उनसे कहा कि जब उनका मन हो तब वे आकर मिल लें, अगर वे आएंगे तो उनको बहुत अच्छा लगेगा। इत्तफाक़ से वह घड़ी बहुत जल्द आ गई और हमारी फिल्मों को शैलेंद्र जैसा महान गीतकार मिल गया।

सिर्फ इतना ही नहीं, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश, शंकर जयकिशन का राजकपूर के साथ मिलकर एक ऐसा समूह बना, जिसने हमारी फिल्मों अनेक अविस्मरणीय गीत दिए, जिनमें सिर्फ महान विचार और भावनाएं नहीं अपितु आत्मा धड़कती है। संगीतकार के तौर पर इस समूह में कल्याण जी-आनंद जी और शायद लक्ष्मीकांत प्यारे लाल भी जुड़े। कुछ ऐसा संयोग बन गया कि शैलेंद्र अथवा हसरत गीत लिखेंगे, शंकर जयकिशन उसका संगीत देंगे, मुकेश उसके पुरुष कंठ होंगे और पर्दे पर पर राज कपूर की प्रस्तुति इस सभी का संयोग बनकर वह गीत अमर बन जाएगा-


तुम जो हमारे मीत न होते
गीत ये मेरे- गीत न होते।


तुम जो न सुनते,
क्यों गाता मैं,
दर्द से घुट कर रह जाता मैं।
सूनी डगर का एक सितारा-
झिलमिल झिलमिल रूप तुम्हारा।


एक बहुत बड़ी शृंखला है ऐसे गीतों की, जिनमें बहुत गहरी बात को बड़ी सादगी से कह दिया गया है। नशे का गीत है तो उसमें भी बड़ी सरलता से फिलॉसफी कह दी गई है-


मुझको यारो माफ करना, मैं नशे में हूँ-
कल की यादें मिट चुकी हैं, दर्द भी है कम
अब जरा आराम से आ-जा रहा है दम,
कम है अब दिल का तड़पना, मैं नशे में हूँ।


है जरा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,
पर न जाने क्या कहेंगे, ये जहाँ वाले,
तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूँ।


शराबियों से ही जुड़ी एक और बात, वो रोज तौबा करते हैं और रोज भूल जाते हैं, इन बातों को इस गीत में कितनी खूबसूरती से कहा गया है-


याद आई आधी रात को, कल रात की तौबा,
दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा!


जीने भी न देंगे मुझे, दुश्मन मेरी जां के,
हर बात पे कहते हैं कि- इस बात की तौबा!


बातों में वफा और वो मर मिटने की कस्में,
क्या दौर था, उस दौर के जज़्बात की तौबा।


और फिर सादगी और मानवीयता के दर्शन से भरे ये गीत-

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार-
जीना इसी का नाम है।


रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का,
जिंदा है हमीं से नाम प्यार का|


किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे,
मर के भी किसी को याद आएंगे,
कहेगा फूल हर कली से बार-बार
जीना इसी का नाम है।


या फिर-


इन काली सदियों के सिर से, जब रात का आंचल ढ़लकेगा,
जब दुख के बादल छिटकेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा,
जब अंबर झूमके नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी-
वो सुबह कभी तो आएगी।

एक और-


जेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वर्ना गाली,
ये संतरी हमारा, ये पासबां हमारा।


चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।


और अंत में-


तुम्हारे महल- चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे,
अकड़ किस बात की प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है।


सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है,
न हाथी है न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।


ये सब मैंने कहा, कवि शैलेंद्र जी को याद करके, हालांकि मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि जिन गीतों की पंक्तियां मैंने यहाँ लिखी हैं, उनमें कौन सा गीत शैलेंद्र जी का है, कौन सा नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये सभी गीत उसी परंपरा के हैं, जिसके शैलेंद्र जी प्रतिनिधि थे। हाँ इन सभी गीतों को मुकेश जी ने अपनी सीधे दिल में उतर जाने वाली आवाज़ दी है।


मुझे नहीं मालूम कि आपको यह आलेख कैसा लगेगा, लेकिन मुझे इस सफर से गुज़रकर बहुत अच्छा लगा और आगे भी जब मौका मिलेगा, मैं इस प्रकार की बातें करता रहूंगा। हर गीत की कुछ पंक्तियां लिखने के बाद मुझे लगा है कि जो पंक्तियां मैंने यहाँ नहीं दी हैं, उनको लिखता तो और अच्छा रहता। इन अमर गीतों की कुछ पंक्तियों के बहाने मैं शैलेंद्र जी को और इन गीतों से जुड़े सभी महान सर्जकों, कलाकारों को याद करता हूँ।

नमस्कार।

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ये जो मन की सीमा-रेखा है!

पिछले लगभग एक माह की अवधि में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश चंद माथुर जी का जन्म दिन (22 जुलाई) और पुण्य तिथि 27 अगस्त दोनो ही आए| 27 अगस्त,1976 को ही इस महान सुरीले गायक और फिल्मी दुनिया में इंसानियत की एक महान मिसाल, मुकेश जी का डेट्रायट, अमरीका में दर्शकों के समक्ष संगीत का कार्यक्रम देते हुए, दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया था| स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी भी मुकेश जी से बहुत प्रेम करती थीं और उनको अपना बड़ा भाई मानती थीं|


आज मुकेश जी की स्मृति में उनका गाया एक मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ, जो योगेश जी ने लिखा था और 1974 में रिलीज़ हुई फिल्म- रजनीगंधा के लिए, सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने बड़े मोहक अंदाज़ में गाया और इसे अमोल पालेकर जी पर फिल्माया गया था| किस प्रकार एक समय ऐसा आता है, जब हमारा मन अपने बंधनों को, अपनी सीमारेखा को तोड़ने लगता है|


लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-



कई बार यूँ भी देखा है
ये जो मन की सीमारेखा है
मन तोड़ने लगता है
अनजानी प्यास के पीछे
अनजानी आस के पीछे
मन दौड़ने लगता है


राहों में, राहों में, जीवन की राहों में
जो खिले हैं फूल, फूल मुस्कुरा के
कौन सा फूल चुरा के
मैं रख लूँ मन में सज़ा के
कई बार यूँ भी…


जानूँ ना, जानूँ ना, उलझन ये जानूँ ना
सुलझाऊँ कैसे कुछ समझ ना पाऊँ
किसको मीत बनाऊँ
मैं किसकी प्रीत भुलाऊँ
कई बार यूँ भी…



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –



आज गुलाम अली जी का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे आनंद बक्षी जी ने लिखा है और इसका संगीत अनु मलिक जी ने तैयार किया है।


यह गीत वैसे ही सुंदर लिखा गया है और गुलाम अली जी की गायकी ने इसको अमर बना दिया है। मूल बात जो इसमें है, वो यह कि इंसान का आचरण, उसका किरदार उसको कहीं से कहीं ले जाता है, ऊंचाइयों पर भी और बर्बादी के रास्ते पर भी! लेकिन इसमें तक़दीर का, परिस्थितियों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है।


लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए और गुलाम अली साहब की अदायगी को याद कीजिए-


चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला
बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर की गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था
मेरी तक़दीर ने मुझको, तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


आज के लिए इतना ही, नमस्कार।



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