बदनाम न हो प्यार मेरा!

आज मैं एक बार फिर से हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी और लता जी का गाया एक युगल गीत शेयर कर रहा हूँ, 1953 में रिलीज़ हुई राज कपूर जी की फिल्म- ‘आह’ के लिए इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी जी ने और शंकर – जयकिशन की संगीतमय जोड़ी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी और लता मंगेशकर जी ने गाया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है मुकेश जी और लता जी का यह बहुत प्यारा सा गीत –


आजा रे अब मेरा दिल पुकारा
रो-रो के ग़म भी हारा
बदनाम न हो प्यार मेरा|

मौत मेरी तरफ आने लगी
जान तेरी तरफ जाने लगी
बोल शाम-ए-जुदाई क्या करे
आस मिलने की तड़पाने लगी|

घबराए हाय रे दिल
सपनों में आ के कभी मिल|


अपने बीमार-ए-ग़म को देख ले
हो सके तो तू हम को देख ले
तूने देखा न होगा ये समां
कैसे जाता है दम वो देख ले|

आजा रे अब मेरा दिल पुकारा
रो-रो के ग़म भी हारा
बदनाम न हो प्यार मेरा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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प्यार का आलम गुज़र गया!

आज एक बार फिर से मैं, हम सबके प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश चंद्र माथुर जी का एक प्यारा सा गीत शेयर कर रहा हूँ, जिनको हम प्यार से सिर्फ ‘मुकेश’ नाम से जानते हैं|

फिल्म- ‘प्यार की राहें’ के लिए इस गीत को ‘प्रेम धवन’ जी ने लिखा था, इसका संगीत – कनू घोष जी ने दिया था और मुकेश जी ने बहुत प्रभावी ढंग से गाकर इस गीत को अमर कर दिया था| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



दो रोज़ में वो प्यार का आलम गुज़र गया,
बरबाद करने आया था, बरबाद कर गया|
दो रोज़ में

बस इतनी सी है दास्तां बचपन के प्यार की,
दो फूल खिलते खिलते ही गुलशन उजड़ गया|
गुलशन उजड़ गया

लेके सहारा याद का कब तक कोई जिए
ऐ मौत आ कि ज़िंदगी से दिल ही भर गया
दिल ही भर गया|


सीने में जब किसी के धड़कता था दिल मेरा
वो दिन कहाँ गए, वो ज़माना किधर गया
ज़माना किधर गया|
दो रोज में


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आदमी मुसाफ़िर है !

फिल्मी के अत्यंत प्रसिद्ध और सफल गीतकार स्वर्गीय आनंद बख्शी जी का लिखा एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ|

इस गीत में बहुत सरल शब्दों में जीवन दर्शन की कुछ बातें की गई हैं| लीजिए प्रस्तुत है आनंद बख्शी जी का लिखा यह गीत-

आदमी मुसाफ़िर है आता है जाता है,
आते-जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है|

झोंका हवा का पानी का रेला
मेले में रह जाए जो अकेला
वो फिर अकेला ही रह जाता है
आदमी मुसाफ़िर है …

क्या साथ लाए क्या छोड़ आए
रस्ते में हम क्या छोड़ आए
मंज़िल पे जा के ही याद आता है
आदमी मुसाफ़िर है …

जब डोलती है जीवन की नैया
कोई तो बन जाता है खिवैया
कोई किनारे पे ही डूब जाता है
आदमी मुसाफ़िर है …

रोती है आँख जलता है ये दिल
जब अपने घर के फेंके दिये से
आंगन पराया जगमगाता है
आदमी मुसाफ़िर है …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बस प्यार ही प्यार पले !

आज किशोर कुमार जी द्वारा स्वयं निर्मित फिल्म – ‘दूर गगन की छाँव में’ के लिए उनके ही द्वारा गाया गया एक गीत शेयर कर रहा हूँ, इस गीत का संगीत भी किशोर कुमार जी ने ही दिया है और इसमें उनके पुत्र अमित कुमार की भी आवाज है|

कुल मिलाकर ये एक बहुत सुंदर और आशावादी गीत है, लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-  

आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ एक ऐसे गगन के तले,

जहाँ ग़म भी ना हो, आँसू भी ना हो, बस प्यार ही प्यार पले|

++++

सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे

चंदा की किरण से धुलकर घनघोर अंधेरा भागे,

कभी धूप खिले, कभी छाँव मिले, लंबी सी डगर ना खले|

+++++

जहाँ दूर नज़र दौड़ाएं, आज़ाद गगन लहराये

जहाँ रंगबिरंगे पंछी आशा का संदेसा लाये, 

सपनों में पली, हँसती हो कली, जहाँ शाम सुहानी ढले|

++++

सपनों के ऐसे जहां में, जहाँ प्यार ही प्यार खिला हो

हम जा के वहाँ खो जाएं, शिकवा ना कोई गीला हो,

कहीं बैर ना हो, कोई गैर ना हो, सब मिल के यूँ चलते चलें|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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मेरा सूना पड़ा रे संगीत !

मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| आज का ये 1957 में रिलीज़ हुई फिल्म- रानी रूपमती के लिए पंडित भरत व्यास जी ने लिखा था और एस एन त्रिपाठी जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने इसे बड़े मनमोहक अंदाज़ में गाया है|


लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का यह एक अमर गीत-

आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं,
मेरा सूना पड़ा रे संगीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|

बरसे गगन मेरे बरसे नयन, देखो तरसे है मन, अब तो आजा|
शीतल पवन ये लगाए अगन,
ओ सजन अब तो मुखड़ा दिखा जा|
तूने भली रे निभाई प्रीत,
तूने भली रे निभाई प्रीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|
आ लौट…

एक पल है हँसना एक पल है रोना, कैसा है जीवन का खेला|
एक पल है मिलना एक पल बिछड़ना,
दुनिया है दो दिन का मेला|
ये घड़ी न जाए बीत,
ये घड़ी न जाए बीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं|
आ लौट…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दिल को वही काम आ गया!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| खास बात ये है आज का ये गीत मुकेश जी ने शम्मी कपूर जी के लिए गाया था, शायद मुकेश जी ने बहुत कम गीत गाये होंगे शम्मी कपूर जी के लिए, मुझे तो कोई और याद नहीं है| फिल्म- ‘ब्लफ़ मास्टर’ के लिए यह गीत- राजेन्द्र कृष्ण जी ने लिखा था और इसका संगीत दिया था – आनंद वीर जी शाह ने|


लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का गाया, कुछ अलग किस्म का यह गीत, जिसमें प्यार करने न करने के बारे में कुछ तर्क-वितर्क किया गया है-

सोचा था प्यार हम न करेंगे,
सूरत पे यार हम न मरेंगे,
लेकिन किसी पे दिल आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे||

बहुत ख़ाक दुनिया की छानी थी हमने,
अब तक किसी की न मानी थी हमने,
धोखे में दिल कैसे आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे|


अगर दिल न देते बड़ा नाम करते,
मगर प्यार से बड़ा काम करते,
दिल को यही काम आ गया|


सोचा था प्यार हम न करेंगे
सूरत पे यार हम न मरेंगे
फिर भी किसी पे दिल आ गया|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे!

आज सोचता हूँ कि गुलाम अली जी की गाई एक और ग़ज़ल शेयर करूं| इस ग़ज़ल के लेखक हैं ज़नाब परवेज़ जालंधरी साहब|


इस ग़ज़ल में मानो एक चुनौती है, या कहें कि जो अपने आपको कुर्बान करने को तैयार हो, वही ‘तुमसे’ इश्क़ कर पाएगा, कहा गया है न, ‘शीश उतारे भुईं धरे, सो पैठे घर माहीं’| चुनौती तो बड़ी ज़बरदस्त है ना!


लीजिए प्रस्तुत है यह खूबसूरत ग़ज़ल-

जिनके होंठों पे हँसी पाँव में छाले होंगे
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे|

मय बरसती है फ़ज़ाओं पे नशा तारीं है,
मेरे साक़ी ने कहीं जाम उछाले होंगे|

उनसे मफ़हूम-ए-ग़म-ए-ज़ीस्त अदा हो शायद,
अश्क़ जो दामन-ए-मिजग़ाँ ने सम्भाले होंगे|

शम्मा ले आये हैं हम जल्वागह-ए-जानाँ से,
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे|

हम बड़े नाज़ से आये थे तेरी महफ़िल में,
क्या ख़बर थी लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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ये कहानी फिर सही!

कविताओं और शायरी के मामले में, मूल परंपरा तो यही रही है कि हम रचनाओं को उनके रचयिता याने कवि अथवा शायर के नाम से जानते रहे हैं| लेकिन यह भी सच्चाई है कि बहुत सी अच्छी रचनाएँ सामान्य जनता तक तभी पहुँच पाती हैं जब उन्हें कोई अच्छा गायक, अच्छे संगीत के साथ गाता है| इसके लिए हमें उन विख्यात गायकों का आभारी होना चाहिए जिनके कारण बहुत सी बार गुमनाम शायर भी प्रकाश में आ पाते हैं|


आज मैं गुलाम अली साहब की गाई एक प्रसिद्ध गजल शेयर कर रहा हूँ, जिसे जनाब मसरूर अनवर साहब ने लिखा है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल, मुझे विश्वास है कि आपने इसे अवश्य सुना होगा-


हमको किसके ग़म ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने…

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने…

नफरतों के तीर खाकर, दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने…

क्या बताएँ प्यार की बाजी, वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने..


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है!

आज ‘इंडियन आइडल’ के एक ताज़ा एपिसोड को देखने के अनुभव को शेयर करना चाहूँगा| इस प्रोग्राम में अनेक युवा प्रतिभाएँ आती हैं, युवक-युवतियाँ हो गायन के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा के बल पर कुछ पाना चाहते हैं| इस प्रोग्राम में कुछ प्रतिष्ठित गायक, संगीतकार आदि निर्णायकों के रूप में और संगीत के क्षेत्र की कुछ बड़ी हस्तियाँ विशिष्ट अतिथि के रूप में सम्मिलित होती हैं|


एक उम्मीद इस कार्यक्रम के माध्यम से युवा गायक-गायिकाओं में पैदा होती है कि यहाँ प्राप्त अनुभव और अर्जित नाम के बल पर वे संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना पाएंगे| अच्छी बात है उम्मीद पर दुनिया कायम है, यद्यपि हम जानते हैं कि ‘इंडियन आइडल’ के कितने प्रोग्राम अब तक हो चुके हैं और इनके माध्यम से कितने लोग संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना पाए हैं!


हाल ही के जिस एपिसोड का अनुभव मैं शेयर कर रहा हूँ, उसमें लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की प्रसिद्ध जोड़ी के सदस्य प्यारेलाल जी शामिल हुए थे और उनके संगीतबद्ध किए गए गीत प्रतिभागियों ने गाकर सुनाए, और हमेशा की तरह इन युवा प्रतिभाओं ने अपनी अमिट छाप छोड़ी|


विशेष बात जिसका उल्लेख मैं करना चाहूँगा, और वास्तव में इसे देखकर धक्का भी लगा, वह थी प्रसिद्ध फिल्मी गीतकार – संतोषानंद जी का इस प्रोग्राम में आना| उनके बारे में काफी पहले यह तो सुना था कि उनका बेटा किसी बड़ी आर्थिक परेशानी में फंस गया था और यह मुझे याद नहीं था कि उनके बेटे और बहू ने आत्महत्या कर ली थी|


मैंने संतोषानंद जी को उनके शुरू के दिनों से ही दिल्ली में देखा है, उनको दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी के अपने कार्यक्रमों में और अन्य आयोजनों में भी आमंत्रित किया था और बहुत बाद में एनटीपीसी अपने आयोजन में भी बुलाया था|


एक बात तो मैं जानता हूँ कि शायद शुरू से ही संतोषानंद जी कभी अपने पैरों पर सीधे नहीं चल पाए, वे हमेशा से छड़ी लेकर चलते रहे और उनके साथ दुर्घटनाएँ भी होती रहीं, लेकिन इस कार्यक्रम में वे व्हीलचेयर पर जिस स्थिति में आए, उसे देखकर दिल दुखी हुआ, लकवा हो जाने के बाद और अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण, उनको देखकर लगा कि जैसे उस कुर्सी पर कोई बच्चा बिलख रहा या पुलक रहा हो|


एक बात और जिसने मुझे इस कार्यक्रम निर्णायक मण्डल में से एक- सुश्री नेहा कक्कड़ का मुरीद बना दिया| जी हाँ, कलाकार तो बहुत से होते हैं, परंतु नेहा जी जिस प्रकार संतोषानंद जी की दयनीय आर्थिक स्थिति के बारे में जानकर, जिस प्रकार द्रवित हो गईं, उनके आँसू रुक नहीं रहे थे और उन्होंने संतोषानंद जी के मना करने पर भी, जिस प्रकार आग्रह पूर्वक, खुद को उनकी पोती के रूप में प्रस्तुत करते हुए पाँच लाख रुपये की भेंट की, वह वास्तव में उनकी विशाल हृदयता का परिचय देता है|


आज संतोषानंद जी की इन गीत पंक्तियों को दोहराते हुए यही कामना करता हूँ कि उनका शेष जीवन सुख से बीते और ईश्वर नेहा जी को उनके इस नेक काम के लिए यश और धन से भरपूर जीवन दे|

एक प्यार का नगमा है
मौजों की रवानी है,
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं
तेरी मेरी कहानी है|


कुछ पाकर खोना है
कुछ खोकर पाना है,
जीवन का मतलब तो
आना और जाना है|
दो पल के जीवन से
इक उम्र चुरानी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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