इक तार कहीं से टूट गया!

इस नग़्मा-तराज़-ए-गुलशन ने तोड़ा है कुछ ऐसा साज़-ए-दिल,
इक तार कहीं से टूट गया इक तार कहीं से टूट गया|

शमीम जयपुरी