कमज़ोर शाख़ें कि हिला भी न सकूँ!

फल तो सब मेरे दरख़्तों के पके हैं लेकिन,
इतनी कमज़ोर हैं शाख़ें कि हिला भी न सकूँ|

राहत इन्दौरी