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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-20 / दूर बहुत दूर!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज बीसवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

इसी क्रम में लीजिए प्रस्तुत है आज का गीत-

 

गीतों के सुमन जहाँ महके थे,
वह ज़मीन-
दूर, बहुत दूर।

 

अजनबी हवाएं,मौसम आदमखोर,
हर तरफ फिजाओं में जहरीला शोर,
सरसों की महक और
सरकंडी दूरबीन,
दूर, बहुत दूर।

 

कुछ हुए हवाओं में गुम, कुछ को धरती निगल गई,
जो भी अपने हुए यहाँ, उन पर तलवार चल गई,
दिवराती सांझ और
फगुआती भोर,
दूर, बहुत दूर।

 

मौसम के साथ-साथ बदले साथी,
दुनिया में सब-सुविधा के बाराती,
दुर्दिन में बंधी रहे-
वह कच्ची डोर,
दूर, बहुत दूर।

 

गीत पंक्ति जैसी आती मीठी याद,
कडुवे अनुभव भी देते मीठा स्वाद,
चांद हुआ बचपन
आहत मन चकोर
तकता कितनी दूर।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-18/ गीत उगने दो!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज अठारहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

बीच में कुछ काम आ गया था, अभी भी निपटा नहीं है, इस बीच समय निकालकर आज की शेयरिंग।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

आज का गीत छोटा सा है। जैसा है आपके सामने प्रस्तुत है-

 

 

मौन यूं कवि मत रहो,
अब गीत उगने दो।

 

अनुभव की दुनिया के
अनगिनत पड़ाव,
आसपास से गुज़र गए,
झोली में भरे कभी
पर फिर अनजाने में,
सभी पत्र-पुष्प झर गए,
करके निर्बंध, पिपासे मानव-मन को-
अनुभव-संवेदन दाना चुगने दो।

 

खुद से खुद की बातें
करने से क्या होगा,
सबसे, सबकी ही
संवेदना कहो,
अपने ही तंतुजाल में
उलझे रहकर तुम,
दुनिया का नया
तंत्रजाल मत सहो,
आगे बढ़कर सारे
भटके कोलाहल में,
मंजिल के लिए
लालसा जगने दो।

 

मौन यूं कवि मत रहो,
अब गीत उगने दो।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-8 : हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज आठवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

 

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इसी क्रम में आज की इस आठवीं पोस्ट में यह गीत शेयर कर रहा हूँ। हम आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, लेकिन जन साधारण को अक्सर लगता है कि क्या वास्तव में देश को चलाने में उसकी कोई भूमिका है। क्या वास्तव में हम ही अपने इस तंत्र की रचना करते हैं? अक्सर ऐसा लगता है कि हमारे पास वास्तव में कोई विकल्प ही नहीं है, दो बुरों में से एक को चुनना होता है और उसका पूरा महौल बना हुआ होता है, जनता तो मात्र बहाना बन जाती है, यह अभिव्यक्ति मैंने ‘वायलिन’ के माध्यम से की है, जैसे कोई वायलिन वादक अपनी मनचाही तरंगें वातावरण मैं पैदा करता है, ऐसे ही माना जाता है कि अपनी सरकार की रचना हम करते हैं, कहाँ तक प्रभावी है हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था।

लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

गीत

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है।
हम सदा जिए झुककर, सामने हवाओं के,
उल्टे ऋतुचक्रों, आकाशी घटनाओं के,
अपना यह हीनभाव, साथ सदा आया है।

 

छंद जो मिला हमको, गाने को
घायल होंठों पर तैराने को,
शापित अस्तित्व और घुन खाए सपने ले,
मीन-मेख क्या करते-
गाना था, गाया है।

 

नत हैं हम अदने भी, शब्द हुए रचना में,
भीड़ हुए सड़कों पर, अंक हुए गणना में,
तस्वीरें, सुर्खियां सदा से ही-
ईश्वर है या उसकी माया है।
हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है।

 

एक और छोटी सी अभिव्यक्ति, जिसमें यह बताया गया है कि किस प्रकार हम नकलीपन को, बाहरी एपीयरेंस को ही अपनी पहचान बना लेते हैं-

 

क्रीज़ बनाए रखने की कोशिश में,
बिता देते हैं पूरा दिन-
इस्तरी किए हुए लोग’

ऐसा लगता है कई बार कि इस्तरी बंदे के कपड़ों पर नहीं, बल्कि उसकी पर्सनैलिटी पर हुई है। इस प्रकार, एक दिन की उस नौकरी का समापन हुआ।

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

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