Categories
Uncategorized

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-2

कल से मैंने अपनी रचनाएं, जितनी उपलब्ध यहाँ शेयर करना शुरू किया है जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं केवल इतना कर रहा हूँ कि मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

एक बात और, मैं हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

 

 

लीजिए आज इस क्रम की इस दूसरी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

 

पिता के नाम

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ 

हे पिता
यदि हो कहीं, तो क्या लिखूं तुमको
बस यही, जो जिस तरह था
उस तरह ही है।

 

पत्र है अभिवादनों की शृंखला केवल
हम अभी जीवित बचे हैं, यह बताने को,
और आश्वासन इसी अनुरूप पाने को,
मैं न मानूं किंतु प्रचलन
इस तरह ही है।

 

हाल अपना क्या सुनाऊं, ठीक सा ही है,
गो कि अदना क्लर्क–
कल का महद आकांक्षी,
ओस मे सतरंगदर्शी बावला पंछी–
हो गया है, मुदित सपना, आपके मन का
जी रहा है, और जीवन
उस तरह ही है।

 

साथ हैं अब कुछ वही एहसास सपनीले-
वह फिसलने फर्श पर मेरा रपट जाना,
और चिंता से तुम्हारा आंख भर लाना,
बीच सड़कों, धुएं, ट्रैफिक के गिरा हूँ मैं
और यह ध्यानस्थ दुनिया-
उस तरह ही है।

 

और यह दूसरी कविता, बेरोजगारी के दिनों के अनुभव पर आधारित-

 

इंद्रधनुष सपनों को, पथरीले अनुभव की
ताक पर धरें,
आओ हम तुम मिलकर, रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।

 

गर्मी में सड़कों का ताप बांट लें,
सर्दी में पेड़ों के साथ कांप लें,
बूंद-बूंद रिसकर आकाश से झरें।
रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें॥

 

ढांपती दिशाओं को, हीन ग्रंथियां,
फूटतीं ऋचाओं सी मंद सिसकियां।
खुद सुलगे पिंड हम, आग से डरें।
रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

********