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चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ!

हिन्दी काव्य मंचों के एक अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक प्रसिद्ध गीत आज शेयर कर रहा हूँ, जिसमें कवि ऐसे भाव व्यक्त करता है कि अपने महान राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित करने के बाद भी हम उसका ऋण नहीं उतार सकते|


लीजिए प्रस्तुत है राष्ट्रप्रेम की भावना से भरपूर यह गीत –



मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।


गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।


स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरे, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।


सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

आज सोचा कि ज़िंदगी के बारे में बात करके, ज़िंदगी को उपकृत कर दें।
शुरू में डॉ. कुंवर बेचैन जी की पंक्तियां याद आ रही हैं, डॉ. बेचैन मेरे लिए गुरू तुल्य रहे हैं और उनकी गीत पंक्तियां अक्सर याद आ जाती हैं-


ज़िंदगी का अर्थ मरना हो गया है,
और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे।


जब सोचते हैं कि बहुत दिनों के लिए जीना है तो क्या किया जाए, तब यह याद आता है-


जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम,
ये रस्ता कट जाएगा मितरा, ये बादल छंट जाएगा मितरा।


लेकिन फिर कोई यह कहता मिल जाता है-


ये करें और वो करें, ऐसा करें, वैसा करें।
ज़िंदगी दो दिन की है, दो दिन में हम क्या-क्या करें।

अब वैसे तो ये कवि-शायर लोग कन्फ्यूज़ करते ही रहते हैं, पर ज़िंदगी के बारे में इन्होंने कुछ ज्यादा ही कन्फ्यूज़ किया है-


ज़िंदगी कैसी है पहेली ये हाय
कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाए।


और जब ज़िंदगी में परेशानियां ज्यादा होती हैं, तब फैज़ अहमद फैज़ कहते हैं-


ज़िंदगी क्या किसी मुफलिस की क़बा है जिसमें,
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं।

और कहीं कोई मोहब्बत का मारा, ये कहता हुआ भी मिल जाता है-


हम तुझ से मोहब्बत करके सनम, हंसते भी रहे, रोते भी रहे,
हंस हंस के सहे उल्फत में सितम, मरते भी रहे, जीते भी रहे।


जब जीवन में कोई पवित्र उद्देश्य मिल जाता है, तब ये खयाल ही नहीं आता कि ज़िंदगी छोटी है या बड़ी, तब इंसान इस तरह की बात करता है-


हम जिएंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए,
दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए।


एक बात और, स्वामी विवेकानंद और इस तरह के कुछ महापुरुष जब कम समय में बहुत बड़ी उपलब्धियां कर लेते हैं और कम उम्र में ही उनको जीवन-त्याग करना पड़ जाता है, उनके लिए सोम ठाकुर जी ने बड़ी सुंदर पंक्तियां लिखी हैं-


कोई दीवाना जब होंठों तक अमृत घट ले आया,
काल बली बोला मैंने, तुझ से बहुतेरे देखे हैं।


और आज के लिए आखिरी बात, ये फानी बदायुनी जी का शेर-


एक मुअम्मा है, समझने का न समझाने का,
ज़िंदगी काहे को है, ख्वाब है दीवाने का।


मेरे खयाल में ज़िंदगी के नाम पर, आज के लिए इतना कंफ्यूज़न ही काफी है।
नमस्कार।


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मैं जहाँ रहूँ जहाँ में, याद रहे तू !

मैं अक्सर पुरानी फिल्मों के गीत याद करता हूँ, क्योंकि मुझे पुराना फिल्मी संगीत, पुराने गायक पसंद हैं, विशेष रूप से मेरे प्रिय गायक मुकेश जी, रफी साहब, किशोर कुमार, मन्ना डे, हेमंत कुमार आदि-आदि, सचिन देव बर्मन जी भी एक गायक के रूप में उनमें शामिल हैं| इसके अलावा मुझे गजल गायक- गुलाम अली साहब, जगजीत सिंह जी और अन्य गायक- अनूप जलोटा, पंकज उधास जी आदि आदि शामिल हैं|


स्वाधीनता दिवस के अवसर पर आज कुछ ही समय पहले की फिल्म- ‘राज़ी’ का एक राष्ट्रभक्ति गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें दिखाया गया है नायिका, जो पाकिस्तान में विवाह करके जाती है एक भारतीय जासूस के रूप में काम करने के लिए, और इस गीत को पाकिस्तानी बच्चों के माध्यम से बड़ी खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है|


फिल्म- राज़ी के लिए यह गीत सुनिधि चौहान जी ने गाया है और नायिका- आलिया भट्ट और बच्चों पर (जिन्हें पाकिस्तानी बच्चों के रूप में दिखाया गया है) पर फिल्माया गया है| गीत लिखा है- गुलज़ार जी ने और संगीत दिया है- शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी ने|


लीजिए आज इस सुंदर गीत को याद कराते हैं-



ऐ वतन
मेरे वतन
ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू|
मैं जहाँ रहूँ जहाँ में, याद रहे तू||

तू ही मेरी मंजिल, पहचान तुझी से,
पहुंचू मैं जहां भी, मेरी बुनियाद रहे तू|


ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू,
मैं जहाँ रहूँ जहाँ में याद रहे तू|

तुझपे कोई गम की आंच आने नहीं दूं,
कुर्बान मेरी जान तुझपे शाद रहे तू |
ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू,
मैं जहाँ रहूँ जहाँ में याद रहे तू |



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कोरोना काल के फरिश्ते!

आज एक बार फिर से कोरोना संकट और लॉक डाउन की परिस्थितियों के बहाने चर्चा कर रहा हूँ|

 

ऐसे राष्ट्रीय संकट के समय भी राजनीति और फिल्म जगत, व्यावहारिक रूप से हर क्षेत्र के लोगों का अलग-अलग चरित्र उजागर होता है| हमारी प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी और लंबे समय तक सत्तारूढ़ रही पार्टी- कांग्रेस का चरित्र इस समय  घृणा के योग्य प्रतीत होता है | जो पार्टी और उसका प्रमुख नेता, संकट की इस घड़ी में भी, किसी न किसी बहाने से राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध खड़े होते हैं| ऐसी असंभव किस्म की मांगें सरकार के रास्ते में  रोड़े अटकाने के लिए करते हैं जिससे राहत के लिए किए जा रहे कार्यों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है| वे किसी न किसी बहाने से जनता में असंतोष पैदा करना चाहते हैं|

आज यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा मुझे इस समाचार से मिली कि फिल्म अभिनेता सोनू सूद ने, कुछ साथियों के साथ मिलकर, मुंबई के प्रवासी मजदूरों को उनके घर वापस भेजने का अभियान चलाया है, अनेक लोगों को वे वापस भेज चुके हैं और प्रवासी मजदूरों के प्रति उनका यह संकल्प है कि जब तक एक भी प्रवासी मजदूर वहाँ उनसे सहायता चाहता है, वे इस अभियान को जारी रखेंगे| मैं सोनू सूद जी और उनकी टीम को इस अभियान के लिए साधुवाद देता हूँ और कामना करता हूँ कि ईश्वर उनको सफलता की नई ऊँचाइयाँ प्रदान करें| मेरी निगाह में वे अनुराग कश्यप, जावेद अख्तर, नसीरुद्दीन शाह जैसे बुद्धिजीवियों से लाख दर्जे अच्छे हैं|

एक और इसी प्रकार का समाचार और पढ़कर बहुत अच्छा लगा कि कुछ छात्रों ने अपने पैसों से हवाई यात्रा का टिकट कराकर कुछ प्रवासी मजदूर परिवारों को उनके घर वापस भिजवाया|

जिस देश में ऐसी भावना से भरे जागरूक और लोगों का दर्द समझने वाले नागरिक मौजूद हैं, वह किसी भी बड़े से बड़े संकट का मुक़ाबला कर लेगा| बस कामना यही है कि इन सभी लाचार मजदूरों को ऐसा कोई हमदर्द मिल जाए, क्योंकि बहुत से लोग तो यह भी नहीं जानते कि श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे कराते हैं| किसी भी रूप में जो लोग इन लोगों की मदद करते हैं, जो पीएम केयर्स फंड अपना विनम्र योगदान करते हैं, वे उन बौद्धिकों से लाख दर्जे अच्छे हैं, जो केवल नकारात्मक वातावरण बनाने में ही लगे रहते हैं|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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A small thing- love for our country!

Talking about small things in life, which hold great importance! What is small or big depends on the thinking of a person and others may consider it small or big based on their thinking or may be values.

 

 

We often try to do things in life which are proper as per our principals, thinking etc. For example ‘faith’ is a matter of faith. We might believe in many things as per our upbringing mostly. For example some people believe in God, some don’t. Loving our country also depends upon us, our personal and family values mostly. For any other person it does not make much difference whether we love our country or not.

Today I take this one thing, which mostly Indians consider very pious is loving our country. Our faith in our culture makes us strong. This is something which the English politician and historian – Lord Macaulay felt that Indian have very strong faith in their motherland and their culture and he felt that this strong faith needs to be erased from the hearts of new people through the education system.

Yes it might appear a small thing, but people like me in the years of their upbringing came across shlokas and poems which give a great teaching and also Samskaara. Like while we say- ‘Vasudhaiv Kutumbakam’ (The whole world is like a family). But we also say- ‘Janani janmabhoomishch swargadapi gariyasi’ (Mother and motherland are more pious than heaven). We have grown listening, to poetic lines, songs etc. explaining the great traditions of our great country and our culture. This is true with most people of my generation.

But now we find that some over educated people of present time. They are in the field of journalism, politics etc. they feel that country is just a geographical boundary. They don’t believe in any great thing associated with our history, civilization or culture. They might rather have chosen to be born in some other country if they had a choice. Such people are also decorated with some national and international awards.

I just want to assert that the love for our country, our culture are very valuable for people like me. But these are not things that should make anybody arrogant and make him consider others to be inferior in anyway. Further one must study in this field and not just have false pride.

I just felt that this is something which many modern people consider to be small but it is in my view very pious which connects us to our roots.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Little things can make a lot of difference in life. How do you appreciate little things in life? #lifemotivation

Thanks for reading.

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कोरोना के असहाय शिकार!

आज कोरोना के खतरे के बाद देश में बनी परिस्थितियों की चर्चा कर रहा हूँ| कितनी भयंकर विपदा यह संपूर्ण मानव जाति पर आई है, ये आप सभी जानते हैं| चीन से शुरू होकर कोरोना के इस दैत्य ने इटली, अमरीका आदि में जैसी तबाही मचाई है, शुक्र है हम अभी वैसी स्थिति में नहीं हैं और ईश्वर ने चाहा तो वैसा यहाँ नहीं होगा, लेकिन जो हुआ है वह भी बहुत डराने वाला है| आज इन परिस्थितियों पर ही कुछ चर्चा कर लेते हैं|

 

 

समाचार चैनल ‘टीवी 18’ के एक एंकर हैं – प्रतीक त्रिवेदी जो ‘भैया जी कहिन’ नाम से चर्चा का एक लोकप्रिय कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं| शाम के समय प्रसारित होने वाला यह कार्यक्रम पहले आउटडोर लोकेशन से सीधे प्रसारित होता था, जिनमें एक लोकेशन अक्सर कनॉट प्लेस की होती थी| काफी भीड़ एकत्रित होती थी इस कार्यक्रम में! अब तो लोगों को इकट्ठा करने वाले कार्यक्रम बंद ही हैं| बहस के कार्यक्रम भी अब स्काइप आदि के माध्यम से चर्चा द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं|

हाँ तो ‘भैया जी’ ने भी जहां तक मुझे याद है 2-3 दिन तो स्टूडिओ से कार्यक्रम प्रस्तुत किए, लेकिन उसके बाद उन्होंने बाहर लोकेशन्स पर जाना शुरू कर दिया| एक लंबी डंडी वाला माइक अब वे इस्तेमाल करते हैं, जिससे दूर खड़े होकर प्रश्न पूछे जा सकते हैं| अब भी वे बाज़ारों, बैंकों, अस्पतालों आदि में जाकर प्रश्न पूछते हैं और बहस के लिए जबकि उनके मेहमान स्काइप के माध्यम से जुडते हैं, वे बाहर की ही किसी लोकेशन पर होते हैं और वहाँ से ही कार्यक्रम का संचालन करते हैं| अक्सर कनॉट प्लेस का उनका शॉट दिखाया जाता है, जिसमें वे कहते हैं – यहाँ पर ही हजारों लोगों की भीड़ जमा होती थी| कुछ स्थितियाँ अतीत की ऐसी होती हैं, जिनकी कमी हमें खलती है| हमें भरोसा है की वे परिस्थितियाँ फिर से वापस लौटेंगी|

लॉक डाउन बढ़ता ही जा रहा है, जरूरत तो यही है कि पूरे अनुशासन के साथ, सभी मिलकर इस स्थिति का सामना करें, परंतु सभी के लिए ऐसा करना संभव नहीं है| कुछ लोगों के लिए दो जून की रोटी का प्रबंध करना भी संभव नहीं है और जबकि प्रदेश की सरकारों द्वारा ऐसा दावा तो किया जा रहा है कि सभी के भोजन और आर्थिक सहायता का प्रबंध किया जा रहा है, लेकिन ये सरकारी प्रयास कितने प्रभावी होते हैं, ये विचारणीय है|

एक समस्या जो भारत में विशेष रूप से है, वह है प्रवासी मजदूरों की| अन्य शहरों में पढ़ने वाले छात्रों को तो पिछले दिनों उनके घरों तक पहुंचाने का काम किया गया और अब मजदूरों को उनके मूल स्थान पर ले जाने का काम भी शुरू किया गया है| मजदूरों को वापस ले जाने का ये काम एक तो आसान नहीं है, ऐसे मजदूर असंख्य हैं| इसके अलावा अब जरूरत इस बात की भी है कि लॉक डाउन को धीरे-धीरे सावधानी के साथ खोला जाए| और जहां ये मजदूर अभी हैं, वहाँ ये रोजगार के लिए आए हैं और रोजगार इनको यहाँ ही मिल पाएगा| इन परिस्थितियों में आवश्यकता इस बात की है कि इनका हौसला बढ़ाया जाए, आवश्यक सहायता सुनिश्चित की जाए और इनको यथाशीघ्र कमाई का साधन उपलब्ध कराया जाए, क्योंकि अभी लौट जाने पर जल्दी ही इनको फिर वापस आने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा|

महाराष्ट्र में रेल पटरी पर हुई 16 मजदूरों की मृत्यु एक हृदय विदारक घटना थी और हमको इस विषय में सोचने के लिए विवश करती है कि इन प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर गंभीरता पूर्वक विचार करने और इनको सहायता और परामर्श प्रदान करने और इनका हौसला बढ़ाने की आवश्यकता है|

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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Our world and the evil forces!

Long back I had given an example from famous science fiction by H.G.Wells – The Island of Dr. Moreau, in an essay written by me for some competitive exam. In that novel the writer had woven a story according to which a famous Doctor Moreau keeps several animals in a far away Island, he treats them and trains them to act like human beings. He succeeds to a great extent but when with time they grow in number, they slowly start returning to their original form, they start behaving the way they did earlier, become aggressive and he himself runs away saving his own life.

 

 

The same is happening in human society, all over the world now. As they say that humans are the developed version of animals of the past and it appears that as we are growing more and more in number, the primitive habits are returning and many humans become animals, wherever they feel that it would be more beneficial for them.

Though we are getting latest gadgets to enjoy, we have so many societies- real and virtual, we come together sometimes in the name of one nation, sometimes because of one school or college, sometimes because of a caste or tribe, city or a village, language or religion. But we think of ourselves, our own benefits, may be at the cost of others.

Today we easily come to know many things about everybody out there, their qualities to some extent but mostly about their social status, richness, sometimes muscle power also. With growing population there is going to be disparity and nobody likes to lag behind.

There are people who acquire good qualification, some get some technical expertise, there are governments which are supposed to provide opportunities to people to grow and get into some profession to make a nice living possible for their families.

But in today’s world it is not possible that everybody could get a suitable job or profession to earn as per his or her dreams. Further there are people who do not make sufficient efforts and in some cases luck also plays a great role.

In such circumstances the social networks or platforms, pressure groups can also play a positive role, may be in some cases they also do so, but where they play a negative role, such things are more obvious.
I discussed  the possible reasons and background for the negative things, tendencies in the society, we may call it something toxic in society, as there are people working in offices or factories, there are also people who earn by thefts and deceit.

Our society keeps growing through real and virtual platforms and there are so many groups working in positive direction and also those which spread hatred against other people and in some cases even against our nation. In reaction to that sometimes there are feelings of excess nationalism, some such self proclaimed patriots who come out to set-right anybody who is not a nationalist as per their standards. So ‘Class divide, Chauvinism, Social media validation, Alarming increase of criminals in politics, Lack of civic sense’ etc. are different forms of alienation from our society, losing faith in our endeavor to grow together as a society, everybody playing his or her role, contributing for our society, our nation and the world at large.

So everybody need to think about his or her own role and think how he or she is contributing for the society and obviously one must keep away from the divisive forces, like Class divide, Chauvinism, criminal activities and should not in any way become an instrument to promote criminals in politics etc. Further the posts on social media, spreading rumors or hatred should be opposed and appropriately reported wherever required.
For the society, nation and the world of today, everybody needs to make his or her positive contribution and also oppose the negative forces.

This is my humble submission on the IndiSpire prompt- Class divide, Chauvinism, Social media validation, Alarming increase of criminals in politics, Lack of civic sense and so on. there’s something toxic everywhere around you. So what is that one toxic thing you want to get rid of? #ThrowAwayTheToxic

Thanks for reading.

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राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह

मैं इन दिनों लंदन प्रवास में हूँ और यहाँ की वर्तमान और पिछले वर्ष की यात्राओं के अनुभव इन दिनों शेयर कर रहा हूँ। ये अनुभव मैं आगे भी शेयर करता रहूंगा।

इस बीच एक और विषय पर बात करने का मन है, अभी ‘राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह’ विषय पर चर्चा चल रही थी, इस विषय में मैंने भी अपने विचार रखे, आज अलग से इससे जुड़े विषय पर अपनी सम्मति देने का मन है।

 

 

हमने पिछले कुछ वर्षों में ऐसी गतिविधियां देखी हैं, जिनको राष्ट्रद्रोही कहने में कम से कम मुझे तो कोई संदेह नहीं है। मैं  जेएनयू में हुई गतिविधियों का उल्लेख कर रहा हूँ, जिनमें हमारे सैनिकों के शहीद होने पर खुशी मनाना, बुरहान बानी को फांसी का विरोध और इस प्रकार के नारे लगाया जाना शामिल है- ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’। अभी कश्मीर के संबंध में सरकार द्वारा लिए गए ऐतिहासिक कदम के बाद ‘जेएनयू’ फैक्ट्री से ही निकली एक कश्मीरी युवती ‘शेहला रशीद’  द्वारा ट्वीट करके, झूठी अफवाह फैलाया जाना भी इसका उदाहरण है कि यह प्रतिष्ठित संस्थान आज राष्ट्रद्रोह का अड्डा बन गया है।

इस सबके पीछे देखा जाए तो लॉर्ड मैकाले द्वारा भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने के लिए चलाई गई शिक्षा पद्यति का बहुत बड़ा हाथ है। हमारी बहुत समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर रही है और लॉर्ड मैकाले का यही सिद्धांत था कि भारतीयों को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से काट दो, उनके मन से राष्ट्र-गौरव निकाल दो, तब उनको गुलाम बनाए रखना आसान होगा और वे भौतिक रूप से आज़ाद हो जाएं तब भी वे मानसिक रूप से गुलाम बने रहेंगे, और इसके लिए अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से भारतीय लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे।

हम विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक हैं, हमें विश्व-गुरू का दर्जा प्राप्त था। मैक्समूलर जैसे अनेक विदेशी विद्वान भारतीय संस्कृति का लंबे समय तक अध्ययन करते रहे, फादर क़ामिल बुल्के जैसे विदेशी मानस मर्मज्ञ रहे।

हमारे राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक और कितना सुंदर साहित्य लिखा। उनका एक प्रसंग याद आ रहा है। दिनकर जी ने एम.ए. नहीं किया था, सो उनके मन में आया और उन्होंने एम.ए. के लिए फॉर्म भर दिया। उस समय बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति भी विख्यात हिंदी साहित्यकार थे, मुझे उनका नाम अभी याद नहीं आ रहा, उन्होंने दिनकर जी को बुलाया और कहा- ये क्या कर रहे हो दिनकर, लोग आपकी पुस्तकें, कवितायें आदि कोर्स में पढ़ रहे हैं, उन पर शोध कर रहे हैं, तुम्हे क्या जरूरत है एम.ए. करने की!

मैं जिस तरफ संकेत करना चाहता हूँ वो ये हि कि हमारे यहाँ डिग्री वाले नहीं अध्यवसाय वाले विद्वान रहे हैं, भारत एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश रहा है। हमारे अनपढ़ कबीर को पूरी दुनिया पढ़कर समझने का प्रयास कर रही है। तुलसीदास जी कहाँ के पढ़े-लिखे थे, जिनकी चौपाइयां आज भी गांवों में अनपढ़ बुज़ुर्ग संदर्भ के लिए जब-तब दोहराते हैं।

एक लंबी संस्कृति रही है, पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को आगे बढाने की परंपरा रही है। एक भारतीय संत- स्वामी विवेकानंद जब विश्व धर्म संसद में खड़ा होकर बोलता है, तब उसका संबोधन-‘भाइयो और बहनो’ सबको अकस्मात चौंका देता है, जो तब तक ‘देवियो और सज्जनो’ ही सुनते आए थे, विश्व बंधुत्व की अवधारणा को मन से अपनाने वाले इस संत की वाणी को दुनिया मंत्रमुग्ध होकर सुनती है, यह कोई किस्सा-कहानी नहीं है!

लेकिन आज, मैकाले की सफलता इस बात में है कि हमारे डिग्रीधारी विद्वान इस पश्चिमी अवधारणा को स्वीकार करते हैं कि ‘राष्ट्र’ एक काल्पनिक इकाई है, एक कल्पना है, हम बस यह मान लेते हैं कि यह हमारा देश है।

हाँ यह भी सच है कि बहुत सी बातें विश्वास पर ही कायम हैं, वरना कोई किसी को अपना पिता अथवा संतान भी नहीं माने। सुना है कि ओशो रजनीश के व्याख्यान स्थल पर लिखा रहता था, ‘कृपया अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़कर आएं।‘

आज के डिग्रीधारी विद्वानों के साथ दिक्कत यह है कि जो बात कोई बाहरी विद्वान कहता है उसे वे तुरंत मान लेते हैं, लेकिन जो उनको भारतीय परंपरा से मिलती है उसको वे मानने को तैयार नहीं होते और इसकी परिणति यहाँ तक होती है जैसा जेएनयू में देखने को मिला।

अंत में एक बात अवश्य जोड़ना चाहूंगा, जो लोग दूसरों को सुधारने का, अपने हिसाब से भारतीय बनाने का और जाति और धर्म के नाम पर अत्याचार का काम करते हैं वे भारतीयता के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

ऐसे ही आज कुछ विचार मन में आए, मैं यहाँ किसी को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ, मैं कोई विदेशी लेखक नहीं हूँ इसलिए कुछ लोगों का तो मेरी बात से सहमत होना संभव ही नहीं है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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Nationalism, Patriotism, Chauvinism!

The idea of nationalism is most relevant today . Though in our holy scriptures it is written ‘Janani Janmabhumishcha, Svargaadapi Gariyasi’ i.e. The mother and motherland are more precious than heaven.

 

 

The biggest problem today is that many people are very much confused about this. Many confusions are created by some selfish politicians and some hate mongers.

There are two extreme ends to thinking on this subject today. There are some narrow minded people, who do not allow a little deviation to their idea of nation and nationalism. There are others too, who totally disregard the idea of nationalism, they consider themselves to be world citizens and for them ‘nation’ and ‘nationalism’ are worthless ideas. Such people easily digest the slogans like ‘Bharat tere tukde honge, insha allah, insha allah’. Further, for them if somebody considers himself a true hindu, he is communal, a person can be anything, have any faith but being a ‘true hindu’ is not allowed. Pity is that such people receive international awards also, sometimes it appears that such ideas are internationally promoted.

I remember a story by Munshi Premchand Ji ‘Padosi’ i.e. neighbor. It is a story about a Hindu and a Muslim, both being neigbour and it shows the deep rooted love amongst them.

Today by the grace of our divisive leadership, we do not find such Hindu and Muslim neighbors in villages at least, in modern societies it might be there, but in “Societies’ there is no society actually, in most of the cases.

I believe that a true Hindu and a true Muslim would never fight (and this is true about any true follower of any religion as such, Hindu and Muslim I wrote just for example). While we indians consider our motherland most sacred, we also believe in the idea of ‘Vishwa Bandhutva’, i.e. we consider the whole world as a family.

Today we find people with very extreme views and activities, there are people who check in people’s houses, whether there is cow meat stored there and also beating people to death on the ground that somebody was carrying a cow (according to their imagination for killing).

There are others also who like to tease others by publicly showing that they are eating cow meat.

I only feel that we should love our nation by heart, but not force anybody else to express his love for the nation, the way we want him to do. If we feel that some activity is not as per norms, we can report it to appropriate authorities, but we are nobody to punish anybody as an unruly mob, in the form of ‘Mob Lynching’.

Further if some people publicly express anti national sentiments, authorities should punish them properly, judiciary also should take prompt decision in such cases, so that others may not get encouraged to do such activities.

So basically we all should love our country, anybody doing his own duty sincerely is doing national service. We need not become the judge by ourselves and remain law abiding citizens.

Those who consider themselves to be nationalist by beating others,  like on carrying a cow, according to them for killing are also anti-national. You are nobody to take law into your hands.

Similarly those proclaiming to be progressive and world citizens, by expressing anti-national sentiments need to be dealt by an iron hand, but by appropriate authorities and not by an unruly mob.

• These are my humble ideas on the #IndiSpire prompt- Time to revisit nationalism, patriotism, chauvinism, and anti-nationalism in the garb of freedom of speech. #nationalism.
Thanks for reading.

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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

आज हम अपना महान स्वाधीनता दिवस मना रहे हैं। आज से 72 वर्ष पूर्व आज ही के दिन, जिस समय मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूँ, उस समय हम तब के हमारे शासकों, अंग्रेजों के विदेशी शासन से मुक्त हुए थे, भारत में आधी रात का समय, मैं उन शासकों के क्षेत्र इंग्लैंड में बैठकर लिख रहा हूँ, यहाँ रात के आठ बजे हैं।

 

भारत के झण्डा गीत की रचना स्व.श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ जी ने की थी। वे कांग्रेस के कार्यकर्ता थे और 7 पद वाले इस मूल गीत से बाद में कांग्रेस नें तीन पद निकाल करके इसे ‘झण्डागीत’ के रूप में मान्यता दी। यह गीत न केवल राष्ट्रीय गीत घोषित हुआ बल्कि अनेक नौजवानों और नवयुवतियों के लिये देश पर मर मिटने हेतु प्रेरणा का स्रोत भी बना।

आज जबकि हम अपनी आजादी का यह महान उत्सव मना रहे हैं, तब यह उचित होगा कि हम अपने स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले सेनानियों और स्वतंत्रता के जज़्बे को मुखरित करने वालों को याद करें। मैं अपने उन महान वीरों को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि प्रस्तुत करते हुए, यह अमर झंडा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
सदा शक्ति बरसाने वाला,
प्रेम सुधा सरसाने वाला,
वीरों को हर्षाने वाला,
मातृभूमि का तन-मन सारा।। झंडा…।

 

स्वतंत्रता के भीषण रण में,
लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में,
कांपे शत्रु देखकर मन में,
मिट जाए भय संकट सारा।। झंडा…।

 

इस झंडे के नीचे निर्भय,
लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय,
बोलें भारत माता की जय,
स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा।। झंडा…।

 

आओ! प्यारे वीरो, आओ।
देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ,
एक साथ सब मिलकर गाओ,
प्यारा भारत देश हमारा।। झंडा…।

 

इसकी शान न जाने पाए,
चाहे जान भले ही जाए,
विश्व-विजय करके दिखलाएं,
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।। झंडा…।

 

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।

 

आप सभी को स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
नमस्कार।

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