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उधर रास्ता न था!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

हमारे एक प्रसिद्ध फिल्मी अभिनेता, निर्माता, निर्देशक हुए हैं, अभी वे सक्रिय नहीं हैं, ईश्वर उनको लंबी उम्र दे, वे हैं- श्री मनोज कुमार।

फिल्म निर्माता के रूप में उन्होंने एक विशेष विषय पर फिल्में बनाई- देशप्रेम और देशभक्ति। उनकी फिल्म के एक गीत की पंक्ति है-


है प्रीत जहाँ की रीत सदा,
मैं गीत उसी के गाता हूँ,
भारत का रहने वाला हूँ,
भारत की बात सुनाता हूँ।


अचानक यह गीत याद आया तो खयाल आया कि देश, देशप्रेम एक बहुत अच्छा विषय है, लेकिन कवियों / शायरों के लिए मूलभूत विषय तो ज़िंदगी है। असल में उसके बाद ही, उससे जुड़कर ही बाकी सभी विषय आगे आते हैं।

श्रेष्ठ कवि श्री रामावतार त्यागी जी की पंक्तियां हैं-


एक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले,
मैंने मंज़िल को तलाशा, मुझे बाज़ार मिले,
ज़िंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है!


इस गीत में वे ज़िंदगी को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं। बस इस ज़िंदगी के सफर से जुड़ी एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे श्री हरिहरन, पंकज उधास और शायद और भी कई गायकों ने गाया है। इस खूबसूरत गज़ल के लेखक हैं- श्री मुमताज़ राशिद।

लीजिए इस गज़ल का आनंद लीजिए-


पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था
हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था।


परछाइयों के शहर की तनहाइयां न पूछ,
अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था।


पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,
जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था।


राशिद किसे सुनाते गली में तेरी गज़ल,
उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था।


पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था,
हम उस तरफ़ चले थे जिधर रास्ता न था।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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हमारी आस्थाओं का गणतंत्र !

एक बार हम फिर से लोकतंत्र और सामाजिक विकास में अपनी दृढ़ आस्थाओं को अभिव्यक्त करने का पर्व, गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं| एक बार फिर लोकतंत्र विरोधी ताक़तें राजधानी दिल्ली के आसपास सड़कों को घेरकर बैठी हैं, इस बार उन्होंने किसानों को अपना मोहरा बनाया है| पिछले वर्ष तो कोरोना फैलने के कारण उनको इससे पहले ही आंदोलन खत्म कर देना पड़ा था, इस बार वे अभी तक जमे हैं और अपनी अलग ट्रैक्टर रैली निकाल रहे हैं|

खालिस्तानी संगठन ने उनसे अपील की है कि ट्रैक्टर रैली में राष्ट्रीय तिरंगा लेकर न निकलें| इस पर भी महान लिबरल लोगों को कोई ऐतराज नहीं होगा|


मैं एक मत अपना स्पष्ट रूप से व्यक्त करना चाहता हूँ कि प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव जैसे लोग ‘पाँच सितारा किस्म के देशद्रोही हैं| ऐसे लोगों को शायद भारत में ही बर्दाश्त किया जा सकता है| यह भारत में ही हो सकता है कि हिन्दू आस्थाओं पर चोट करके लोग हीरो बन सकते हैं|

मुझे याद है जब मैं छोटा था किसी ने पैगंबर मुहम्मद साहब की काल्पनिक तस्वीर पुस्तक में छाप दी थी| लोगों ने उसकी विशाल प्रेस में आग लगा दी थी| यहाँ हिन्दू आस्थाओं पर चोट करना तो एक सेक्युलर क्रिया है, बाकी किसी के बारे में ऐसा कुछ करके देखो!


अमेरिका में नए राष्ट्रपति ने बाइबिल पर हाथ रखकर शपथ ली, क्या किसी लिबरल के मुंह में जमा हुआ दही पिघला! हिंदुस्तान में अगर कोई नेता गीता या रामचरित मानस पर हाथ रखकर शपथ लेगा तो ये ‘लिबरल’ लोग बांस पर चढ़ जाएंगे और कहेंगे कि लोकतंत्र खतरे में आ गया है|


पिछले काफी समय से भारत में ये महान लिबरल लोग ऐसा माहौल बनाने में लगे हैं| इसके लिए वे योजनाबद्ध तरीके से आस्थाओं पर चोट करते हैं| जैसे वे कहेंगे कि ईश्वर कोई नहीं होता! चलिए ईश्वर में बहुत से लोगों का विश्वास नहीं होता, यद्यपि उनका लक्ष्य सिर्फ हिन्दू आस्था पर चोट करना ही होता है| फिर वे कहते हैं देश कुछ नहीं होता, यह केवल भौगोलिक सीमा मात्र है, संस्कृति कुछ नहीं होती, राष्ट्रभक्ति कुछ नहीं होती| यही काम लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजों की शिक्षा पद्यति विकसित करते हुए किया था ताकि लोगों में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र गौरव की भावना न रहे और वे आराम से गुलामी स्वीकार कर लें|


बातें बहुत सी हो सकती हैं, लेकिन ऐसे ही लोकतंत्र के इस महापर्व के अवसर पर, दुराग्रहपूर्ण तरीके से सड़कों को घेरकर बैठे और एक देशप्रेमी पत्रकार के तथाकथित चैट लीक होने पर, पाकिस्तान के साथ मिलकर खुशी मनाने वाले लोगों का ताली पीटना यही बताता है कि हमारी उदारता का फायदा उठाकर यहाँ लोग देशद्रोह की सीमा तक जाने को तैयार हैं| इन लोगों को उन पत्रकारों से कोई दिक्कत नहीं होती जो ज़िंदगी भर सत्ता की दलाली करके सुविधाएं और पुरस्कार प्राप्त करते हैं और फिर मौका आने पर एवार्ड वापसी का नाटक करते हैं| भारतीय लोकतंत्र के हित में होगा कि ऐसे लोगों को उनकी सीमा ठीक से समझाई जाए|


सभी देशभक्तों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई|

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सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी !

आज फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में अवस्थी जी ने यही व्यक्त किया है कि हमारी व्यक्तिगत आस्थाएँ, आकांक्षाएँ और धार्मिक रुझान कुछ भी हों, हमारे लिए सबसे पहले देश का स्थान है|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की यह रचना-



जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू पूरब का हो या पश्चिम का वासी
तेरे दिल में हो काबा या हो काशी
तू संसारी हो चाहे हो सन्यासी
तू चाहे कुछ भी हो पर भूल नहीं
तू सब कुछ पीछे, पहले भारतवासी ।

उन सबकी नज़रें आज हमीं पर ठहरीं
जिनके बलिदानों से आज़ादी आई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू महलों में हो या हो मैदानों में
तू आसमान में हो या तहखानों में
पर तेरा भी हिस्सा है बलिदानों में
यदि तुझमें धड़कन नहीं देश के दुख की
तो तेरी गिनती होगी हैवानों में ।

मत भूल कि तेरे ज्ञान सूर्य ने ही तो
दुनिया के अँधियारे को राह दिखाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तेरे पुरखों की जादू भरी कहानी
गौतम से लेकर गाँधी तक की वाणी
गंगा जमना का निर्मल-निर्मल पानी
इन सब पर कोई आँच न आने पाए
सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी ।

भारत का भाल दिनों-दिन जग में चमके
अर्पित है मेरी श्रद्धा और सच्चाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

आज़ादी डरी-डरी है आँखें खोलो
आत्मा के बल को फिर से आज टटोलो
दुश्मन को मारो, उससे मत कुछ बोलो
स्वाधीन देश के जीवन में अब फिर से
अपराजित शोणित की रंगत को घोलो ।

युग-युग के साथी और देश के प्रहरी
नगराज हिमालय ने आवाज़ लगाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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तरक्की के पैमाने!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है और मैं 2018 में हुई एक दुखद घटना की प्रतिक्रियास्वरूप लिखी अपनी एक पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

आज हम वर्ष 2018 में जी रहे हैं, सुना है हिंदुस्तान दुनिया की बड़ी ताक़त बन गया, आर्थिक शक्तिसंपन्न देशों में भारत की गिनती होने लगी है। कितने पैमाने होते हैं किसी देश की तरक्की को मापने, उन सबका उदाहरण देते हुए बताया जाता है कि भारतवर्ष कितना आगे बढ़ गया है!

एक बहुत पुराना पैमाना है, गोस्वामी तुलसीदास जी का बताया हुआ-


जासु राज सुन प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी


और हम रामराज्य की कल्पना करते हैं, एक गाय को मारने अथवा ऐसा प्रयास करने में हमारे यहाँ लोग, कुछ इंसानों को मारने में भी संकोच नहीं करते।
रामराज्य के बारे में एक और उद्धरण गोस्वामी जी का याद आता है-


दैहिक, दैविक, भौतिक तापा
रामराज्य नहीं काहुई व्यापा।

मैं दलगत राजनीति की बात नहीं करना चाहता, सीधे बात करना चाहूंगा- देश की राजधानी दिल्ली में, तीन बच्चे भूख से मर गए। ये किसी भी समाज के लिए डूब मरने की बात है।


दिल्ली में- नगर की, केंद्र शासित क्षेत्र की और केंद्र की, दोनो सरकारें हैं। लेकिन मैं इस घटना को किसी पार्टी अथवा सरकार से नहीं जोड़ना चाहता। सबसे पहली बात तो यह है कि हमारे समाज में, आस-पड़ौस के लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि उनके आस पास किसी परिवार में ऐसी स्थिति है कि बच्चों के भूख से मरने की नौबत आ रही है।


यह तीन बच्चों की नहीं, ये इंसानियत की मौत है, बेशक हमारी सरकारों को भी ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए कि कहीं ऐसी नौबत आने वाली है तो उसको पहचाना जाए और जरूरी कदम उठाए जाएं। और हाँ आस-पड़ौस के लोगों को भी सहायता के लिए तत्पर रहना चाहिए।


आज गुरुदत्त जी की फिल्म का एक गीत याद आ रहा है, जिसे यहाँ शेयर कर रहा हूँ। फिल्म प्यासा के इस गीत को साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है और एस.डी.बर्मन जी के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी साहब ने गाया है। प्रस्तुत है ये गीत-


ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के
कहाँ है, कहाँ है मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है


ये पुरपेच गलियां, ये बदनाम बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदे पे तकरार
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन
थकी हारी सांसों पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरो में खांसी की ठन-ठन
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी
तनूमन्द बेटे, अब्बा मियां भी
ये बीवी भी है और बहन भी, माँ भी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हम्जिन्स, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत , जुलेखां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ!

हिन्दी काव्य मंचों के एक अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक प्रसिद्ध गीत आज शेयर कर रहा हूँ, जिसमें कवि ऐसे भाव व्यक्त करता है कि अपने महान राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित करने के बाद भी हम उसका ऋण नहीं उतार सकते|


लीजिए प्रस्तुत है राष्ट्रप्रेम की भावना से भरपूर यह गीत –



मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।


गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।


स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरे, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।


सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

आज सोचा कि ज़िंदगी के बारे में बात करके, ज़िंदगी को उपकृत कर दें।
शुरू में डॉ. कुंवर बेचैन जी की पंक्तियां याद आ रही हैं, डॉ. बेचैन मेरे लिए गुरू तुल्य रहे हैं और उनकी गीत पंक्तियां अक्सर याद आ जाती हैं-


ज़िंदगी का अर्थ मरना हो गया है,
और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे।


जब सोचते हैं कि बहुत दिनों के लिए जीना है तो क्या किया जाए, तब यह याद आता है-


जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम,
ये रस्ता कट जाएगा मितरा, ये बादल छंट जाएगा मितरा।


लेकिन फिर कोई यह कहता मिल जाता है-


ये करें और वो करें, ऐसा करें, वैसा करें।
ज़िंदगी दो दिन की है, दो दिन में हम क्या-क्या करें।

अब वैसे तो ये कवि-शायर लोग कन्फ्यूज़ करते ही रहते हैं, पर ज़िंदगी के बारे में इन्होंने कुछ ज्यादा ही कन्फ्यूज़ किया है-


ज़िंदगी कैसी है पहेली ये हाय
कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाए।


और जब ज़िंदगी में परेशानियां ज्यादा होती हैं, तब फैज़ अहमद फैज़ कहते हैं-


ज़िंदगी क्या किसी मुफलिस की क़बा है जिसमें,
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं।

और कहीं कोई मोहब्बत का मारा, ये कहता हुआ भी मिल जाता है-


हम तुझ से मोहब्बत करके सनम, हंसते भी रहे, रोते भी रहे,
हंस हंस के सहे उल्फत में सितम, मरते भी रहे, जीते भी रहे।


जब जीवन में कोई पवित्र उद्देश्य मिल जाता है, तब ये खयाल ही नहीं आता कि ज़िंदगी छोटी है या बड़ी, तब इंसान इस तरह की बात करता है-


हम जिएंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए,
दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए।


एक बात और, स्वामी विवेकानंद और इस तरह के कुछ महापुरुष जब कम समय में बहुत बड़ी उपलब्धियां कर लेते हैं और कम उम्र में ही उनको जीवन-त्याग करना पड़ जाता है, उनके लिए सोम ठाकुर जी ने बड़ी सुंदर पंक्तियां लिखी हैं-


कोई दीवाना जब होंठों तक अमृत घट ले आया,
काल बली बोला मैंने, तुझ से बहुतेरे देखे हैं।


और आज के लिए आखिरी बात, ये फानी बदायुनी जी का शेर-


एक मुअम्मा है, समझने का न समझाने का,
ज़िंदगी काहे को है, ख्वाब है दीवाने का।


मेरे खयाल में ज़िंदगी के नाम पर, आज के लिए इतना कंफ्यूज़न ही काफी है।
नमस्कार।


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मैं जहाँ रहूँ जहाँ में, याद रहे तू !

मैं अक्सर पुरानी फिल्मों के गीत याद करता हूँ, क्योंकि मुझे पुराना फिल्मी संगीत, पुराने गायक पसंद हैं, विशेष रूप से मेरे प्रिय गायक मुकेश जी, रफी साहब, किशोर कुमार, मन्ना डे, हेमंत कुमार आदि-आदि, सचिन देव बर्मन जी भी एक गायक के रूप में उनमें शामिल हैं| इसके अलावा मुझे गजल गायक- गुलाम अली साहब, जगजीत सिंह जी और अन्य गायक- अनूप जलोटा, पंकज उधास जी आदि आदि शामिल हैं|


स्वाधीनता दिवस के अवसर पर आज कुछ ही समय पहले की फिल्म- ‘राज़ी’ का एक राष्ट्रभक्ति गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें दिखाया गया है नायिका, जो पाकिस्तान में विवाह करके जाती है एक भारतीय जासूस के रूप में काम करने के लिए, और इस गीत को पाकिस्तानी बच्चों के माध्यम से बड़ी खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है|


फिल्म- राज़ी के लिए यह गीत सुनिधि चौहान जी ने गाया है और नायिका- आलिया भट्ट और बच्चों पर (जिन्हें पाकिस्तानी बच्चों के रूप में दिखाया गया है) पर फिल्माया गया है| गीत लिखा है- गुलज़ार जी ने और संगीत दिया है- शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी ने|


लीजिए आज इस सुंदर गीत को याद कराते हैं-



ऐ वतन
मेरे वतन
ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू|
मैं जहाँ रहूँ जहाँ में, याद रहे तू||

तू ही मेरी मंजिल, पहचान तुझी से,
पहुंचू मैं जहां भी, मेरी बुनियाद रहे तू|


ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू,
मैं जहाँ रहूँ जहाँ में याद रहे तू|

तुझपे कोई गम की आंच आने नहीं दूं,
कुर्बान मेरी जान तुझपे शाद रहे तू |
ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू,
मैं जहाँ रहूँ जहाँ में याद रहे तू |



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कोरोना काल के फरिश्ते!

आज एक बार फिर से कोरोना संकट और लॉक डाउन की परिस्थितियों के बहाने चर्चा कर रहा हूँ|

 

ऐसे राष्ट्रीय संकट के समय भी राजनीति और फिल्म जगत, व्यावहारिक रूप से हर क्षेत्र के लोगों का अलग-अलग चरित्र उजागर होता है| हमारी प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी और लंबे समय तक सत्तारूढ़ रही पार्टी- कांग्रेस का चरित्र इस समय  घृणा के योग्य प्रतीत होता है | जो पार्टी और उसका प्रमुख नेता, संकट की इस घड़ी में भी, किसी न किसी बहाने से राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध खड़े होते हैं| ऐसी असंभव किस्म की मांगें सरकार के रास्ते में  रोड़े अटकाने के लिए करते हैं जिससे राहत के लिए किए जा रहे कार्यों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है| वे किसी न किसी बहाने से जनता में असंतोष पैदा करना चाहते हैं|

आज यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा मुझे इस समाचार से मिली कि फिल्म अभिनेता सोनू सूद ने, कुछ साथियों के साथ मिलकर, मुंबई के प्रवासी मजदूरों को उनके घर वापस भेजने का अभियान चलाया है, अनेक लोगों को वे वापस भेज चुके हैं और प्रवासी मजदूरों के प्रति उनका यह संकल्प है कि जब तक एक भी प्रवासी मजदूर वहाँ उनसे सहायता चाहता है, वे इस अभियान को जारी रखेंगे| मैं सोनू सूद जी और उनकी टीम को इस अभियान के लिए साधुवाद देता हूँ और कामना करता हूँ कि ईश्वर उनको सफलता की नई ऊँचाइयाँ प्रदान करें| मेरी निगाह में वे अनुराग कश्यप, जावेद अख्तर, नसीरुद्दीन शाह जैसे बुद्धिजीवियों से लाख दर्जे अच्छे हैं|

एक और इसी प्रकार का समाचार और पढ़कर बहुत अच्छा लगा कि कुछ छात्रों ने अपने पैसों से हवाई यात्रा का टिकट कराकर कुछ प्रवासी मजदूर परिवारों को उनके घर वापस भिजवाया|

जिस देश में ऐसी भावना से भरे जागरूक और लोगों का दर्द समझने वाले नागरिक मौजूद हैं, वह किसी भी बड़े से बड़े संकट का मुक़ाबला कर लेगा| बस कामना यही है कि इन सभी लाचार मजदूरों को ऐसा कोई हमदर्द मिल जाए, क्योंकि बहुत से लोग तो यह भी नहीं जानते कि श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे कराते हैं| किसी भी रूप में जो लोग इन लोगों की मदद करते हैं, जो पीएम केयर्स फंड अपना विनम्र योगदान करते हैं, वे उन बौद्धिकों से लाख दर्जे अच्छे हैं, जो केवल नकारात्मक वातावरण बनाने में ही लगे रहते हैं|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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A small thing- love for our country!

Talking about small things in life, which hold great importance! What is small or big depends on the thinking of a person and others may consider it small or big based on their thinking or may be values.

 

 

We often try to do things in life which are proper as per our principals, thinking etc. For example ‘faith’ is a matter of faith. We might believe in many things as per our upbringing mostly. For example some people believe in God, some don’t. Loving our country also depends upon us, our personal and family values mostly. For any other person it does not make much difference whether we love our country or not.

Today I take this one thing, which mostly Indians consider very pious is loving our country. Our faith in our culture makes us strong. This is something which the English politician and historian – Lord Macaulay felt that Indian have very strong faith in their motherland and their culture and he felt that this strong faith needs to be erased from the hearts of new people through the education system.

Yes it might appear a small thing, but people like me in the years of their upbringing came across shlokas and poems which give a great teaching and also Samskaara. Like while we say- ‘Vasudhaiv Kutumbakam’ (The whole world is like a family). But we also say- ‘Janani janmabhoomishch swargadapi gariyasi’ (Mother and motherland are more pious than heaven). We have grown listening, to poetic lines, songs etc. explaining the great traditions of our great country and our culture. This is true with most people of my generation.

But now we find that some over educated people of present time. They are in the field of journalism, politics etc. they feel that country is just a geographical boundary. They don’t believe in any great thing associated with our history, civilization or culture. They might rather have chosen to be born in some other country if they had a choice. Such people are also decorated with some national and international awards.

I just want to assert that the love for our country, our culture are very valuable for people like me. But these are not things that should make anybody arrogant and make him consider others to be inferior in anyway. Further one must study in this field and not just have false pride.

I just felt that this is something which many modern people consider to be small but it is in my view very pious which connects us to our roots.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Little things can make a lot of difference in life. How do you appreciate little things in life? #lifemotivation

Thanks for reading.

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कोरोना के असहाय शिकार!

आज कोरोना के खतरे के बाद देश में बनी परिस्थितियों की चर्चा कर रहा हूँ| कितनी भयंकर विपदा यह संपूर्ण मानव जाति पर आई है, ये आप सभी जानते हैं| चीन से शुरू होकर कोरोना के इस दैत्य ने इटली, अमरीका आदि में जैसी तबाही मचाई है, शुक्र है हम अभी वैसी स्थिति में नहीं हैं और ईश्वर ने चाहा तो वैसा यहाँ नहीं होगा, लेकिन जो हुआ है वह भी बहुत डराने वाला है| आज इन परिस्थितियों पर ही कुछ चर्चा कर लेते हैं|

 

 

समाचार चैनल ‘टीवी 18’ के एक एंकर हैं – प्रतीक त्रिवेदी जो ‘भैया जी कहिन’ नाम से चर्चा का एक लोकप्रिय कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं| शाम के समय प्रसारित होने वाला यह कार्यक्रम पहले आउटडोर लोकेशन से सीधे प्रसारित होता था, जिनमें एक लोकेशन अक्सर कनॉट प्लेस की होती थी| काफी भीड़ एकत्रित होती थी इस कार्यक्रम में! अब तो लोगों को इकट्ठा करने वाले कार्यक्रम बंद ही हैं| बहस के कार्यक्रम भी अब स्काइप आदि के माध्यम से चर्चा द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं|

हाँ तो ‘भैया जी’ ने भी जहां तक मुझे याद है 2-3 दिन तो स्टूडिओ से कार्यक्रम प्रस्तुत किए, लेकिन उसके बाद उन्होंने बाहर लोकेशन्स पर जाना शुरू कर दिया| एक लंबी डंडी वाला माइक अब वे इस्तेमाल करते हैं, जिससे दूर खड़े होकर प्रश्न पूछे जा सकते हैं| अब भी वे बाज़ारों, बैंकों, अस्पतालों आदि में जाकर प्रश्न पूछते हैं और बहस के लिए जबकि उनके मेहमान स्काइप के माध्यम से जुडते हैं, वे बाहर की ही किसी लोकेशन पर होते हैं और वहाँ से ही कार्यक्रम का संचालन करते हैं| अक्सर कनॉट प्लेस का उनका शॉट दिखाया जाता है, जिसमें वे कहते हैं – यहाँ पर ही हजारों लोगों की भीड़ जमा होती थी| कुछ स्थितियाँ अतीत की ऐसी होती हैं, जिनकी कमी हमें खलती है| हमें भरोसा है की वे परिस्थितियाँ फिर से वापस लौटेंगी|

लॉक डाउन बढ़ता ही जा रहा है, जरूरत तो यही है कि पूरे अनुशासन के साथ, सभी मिलकर इस स्थिति का सामना करें, परंतु सभी के लिए ऐसा करना संभव नहीं है| कुछ लोगों के लिए दो जून की रोटी का प्रबंध करना भी संभव नहीं है और जबकि प्रदेश की सरकारों द्वारा ऐसा दावा तो किया जा रहा है कि सभी के भोजन और आर्थिक सहायता का प्रबंध किया जा रहा है, लेकिन ये सरकारी प्रयास कितने प्रभावी होते हैं, ये विचारणीय है|

एक समस्या जो भारत में विशेष रूप से है, वह है प्रवासी मजदूरों की| अन्य शहरों में पढ़ने वाले छात्रों को तो पिछले दिनों उनके घरों तक पहुंचाने का काम किया गया और अब मजदूरों को उनके मूल स्थान पर ले जाने का काम भी शुरू किया गया है| मजदूरों को वापस ले जाने का ये काम एक तो आसान नहीं है, ऐसे मजदूर असंख्य हैं| इसके अलावा अब जरूरत इस बात की भी है कि लॉक डाउन को धीरे-धीरे सावधानी के साथ खोला जाए| और जहां ये मजदूर अभी हैं, वहाँ ये रोजगार के लिए आए हैं और रोजगार इनको यहाँ ही मिल पाएगा| इन परिस्थितियों में आवश्यकता इस बात की है कि इनका हौसला बढ़ाया जाए, आवश्यक सहायता सुनिश्चित की जाए और इनको यथाशीघ्र कमाई का साधन उपलब्ध कराया जाए, क्योंकि अभी लौट जाने पर जल्दी ही इनको फिर वापस आने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा|

महाराष्ट्र में रेल पटरी पर हुई 16 मजदूरों की मृत्यु एक हृदय विदारक घटना थी और हमको इस विषय में सोचने के लिए विवश करती है कि इन प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर गंभीरता पूर्वक विचार करने और इनको सहायता और परामर्श प्रदान करने और इनका हौसला बढ़ाने की आवश्यकता है|

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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