वंदना!

एक बार फिर मैं आज हिन्दीदेश के राष्ट्रकवि के रूप में जाने गए, स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी का एक सुंदर वंदना गीत शेयर कर रहा हूँ|, स्वर्गीय द्विवेदी जी ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन तथा गांधी जी के बारे में अनेक महत्वपूर्ण कविताएं लिखी थीं, मैंने उनकी बहुत सी कविताएं पहले भी शेयर की हैं, आज प्रस्तुत है ये वंदना गीत|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी का लिखा यह सुंदर वंदना गीत –

वंदिनी तव वंदना में
कौन सा मैं गीत गाऊँ?

स्वर उठे मेरा गगन पर,
बने गुंजित ध्वनित मन पर,
कोटि कण्ठों में तुम्हारी
वेदना कैसे बजाऊँ?

फिर, न कसकें क्रूर कड़ियाँ,
बनें शीतल जलन–घड़ियाँ,
प्राण का चन्दन तुम्हारे
किस चरण तल पर लगाऊँ?

धूलि लुiण्ठत हो न अलकें,
खिलें पा नवज्योति पलकें,
दुर्दिनों में भाग्य की
मधु चंद्रिका कैसे खिलाऊँ?

तुम उठो माँ! पा नवल बल,
दीप्त हो फिर भाल उज्ज्वल!
इस निबिड़ नीरव निशा में
किस उषा की रश्मि लाऊँ?

वन्दिनी तव वन्दना में
कौन सा मैं गीत गाऊँ?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में!

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में,
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है|

राहत इन्दौरी

चेतावनी!

एक बार फिर से मैं आज श्रेष्ठ कवि, गीतकार श्री सत्यनारायण जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो पटना निवासी हैं, शत्रुघ्न सिन्हा जी के पडौसी और मित्र हैं और मुझको, उनको अपना मित्र कहने में गर्व का अनुभव होता है| यद्यपि 11 साल पहले एनटीपीसी से सेवानिवृत्त होने के और गोवा में आकर बस जाने के बाद, अब किसी से मेरा संपर्क नहीं रहा है|

लीजिए आज श्री सत्यनारायण जी का यह नवगीत प्रस्तुत है, जिसका कथ्य स्वतः स्पष्ट है –

ख़बरदार
‘राजा नंगा है‘…
मत कहना

राजा नंगा है तो है
इससे तुमको क्या
सच को सच कहने पर
होगी घोर समस्या
सभी सयाने चुप हैं
तुम भी चुप रहना

राजा दिन को रात कहे तो
रात कहो तुम
राजा को जो भाये
वैसी बात करो तुम
जैसे राखे राजा
वैसे ही रहना
राजा जो बोले
समझो कानून वही है
राजा उल्टी चाल चले
तो वही सही है
इस उल्टी गंगा में
तुम उल्टा बहना

राजा की तुम अगर
खिलाफ़त कभी करोगे
चौराहे पर सरेआम
बेमौत मरोगे
अब तक सहते आये हो
अब भी सहना ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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भारत महिमा – जयशंकर प्रसाद

आज छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ तथा कामायनी, आँसू आदि अनेक गौरवामयी श्रेष्ठ रचनाओं के रचयिता स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की भारत के गौरव का वर्णन करने वाली एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए प्रस्तुत है यह रचना-


हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार
उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार

जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक
व्योम-तम पुँज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक

विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत
सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत

बचाकर बीज रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत
अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ पर हम बढ़े अभीत


सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता विकास
पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास

सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह
दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह

धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद

हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद

विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम
भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम

यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि
मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि

किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं
हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं

जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ी, प्रचंड समीर
खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर

चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न
हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न

हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव
वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा मे रहती थी टेव

वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान
वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-संतान

जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी सिनेमा जगत से जुड़े ऐसे महान कवि की रचना शेयर कर रहा हूँ, जिन्होंने राष्ट्रीय भावना से जुड़े अनेक अमर गीत हमारी फिल्मों को और हमारे साहित्य कोश को दिए हैं| जी हां मैं स्वर्गीय कवि प्रदीप जी की बात कर रहा हूँ, जिनको सिनेमा जगत में उनके अमूल्य योगदान के लिए ‘दादा साहब फाल्के’ सम्मान प्रदान किया गया था और क्योंकि वे अस्वस्थ होने के कारण पुरस्कार लेने के लिए नहीं आ सके थे, इसलिए केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज जी ने उनके मुंबई स्थित आवास पर जाकर, उनके चरण छूकर उनको यह सम्मान भेंट किया था|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय कवि प्रदीप जी का यह गीत-

पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के
अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के
मंजिल पे आया मुल्क हर बला को टाल के
सदियों के बाद फ़िर उड़े बादल गुलाल के,

हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के|
तुम ही भविष्य हो मेरे भारत विशाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
|

देखो कहीं बरबाद न होवे ये बगीचा
इसको हृदय के खून से बापू ने है सींचा
रक्खा है ये चिराग़ शहीदों ने बाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के|

दुनियाँ के दांव पेंच से रखना न वास्ता
मंजिल तुम्हारी दूर है लंबा है रास्ता,
भटका न दे कोई तुम्हें धोखे में डाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
|

एटम बमों के जोर पे ऐंठी है ये दुनिया
बारूद के इक ढेर पे बैठी है ये दुनिया,
तुम हर कदम उठाना जरा देखभाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के|

आराम की तुम भूल-भुलैया में न भूलो
सपनों के हिंडोलों में मगन हो के न झूलो,
अब वक़्त आ गया मेरे हंसते हुए फूलों
उठो छलांग मार के आकाश को छू लो|
तुम गाड़ दो गगन में तिरंगा उछाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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ज्यों लूट ले कहार ही-

ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी,
हालत यही है आजकल हिन्दुस्तान की|

गोपालदास ‘नीरज’

कलम आज उनकी जय बोल!

आज मैं राष्ट्रप्रेम और ओज के कवि, स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों को नमन किया है| दिनकर जी ने जहां ‘मेरे नगपति, मेरे विशाल’ जैसी पंक्तियाँ लिखीं वहीं उन्होंने ‘उर्वशी’ जैसी महान रचना भी लिखी, जो बिल्कुल अलग तरह की थी| पौराणिक चरित्रों को लेकर उन्होंने अद्वितीय काव्य सुमन मां भारती को अर्पित किए हैं, वहीं राष्ट्रभाषा हिन्दी को लेकर भी उनकी अनेक बहुमूल्य रचनाएं हैं| एक बार संसद में हिन्दी विरोधियों को ललकारते हुए उन्होंने अपनी एक प्रसिद्ध रचना का पाठ किया था- ‘तान तान फण व्याल कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की यह प्रसिद्ध कविता –

जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पर्दा है पर्दा!

हिजाब को लेकर एक नया मुद्दा मिला है आन्दोलनजीवी, जो जब से मोदी सरकार आई है, असंतोष पैदा करने का लिए मुद्दे ढूंढते ही रहते हैं|


मैं एक बार फिर से कह दूँ कि यद्यपि प्रधानमंत्री जी ने देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तीनों कृषि कानून वापस ले लिए हैं, क्योंकि किसान आंदोलन की आड़ में खलिस्तानी और अन्य भारत विरोधी ताक़तें कोई बड़ा खेल खेलना चाहती थीं| सारा पैसा कनाडा आदि से आता था और वहाँ के नेता भी वास्तव में यहाँ आए थे| आज कनाडा इसी प्रकार के आंदोलन का सामना कर रहा है और वहाँ की सरकार ने कड़ी चेतावनी दे दी है कि अर्थव्यवस्था को किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा| जबकि यहाँ चले आंदोलन का वहाँ के प्रधानमंत्री ने खुद खालिस्तानियों के दवाब में समर्थन किया था, जबकि दूसरे देश के ऐसे आंतरिक मामलों में उनका टिप्पणी करना उचित नहीं था|

मुझे लगता है कि अब यहाँ के आन्दोलनजीवियों को कनाडा जाकर वहाँ की सरकार द्वारा मिलने वाली आवभगत का आनंद लेना चाहिए|

अब हिजाब की बात| दुनिया भर में, मुस्लिम राष्ट्रों में भी, जबकि महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, पर्दा, हिजाब आदि का विरोध कर रही हैं, यहाँ कर्नाटक में छात्राओं में नई सोच पैदा हुई है कि वे हिजाब में ही स्कूल। कालेज जाएंगी| ये तालिबानी सोच वास्तव में उन छात्राओं की नहीं है, अपितु उन घुटे हुए नेताओं/ मुल्लाओं की है जो किसी न किसी बहाने से असंतोष फैलाना चाहते हैं| कभी वे सीएए के बहाने वृद्ध महिलाओं को आगे कर देते हैं, कभी किसानों को मोहरा बनाते हैं और अब भोली- भाली छात्राओं के पीछे छुपकर अपने घटिया खेल को खेल रहे हैं|

ऐसा नहीं है कि इन छात्राओं ने अभी स्कूल/कालेज जाना शुरू किया है, लेकिन यह दकियानूसी सोच उनके माध्यम से अभी फैलाई जा रही है|

मैं समझता हूँ कि जावेद अख्तर, शबाना आज़मी आदि जैसे लोग जो अपने आपको प्रगतिशील मानते हैं उनको इस आंदोलन का विरोध करना चाहिए| मेरे विचार में न्यायपालिका द्वारा भी इस संबंध में सख्त दिशानिर्देश जारी किए जाने चाहिएं और सरकार द्वारा ऐसे विभाजनकारी प्रयासों से कड़ाई के साथ निपटा जाना चाहिए|


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सर न कांधे से सहेली के उठाया होगा!

आज जिस गीत के बोल शेयर कर रहा हूँ, वह युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी प्रसिद्ध फिल्म- ‘हक़ीक़त’ से है और इसको चार श्रेष्ठ पुरुष गायकों- मोहम्मद रफ़ी साहब, मन्ना डे साहब, भूपेन्द्र जी और तलत महमूद जी ने बड़े खूबसूरत अन्दाज़ में गाया है| कैफ़ी आज़मी साहब का लिखा यह गीत, अपने बोलों, श्रेष्ठ अदायगी, मदन मोहन जी के लाजवाब संगीत और मोर्चे पर फौजी जवान बने कलाकारों द्वारा अदायगी के कारण एक धरोहर की तरह है|

लीजिए प्रस्तुत हैं फिल्म- ‘हक़ीक़त’ के इस यादगार गीत के बोल :


होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा,
ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा|
होके मजबूर मुझे …

दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे,
अश्क़ आँखों ने पिये और न बहाए होंगे,
बन्द कमरे में जो खत मेरे जलाए होंगे,
एक इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा|

उसने घबराके नज़र लाख बचाई होगी,
दिल की लुटती हुई दुनिया नज़र आई होगी,
मेज से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी,
हर तरफ़ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा|
होके मजबूर मुझे …

छेड़ की बात पे अरमाँ मचल आए होंगे,
ग़म दिखावे की हँसी ने न छुपाए होंगे,
नाम पर मेरे जब आँसू निकल आए होंगे,
सर न कांधे से सहेली के उठाया होगा|

ज़ुल्फ़ ज़िद करके किसी ने जो बनाई होगी,
और भी ग़म की घटा मुखड़े पे छाई होगी,
बिजली नज़रों ने कई दिन न गिराई होगी,
रंग चेहरे पे कई रोज़ न आया होगा|
होके मजबूर मुझे …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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हो गई है पीर पर्वत-सी!

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए|

दुष्यंत कुमार