जिंदगी अपनी नहीं!

लीजिए आज एक बार फिर से मैं, मेरे लिए बड़े भाई और गुरू जैसा दर्जा रखने वाले, पारंपरिक गीत और नवगीत दोनों के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर बेचैन जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –

दिवस खरीदे मजदूरी ने
मजबूरी ने रात
शाम हुई नीलाम थकन को
कुंठाओं को प्रात
जिंदगी अपनी नहीं रही ।

काली सड़कों पर पहरा है
अनजाने तम का
नभ में डरा डरा रहता है
चंदा पूनम का
नभ के उर में
चुभी कील-सी
तारों की बारात
कौन सी पीड़ा नहीं सही ?
जिंदगी अपनी नहीं रही।

रोज तीर सी चुभ जाती है
पहली सूर्य-किरन
सूरज
शेर बना फिरता है
मेरे प्राण हिरन
कर जाती है
धूप निगोड़िन
पल-पल पर आघात
जिंदगी आँसू बनी वही।
जिंदगी अपनी नहीं रही।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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वक़्त की मीनार पर!

आज एक बार फिर से मैं नवगीत आंदोलन के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| शंभुनाथ जी ने अपने गीतों और नेतृत्व- संकलन, संपादन आदि के माध्यम से नवगीत को सुदृढ़ आधार प्रदान किया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत –


मैं तुम्हारे साथ हूँ
हर मोड़ पर संग-संग मुड़ा हूँ।

तुम जहाँ भी हो वहीं मैं,
जंगलों में या पहाड़ों में,
मंदिरों में, खंडहरों में,
सिन्धु लहरों की पछाड़ों में,

मैं तुम्हारे पाँव से
परछाइयाँ बनकर जुड़ा हूँ।

शाल-वन की छाँव में
चलता हुआ टहनी झुकाता हूँ,
स्वर मिला स्वर में तुम्हारे
पास मृगछौने बुलाता हूँ,

पंख पर बैठा तितलियों के
तुम्हारे संग उड़ा हूँ।

रेत में सूखी नदी की
मैं अजन्ताएँ बनाता हूँ,
द्वार पर बैठा गुफ़ा के
मैं तथागत गीत गाता हूँ,

बोध के वे क्षण, मुझे लगता
कि मैं ख़ुद से बड़ा हूँ।

इन झरोखों से लुटाता
उम्र का अनमोल सरमाया,
मैं दिनों की सीढ़ियाँ
चढ़ता हुआ ऊपर चला आया,

हाथ पकड़े वक़्त की
मीनार पर संग-संग खड़ा हूँ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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आम के हैं पेड़ बाबा!

आज मैं श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ग्रामीण परिवेश को लेकर अनूप जी ने बहुत अच्छे गीत लिखे हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह गीत –

आम के हैं पेड़ बाबा
पिता फल
नाती टिकोरे हैं ।

भात में है दूध
रोटी में रहे घी,
पोपले मुँह की
असीसें
हम रहे हैं जी ।

नीम की हैं छाँह बाबा
खाटें अपनी
रहे जोरे हैं ।

खेल में घुटने
दुकानों रहे खीसे,
मीठी गोली
बात में बादाम-से पीसे ।

शाम की ठंडई बाबा
धूप दिन के
रहे घोरे हैं ।

भूख की कोरों में गीले
फूल में सरसों,
पिता में कुछ ढूँढ़ते
जैसे रहे बरसों ।

खेतों की हैं मेंड़ बाबा
धान-गंधों
रहे बोरे हैं ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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ऋतुराज इक पल का!


आज एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि, वरिष्ठ गीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, आज का यह नवगीत भी कुछ अलग किस्म का है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –


राजमिस्त्री से हुई क्या चूक, गारे में
बीज को संबल मिला रजकण तथा जल का ।
तोड़कर पहरे कड़े पाबन्दियों के आज
उग गया है एक नन्हा गाछ पीपल का ।

चाय की दो पत्तियोंवाली

फुनगियों ने पुकारा
शैल-उर से फूटकर उमड़ी
दमित-सी स्नेह-धारा ।
एक छोटी-सी जुही की कली
मेरे हाथ आई
और पूरी देह, आदम
ख़ुशबुओं से महमहाई ।



वनपलाशी आग के झरने नहाकर हम
इस तरह भीगे कि ख़ुद जी हो गया हलका ।

मूक थे दोनों, मुखर थी
देह की भाषा
कर गया जादू ज़ुबां पर
गोगिया पाशा
लाख आँखें हों मुँदी —
सपने खुले बाँटे
वह समर्पण फूल का
ऐसा, झुके काँटे



क्या हुआ जो धूप में तपता रहा सदियों
ग्रीष्म पर भारी पड़ा ऋतुराज इक पल का ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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टूटते कगार से!

आज एक बार फिर से मैं, अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

चाँदनी रात हुई जब झील
झाँकने लगी अनमनी प्रीत
गीत के टूटे-फूटे शंख
लहरियों में अँगड़ाने लगे
याद बीते दिन आने लगे

धुएँ-सी उठी गुनगुनी लहर
छोड़ अपनी ठण्डी तासीर
मचलने लगा अधर पर नाम
भर गई आँखों में तस्वीर
देह के छुए-अनछुए तार तुम्हारे स्वर में गाने लगे

झुके से कमलानन के पास
गूँजने लगे मधुर अनुबन्ध
किनारे पर आ बैठे मौन
अधजुड़ी छाँहों के सम्बन्ध
चम्पई मौसम के संकेत बुझे शोले दहकाने लगे


मिली अमृत की स्वीकृति हँसी
और फिर ज़हरीला इनकार
मान के बान प्रान को मिले
कामना को नखरीला प्यार
तभी कंगन के बोल अमोल न जाने क्या समझाने लगे ?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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फिसल गईं स्वीकृतियाँ!

एक बार फिर से मैं आज, मेरे लिए गुरू तुल्य रहे और बड़े भाई की तरह प्रेम करने वाले स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| बेचैन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –

दृष्टि हटी जब भी
मन-पुस्तक के पेज से
फिसल गईं स्वीकृतियाँ
जीवन की मेज से।

हाथों को
मिली हुई
लेखनी बबूल की
दासी जो मेहनत के
साँवरे उसूल की
जितने ही
प्राण रहे मेरे परहेज से।
फिसल गई थीं खुशियाँ
जीवन की मेज से।

गलत दिशा
चुनी अगर
कागज के पेट ने
उसको सम्मान दिया
हर “पेपर वेट” ने
ब्याही जाती
खुशियाँ झूठ के दहेज से।

फिसल गईं स्वीकृतियाँ
जीवन की मेज से।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जीवन लय!

आज मैं हिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी ने नवगीत आंदोलन का कुशल नेतृत्व किया तथा नवगीत संबंधी की संकलनों का संपादन भी किया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी का यह नवगीत –

शब्द है,
स्वर है,
सजग अनुभूति भी
पर लय नहीं है!

कट गए पर हैं
अगम इस शून्य में,
उल्का सदृश
गिरते हुए मुझको
कहीं आश्रय नहीं है!

थम गए क्षण हैं
दुसह क्षण
अन्तहीन, अछोर निरवधि काल के;
फिर भी मुझे
कुछ भय नहीं है!

एक ही परिताप प्राणों में
सजग अनुभूति
पर क्यों लय नहीं है?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वक्त!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी अत्यंत श्रेष्ठ और सृजनशील कवि एवं नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, इस नवगीत में श्री बुदधिनाथ मिश्र जी ने समय की असीम शक्ति का वर्णन किया है|

लीजिए प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह सुंदर नवगीत –

वक्त कभी माटी का, वक्त कभी सोने का
पर न किसी हालत में यह अपना होने का ।

मिट्टी से बने महल, मिट्टी में मिले महल
खो गई खंडहरों में वैभव की चहल-पहल
बाजबहादुर राजा, रानी वह रूपमती
दोनों को अंक में समेट सो रही धरती

रटते हैं तोते इतिहास की छड़ी से डर
लेकिन यह सबक कभी याद नहीं होने का ।

सागर के तट बनते दम्भ के घरौंदे ये
ज्वार के थपेड़ों से टूट बिखर जाएंगे
टूटेगा नहीं मगर ये सिलसिला विचारों का
लहरों के गीत समय-शंख गुनगुनाएंगे

चलने पर संग चला सिर पर नभ का चंदा
थमने पर ठिठका है पाँव मिरगछौने का ।

बांध लिया शब्दों को मुट्ठी में दुनिया को
द्वार ही न मिला मुक्ति का जिसको मांगे से
सोने की ढाल और रत्न-जड़ी तलवारें
हारती रहीं कुम्हार के कर के धागे से

सीखा यों हमने फ़न सावन की बदली में
सावन के रंग और नूर को पिरोने का ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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झील का ठहरा हुआ जल!

आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| तिवारी जी के अनेक नवगीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं और उनको अनेक सम्मान भी प्राप्त हुए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत यह –

उंगलियों से कभी
हल्का-सा छुएँ भी तो
झील का ठहरा हुआ जल
काँप जाता है।

मछलियाँ बेचैन हो उठतीं
देखते ही हाथ की परछाइयाँ
एक कंकड़ फेंक कर देखो
काँप उठती हैं सभी गहराइयाँ
और उस पल झुका कन्धों पर क्षितिज के
हर लहर के साथ
बादल काँप जाता है।

जानते हैं हम
जब शुरू होता कभी
कँपकँपाहट से भरा यह गन्दुमी बिखराव
टूट जाता है अचानक बेतरह
एक झिल्ली की तरह पहना हुआ ठहराव
जिस तरह ख़ूंख़ार
आहट से सहमकर
सरसराहट भरा जंगल काँप जाता है।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पवन सामने है नहीं गुनगुनाना!

आज हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे विश्वास है कि वीरेंद्र मिश्र जी का यह सुंदर नवगीत आपको अवश्य प्रभावित करेगा|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह नवगीत–


पवन सामने है नहीं गुनगुनाना
सुमन ने कहा पर भ्रमर ने न माना

गगन से धरा पर सुबह छन रही है
किरन डोर खींचे बिना तन रही है
दिए बुझ गए हैं नए जल गए हैं
सपन उठ गए हैं नयन मिल गए हैं
हवा देख कर ही सुनाना तराना
सुमन ने कहा पर भ्रमर ने न माना

जरा साँस ले दूर तट का ठिकाना
तरणि ने कहा पर लहर ने न माना

मुझे रात भर तू बहाती रही है
थकी और मुझको थकाती रही है
वहाँ सामने बस यही शब्द तेरे
वही झूठ वो भी सवेरे-सवेरे
मुझे पार जाना नहीं डूब जाना
तरणि ने कहा पर लहर ने न माना

ठहर कर मुझे मंज़िलों तक चलाना
पथिक ने कहा पर डगर ने न माना
अभी है सुबह और आरम्भ मेरा
भरोसा न है यह चरण दम्भ मेरा
गगन धूप छाँही धरा धूप छाँही
कली देख सकती न तू किन्तु राही
मुझे फूल देकर तुझे है सजाना
पथिक ने कहा पर डगर ने न माना

अधूरे प्रणय का कथानक न माना
हृदय ने कहा पर अधर ने न माना
डगर पार जाए वही तो पथिक है
अगर हार जाए कहाँ वो श्रमिक है
नहीं छोड़ता कवि कभी गीत आधा
अधूरी समर्पित हुई थी न राधा
समझ सोच गाना बुरा है जमाना
हृदय ने कहा पर अधर ने न माना


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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