दुपहरिया!

आज मैं स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| केदारनाथ सिंह जी हिन्दी के प्रतिष्ठित रचनाकार रहे हैं और उनको ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे| आज का यह नवगीत अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल एक किया गया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का यह नवगीत, जो गर्मी की दोपहर का एक अलग ही चित्र प्रस्तुत करता है –

झरने लगे नीम के पत्ते
बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से
झुर-झुर सरसों की रंगीनी,
धूसर धूप हुई मन पर ज्यों —
सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में
रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।

साँस रोक कर खड़े हो गए
लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,
चिलबिल की नंगी बाँहों में
भरने लगा एक खोयापन,


बड़ी हो गई कटु कानों को
‘चुर-मुर’ ध्वनि बाँसों के वन की ।

थककर ठहर गई दुपहरिया,
रुक कर सहम गई चौबाई,
आँखों के इस वीराने में —
और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन,
बीत गईं रातें ठिठुरन की ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इतने बरसों बाद!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| लंबे समय तक बरसात को तरसने के बाद जब गाँव देहात में बारिश होती है तो सबके मन को सरसा जाती है, कृषक परिवारों के मन में एक नया उल्लास आ जाता है| यह गीत इसी स्थिति का है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री अनूप अशेष जी का यह गीत –

इतने बरसों बाद भले से
लगते गीले घर।।

गौरैया के पंख भीग कर
निकले पानी से,
कितने गए अषाढ़
देह के
छप्पर-छानी से।
बिटिया के मन में उगते
चिड़ियों के पीले-पर।।

अबके हरे-बाँस फूटें
आँगन शहनाई में,
कितने छूँछे
हर बसंत
बीते परछाई में।

अंकुराई है धान खेत के
सूखे-डीले पर।।


लाज लगे कोई देखे तो
फूटे पीकों-सी,
दूध-भरी
फूटी दोहनी के
खुलते छींकों-सी।
माँ की आँखों में झाँके-दिन
बंधन ढीले कर।।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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गीत के जितने कफ़न हैं!

एक बार फिर मैं आज मेरे लिए गुरुतुल्य और बड़े भाई जैसे रहे, श्रेष्ठ रचनाकार और अत्यंत सरल हृदय गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में भी डॉक्टर बेचैन जी ने जीवन पर एक अलग तरीके से निगाह डाली है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, जीवन पर एक अलग प्रकार की दृष्टि डालने वाला स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह गीत –

जिंदगी की लाश
ढकने के लिए
गीत के जितने कफ़न हैं
हैं बहुत छोटे।

रात की
प्रतिमा
सुधाकर ने छुई
पीर यह
फिर से
सितारों सी हुई
आँख का आकाश

ढकने के लिए
प्रीत के जितने सपन हैं
हैं बहुत छोटे।

खोज में हो
जो
लरजती छाँव की
दर्द
पगडंडी नहीं
उस गाँव की
पीर का उपहास
ढकने के लिए
अश्रु के जितने रतन हैं
हैं बहुत छोटे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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नवनिर्माण का संकल्प!

नवगीत आंदोलन के शिखर पुरूष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| यह गीत एक तरह से सभी रचनाकारों और सजग नागरिकों की तरफ से एक संकल्प गीत है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत –


विषम भूमि नीचे, निठुर व्योम ऊपर!

यहाँ राह अपनी बनाने चले हम,
यहाँ प्यास अपनी बुझाने चले हम,
जहाँ हाथ और पाँव की ज़िन्दगी हो
नई एक दुनिया बसाने चले हम;
विषम भूमि को सम बनाना हमें है
निठुर व्योम को भी झुकाना हमें है;
न अपने लिये, विश्वभर के लिये ही
धरा व्योम को हम रखेंगे उलटकर!

विषम भूमि नीचे, निठुर व्योम ऊपर!
अगम सिंधु नीचे, प्रलय मेघ ऊपर!


लहर गिरि-शिखर सी उठी आ रही है,
हमें घेर झंझा चली आ रही है,
गरजकर, तड़पकर, बरसकर घटा भी
तरी को हमारे ड़रा जा रही है
नहीं हम ड़रेंगे, नहीं हम रुकेंगे,
न मानव कभी भी प्रलय से झुकेंगे
न लंगर गिरेगा, न नौका रुकेगी
रहे तो रहे सिन्धु बन आज अनुचर!

अगम सिंधु नीचे, प्रलय मेघ ऊपर!
कठिन पंथ नीचे, दुसह अग्नि ऊपर!

बना रक्त से कंटकों पर निशानी
रहे पंथ पर लिख चरण ये कहानी

,
बरसती चली जा रही व्योम ज्वाला
तपाते चले जा रहे हम जवानी;
नहीं पर मरेंगे, नहीं पर मिटेंगे
न जब तक यहाँ विश्व नूतन रचेंगे
यही भूख तन में, यही प्यास मन में
करें विश्व सुन्दर, बने विश्व सुन्दर!

कठिन पंथ नीचे, दुसह अग्नि ऊपर!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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लो करने आ गए जिरह!

आज फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय कवि और नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बाकी क्षेत्रों की तरह कविता और गीत, नवगीत की दुनिया में भी कुछ सृजनधर्मी रचनाकार होते हैं और बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिनके पास रचना-कौशल या प्रतिभा तो नहीं होती परंतु तर्क खूब होते हैं|

लीजिए आज मैं स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक ऐसा ही नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें रचनाधार्मिता के संबंध ऐसी ही जिरह की प्रवृत्ति का जिक्र किया गया है–

कोल्हू के बैल की तरह
घूमते रहे हैं जो एक ही जगह
लो करने आ गए जिरह।

खुर वही पुजे हैं
तोड़ा है जिसने भी
धरती का बाँझपन
और सुम वही हैं
नाप गए बिना नापी
धरती का आयतन

भीतर तक भरे नहीं
ऊपर से हरे नहीं
लालसा ही अर्थ की
जीवन में खरे नहीं

छूते ही रहे सदा ऊपरी सतह
लो करने आ गए जिरह
घूमते रहे हैं जो एक ही जगह
कोल्हू के बैल की तरह ।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चेतावनी!

एक बार फिर से मैं आज श्रेष्ठ कवि, गीतकार श्री सत्यनारायण जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो पटना निवासी हैं, शत्रुघ्न सिन्हा जी के पडौसी और मित्र हैं और मुझको, उनको अपना मित्र कहने में गर्व का अनुभव होता है| यद्यपि 11 साल पहले एनटीपीसी से सेवानिवृत्त होने के और गोवा में आकर बस जाने के बाद, अब किसी से मेरा संपर्क नहीं रहा है|

लीजिए आज श्री सत्यनारायण जी का यह नवगीत प्रस्तुत है, जिसका कथ्य स्वतः स्पष्ट है –

ख़बरदार
‘राजा नंगा है‘…
मत कहना

राजा नंगा है तो है
इससे तुमको क्या
सच को सच कहने पर
होगी घोर समस्या
सभी सयाने चुप हैं
तुम भी चुप रहना

राजा दिन को रात कहे तो
रात कहो तुम
राजा को जो भाये
वैसी बात करो तुम
जैसे राखे राजा
वैसे ही रहना
राजा जो बोले
समझो कानून वही है
राजा उल्टी चाल चले
तो वही सही है
इस उल्टी गंगा में
तुम उल्टा बहना

राजा की तुम अगर
खिलाफ़त कभी करोगे
चौराहे पर सरेआम
बेमौत मरोगे
अब तक सहते आये हो
अब भी सहना ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जमुन – जल मेघ!

आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ कवि, गीतकार, संपादक और राजभाषा से जुड़े उच्च अधिकारी रहे, माननीय डॉक्टर बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| डॉक्टर मिश्र की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, आज का यह नवगीत उनके नवगीत संग्रह- ‘शिखरिणी’ से लिया गया है|
मौसम के छविचित्र को अपने अनूठे अंदाज़ में प्रस्तुत करने वाला यह नवगीत आज प्रस्तुत है –

लौट आए हैं जमुन-जल मेघ
सिन्धु की अंतर्कथा लेकर ।
यों फले हैं टूटकर जामुन
झुक गई आकाश की डाली
झाँकती हैं ओट से रह-रह
बिजलियाँ तिरछी नज़र वाली
ये उठे कंधे, झुके कुंतल
क्या करें काली घटा लेकर !

रतजगा लौटा कजरियों का
फिर बसी दुनिया मचानों की
चहचहाए हैं हरे पाखी
दीन आँखों में किसानों की
खंडहरों में यक्ष के साए
ढूंढ़ते किसको दिया लेकर ?

दूर तक फैली जुही की गंध
दिप उठी सतरंगिनी मन की
चंद भँवरे ही उदासे गीत
गा रहे झुलसे कमल-वन में
कौन आया द्वार तक मेरे
दर्भजल सींची ऋचा लेकर ?
(दर्भजल=कुश से टपकता जल)


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मिट्टी बोलती है!

फिर से एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी| बहुत से अमर नवगीतों की रचना उन्होंने की है, जिनमें आम आदमी के संघर्ष को वाणी दी गई है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत, जिसमें ऐसे किसान की त्रासदी का जिक्र किया गया है, जिसका सिंचाई का साधन, उसका रहट, चकबंदी के अंतर्गत बनने वाली सड़क में या जाए, फिर उसको कैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है| दरअसल जमीन से दूर रहकर जो योजनाएं बनती हैं वे आम आदमी के प्रति उतनी संवेदनशील नहीं होतीं| लीजिए प्रस्तुत है यह नवगीत –

रहट जब चकरोड में आ जाए
और सूखी रोटियाँ खा जाए
मिट्टी बोलती है|

बोलती है छन्द जो सन्दर्भ में अपने
टूट जाते हैं बया के घोंसले-से
झूलते नीले-हरे सपने,

हर पुराने शब्द में
ध्वन्यर्थ गहरा घोलती है
मिट्टी बोलती है|

अर्थ ये इतिहास को
भूगोल से यूँ जोड़ देते हैं
रीति में डूबी हुई
पगडंडियों को मोड़ देते हैं


झुर्रियों के बीच में धँस कर
आदमी में आदमी को तोलती है|
मिट्टी बोलती है|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इन दिनों है दुख शिखर पर!

आज मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| जीवन में कितना कुछ होता है अभिव्यक्त करने के लिए जिसको कविगण, विशेष रूप से गीतकार बहुत सरल और प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर देते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह श्रेष्ठ गीत जिसमें उन्होंने जीवन स्थितियों की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति की है–

रह गया सब कुछ बिखर कर
इन दिनों है दुख शिखर पर

एक पल में हो गया सब कुछ अधूरा
कुछ हुआ ऐसा कि टूटा तानपूरा
शब्द का संगीत चुप है काँपता हर गीत थर-थर

और ऊपर उठ रही है तेज़ धारा
यह किसी रूठी नदी का है इशारा
द्वीप जैसा हो गया है बाढ़ में घिरता हुआ घर

देखने में नहीं लगता साधुओं सा
दुख शलाका पुरुष-सा है आँसुओं का
रहा आँखों में बहुत दिन आज है लंबे सफ़र पर।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अक्षरा से!

अपने सेवाकाल के दौरान मुझे, कवि सम्मेलनों का आयोजन करने के कारण हिन्दी के अनेक श्रेष्ठ कवियों/ गीतकारों के संपर्क में आने का अवसर मिला| आज उनमें से ही एक श्रेष्ठ नवगीतकार पटना के श्री सत्यनारायण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सत्यनारायण जी पटना में शत्रुघ्न सिन्हा जी के पडौसी और मित्र भी हैं और मेरे लिए भी वे बड़े भाई के समान हैं, यद्यपि उनसे मिले अब तो बहुत लंबा समय हो गया है| कवि सम्मेलनों का स्तरीय संचालन करना भी सत्यनारायण जी की विशेषता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सत्यनारायण जी का यह नवगीत जिसमें उन्होंने छोटी बच्ची से संवाद के बहाने से कितनी सुंदर भावाभिव्यक्ति दी है–



अरी अक्षरा
तू है बढ़ी उम्र का
गीत सुनहरा

मेरे उजले केश
किंतु, इनसे उजली
तेरी किलकारी
तेरे आगे
फीकी लगती
चाँद-सितारों की उजियारी
कौन थाह पाएगा
बिटिया
यह अनुराग
बड़ा है गहरा


तू हँसती है
झिलमिल करती
आबदार मोती की लड़ियाँ
तेरी लार-लपेटी बोली
छूट रहीं
सौ-सौ फुलझड़ियाँ
ये दिन हैं
खिलने-खुलने के
इन पर कहाँ
किसी का पहरा


होंठों पर
उग-उग आते हैं
दूध-बिलोये अनगिन आखर
कितने-कितने
अर्थ कौंधते
गागर में आ जाता सागर
मैं जीवन का
वर्ण आखिरी
तू मेरा
अनमोल ककहरा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********