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एक जाला-सा समय की आँख में उतरा!

आज हिन्दी नवगीत के एक सशक्त हस्ताक्षर- श्री राजेन्द्र गौतम का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में सामान्य जन के लिए संघर्ष और आशावाद का संदेश दिया गया है| यह विश्वास व्यक्त किया गया है की परिस्थितियाँ कितनी ही विकट क्यों न हो, हम लोग मिलकर उनका सामना कर सकते हैं| इस अंधेरी सुरंग के पार रोशनी की सौगात अवश्य मिलेगी|


आइए इस नवगीत का आनंद लेते हैं-



यह धुआँ
सच ही बहुत कड़वा —
घना काला
क्षितिज तक दीवार फिर भी
बन न पाएगा ।

सूरज की लाश दबी
चट्टान के नीचे,
सोच यह मन में
ठठा कर रात हँसती है|

सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को,
आत्ममुग्धा-गर्विता यह
व्यंग्य कसती है|

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा,
पर उजाला सहज ही यों
छिन न पाएगा ।


संखिया कोई —
कुओं में डाल जाता है,
हवा व्याकुल
गाँव भर की देह है नीली|
दिशाएँ निःस्पन्द सब
बेहोश सीवाने,
कुटिलता की गुँजलक
होती नहीं ढीली|


पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे,
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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राजा को खबर तक नहीं!

आज मैं पंडित श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो मेरे हमनाम हैं (मैं शर्मा हूँ, वे तिवारी हैं), वाराणसी के निवासी हैं और उन्होंने कुछ बहुत सुंदर नवगीत लिखे हैं| मैंने अपनी संस्था के लिए किए गए आयोजनों में से एक में श्री तिवारी जी को बुलाया था जिसमें उन्होंने अपने श्रेष्ठ काव्य पाठ के अलावा बहुत सुंदर संचालन भी किया था|


लीजिए प्रस्तुत है श्री तिवारी जी का यह गीत जो अव्यवस्था, अराजकता और शासन की असफलताओं की ओर इशारा करता है –



भीलों ने बाँट लिए वन,
राजा को खबर तक नहीं|

पाप ने लिया नया जनम
दूध की नदी हुई जहर,
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गई यह नई ख़बर,
रानी हो गई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं|

कच्चा मन राजकुंवर का
बेलगाम इस कदर हुआ,
आवारे छोरे के संग
रोज खेलने लगा जुआ,
हार गया दांव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं|

उलटे मुंह हवा हो गई
मरा हुआ सांप जी गया,
सूख गए ताल -पोखरे
बादल को सूर्य पी गया,
पानी बिन मर गए हिरन
राजा को खबर तक नहीं|

एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गए,
राजमहल खंडहर हुआ
छत्र -मुकुट चोर ले गए,
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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समय की नंगी सलीबों पर, गले में अटकी हुईं फाँसें!

आज मैं हिन्दी कविता और नवगीत के यशस्वी हस्ताक्षर श्री ओम प्रभाकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वैसे तो मनुष्य को जीवन में आशावादी होना चाहिए, लेकिन एक कवि अपने समय की सभी स्थितियों को अभिव्यक्त करता है, विसंगतियों को उजागर करता है| इन अभिव्यक्तियों का मूल उद्देश्य इंसानियत को जगाना ही होता है|

ओम प्रभाकर जी की इस रचना में भी आज के समय की विसंगतियों को बड़ी कुशलता से उजागर किया गया है| प्रस्तुत है यह रचना-

 

 

बीत गए दिन
फूल खिलने के।

 

होती हैं केवल वनस्पतियाँ
हरी-हरी-सी
हर गली
हर मोड़ पर बैठी
मौत अपनी बाँह फैलाकर।

 

बर्फ़-सा
जमता हुआ हर शख़्स
चुप्पियों में क़ैद हैं साँसें,
समय की नंगी सलीबों पर
गले में अटकी हुईं फाँसें,
लिख रहे हैं
लोग कविताएँ
नींद की ज्यों गोलियाँ खाकर।

 

बीत गए दिन
अब हवाओं में गन्धकेतु हिलने के
फूल खिलने के।

 

ढोती है काले पहाड़ दृष्टियाँ
सूर्य झर गए,
दृश्य घाटी में गहरे उतर गए,
बीत गए दिन
उठी बाँहों से बाँहों के मिलने के
फूल खिलने के।

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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जैसे कोई हंस अकेला, आंगन में उतरे!

आज हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर माहेश्वर तिवारी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| गीत-कविता आदि स्वयं ही अपनी बात कहते हैं, उसके बारे में अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती| किसी की याद को लेकर कितनी सुंदर अभिव्यक्ति इस गीत में दी गई है, आइए इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे।
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे।

 

लौट रही गायों के
संग-संग
याद तुम्हारी आती,
और धूल के
संग-संग
मेरे माथे को छू जाती,
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे,
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे।

 

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कंगनी पर आ जाए,
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए,
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे|
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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केवल कीं नंगी अठखेलियाँ हवा ने!

एक बार फिर से मैं अपने एक प्रिय कवि-नवगीतकार रहे स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।हूँ। यह गीत रंजक जी के 1969 में प्रकाशित हुए नवगीत संकलन ‘हरापन नहीं टूटेगा’ से लिया गया है।

आजकल दुनिया में जो कोरोना की महामारी फैली है, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में अचानक यह गीत भी, जो जीवन की नश्वरता को रेखांकित करता है, याद आ रहा है, अक्सर बार ऐसा भी होता है ना कि कोई व्यक्ति अंतिम सांस लेने से पहले किसी प्रियजन से मिलने के लिए बहुत बेचैन होता है। लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

 

एक लतर सपने के आतुर आधार के लिए,
मन के संसार के लिए।
जैसे रोगी सूने गाँव में पुकारे,
साधे हो साँस
किसी नाम के सहारे,
वैसे ही एक उमर पुतलियाँ उघारे,
आकुल उपचार के लिए।
छाया तक साथ नहीं बैठी सिरहाने,
केवल कीं नंगी
अठखेलियाँ हवा ने,
एक लचर मृग-तृष्णा लाँघ कर सिवाने,
प्यासी आकार के लिए।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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अपनी भाषा की रोशनी में चलता रहूँ – रमेश रंजक

आज मैं अपने प्रिय कवियों में से एक रहे स्व. रमेश रंजक जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। यह जानकर अच्छा लगता है कि रमेश रन्जक जी से कुछ बार बात करने का, उनके नवगीत सुनने का अवसर मिला और एक बार उन्होंने मेरा गीत सुनकर उसे नवगीत संकलन अंतराल-4 में प्रकाशित करने के लिए भेजा था।

रंजक जी ने कविता और नवगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई थी, उनकी यह रचना भी एक अच्छी बानगी है, उनकी रचना प्रतिभा और उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाने वाले। लीजिए प्रस्तुत है ये रचना-

 

 

 

जब मैं छोटा था
पिताजी कहते थे —
‘अंधेरे  में
रोशनी लेकर चला करो !’

 

जब मैं बड़ा हुआ
रीतिकालीन नायिकाओं को
आँचल की ओट में
दीप लिए चलते पढ़ा ।

 

जब कुछ और बड़ा हुआ
तो मैंने अपने भीतर
स्वयं एक
रोशनी को गढ़ा ।

 

अब, जब मैं
पचास का हो रहा हूँ
चाहता हूँ कि —
अपनी भाषा की रोशनी में
चलता रहूँ
और उस अन्धेरे को
दलता रहूँ
जो हमारे भीतर की रोशनी को
लगातार खाए जा रहा है ।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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अपनी छोटी-सी ज़मीन पर , अपनी उगा फसल!

आज स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। इस गीत में रंजक जी ने नए कवियों को संबोधित करते हुए यह संदेश दिया है कि वे मौलिकता पर पूरा ध्यान दें। अक्सर यह होता है कि लोग तेजी से आगे बढ़ने के लिए दूसरों की नकल करने लगते हैं, बहुत से लोग तो ऐसे भी होते हैं जो दूसरों की काव्य पंक्तियां, अभिव्यक्तियां अपने नाम से प्रकाशित/ प्रसारित कर लेते हैं।

मौलिकता ही वास्तव में रचनाकार की अपनी पहचान बनाती है और सच्चे रचनाकार को ख्याति दिला सकती है। प्रस्तुत है स्व. रमेश रंजक जी की यह रचना-

 

 

वक़्त तलाशी लेगा
वह भी चढ़े बुढ़ापे में
सँभल कर चल ।
कोई भी सामान न रखना
जाना-पहचाना,
किसी शत्रु का, किसी मित्र का
ढंग न अपनाना,
अपनी छोटी-सी ज़मीन पर
अपनी उगा फसल
सँभल कर चल ।
ख्वारी हो सफ़ेद बालों की
ऐसा मत करना,
ज़हर जवानी में पी कर ही
जीती है रचना,
जितना है उतना ही रख
गीतों में गंगाजल,
वे जो आएंगे
छानेंगे कपड़े बदल-बदल,
सँभल कर चल ।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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तू भी हुआ रखैल — बदरा पानी दे !

जब स्व. रमेश रंजक जी के दो गीत पहले शेयर किए तो खयाल आया कि गरीब किसान की हालत को लेकर बादल से फरियाद वाला उनका गीत भी शेयर करूं। गरीब किसान का पूरा भविष्य, उसकी खेती पर और उसकी खेती वर्षा पर निर्भर होती है। इस गीत में उन्होंने बादलों को यह भी उलाहना दे दिया कि वह भी अमीरों की रखैल बन गया है और गरीब किसान का साथ नहीं दे रहा। लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-

 

पास नहीं है बैल — बदरा पानी दे ।
ज़ालिम है ट्यूवैल — बदरा पानी दे !

 

इज़्ज़तदार ग़रीब पुकारे,
ढोंगी मारे दूध-छुआरे,
चटक रही खपरैल — बदरा पानी दे !

 

ठनगन मत दिखला मेरे भाई,
खबसूरत औरत की नाँई,
तू भी हुआ रखैल — बदरा पानी दे !

 

छोड़ पछाँही लटके-झटके,
एक बार नहला जा डट के,
तू ! ग़रीब की गैल — बदरा पानी दे !

 

ऐसी झड़ी लगा दे प्यारे,
भेद-भाव मिट जाएँ हमारे,
छूटे सारा मैल — बदरा पानी दे !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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भर-भर आई आँख , ब्याज से पाँच-पचास हुए!

आज मैं अपने प्रिय कवियों में से एक, स्व. रमेश रंजक जी का एक प्यारा सा गीत, बिना किसी भूमिका के शेयर करूंगा।

 

जितने दूर हुए तुम हमसे
उतने पास हुए,
दर्द गीत बन गया
जिस घड़ी प्राण उदास हुए।

 

याद किसी ज़िद्दी बालक-सी
पकड़ एक उँगली,
उगी जिस तरह प्रीत उसी
आँगन की ओर चली,
भर-भर आई आँख ब्याज से
पाँच-पचास हुए।

 

सुबह तुम्हारे ही सुहाग की
साड़ी में आई,
जाते-जाते शाम तुम्हारे
ढंग से शरमाई,
सुधि की गन्ध मिली, पतझर के
दिन मधुमास हुए।

 

रात झुकी तुलसी-चौरे पर
दिन के पूजन को,
ऐसा लगा कि जैसे तुमने
परस दिया मन को,
युग-युग के भूले-बिसरे
दो नाम समास हुए।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-1

जैसा मैंने कल लिखा था, चाहता हूँ कि अपनी रचनाएं, जितनी उपलब्ध हैं, और याद आ रही हैं, एक बार यहाँ शेयर कर लूं, जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। वैसे तो मेरा संपादकों से, कविता के संप्रभुओं से कभी कोई निकट का नाता नहीं रहा।

एक बात और, मैं हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

यह भी उल्लेख कर दूं कि मेरा जन्म दिल्ली में 23 अगस्त, 1950 को हुआ था, अधिकांश रचनाकर्म भी 1970 से 1980 के बीच दिल्ली-शाहदरा में हुआ, थोड़ा बहुत उसके बाद जयपुर, झारखंड, मध्य प्रदेश में लगभग 1990 तक हुआ। उसके बाद कविता लेखन बंद हो गया, गद्य कुछ मात्रा में लिखता रहा।

आज से मैं अपनी रचनाओं को विनम्रतापूर्वक शेयर कर रहा हूँ, ताकि रिकॉर्ड रह सके और आशा है कि आपको यह रचनाएं पसंद आएंगी। कविताओं को शेयर करने की शुरुआत उस गीत से कर रहा हूँ, जिसके आधार पर मैंने अपने ब्लॉग का नाम रखा था।

एक बात का उल्लेख और कर दूं कि दिल्ली-शाहदरा से अपनी यात्रा प्रारंभ करने के बाद, सेवा के दौरान देश में अनेक स्थानों पर रहने और 2010 में सेवानिवृत्ति के बाद, मैं पिछले लगभग 3 वर्षों से पणजी, गोआ में रह रहा हूँ।

लीजिए आज से रचनाओं को शेयर करना प्रारंभ कर रहा हूँ-

 

गीत

आसमान धुनिए के छप्पर सा!

 

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

यहाँ वहाँ चिपक गए बादल के टुकड़े
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया।

 

मुक्त नभ में, मुक्त खग ने प्रेम गीत बांचे
थक गए निहारते नयन,
चिड़ियाघर में मोर नहीं नाचे,
छंदों में अनुशासित
मुक्त-गान खो गया॥

 

क्षितिजों पर लाली,
सिर पर काला आसमान
चिकनी-चुपड़ी, गतिमय
कारों की आन-बान,
पांवों पर चलने के
छींट-छींट विधि-विधान,
उमड-घुमड़ मेघ
सिर्फ कीच भर बिलो गया।
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया॥

 

एक और अधूरी सी अभिव्यक्ति-

लिए चौथ का अपशकुनी चंदा रात
जाने हम पर कितने और ज़ुल्म ढाएगी,
कहने को इतना है, हर गूंगी मूरत पर
चुप रहकर सुनें अगर, उम्र बीत जाएगी।

 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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