पथ में किरण-छुरे!

आज एक बार फिर मैं अपने अग्रज और गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी उन कवियों में शामिल हैं, जिनके गीतों को मैं कविता का शौक पैदा होने के बाद अक्सर गुनगुनाया करता था|

मैंने पहले भी बेचैन जी की बहुत सी कविताएं और गीत शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह सुंदर नवगीत–

नित आवारा धूप घोंपती
पथ में किरण-छुरे।
आज के
दिन हैं बहुत बुरे ।

जो चाही
गाली फूलों को
कांटों ने बक दी
पगडंडी के
अधरों पर फिर
गर्म रेत रख दी
चारों ओर
तपन के निर्मम
सौ-सौ जाल पुरे।
आज के दिन हैं बहुत बुरे ।

सूखी हुई
झुकी शाखों पर
कोलाहल लटका
क्रुद्ध छाँव को
इधर-उधर
खो जाने का खटका
गाते हैं
अश्लील गीत अब
पावन तानपुरे।
आज के दिन हैं बहुत बुरे ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सतरंगी तितली!

आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी उल्लेख किया है रंजक जी को काव्य-पाठ करते हुए सुनने का अनुभव बहुत सुंदर होता था और मेरा सौभाग्य है कि मुझे यह अवसर अनेक बार मिला है|

मैंने पहले भी स्वर्गीय रमेश रंजक जी के बहुत से नवगीत शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है रंजक जी का यह सुंदर नवगीत–


माणिक अधर, नीलमी आँखें
ये पुखराज बदन
मन घायल कर गई तुम्हारी
हीरकनी चितवन

श्वेत शिला-सी दिपे
मोतिया
अँगिया कसी-कसी
रखनख-मणि, पन्नई
चूनरी
लहरे नागिन-सी
कैसे पाए प्राण जौहरी
ये अनमोल रतन ?

पग पर मूँगा रंग
महावर
शीश कटी मछली
हाथों पर गोमधिया
मेंहदी
सतरंगी तितली
कोमल काया से क्यों बाँधा
इतना पाहनपन ?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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करतूतों जैसे ही सारे काम हो गये!

एक बार फिर मैं आज हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय नईम जी का एक सुंदर नवगीत, बिना किसी भूमिका के प्रस्तुत कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नईम जी का यह नवगीत –

करतूतों जैसे ही सारे काम हो गये,
किष्किन्धा में

लगता अपने राम खो गये।

बालि और वीरप्पन से कुछ कहा न जाये,
न्याय माँगते शबरी, शम्बूकों के जाये।
करे धरे सब हवन-होम भी

हत्या और हराम हो गये।

स्वपनों, सूझों की जड़ में ही ज्ञानी मट्ठा डाल रहे हैं,
अपने ही हाथों अपनों पर कीचड़ लोग उछाल रहे हैं।
जनपदीय क्षत्रप कितने ही

आज केन्द्र से वाम हो गये।

देनदारियों की मत पूछो, डेवढ़ी बैठेंगी आवक से,
शायद इसीलिए प्रभु पीछे पड़े हुए हैं मृगशावक के।

वर्तमान रिस रहा तले से,

गत, आगत बदनाम हो गये।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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एक चाय की चुस्की!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक सुंदर नवगीत, बिना किसी भूमिका के प्रस्तुत कर रहा हूँ||

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत –


एक चाय की चुस्की
एक कहकहा
अपना तो इतना सामान ही रहा ।

चुभन और दंशन
पैने यथार्थ के
पग-पग पर घेर रहे
प्रेत स्वार्थ के ।
भीतर ही भीतर
मैं बहुत ही दहा
किंतु कभी भूले से कुछ नहीं कहा ।


एक अदद गंध
एक टेक गीत की
बतरस भीगी संध्या
बातचीत की ।
इन्हीं के भरोसे क्या-क्या नहीं सहा
छू ली है सभी, एक-एक इन्तहा ।

एक क़सम जीने की
ढेर उलझनें
दोनों ग़र नहीं रहे
बात क्या बने ।
देखता रहा सब कुछ सामने ढहा
मगर कभी किसी का चरण नहीं गहा|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे!

आज मैं हिन्दी के प्रतिष्ठित नवगीतकार श्री ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री ठाकुर प्रसाद सिंह जी का यह नवगीत –

पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे

साखू की डाल पर उदासे मन
उन्मन का क्या होगा
पात-पात पर अंकित चुम्बन
चुम्बन का क्या होगा
मन-मन पर डाल दिए बन्धन
बन्धन का क्या होगा
पात झरे, गलियों-गलियों बिखरे

कोयलें उदास मगर फिर-फिर वे गाएँगी
नए-नए चिन्हों से राहें भर जाएँगी
खुलने दो कलियों की ठिठुरी ये मुट्ठियाँ
माथे पर नई-नई सुबहें मुस्काएँगी
गगन-नयन फिर-फिर होंगे भरे

पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मैंने तो कुछ धूप के टुकड़े माँगे थे!

हिन्दी के श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| आकाशवाणी, जयपुर में रहते हुए उनसे भेंट करने और गोष्ठियों में उनके साथ काव्य पाठ करने का भी अवसर मिला था| उनकी कुछ पंक्तियाँ जो मैं अक्सर दोहराता हूँ, वे हैं- ‘फ्यूज बल्बों के अदभुद समारोह में, रोशनी को शहर से निकाला गया’ तथा ‘काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी, देखी हमने अपनी सालगिरह देखी’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह सुंदर नवगीत–

मैंने तो कुछ धूप के टुकड़े माँगे थे
तुमने वर्गाकार अन्धेरे भेज दिए ।

मेरी सुबह नक़ाब पहन कर आई है
चितकबरा सूरज बैठा है पर्वत पर
सन्नाटा गूँजा है मेरे होंठों से
फूल नीम के महके मेरी चाहत पर

मैंने तो पुरवा के झोंके माँगे थे
तुमने अन्धड़ केश बिखेरे भेज दिए ।

मैं तट पर बैठा-बैठा यह देख रहा
नदी तुम्हारी कितनी गोरी बाँहें हैं
दो नावें जो तैर रहीं हैं पानी में
यही तुम्हारी जादूगरनी आँखें हैं

नदी, भरोसे मैंने तुमसे माँगे थे
तुमने तो भँवरों के घेरे भेज दिए ।


घिरा खजूरों से मैं एक किनारा हूँ
बहुत टूटकर मैंने चाहा है तुमको
सूखा हो या बाढ़ तुम्हारे होंठों पर
मैंने बाँहें खोल निबाहा है तुमको

मैंने तो अनियन्त्रित धारे माँगे थे
तुमने तो लहरों के फेरे भेज दिए ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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शीशे की किरचें!

आज फिर मैं एक वरिष्ठ कवि एवं नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| किसी समय मैं हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की झारखंड स्थित मुसाबनी माइंस में हिन्दी अधिकारी था और बुदधिनाथ जी हमारे कलकत्ता स्थित मुख्यालय में हिन्दी विभाग में उच्च पद पर थे, इस प्रकार कई बार उनके सानिध्य का और उनके संचालन में काव्य-पाठ का भी अवसर मिला|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह सुंदर नवगीत–

सड़कों पर शीशे की किरचें हैं
औ’ नंगे पाँव हमें चलना है ।
सरकस के बाघ की तरह हमको
लपटों के बीच से निकलना है ।

इतने बादल, नदियाँ, सागर हैं
फिर भी हम हैं रीते के रीते
चूमते हुए छुरी कसाई की
मेमने सरीखे ये दिन बीते

फिर लहूलुहान उम्र पूछेगी
जीवन क्या नींद में टहलना है ?

सूर्य लगे अब डूबा, तब डूबा
औ’ ज़मीन लगती है धँसती-सी
भोर : हिंस्र पशुओं की लाल आँखें
सांझ : बेगुनाह जली बस्ती-सी

मेघों से टकराते महलों की
छाँहों में और अभी जलना है ।


मन के सारे रिश्ते पल भर में
बासी क्यों होते अख़बारों-से ?
पूजा के हाथ यहाँ छू जाते
क्यों बिजली के नंगे तारों से ?

जीने के लिए हमें इस उलटी
साँसों के दौर को बदलना है ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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धूप के लिए!

मेरे मित्र और बड़े भाई जैसे, पटना निवासी वरिष्ठ कवि एवं नवगीतकार श्री सत्यनारायण जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| बहुत अरसा हो गया सत्यनारायण जी से मिले, दो बार मैंने उन्हें एनटीपीसी के कवि सम्मेलनों में भी आमंत्रित करके उनके स्तरीय संचालन और सुंदर काव्य पाठ का आनंद लिया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सत्यनारायण जी का यह नवगीत–

अब बहुत
छलने लगी है छाँव
चलो, चलकर धूप के हो लें!

थम नहीं पाते
कहीं भी पाँव
मानसूनी इन हवाओं के
हो रहे
पन्ने सभी बदरंग
जिल्द में लिपटी कथाओं के
एक रस वे बोल
औरों के
और कितनी बार हम बोलें!

दाबकर पंजे
ढलानों से
उतरता आ रहा सुनसान
फ़ायदा क्या
पत्रियों की चरमराहट पर
लगाकर कान
मुट्ठियों में
फड़फड़ाते दिन
गीत-गंधी पर कहां तोलें!


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जितने-जितने सभ्य!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय और सृजनशील नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहूँ| कविताओं का शौक पैदा होने के बाद जिन कवियों को मैंने गोष्ठियों में और काव्य मंचों से बड़े चाव से सुना और उनके सानिध्य का मौका भी मिला उनमें स्वर्गीय रमेश रंजक भी शामिल थे| रमेश जी नवगीत के लिए समर्पित दुर्लभ रचनाकार थे, दुर्भाग्य से विधाता उन्हें ज्यादा लंबी उम्र नहीं दी थी और दूरदर्शन के लिए एक कार्यक्रम में कविता पाठ करते हुए ही उनको हार्ट अटैक आया जो उनके प्राण लेकर ही गया|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

जितने-जितने सभ्य हुए हैं
सचमुच बहुत असभ्य हुए हैं !

इन्हें-उन्हें दे कर नज़राना
अपना खाना-पीना जाना
सुख-सुविधाओं की किश्तों में
जीना और महीना जाना
मानव होकर मानव के हित
कितनी बार अलभ्य हुए हैं !

सब जाना ज़िन्दगी न जानी
जड़ता में जड़ रही अजानी
पेट परम सुख के चक्कर में
कथा आधुनिक व्यथा पुरानी
जितनी गुण-ग्राहकता छीजी
अवगुण उतने भव्य हुए हैं !


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अब भी बाक़ी है!

हिन्दी के एक और प्रतिष्ठित नवगीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| गाँव में किसानों की दयनीय दशा को दर्शाता और हौसला बढ़ाता यह गीत अत्यंत प्रभावी है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह नवगीत –


अब तो यह मत कहो
कि तुममें रीढ़ नहीं है

तुम में ज़िन्दा
अब भी
पतली मेंड़

गई जोत में
फिर भी आधी अब भी बाकी है
ढेलों में साँसों की ख़ातिर
घर की चाकी है

एहसासों के हर किवाड़ को
रखना
मन में भेड़

सुलगा कर
कोनों में रखना देहों की तापें
खुद से दूर न होंगी

अपनी पुश्तैनी
नापें

बिस्वे होंगे बीघे होंगे
खेती
अपनी छेड़


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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