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आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते!

साहिर लुधियानवी साहब हिंदुस्तान के जाने-माने शायर थे, जिनके गीतों और शायरी का हमारी फिल्मों में भी खूब इस्तेमाल किया गया है| साहिर साहब बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति थे, पहले फिल्मों में शायर का नाम नहीं लिखा जाता था| साहिर साहब ने यह शर्त रखी कि मैं फिल्म के लिए गीत तभी लिखूंगा, जब मेरा नाम भी प्रदर्शित किया जाए, और इसके बाद ही गीतकारों का नाम प्रदर्शित करना प्रारंभ हुआ|

साहिर साहब की आज की यह नज़्म भी अपने आप में लाजवाब है, लीजिए इसका आनंद लीजिए-


आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें|

गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र,
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र,


ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब,

तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब,

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे,
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग है हयात|


आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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दूसरा बनवास !

कैफ़ी आज़मी साहब हमारे देश के ऐसे मशहूर शायरों में शामिल थे, जिनका नाम शायरी की दुनिया में बहुत आदर के साथ लिया जाता है| आज उनकी जो नज़्म मैं शेयर कर रहा हूँ उसमें उन्होंने बताया है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी यदि बाबरी मस्जिद का गिराया जाना देखते तो उनको कैसा महसूस होता|


लीजिए आज प्रस्तुत है कैफ़ी साहब की यह भावपूर्ण नज़्म-


राम बन-बास से जब लौट के घर में आए,
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए|

रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
छः दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए|

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ
प्यार की कहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ,
मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए|


धर्म क्या उनका था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए|

शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर
तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए|


पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे
पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे,

राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे
छः दिसम्बर को मिला दूसरा बनबास मुझे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मैं एक तड़पता क़तरा हूँ!

अली सरदार जाफ़री साहब की एक लंबी कविता या कहें की नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| अली सरदार जाफ़री साहब बहुत विख्यात शायर थे और हिन्दी फिल्मों में भी उनकी अनेक रचनाओं का सदुपयोग किया गया है|

आज की इस रचना में अली सरदार जाफ़री साहब ने ज़िंदगी के बारे में, खुलकर अपने विचार रखे हैं, किस तरह से देखा जाए तो हर इंसान अमर कहला सकता है| लीजिए इस रचना का आनंद लीजिए-

फिर एक दिन ऐसा आयेगा
आँखों के दिये बुझ जायेंगे,
हाथों के कँवल कुम्हलायेंगे
और बर्ग-ए-ज़बाँ से नुक्तो-सदा
की हर तितली उड़ जायेगी|


इक काले समन्दर की तह में
कलियों की तरह से खिलती हुई,
फूलों की तरह से हँसती हुई
सारी शक्लें खो जायेंगी|
खूँ की गर्दिश, दिल की धड़कन
सब रागनियाँ सो जायेंगी|

और नीली फ़ज़ा की मख़मल पर
हँसती हुई हीरे की ये कनी,
ये मेरी जन्नत मेरी ज़मीं
इसकी सुबहें इसकी शामें,
बेजाने हुए बेसमझे हुए
इक मुश्त ग़ुबार-ए-इन्साँ पर

शबनम की तरह रो जायेंगी|

हर चीज़ भुला दी जायेगी
यादों के हसीं बुतख़ाने से,
हर चीज़ उठा दी जायेगी
फिर कोई नहीं ये पूछेगा
‘सरदार’ कहाँ है महफ़िल में!


लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा
बच्चों के जेहन से बोलूँगा
चिड़ियों की ज़बाँ से गाऊँगा|

जब बीज हँसेंगे धरती में
और कोंपलें अपनी उँगली से
मिट्टी की तहों को छेड़ेंगी
मैं पत्ती-पत्ती कली-कली
अपनी आँखें फिर खोलूँगा
सरसब्ज़ हथेली पर लेकर
शबनम के क़तरे तोलूँगा|


मैं रंग-ए-हिना, आहंग-ए-ग़ज़ल,
अन्दाज़-ए-सुख़न बन जाऊँगा,
रुख़सार-ए-उरूस-ए-नौ की तरह
हर आँचल से छन जाऊँगा|

जाड़ों की हवायें दामन में
जब फ़स्ल-ए-ख़ज़ाँ को लायेंगी,
रहरू के जवाँ क़दमों के तले
सूखे हुए पत्तों से मेरे
हँसने की सदायें आयेंगी|


धरती की सुनहरी सब नदियाँ
आकाश की नीली सब झीलें
हस्ती से मेरी भर जायेंगी|

और सारा ज़माना देखेगा
हर क़िस्सा मेरा अफ़साना है
हर आशिक़ है सरदार यहाँ
हर माशूक़ा सुल्ताना है|


मैं एक गुरेज़ाँ लम्हा हूँ
अय्याम के अफ़्सूँखाने में
मैं एक तड़पता क़तरा हूँ
मसरूफ़-ए-सफ़र जो रहता है
माज़ी की सुराही के दिल से
मुस्तक़्बिल के पैमाने में|

मैं सोता हूँ और जागता हूँ
और जाग के फिर सो जाता हूँ
सदियों का पुराना खेल हूँ मैं
मैं मर के अमर हो जाता हूँ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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एक पूरा दिन!

गुलज़ार साहब हमारे देश के बहुत सृजनशील और प्रयोगधर्मी रचनाकार हैं| जहां फिल्मी दुनिया को उन्होंने बहुत से नायाब गीत दिए हैं वहीं जगजीत सिंह जी जैसे ग़ज़ल गायकों ने भी उनकी अनेक रचनाओं को अपना स्वर दिया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है गुलज़ार साहब की यह नज़्म-

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं
गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
“तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है “
ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर
अभी 2-4 लम्हे खर्च करने के लिए रख ले,
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं,
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च
करने की तमन्ना है !!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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माँ है रेशम के कारख़ाने में!

अली सरदार जाफरी साहब की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में पिछड़े वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का ऐसा चित्रण किया गया है, जिनकी हालत पीढ़ी दर पीढ़ी एक जैसी बनी रहती है, कोई सपने नहीं, कोई बदलाव की उम्मीद नहीं है|

जाफरी साहब एक प्रगतिशील शायर थे, मुद्दतों पहले उन्होंने यह रचना लिखी थी, लेकिन आज भी स्थितियाँ वैसी ही है|

लीजिए प्रस्तुत है अली सरदार जाफरी साहब की यह सुंदर रचना-

 

 

माँ है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है,
कोख से माँ की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है|

 

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा,
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूख सरमाये की बढ़ाएगा|

 

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा,
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिये जलाएगा|

 

यह जो नन्हा है भोला-भाला है
खूनी सरमाये का निवाला है,
पूछती है ये, इसकी ख़ामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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