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एक पूरा दिन!

गुलज़ार साहब हमारे देश के बहुत सृजनशील और प्रयोगधर्मी रचनाकार हैं| जहां फिल्मी दुनिया को उन्होंने बहुत से नायाब गीत दिए हैं वहीं जगजीत सिंह जी जैसे ग़ज़ल गायकों ने भी उनकी अनेक रचनाओं को अपना स्वर दिया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है गुलज़ार साहब की यह नज़्म-

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं
गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
“तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है “
ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर
अभी 2-4 लम्हे खर्च करने के लिए रख ले,
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं,
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च
करने की तमन्ना है !!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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माँ है रेशम के कारख़ाने में!

अली सरदार जाफरी साहब की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में पिछड़े वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का ऐसा चित्रण किया गया है, जिनकी हालत पीढ़ी दर पीढ़ी एक जैसी बनी रहती है, कोई सपने नहीं, कोई बदलाव की उम्मीद नहीं है|

जाफरी साहब एक प्रगतिशील शायर थे, मुद्दतों पहले उन्होंने यह रचना लिखी थी, लेकिन आज भी स्थितियाँ वैसी ही है|

लीजिए प्रस्तुत है अली सरदार जाफरी साहब की यह सुंदर रचना-

 

 

माँ है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है,
कोख से माँ की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है|

 

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा,
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूख सरमाये की बढ़ाएगा|

 

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा,
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिये जलाएगा|

 

यह जो नन्हा है भोला-भाला है
खूनी सरमाये का निवाला है,
पूछती है ये, इसकी ख़ामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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