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किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा !

हिन्दी काव्य मंचों की शान रहे स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी ग़ज़ल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ|


कविता अपनी बात स्वयं कहती है और नीरज जी भी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल और नीरज जी के शब्दों में कहें तो ‘गीतिका’-


बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा,
वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा|

ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया,
किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा|


मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी,
कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा|

बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है,
सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा|

ज़बाँ है और बयाँ और उस का मतलब और,
अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा|


लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे,
उन्होंने आज जो संतों का आचरण देखा|

जो सादगी है कुहन में हमारे ऐ ‘नीरज’,
किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह!

आज स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी ने फिल्मों में बहुत से गीत लिखे, वे काव्य मंचों पर किसी समय बहुत लोकप्रिय थे और उनको ‘गीतों का राजकुमार’ कहा जाता था|


लीजिए आज प्रस्तुत है उनकी एक हिन्दी ग़ज़ल, जिसे वे गीतिका कहते थे-

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह।

ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा,
जाने शरमाए वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह।

कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो,
ज़िन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह।


दाग़ मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह।

हर किसी शख़्स की किस्मत का यही है किस्सा,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह।

जिसमें इन्सान के दिल की न हो धड़कन ‘नीरज’,
शायरी तो है वह अख़बार की कतरन की तरह।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा !

एक बार फिर से मैं, हिन्दी काव्य मंचों और फिल्मी दुनिया, दोनों क्षेत्रों में अपनी रचनाधर्मिता की अमिट छाप छोड़ने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी गजल, जिसे वे ‘गीतिका’ कहते थे प्रस्तुत कर रहा हूँ| नीरज जी जहां कवि सम्मेलनों में बहुत लोकप्रिय थे, वहीं उन्होंने हमारी फिल्मों में भी अनेक साहित्यिक गरिमा से युक्त गीत लिखे|


आज की यह गजल भी उनकी एक अलग पहचान प्रस्तुत करती है –

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्म-ए-तर में रहा ।


वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा ।

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,
उसे न कुछ भी मिला, जो अगर-मगर में रहा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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बंसी से बन्दूक बनाते, हम वो प्रेम पुजारी !

कल मैंने बाल स्वरूप राही जी की एक गजल प्रस्तुत की थी, जिसमें ताजमहल का ज़िक्र आया था| तुरंत मुझे स्वर्गीय नीरज जी का एक गीत याद आ गया| यह गीत फिल्म- प्रेम पुजारी के लिए रफी साहब की आवाज़ और सचिन दा के संगीत निर्देशन में बहुत सुंदर ढंग से फिल्माया गया है|

अभी कल ही चीन की सीमा पर हमारे 20 जाँबाज शहीद हुए हैं| जिनको अपने देश और अपनी सेनाओं पर गर्व है, उनको निश्चित रूप से नीरज जी का लिखा यह गीत अवश्य पसंद आएगा-

 

 

 

ताकत वतन की हमसे है
हिम्मत वतन की हमसे है
इज्ज़त वतन की हमसे है
इंसान के हम रखवाले|

 

पहरेदार हिमालय के हम
झोंके हैं तूफ़ान के,
सुनकर गरज हमारी सीने
फट जाते चट्टान के|
ताकत वतन की हमसे है—

 

सीना है फौलाद का अपना
फूलों जैसा दिल है
तन में विंध्याचल की ताक़त, मन में ताजमहल है |
ताकत वतन की हमसे है—

 

देकर अपना खून सींचते
देश की हम फुलवारी
बंसी से बन्दूक बनाते हम वो प्रेम पुजारी
ताकत वतन की हमसे है—

 

आकर हमको कसम दे गई
राखी किसी बहन की
देंगे अपना शीश
न देंगे मिट्टी मगर वतन की|
ताकत वतन की हमसे है—

 

खतरे में हो देश अरे तब लड़ना सिर्फ धरम है
मरना है क्या चीज़ आदमी लेता नया जनम है|
ताकत वतन की हमसे है—

 

एक जान है, एक प्राण है सारा देश हमारा
नदियाँ चल कर थकी,
रुकी पर कभी न गंगा धारा |
ताकत वतन की हमसे है
हिम्मत वतन की हमसे है
इज्ज़त वतन की हमसे है
इंसान के हम रखवाले|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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ऐसा भी तो अंगार नहीं मिलता है – गोपाल दास ‘नीरज’

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी अपने जमाने में कवि सम्मेलनों का मुख्य आकर्षण हुआ करते थे| हिन्दी फिल्मों में भी नीरज जी ने बहुत प्यारे गीत दिए हैं|

लीजिए आज नीरज जी के इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

 

मुझको जीवन आधार नहीं मिलता,
आशाओं का संसार नहीं मिलता।

 

मधु से पीड़ित-मधुशाला से निर्वासित,
जग से, अपनों से निन्दित और उपेक्षित-
जीने के योग्य नहीं मेरा जीवन पर
मरने का भी अधिकार नहीं मिलता।
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता..

 

भव-सागर में लहरों के आलोड़न से,
मैं टकराता फ़िरता तट के कण-२ से,
पर क्षण भर भी विश्राम मुझे दे दे जो
ऐसा भी तो मँझधार नहीं मिलता है।
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है..

 

अब पीने को खारी मदिरा पीता हूँ,
अन्तर में जल-२ कर ही तो जीता हूँ,
पर मुझे जला कर राख अरे जो कर दे
ऐसा भी तो अंगार नहीं मिलता है।
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है..

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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उतरे कभी ना जो खुमार वो, प्यार है!

आज स्व. नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। यह एक फिल्मी गीत है, जो उन्होंने फिल्म- प्रेम पुजारी के लिए लिखा था, जिसे एस. डी. बर्मन जी के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार जी ने गाया था। इस गीत में नीरज ने प्रेम का एक अनोखा फार्मूला प्रस्तुत किया है।

लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

 

शोखियों में घोला जाए, फूलों का शबाब,
उसमें फिर मिलायी जाए, थोड़ी सी शराब,
होगा यूं नशा जो तैयार, वो प्यार है।

 

हँसता हुआ बचपन वो, बहका हुआ मौसम है,
छेड़ो तो इक शोला है, छूलो तो बस शबनम है,
गाँव में, मेले में, राह में, अकेले में,
आता जो याद बार-बार वो, प्यार है।
शोखियों में घोला जाये…

 

रंग में पिघले सोना, अंग से यूं रस झलके,
जैसे बजे धुन कोई, रात में हल्के हल्के,
धूप में, छाँव में, झूमती हवाओं में,
हर दम करे जो इन्तज़ार वो, प्यार है।
शोखियों में घोला जाये…

 

याद अगर वो आये, कैसे कटे तनहाई,
सूने शहर में जैसे, बजने लगे शहनाई,
आना हो, जाना हो, कैसा भी ज़माना हो,
उतरे कभी ना जो खुमार वो, प्यार है।
शोखियों में घोला जाये..

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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मेरा कुर्ता सिला दुखों ने, बदनामी ने काज निकाले- गोपालदास नीरज

आज स्व. गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। नीरज जी को गीतों का राजकुंवर कहा गया है लेकिन इस गीत में उन्होंने खुद को पीड़ा का राजकुंवर कहा है। नीरज जी ने अन्य अनेक लोगों के साथ मिलकर हिंदी के साहित्यिक गीतों को भारतीय फिल्मों में स्थान दिलाया था। स्व. मीना कुमारी जी उनके गीतों से प्रभावित होकर उनको फिल्मों में ले गई थीं, जो खुद भी एक अच्छी शायरा थीं।

लीजिए प्रस्तुत है नीरज जी का यह दर्द भरा गीत-

 

 

 

मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ, तुम शहज़ादी रूप नगर की
हो भी गया प्यार हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा ?
मीलों जहाँ न पता खुशी का
मैं उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ नित
होंठ करें गीतों का न्योता,
मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का…

 

मेरा कुर्ता सिला दुखों ने
बदनामी ने काज निकाले,
तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
नभ ने सब तारे जड़ डाले,
मैं केवल पानी ही पानी, तुम केवल मदिरा ही मदिरा,
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का…

 

मैं जन्मा इसलिए कि थोड़ी
उम्र आँसुओं की बढ़ जाए,
तुम आई इस हेतु कि मेंहदी
रोज़ नए कंगन जड़वाए,
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल तुम सुखान्तकी, मैं दुखान्तकी
जुड़ भी गए अंक अपने तो, रस-अवतरण कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का…

 

इतना दानी नहीं समय जो
हर गमले में फूल खिला दे,
इतनी भावुक नहीं ज़िन्दगी
हर ख़त का उत्तर भिजवा दे,
मिलना अपना सरल नहीं है, फिर भी यह सोचा करता हूँ,
जब न आदमी प्यार करेगा, जाने भुवन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का…

 

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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जब राजा फँसता दिखे पैदल दे पिटवाय!

आज मैं हिंदी गीतों के राजकुंवर, स्व. गोपाल दास ‘नीरज’ जी के लिखे कुछ दोहे शेयर कर रहा हूँ, जैसे गज़ल के शेरों में संक्षेप में बड़ी बात कही जाती है, दोहे भी बहुत लंबे समय से, थोड़े में अधिक बात कहने के लिए प्रयोग किए जाते रहे हैं, तुलसीदास जी के और उनसे भी पहले के समय से। लीजिए प्रस्तुत हैं नीरज जी के कुछ दोहे-

 

 

राजनीति के खेल ये समझ सका है कौन,
बहरों को भी बँट रहे अब मोबाइल फोन।

 

राजनीति शतरंज है, विजय यहाँ वो पाय,
जब राजा फँसता दिखे पैदल दे पिटवाय।

 

चील, बाज़ और गिद्ध अब घेरे हैं आकाश,
कोयल, मैना, शुकों का पिंजड़ा है अधिवास।

 

दूध पिलाये हाथ जो, डसे उसे भी साँप,
दुष्ट न त्यागे दुष्टता कुछ भी कर लें आप।

 

तोड़ो, मसलो या कि तुम उस पर डालो धूल,
बदले में लेकिन तुम्हें खुशबू ही दे फूल।

 

हम कितना जीवित रहे, इसका नहीं महत्व,
हम कैसे जीवित रहे, यही तत्व अमरत्व।

 

जीने को हमको मिले यद्यपि दिन दो-चार,
जिएँ मगर हम इस तरह हर दिन बनें हजार।

 

बन्दर चूके डाल को, और आषाढ़ किसान,
दोनों के ही लिए है ये गति मरण समान।

 

चिडि़या है बिन पंख की कहते जिसको आयु,
इससे ज्यादा तेज़ तो चले न कोई वायु।

 

बुरे दिनों में कर नहीं कभी किसी से आस,
परछाई भी साथ दे, जब तक रहे प्रकाश।

 

रहे शाम से सुबह तक मय का नशा ख़ुमार,
लेकिन धन का तो नशा कभी न उतरे यार।

 

रामराज्य में इस कदर फैली लूटम-लूट,
दाम बुराई के बढ़े, सच्चाई पर छूट।

 

स्नेह, शान्ति, सुख, सदा ही करते वहाँ निवास,
निष्ठा जिस घर माँ बने, पिता बने विश्वास।

 

जीवन का रस्ता पथिक सीधा सरल न जान,
बहुत बार होते ग़लत मंज़िल के अनुमान।

 

किया जाए नेता यहाँ, अच्छा वही शुमार,
सच कहकर जो झूठ को देता गले उतार।

 

जब से वो बरगद गिरा, बिछड़ी उसकी छाँव,
लगता एक अनाथ-सा सबका सब वो गाँव।

 

काग़ज़ की एक नाव पर मैं हूँ आज सवार,
और इसी से है मुझे करना सागर पार।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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