हार न अपनी मानूँगा मैं !


आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों पर गीतों के राजकुंवर के नाम से जिनको जाना जाता था, ऐसे स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी जहां कवि सम्मेलनों में श्रोताओं का मन मोह लेते थे, वहीं हमारी हिन्दी फिल्मों में भी उन्होंने बहुत यादगार गीत दिए हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की यह रचना–

हार न अपनी मानूँगा मैं !

चाहे पथ में शूल बिछाओ
चाहे ज्वालामुखी बसाओ,
किन्तु मुझे जब जाना ही है —
तलवारों की धारों पर भी, हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं !

मन में मरू-सी प्यास जगाओ,
रस की बूँद नहीं बरसाओ,
किन्तु मुझे जब जीना ही है —
मसल-मसल कर उर के छाले, अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं !

हार न अपनी मानूंगा मैं !


चाहे चिर गायन सो जाए,
और ह्रदय मुरदा हो जाए,
किन्तु मुझे अब जीना ही है —
बैठ चिता की छाती पर भी, मादक गीत सुना लूँगा मैं !

हार न अपनी मानूंगा मैं !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जुबां है किसी बेजुबान की!

जुल्फों के पेंचो-ख़म में उसे मत तलाशिये,
ये शायरी जुबां है किसी बेजुबान की|

गोपालदास ‘नीरज’

रौशनी अपने मकान की!

औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद हो
बेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की|

गोपालदास ‘नीरज’

शुरुआत मेरी दास्तान की!

बुझ जाये सरे आम ही जैसे कोई चिराग,
कुछ यूँ है शुरुआत मेरी दास्तान की|

गोपालदास ‘नीरज’

जमीन पे छत आसमान की!

हारे हुए परिन्दे ज़रा उड़ के देख तो,
आ जायेगी जमीन पे छत आसमान की|

गोपालदास ‘नीरज’

खुशबू सी आ रही है इधर!

खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की,
खिडकी खुली है गालिबन उनके मकान की|

गोपालदास ‘नीरज’

मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे!

एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबां,
कल को शायद मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे।

गोपालदास “नीरज”

जो तेरे मकाँ तक पहुंचे!

वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,
वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुंचे।

गोपालदास “नीरज”

ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे!

इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे ।

गोपालदास “नीरज”

ऐ यार ! वहाँ तक पहुंचे!

हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुंचे।
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुंचे।

गोपालदास “नीरज”