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नफरत की बैटरी!

ब्लॉग लेखन के लिए मैंने तो मुख्यतः कविता, गीत, गजल आदि का सृजनात्मक क्षेत्र चुना है और मैं समझता हूँ कि इस क्षेत्र में ही अभिव्यक्ति के लिए इतना कुछ मिल जाता है कि कुछ और ढूँढने की जरूरत ही नहीं है| हाँ एक जागरूक नागरिक होने के नाते, जब किसी सामयिक राजनैतिक विषय पर अपनी राय रखने का मन होता है तो उसमें भी मैं हिचकता नहीं हूँ|


वैसे राजनैतिक विषय पर लिखने वालों में आजकल ऐसे लोग ज्यादा सक्रिय हैं जिन्हें ‘अवार्ड वापसी गैंग’, ‘खान मार्केट गैंग’ या ‘लुटियन्स मीडिया’ नाम से भी जाना जाता है|


इन महानुभावों के बारे में बात करने से पहले एक छोटा सा प्रसंग याद आ रहा है| कहा जाता है कि एक बार कुछ विद्वान सज्जनों को यह मालूम हुआ कि ऐसी हवा चलने वाली है कि वो जिसको भी लगेगी, वह पागल हो जाएगा| उन विद्वानों ने यह फैसला किया कि हम एक कमरे में बंद हो जाएंगे, और वह हवा समाप्त हो जाने के बाद हम बाकी लोगों को समझा देंगे कि आप लोगों पर पागल करने वाली हवा का असर है और धीरे-धीरे उनको ठीक कर लेंगे| लेकिन असल में हुआ यह कि जो लोग खुली हवा में रहे, उन्होंने इन विद्वान लोगों को ही पागल घोषित कर दिया!

अपने यहाँ के इन विद्वानों की भी यही स्थिति है| उनको ऐसा भी लगता है कि देश के लिए क्या ठीक है, यह सिर्फ उनको ही मालूम है और देश की जनता उनके विचार में बेवकूफ है, जो जानती ही नहीं कि क्या ठीक है और क्या गलत!


अपने यहाँ के इन विद्वानों की भी यही स्थिति है| जैसे उदाहरण के लिए आदरणीय रवीश जी, विनोद दुआ जी, राजदीप सरदेसाई आदि-आदि विद्वानों को देखें, इन के पास लिखने अथवा बोलने का क्रॉफ्ट बढ़िया है| किसी जमाने में मैं रवीश जी, विनोद दुआ जी आदि का फैन भी रहा हूँ, लेकिन समय के साथ-साथ इनका दिमाग ज्यादा से ज्यादा बंद होता गया| स्थिति ऐसी होती गई कि जो सकारात्मक उपलब्धियां हिंदुस्तान में और विदेश में भी लोगों को दिखाई देती हैं, वे उनको दिखाई नहीं दे पातीं, चिड़िया की आँख की तरह उनको सिर्फ बुराई ही दिखाई देती है और वही उनका धर्म बन गया लगता है|


मुझे कुछ ऐसा ही लगता है, जैसे खिलाड़ी नेट-प्रेक्टिस करते हैं, फिट रहने के लिए एक्सरसाइज़ करते हैं, ये लेखक-पत्रकार बंधु अपने लेखन को धार देने के लिए कहें या जीवित बनाए रखने के लिए भी, नफरत का अभ्यास करते हैं| जैसे हम मानते हैं कि किसी जमाने में तुलसीदास जी जैसे कवियों के लिए उनकी आस्था ही उनकी बड़ी शक्ति थी| कवियों के लिए उनके दिल में भरा प्रेम उनके सृजन की शक्ति होता है, आज के इन स्वनामधन्य लेखकों के लिए नफरत ही शक्ति है, ऊर्जा का स्रोत है जो उनको चार्ज करता है|


आज इस बहाने मुझे अपनी एक कविता याद आ गई, जिसे पहले भी मैंने शेयर किया होगा, आज फिर शेयर कर लेता हूँ| ये कविता अपने कविता लेखन के शुरू के दिनों में लिखी थी, जब मैंने देखा कि मेरे साथी जो अभी कविता लिखना शुरू ही कर रहे हैं, वे स्थापित कवियों की रचनाओं के बारे में कभी-कभी काफी अभद्र और अगंभीर टिप्पणियाँ कर देते थे|


लीजिए प्रस्तुत है मेरी यह पुरानी कविता-


शब्दों के पिरामिड सजाओगे
पढ़कर तुम बासी अखबार,
पर इससे होगा क्या यार|


घिसी हुई रूढ़ स्थापनाओं को,
मंत्रों सी जब-तब दोहराओगे,
कविता की बात खुद चलाकर तुम,
कविता की राजनीति गाओगे|


उगलोगे जितना पढ़ डाला है,
ले भी लेते जरा डकार,
यूं होना भी क्या है यार|

गंधों के मकबरे गिनाना फिर,
एक गंध अपनी तो बो लो तुम,
प्रवचन की मुद्रा फिर धारणा,
पहले सचमुच कुछ जी तो लो तुम|


अंतर के स्पंदन में ढूंढोगे
केवल रस-छंद अलंकार|
पर इससे होगा क्या यार|

प्रतिभा है तुममें माना मैंने
हर दिन कविता को वर लोगे तुम,
अड़ जाओगे जिस भी झूठ पर
उसको सच साबित कर लोगे तुम|


मंचों से रात-दिन उंडेलोगे
उथले मस्तिष्क के विकार|
पर इससे होगा क्या यार|

(श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’)




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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निंदा, समीक्षा और आलोचना

आज फिर से एक बार पुराना समय याद कर रहा हूँ| पुराने समय को कभी-कभी याद करना बुरा नहीं है, हाँ अतीत में रहना अवश्य बुरी बात है|

 

हाँ तो बात उस समय की है जब मैं अपने अनेक मित्रों के साथ, जो कविता लेखन के क्षेत्र में नए थे, मेरी तरह, और हम सभी पुरानी दिल्ली स्टेशन के सामने ‘दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में जाया करते थे| वहाँ प्रत्येक शनिवार को कवियों का मेला लगता था, जिसका नाम था ‘लिटरेचर स्टडी ग्रुप’ और प्रत्येक सोमवार को भाषण देने वालों, विचारों का आदान-प्रदान करने वालों की सभा होती थी, ‘सोशल स्टडी ग्रुप’ के नाम से| मेरा वहाँ जाना कविता वाले दिन अर्थात शनिवार को अधिक होता था| वहाँ अनेक अच्छी रचना करने वाले आते थे, जिनमें ‘राना सहरी’ भी थे जो वहाँ शायद सबसे युवा थे और अभी लिखना शुरू ही कर रहे थे| उनसे उनके उस्ताद कुँवर महेंदर सिंह बेदी ‘सहर’ जी के बारे में भी बात होती थी|

उस ग्रुप में भी हमारा एक छोटा सा ग्रुप था, जिसे हम ‘यमुना पार’ का ग्रुप कह सकते हैं, इस ग्रुप में हमारे नायक थे जो हम सबसे बड़े थे और उस समय कुछ कवि-सम्मेलनों में भी जाते थे| हमारे लिए वे आदर्श जैसे थे| लेकिन उनमें एक आदत ऐसी भी थी जो शायद ‘कवि सम्मेलन’ संस्कृति की ही उपज थी| उनके माध्यम से ही हमने अनेक श्रेष्ठ कवियों को अधिक निकट से जाना, परंतु जो एक गुण अथवा अवगुण उनमें था, वह धीरे-धीरे हमारे भीतर भी स्थान बनाता जा रहा था, वह था बड़े और श्रेष्ठ कवियों के बारे में, जिनके रचना-कर्म को हम ज्यादा नहीं जानते थे, उनकी किसी एक कविता को, किसी पंक्ति को लेकर उनकी निंदा करना| बाद में अपने सहयोगी कवियों के बारे में भी हम ऐसा करने लगे थे|

अपने से अधिक सफल लोगों की निंदा करने के मूल में असल में असुरक्षा की भावना ही होती है| यह जस्टीफ़ाई करने की कोशिश होती है, कि हम उनके जैसे क्यों नहीं बन पाए! ऐसे लोग क्रमशः आत्ममुग्द्ध बनते जाते हैं, वे किसी भी बहाने से अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं और दूसरे का कोई गुण देखने में उनको काफी कष्ट होता है|

उस समूह में ही एक साथी थे, जो शायद चाँदनी चौक में ही कहीं रहते थे, बाद में वे विदेश में हिन्दी पढ़ाने लगे थे, नाम शायद उनका ‘सुरेश किसलय’ था, अच्छे गीत लिखते और मेरी रचनाओं को पसंद करते थे| उन्होंने मेरे भीतर पनपते इस अवगुण को पहचाना और इसके स्रोत को भी वे जानते थे| उन्होने मुझसे कहा कि आप एक अच्छे रचनाकार और अच्छे इंसान हो, यह अवगुण आपका बहुत नुकसान कर सकता है| नकारात्मकता किसी भी इंसान को बर्बाद कर सकती है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति हमेशा दूसरों में बुराई ही देखता है| इसका मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा और बाद में सेवाकाल में मेरी ऐसी छवि बनी कि मेरे विभाग के लोग कहते थे ‘उस विभाग के लोग बहुत झगड़ालू हैं, जहां आप जा रहे हो, लेकिन आपसे कौन झगड़ा करेगा!

मुझे नकारात्मकता के बारे में शिव खेड़ा जी के द्वारा अपनी पुस्तक ‘जीत आपकी’ में दिया गया एक उदाहरण याद आता है, वे लिखते हैं कि एक व्यक्ति को ऐसा कुत्ता मिला जो पानी पर चल सकता था , वे बहुत प्रसन्न हुए और अपने मित्रों को दिखाने ले गए| उस कुत्ते को देखकर उनके नकारात्मकता से भरे मित्र बोले- ‘इसको तैरना नहीं आता शायद!’ उनके लिए पानी पर चलने के इस दिव्य गुण की भी प्रशंसा करना संभव नहीं था|

जीवन में नकारात्मकता से भरे लोग तो मिलते ही रहेंगे, उनके लिए किसी से प्रेम करना भी संभव नहीं होता| बस इस नकारात्मकता के परिवेश में आप सकारात्मक बने रहिए, क्योंकि अंततः आपके इसी गुण को लोग याद करेंगे|

उन दिनों की अपनी एक कविता को यहाँ शेयर कर रहा हूँ-

 

शब्दों के पिरामिड सजाओगे, पढ़कर तुम बासी अखबार
पर इससे होगा क्या यार|

 

घिसी हुई रूढ़ स्थापनाओं को, मंत्रों सी जब-तब दोहराओगे,
कविता की बात खुद चलाकर तुम, कविता की राजनीति गाओगे,
उगलोगे जितना पढ़ डाला है, ले भी लेते जरा डकार|

 

गंधों के मकबरे गिनाना फिर, एक गंध अपनी तो बो लो तुम,
प्रवचन की मुद्रा फिर धारणा, पहले सचमुच कुछ जी तो लो तुम,
अंतर के स्पंदन मे खोजोगे, केवल रस-छंद-अलंकार
पर इससे होगा क्या यार|

 

प्रतिभा है तुम में माना मैंने, हर दिन कविता को वर लोगे तुम,
अड़ जाओगे जिस भी झूठ पर, उसको सच साबित कर लोगे तुम,
मंचों से रात दिन उंडेलोगे, उथले मस्तिष्क के विकार|
पर इससे होगा क्या यार|

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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