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क्या जाने किस भेष में बाबा!

 

हमारे यहाँ बहुत पुरानी मान्यता है और उस मान्यता को मान्यता देते हुए, एक फिल्मी गीत भी था-

 

बड़े प्यार से मिलना सबसे, दुनिया में इंसान रे,
क्या जाने किस भेष में बाबा, मिल जाए भगवान रे!

 

देखा जाए तो हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी ने इस विचार को खूब प्रचारित किया है और वे दुनिया भर में राष्ट्राध्यक्षों से गले मिलते रहे हैं| अपने देश में राहुल बाबा ने भी इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया, मोदी जी से गले मिलकर| वैसे वो गले मिलना कम अपितु दबोचना या गले पड़ना अधिक था, जब वे बैठे हुए मोदी को ऊपर से दबोचकर गले मिले थे| वे उस समय सिद्ध यह करना चाहते थे कि उनको मोदी जी से किंचित भी नफरत नहीं है| शायद यही सिद्ध करने के लिए उन्होंने कुछ दिन बाद ही यह कहा था कि लोग मोदी जी को डंडों से मारेंगे!

खैर बड़े लोगों के बारे में क्या बात करें, मैं इस समय कहना यह चाह रहा था कि युगों से चली आ रही यह मान्यता अब बदल गई है| बहुत लंबे समय से मोदी जी देश से बाहर नहीं गए हैं, विदेशी नेताओं से बात होती भी है तो फोन पर या वीडियो कान्फ्रेंसिंग के द्वारा| सो गले मिलने का तो अब सवाल ही नहीं है, हाथ मिलाना भी वर्जित है|

मुझे बशीर बद्र जी का एक शेर याद आ रहा है-

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो!

 

वैसे ये बात आज किसी शहर की नहीं पूरी दुनिया की हो गई है| और नया मुहावरा आज का यह हो गया है-

दूरी रखकर मिलना सबसे, देते हैं बतलाय रे,
जाने  किस बंदे से तुमको ‘कोरोना’ लग जाए रे!

ये आज का बदला हुआ समय है, बदली हुई संस्कृति है| देखते हैं आज की स्थिति से गले मिलने वाली उस पुरानी हालत में पहुँचने तक कितना समय लगेगा| लेकिन तब तक अपना खयाल रखिए|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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