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बेहतरीन कलाकार- पंकज त्रिपाठी

भारतीय फिल्म और सीरियलों की दुनिया में अनेक बेहतरीन कलाकार रहे हैं और आज मैं इस समय के एक अत्यंत प्रतिभाशाली कलाकार- श्री पंकज त्रिपाठी के बारे में बात करना चाहता हूँ|

अभी पिछले एक सप्ताह में ही मैंने उनकी दो टेलीफ़िल्म, वेब सीरीज़ – देखीं- ‘कागज’, जो कल ही मैंने देखी और उससे पहले वेब सीरीज़- ‘क्रिमिनल जस्टिस- बिहाइन्ड क्लोज्ड डोर्स’| इस वेब सीरीज़ में पंकज जी ने एक वकील की भूमिका निभाई, ऐसा वकील जो रहन-सहन और मन से एकदम देहाती है, जब थाने से उसका कोई जानने वाला उसे केस के बारे में बताता है, तब वह चला जाता है, और बड़ी सादगी से, बिना किसी चालाकी के वकील की भूमिका निभाता है और इत्तेफाक से, बहुत बड़े वकील के मुक़ाबले जीत भी जाता है|


‘कागज’ फिल्म में पंकज जी ने एक ऐसे सीधे-साधे देहाती व्यक्ति की भूमिका निभाई है, जिसको उसके संबंधी जमीन हड़पने के लिए सरकारी अभिलेखों में मृत घोषित करा देते हैं| इन परिस्थितियों में वह सीधा-सादा व्यक्ति कैसे स्वयं को जीवित घोषित कराने के लिए संघर्ष करता है, उसको पंकज जी ने बहुत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है| एक बात और, इस फिल्म में पंकज जी वेश-भूषा और दिखाई देने में, बिलकुल ‘तीसरी कसम’ के राज कपूर लगते हैं|


आज के लिए ये दो भूमिकाएँ अचानक याद आयीं, वैसे तो उनकी हर भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही है, मिर्जापुर सीरीज़ के भाग 1 और 2 में भी, एक गैंगस्टर- अखंडानन्द त्रिपाठी बनाम ‘कालीन भैया’ के रूप में उनकी भूमिका के लिए उन्हें बहुत पसंद किया गया| उनकी इस भूमिका को देखकर फिल्मों के विख्यात खलनायक अजीत की याद आती है, जो सामने वाला जब चिल्लाकर उनको धमकी देता है, तब बड़े सहज भाव से बोलते है, ‘जरा अपने पीछे तो देख लो’, जहां उनके गुंडे उसको घेरे खड़े होते हैं| मतलब खलनायक या गैंगस्टर होने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप चिल्लाकर बोलें|


पंकज जी की यादगार भूमिकाएँ अनेक हैं, यहाँ बस कुछ का ही उल्लेख कर रहा हूँ, जैसे- ओंकारा, गैङ्ग्स ऑफ वासेपुर, गुंजन सक्सेना, लूडो, बरेली की बर्फी, स्त्री, न्यूटन, सुपर 30, मसान आदि-आदि|


मैं यही शुभकामना करता हूँ कि पंकज जी इसी प्रकार बेहतरीन भूमिकाएँ निभाते रहें और सफलता की नई ऊंचाइयों को छुएँ|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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