चार हर्फ़ों का जो नाम रह गया!

अब क्या बताएँ कौन था क्या था वो एक शख़्स,
गिनती के चार हर्फ़ों का जो नाम रह गया|

निदा फ़ाज़ली

बहुत सोचता था वो!

उसका क़ुसूर ये था बहुत सोचता था वो,
वो कामयाब हो के भी नाकाम रह गया|

निदा फ़ाज़ली

मस्जिदों से नमाज़ी चले गए!

उठ उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए,
दहशत-गरों के हाथ में इस्लाम रह गया|

निदा फ़ाज़ली

हमेशा कोई काम रह गया!

कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया,
हर काम में हमेशा कोई काम रह गया|

निदा फ़ाज़ली

हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा!

आइना देख के निकला था मैं घर से बाहर,
आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा|

निदा फ़ाज़ली

जागता रहता है हर नींद में–

मुद्दतें बीत गईं ख़्वाब सुहाना देखे,
जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा|

निदा फ़ाज़ली

आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा!

एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे,
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा|

निदा फ़ाज़ली

ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा!

किससे पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से,
हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा|

निदा फ़ाज़ली

मुझी में है समुंदर मेरा!

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा,
मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा|

निदा फ़ाज़ली