लीजे मुलाक़ात हो गई!

वो आदमी था कितना भला कितना पुर-ख़ुलूस,
उससे भी आज लीजे मुलाक़ात हो गई|

निदा फ़ाज़ली

पर्दे खींच दिए रात हो गई!

सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा,
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई|

निदा फ़ाज़ली

मगर मात हो गई!

फिर यूँ हुआ कि वक़्त का पाँसा पलट गया,
उम्मीद जीत की थी मगर मात हो गई|

निदा फ़ाज़ली

कहीं शराब पिएँ रात हो गई!

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई,
आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई|

निदा फ़ाज़ली

औरों को समझाएँगे!

किन राहों से सफ़र है आसाँ कौन सा रस्ता मुश्किल है,
हम भी जब थक कर बैठेंगे औरों को समझाएँगे|

निदा फ़ाज़ली

जिस दिन धोका खाएँगे!

अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर-दिल हों मुमकिन है,
हम तो उस दिन राय देंगे जिस दिन धोका खाएँगे|

निदा फ़ाज़ली

चार किताबें पढ़ कर ये भी-

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे|

निदा फ़ाज़ली

वर्ना घर खो जाएँगे!

तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं,
देर न करना घर आने में वर्ना घर खो जाएँगे|

निदा फ़ाज़ली

महफ़िल महफ़िल गाएँगे!

तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे,
जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे|

निदा फ़ाज़ली

ज़ेहन की आवारगी से हम!

शाइस्ता महफ़िलों की फ़ज़ाओं में ज़हर था,
ज़िंदा बचे हैं ज़ेहन की आवारगी से हम|

निदा फ़ाज़ली